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Egypt

Egypt

Geography: Egypt, at the northeast corner of Africa on the Mediterranean Sea, is bordered on the west by Libya, on the south by the Sudan, and on the east by the Red Sea and Israel. It is nearly one and one-half times the size of Texas. Egypt is divided into two unequal, extremely arid regions by the landscape's dominant feature, the northward-flowing Nile River. The Nile starts 100 mi (161 km) south of the Mediterranean and fans out to a sea front of 155 mi between the cities of Alexandria and Port Said.

History: Egyptian history dates back to about 4000 B.C. , when the kingdoms of upper and lower Egypt, already highly sophisticated, were united. Egypt's golden age coincided with the 18th and 19th dynasties (16th to 13th century B.C.), during which the empire was established. Persia conquered Egypt in 525 B.C. , Alexander the Great subdued it in 332 B.C. , and then the dynasty of the Ptolemies ruled the land until 30 B.C. , when Cleopatra, last of the line, committed suicide and Egypt became a Roman, then Byzantine, province. Arab caliphs ruled Egypt from 641 until 1517, when the Turks took it for their Ottoman Empire. Napoléon's armies occupied the country from 1798 to 1801. In 1805, Mohammed Ali, leader of a band of Albanian soldiers, became pasha of Egypt. After completion of the Suez Canal in 1869, the French and British took increasing interest in Egypt. British troops occupied Egypt in 1882, and British resident agents became its actual administrators, though it remained under nominal Turkish sovereignty. In 1914, this fiction was ended, and Egypt became a protectorate of Britain. Egyptian nationalism, led by Zaghlul Pasha and the Wafd Party, forced Britain to relinquish its claims on the country. Egypt became an independent sovereign state on Feb. 28, 1922, with Fu'ad I as its king. In 1936, by an Anglo-Egyptian treaty of alliance, all British troops and officials were to be withdrawn, except from the Suez Canal Zone. When World War II started, Egypt remained neutral.

Capital:Cairo,National name: Jumhuriyat Misr al-Arabiyah Languages: Arabic (official), English and French widely understood by educated classes Ethnicity/race: Egyptian 99.6%, other 0.4% (2006 census) National Holiday: Revolution Day, July 23 Religions: Muslim (predominantly Sunni) 90%, Christian (majority Coptic Orthodox, other Christians include Armenian Apostolic, Catholic, Maronite, Orthodox, and Anglican) 10% (2012 est.) Literacy rate: 73.9% (2012 est.) Economic summary: GDP/PPP $551.4 billion (2013 est.); per capita $6,600. Real growth rate: 1.8%. Inflation:9%. Unemployment: 13.4%. Arable land: 2.87%. Agriculture: cotton, rice, corn, wheat, beans, fruits, vegetables; cattle, water buffalo, sheep, goats. Labor force: 27.69 million (2013); agriculture 29%, industry 24%, services 47% (2011 est.). Industries: textiles, food processing, tourism, chemicals, pharmaceuticals, hydrocarbons, construction, cement, metals, light manufactures. Natural resources: petroleum, natural gas, iron ore, phosphates, manganese, limestone, gypsum, talc, asbestos, lead, zinc. Exports: $24.81 billion (2013 est.): crude oil and petroleum products, cotton, textiles, metal products, chemicals. Imports: $59.22 billion (2013 est.): machinery and equipment, foodstuffs, chemicals, wood products, fuels. Major trading partners: Italy, U.S., Germany, China, UK, Saudi Arabia, India, Turkey, Libya, Ukraine, Russia (2012). Communications: Telephones: main lines in use: 8.557 million (2012); mobile cellular: 96.8 million (2012).Broadcast media: mix of state-run and private broadcast media; state-run TV operates 2 national and 6 regional terrestrial networks as well as a few satellite channels; about 20 private satellite channels and a large number of Arabic satellite channels are available via subscription; state-run radio operates about 70 stations belonging to 8 networks; 2 privately owned radio stations operational (2008). Internet hosts: 200,430 (2012). Internet users:20.136 million (2009). Transportation: Railways: total: 5,083 km (2009). Roadways: total: 137,430 km; (2010 est.). Waterways: 3,500 km; note: includes Nile River, Lake Nasser, Alexandria-Cairo Waterway, and numerous smaller canals in delta; Suez Canal (193.5 km including approaches) navigable by oceangoing vessels drawing up to 17.68 m (2011). Ports and harbors: Alexandria, Damietta, El Dekheila, Port Said, Suez, Zeit. Airports: 83 (2013). International disputes: Sudan claims but Egypt de facto administers security and economic development of Halaib region north of the 22nd parallel boundary; Egypt no longer shows its administration of the Bir Tawil trapezoid in Sudan on its maps; Gazan breaches in the security wall with Egypt in January 2008 highlight difficulties in monitoring the Sinai border; Saudi Arabia claims Egyptian-administered islands of Tiran and Sanafir.

राजधानी काहिरा

मिस्र (अरबी; مصر, अंग्रेजी:Egypt), आधिकारिक तौर पर मिस्र अरब गणराज्य, एक देश है जिसका अधिकांश हालांकि उत्तरी अफ्रीका में स्थित है जबकि इसका सिनाई प्रायद्वीप, दक्षिणपश्चिम एशिया में एक स्थल पुल बनाता है। इस प्रकार मिस्र एक अंतरमहाद्वीपीय देश है, तथा अफ्रीका, भूमध्य क्षेत्र, मध्य पूर्व और इस्लामी दुनिया की यह एक प्रमुख शक्ति है। इसका क्षेत्रफल 1010000 वर्ग किलोमीटर है और इसके उत्तर में भूमध्य सागर, पूर्वोत्तर में गाजा पट्टी और इस्राइल, पूर्व में लाल सागर, दक्षिण में सूडान और पश्चिम में लीबिया स्थित है।मिस्र, अफ्रीका और मध्य पूर्व के सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में से एक है। इसकी अनुमानित 7.90 करोड़ जनसंख्या का अधिकतर हिस्सा नील नदी के किनारे वाले हिस्से में रहता है। नील नदी का यह क्षेत्र लगभग 40000 वर्ग किलोमीटर (15000 वर्ग मील) का है और पूरे देश का सिर्फ इसी क्षेत्र में कृषि योग्य भूमि पायी जाती है। सहारा मरुस्थल के एक बड़े हिस्से में विरल जनसंख्या निवास करती है। मिस्र के लगभग आधे निवासी शहरों में वास करते हैं जिनमें नील नदी के मुहाने के क्षेत्र में बसे सघन जनसंख्या वाले शहर जैसे कि काहिरासिकन्दरिया आदि प्रमुख हैं।मिस्र की मान्यता उसकी प्राचीन सभ्यता के लिए है। गीज़ा पिरामिड परिसर और महान स्फिंक्स जैसे प्रसिद्ध स्मारक यहीं स्थित है। मिस्र के प्राचीन खंडहर जैसे कि मेम्फिसथेबिसकरनाक और राजाओं की घाटी जो लक्सर के बाहर स्थित हैं, पुरातात्विक अध्ययन का एक महत्वपूर्ण केंद्र हैं। यहां के शासक को फारो नाम से जाना जाता था। इस पदवी का प्रयोग ईसाई और इस्लाम काल के पूर्व काल मे होता था। इसे फारोह भी लिखते हैं। फारो को मिस्र के देवता होरसका पुनर्जन्म माना जाता था। होरस द्यौ (आकाश) का देवता था और इसे सूर्य भी माना जाता था। मिस्र की कार्यशक्ति का लगभग 12% हिस्सा पर्यटनऔर लाल सागर रिवेरा में कार्यरत है।मध्य पूर्व में, मिस्र की अर्थव्यवस्था सबसे अधिक विकसित और विविध अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। पर्यटन, कृषिउद्योग और सेवा जैसे क्षेत्रों का उत्पादन स्तर लगभग एक समान है। 2011 के शुरूआत में मिस्र उस क्रांति का गवाह बना, जिसके द्वारा मिस्र से होस्नी मुबारक नाम के तानाशाह के 30 साल के शासन का खात्मा हुआ। मिस्र अफ्रीका के उत्तर-पूर्वी भाग में सिनाइ प्रायद्वीप सहित नील नदी की निचली घाटी में, जिसके दोनों और रेगिस्तान पड़ते हैं, एक वर्गाकार देश है। इसका समुद्र तट सपाट है। अरब की पहाड़ियाँ यहाँ की मुख्य पर्वतश्रेणी है। देश की अधिकतम ऊँचाई समुद्रतल से लगभग ८,६०० फुट तथा निम्नतम ऊँचाई लगभग १०० फुट तक है। संसार की सबसे लंबी नील नदी यहाँ बहती है तथा मुख्य खाड़ियाँ स्वेज और ऐबुकिर की खाड़ी हैं।धरातल- प्राकृतिक लक्षण के विचार से नील नदी के चारों ओर मिस्र के आबाद हिस्से को दो भागों में बाँट सकते हैं : (क) निचला मिस्र, जो नील नदी के डेल्टा वाले भाग में पड़ता है। ये उत्तरी मिस्र भी कहलाता है, जो भूमध्य सागर से लेकर काहिरा तक विस्तृत है। (ख) उच्च मिस्र, जो दक्षिणी सीमा तक नील नदी की घाटी की पतली पट्टी में विस्तृत है। इस प्रकार मिस्र की ढालश् नील नदी के अनुरूप सामान्यत: दक्षिण से उत्तर की ओर है।मिस्र का भूपृष्ठ केवल नील नदी के आस पास अधिक चौरस है। नदी के पश्चिम की भूमि धीरे धीरे ऊँची होती गई है (लगभग १,००० फुट तक), जहाँ हवा के प्रभाव से निर्मित चिकनी चट्टानें तथा लिबिया की रेगिस्तानी बालू दृष्टिगोचर होती है। नदी के पूर्वी ओर अरब के रेगिस्तान का विस्तार पाया जाता है, जो और आगे चलकर लाल सागर के निकट लगभग ७,००० फुट ऊँची पहाड़ियों के रूप में परिणत हो जाता है। नदी के पश्चिमी ओर काहिरा के उत्तर में लगभग ५० मील दूर फायूम की उपजाऊ निम्नभूमि है।मिस्त्र का अधिक भाग जलविहीन है। केवल नील नदी ही जल का स्रोत है। निचले मिस्त्र में नील से नहरें भी निकाली गई हैं जिनका उपयोग जलमार्गो के रूप में तथा खेतों की सिंचाई के लिये किया जाता है। विश्वविख्यात स्वेज नहर भूमध्य सागर तथा लाल सागर को उत्तर-पूर्वी मिस्त्र में सिनाइ प्रायद्वीप से होकर जोड़ती है। कहीं कहीं पर मरूद्यान भी दृष्टिगोचर होते हैं, जहाँ भूमिगत जल के प्रभाव के कारण अत्यधिक पौधे उग सकते हैं।मिस्त्र में शुष्क तथा गरम रेगिस्तानी जलवायु पाई जाती है। दिन में सूर्य की प्रखरता के कारण अत्यधिक गरमी तथा रात में बालू की शीतलता के कारण अत्यधिक ठंडक पड़ती है भूमध्यसागरीय तट को छोड़कर देश के अधिकांश भाग में वर्षा नहीं होती। भूमध्यसागरीय तट की औसत वार्षिक वर्षा आठ इंच के लगभग है। ऊपरी नील की ओर यह औसत केवल एक इंच के लगभग रह जाता है। मिस्त्र में दक्षिण की ओर से आने वाली हवाओं को खामसिन कहते हैं। इन हवाओं के साथ गरमी में बालू एवं धूल के भीषण तूफान आते हैं।यहाँ की ९०% जनसंख्या नील नदी के दोनों ओर एक पतली पट्टी में निवास करती है। नील के डेल्टों तथा घाटी में कहीं कहीं जनसंख्या का घनत्व १,५०० व्यक्ति प्रति वर्ग मील हो गया है। कुछ भ्रमणशील जातियाँ लिबिया के रेगिस्तान में एक मरूद्यान से दूसरे मरूद्यान में घूमती रहती हैं, परंतु मिस्त्र के रेगिस्तानों के बहुत से भाग बिल्कुल ही जनविहीन हैं।

कार्य और रहन सहन के आधार पर मिस्त्र के निवासियों को तीन समूहों में विभाजित कर सकते है:

  • (क) फेलाहिन अथवा कृषक, इनकी संख्या कुल जनसंख्या का लगभग २/३ है जो अपने पूर्वजों की भाँति सैकड़ों वर्षो से खेती करते आ रहे हैं। इनकी आकृति इनके पूर्वजों की ही भाँति भिन्न-भिन्न है। ये अरबी भाषा बोलने तथा सामन्यत: मुस्लिम धर्म को मानने वाले होते हैं, यद्यपि कुछ लोग ईसाई धर्म को भी मानते हैं।
  • (ख) बद्दू, इनका वर्ग बहुत छोटे पैमाने पर हैं। ये रेगिस्तान के अरबी भाषा बोलने वाले आदिवासी होते हैं। कुछ बद्दू नदी के किनारे अथवा हरे भरे मरूद्यानों में स्थायी खेमों में निवास करते हैं। कुछ लोग एक रेगिस्तान से दूसरे रेगिस्तान में अपनी भेड़ों तथा घोड़ों को लेकर भ्रमण किया करते हैं और छोटे मोटे भूभागों पर निवास करते हैं।
  • (ग) व्यापारी तथा व्यवसायी, यह सबसे छोटा समूह है जो शहरों में निवास करता है। इसमें अधिकतर विदेशी खासकर यूनानी, तुर्की, इतालवीय, अंग्रेज तथा फ्रांसीसी सम्मिलित हैं।

कृषि - मिस्त्र के लोगों का मुख्य धंधा कृषि है। खेत अधिकतर नील नदी के निकट लगभग १२ मील की चौड़ाई में फैले हैं। कम वर्षा या वर्षारहित दिनों में नील की घाटी में कृषि सिंचाई पर निर्भर करती है। बाढ़ के समय नदी का पानी खेतों में फैल जाने के कारण साल में एक बार अपने आप सिंचाई हो जाती है और खेतों में बाढ़ द्वारा लाई हुई नई उपजाऊ मिट्टी भी बिछ जाती है। इसी समय शीघ्र फसलें रोपकर मिट्टी में नमी के विद्यमान रहने तक आवश्यक उत्पादन कर लिया जाता है। अब तो बाढ़ के जल को नियंत्रित एवं संचित करने के लिये आर-पार बड़े बड़े बाँध तथा फाटक बन गए हैं और आवश्यकतानुसार पानी को नहरों द्वारा खतों में पहुँचाकर दो या कभी तीन फसलें प्रति वर्ष उगा ली जाती हैं। मिस्त्र की मुख्य फसलों में लंबी रेशे वाली कपास, गेहूँ, धान, गन्ना, फलियाँ (बीन), प्याज, मसूर, शकरकंद, खजूर आदि हैं।खनिज पदार्थ - मिस्त्र के पूर्वी पर्वतों से सोना, ऐस्वैन और ऐल बहारिया के निकट से लोहा, जस्ते की प्राचीन खानों के निकट सिनाइ प्रायद्वीप से मैंगनीज, नील डेल्टा के दलदल से नमक और पूर्वी तट के किनारे तेल के अतिरिक्त फॉस्फेट, जस्ता, फिटकरी, जिप्सम, बेरिल, ग्रेनाइट, सैडस्टोन तथा चूना पत्थर आदि प्राप्त जाते हैं।यातायात - नील नदी मिस्त्र के लिये एक बहुत बड़ा जलमार्ग है। रेलें मिस्त्र के आधुनिक शहरों को आपस में जोड़ती है सड़के देश के आबाद भागों में स्थित हैं। वायुयान देश के मुख्य शहरों को एक दूसरे के साथ तथा अफ्रीका, यूरोप, भारत एवं सुदूर पूर्व के नगरों को जोड़ते हैं। रेगिस्तानी बालू के क्षेत्रों में, जहाँ यात्रा का अन्य कोई साधन संभव नहीं है, वहाँ ऊटों द्वारा यातायात संभव होता है।काहिरा, एलेग्जेंड्रेिया, अस्यूट, डैमिएटा, एल ऐलामेन, एल मंसूरा, पोर्ट सईद, स्वेज, मेंफिस, थीबीज, टॉन्टॉ आदि मिस्त्र के आधुनिक नगर हैं। काहिरा यहाँ की राजधानी है।

इतिहास

मिस्र के इतिहास में विदेशी शक्तियों और आंतरिक राजाओं (फ़राओ) का अंश रहा है। ईसा के 4000 साल पहले से चला आ रहा साम्राज्य छठी सदी ईसा पूर्व में ईरानियों के आक्रमण के बाद ख़त्म हुआ। उसके बाद चौथी सदी ईसा पूर्व में सिकंदर के आक्रमण से ग्रीक यहाँ शासन करने लगे। इस काल में यूनानी संस्कृति का असर यहाँ पर पड़ा। यूनानियों पर रोमन कब्ज़े के बाद (ईसापूर्व सन् 30) यहाँ रोमन शासन स्थापित हुआ। इस काल में यहाँ कॉप्टिक भाषा का विकास हुआ। रोमन साम्राज्य चौथी सदी में टूटा तो पूर्वी भाग के बिज़ेंटाइन यहाँ के शासक बने। सातवीं सदी में फ़ारसियों के अल्पकालिक नियंत्रण के बाद मिस्र बिज़ेंटाइनों के हाथ तो लगा पर जल्द ही (सन् 639) मुस्लिम अरबों ने इस पर अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद अरब साम्राज्य का ये अंग तेरहवीं सदी तक रहा और इस दौरान यहाँ इस्लाम का प्रचार हुआ। सन् 1250 में मामलुकों ने सीरिया तक फैले साम्राज्य में मिस्र को शामिल किया और ये मंगोल आक्रमण के समय भी बचा रहा। सोलहवीं सदी में उस्मानी तुर्कों (ऑटोमन) ने मिस्र पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्नीसवीं सदी में यहाँ ब्रिटिश आए।आधुनिक काल में मिस्री विद्या का अध्ययन नेपोलियन के मिस्री अभियान (१८९७ ई०) और शांपोल्यों (१७९०-१८३२ ई०) नामक फ्रेंच विद्वान् द्वारा रोजेटा प्रस्तर की सहायता से मिस्री चित्राक्षर लिपि के उद्वाचन से प्रारंभ होता है। मिस्र के अधिकांश स्मारक धरातल के ऊपर हैं, इसलिये इनपर उत्कीर्ण अभिलेखों का अध्ययन करने के लिये इनकी लिपि से परिचय मात्र की आवश्यकता थी। मिस्त्री इतिहास पर प्रकाश डालनेवाले प्राचीन लेखकों में हेरोडोटस तथा डायोडोरस प्रमुख हैं, परंतु उनके विवरण विशेष ज्ञानवर्धक नहीं हैं। सबसे महत्वपूर्ण प्राचीन रचना है तीसरी शती ई० पू० के मनेथो नामक मिस्री पुजारी की। आजकल उसकी कृति का जूलियस अफ्रीकेनस, यूसीबियस तथा जोसेफस प्रभृति परवर्ती लेखकों की रचनाओं मे उद्वरणों के रूप में सुरक्षित लगभग आधा भाग ही प्राप्य है। इसमें मनेथो ने प्राचीन मिस्री राजाओं को सूचीबद्ध करके उन्हें तीस वंशों में विभाजित किया था। यह विभाजन अनेक दोषों के बावजूद अत्यंत उपयोगी और सत्य के काफी निकट सिद्ध हुआ है।प्रागैतिहासिक युग में उत्तरी मिस्र में लीबियन और सेमेटिक जातियाँ निवास करती थीं। इनके अतिरिक्त एक तीसरी जाति और थी जिसके सदस्यों का सिर बड़ा, चेहरा गोल और नाक छोटी होती थी। यह जाति दक्षिणी मिस्र में प्रागैतिहासिक युग में अज्ञात थी, परंतु ऐतिहासिक युग में धीरे-धीरे वहाँ भी फैल गई थी। दक्षिणी मिस्र में निवास करने वाली जाति जिसका ज्ञान हमें उस युग की समाधियों से प्राप्त अवशेषों और मूर्तियों आदि से होता है छोटे सिर वाली थी। जैसा मिस्र की ट्यूबसम आकृति से स्पष्ट है, नील की उपरली घाटी में इसका प्रवेश निश्चित रूप से मिस्र के दक्षिण से हुआ होगा।सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से मिस्री इतिहास को कई भागों में विभाजित किया जाता है। प्रथम दो वंशों के शासनकाल में मिस्री सभ्यता से प्राग्वंशीय सभ्यता विशेष भिन्न नहीं थीं, इसलिये मिस्त्री सभ्यता के प्राचीनतम युग का अध्ययन करते समय प्रथम दो वंशों के शासनकाल को उसी में सम्मिलित कर लिया जाता है। तीसरे वंश की स्थापना से लेकर बीसवें वंश के पतन तक के सुदीर्घ युग में मिस्री सभ्यता के तीन काल माने गए हैं। 'प्राचीन राज्य युग' अथवा 'पिरेमिड युग' जिसमें तीसरे से छठे वंशों ने राज्य किया; 'मध्य राज्य युग' जिसमें ११वें और १२वें वंशों ने राजय किया; तथा 'साम्राज्य युग' जिसमें १८ वें से लेकर २० वें वंशों ने शासन किया। इन युगों के मध्यवर्ती युगों में और २० वें वंश के पतन के पश्चात् मिस्र प्राय: आंतरिक दौर्बल्य और विदेशी आक्रमणों का शिकार रहा।प्राग्वंशीय मिस्र प्रारंभ में छोटे छोटे नगर राज्यों में विभाजित था। ये नगर ४००० ई० पू० के लगभग संयुक्त होकर दो राज्यों में एकीकृत हो गए:-उत्तरी अथवा नील के मुहाने का राज्य और दक्षिणी अथवा नील की घाटी का राज्य। नेखेब (आधुनिक अलकाब) दक्षिणी राज्य की राजधानी थी। इसके राजा लंबा श्वेत मुकुट धारण करते थे। उनका राजप्रासाद नेखेन और कोषागार 'श्वेत भवन' कहलाता था। उनका राजचिह्न लिली पौधे की शाख एवं संरक्षिका गृध्रदेवी नेखबत थी। उत्तरी राज्य की राजधानी बूटो, संरक्षिका इसी नाम की नागदेवी और उसका विशिष्ट रंग लाल थी। इसलिये उसके राजा लाल मुकुट धारण करते थे और उनके राजप्रासाद और कोषागार क्रमश: 'पे और रक्तभवन' कहलाते थे। उनके राजचिह्न पेपाइरस का गुच्छा और मधुमक्खी थे।उत्तरी और दक्षिणी राज्यों को संयुक्त करके राजनीतिक एकता और प्रथम वंश की स्थापना दक्षिणी मिस्र में एबाइडोस के समीप स्थित तेनी (यूनानी थिस अथवा थिनिस) नामक स्थान के निवासी मेना (यूनानी मेनिज) ने की थी। उसके बाद प्रथम दो वंशों के १८ नरेशों ने ४२० वर्ष (लगभग ३४००-२९८० ई० पू० तक) राज्य किया। तृतीय सहस्राब्दी ई० पू० के प्रारंभ में द्वितीय वंश के पतन और जोसेर के नेतृत्व में तृतीय वंश की स्थापना (२९८० ई० पू०) से मिस्र के इतिहास के पिरेमिड अथवा प्राचीन राज्य युग का प्रारंभ हुआ जो २४७५ ई० पू० में छठे वंश के पतन तक चला। जोसेर के शासनकाल में मेंफिस (मेन नो फेर) का प्रभुत्व दृढ़रूपेण स्थापित हुआ और उसके मंत्री इम्होतेप ने सक्कर के सीढ़ीदार पिरेमिड का निर्माण करके पाषाण वास्तुकला को जन्म दिया। जोसेर के एक उत्तराधिकारी नेफु ने विदेशी व्यापार को प्रोत्साहन दिया, उत्तरी नूबिया में विद्रोही जातियों को परास्त किया तथा पहले ढ़लवाँ पिरेमिड का निर्माण कराया। मिस्र के चौथे वंश के संस्थापक खूफू ने मिस्र का विशालतम पिरेमिड बनवाया तथा उसके पुत्र खेफे ने एक लघुतर पिरेमिड और संभवत: विशाल स्फिंकस भी बनवाया। पंचम वंश के संस्थापक यूसेरकाफ तथा उसके पुत्र सहुरे ने मिस्र की नौशक्ति में वृद्धि की तथा फिनीशिया और देवभूमि 'पुंट' पर सफल आक्रमण किए। परंतु इसके बावजूद उनके शासनकाल में रे के पुजारियों, सामंतों और सेनापतियों की महत्वाकांक्षाएँ बढ़ जाने के कारण फेराओ की शक्ति शनै: शनै: कम होती गई। राजपद की इस ्ह्रासोन्मुखी प्रतिष्ठा को बढ़ाने का महानीय कार्य किया छठे वंश के प्रथम दो फेराओ तेती द्वितीय और पेपी प्रथम ने। पेपी प्रथम के एक उत्तराधिकारी पेपी द्वितीय ने, जो राज्यारोहण के समय शिशु मात्र था, मनेथो के अनुसार ९४ वर्ष राज्य किया। विश्व इतिहास में उसके शासनकाल को दीर्घतम माना जा सकता है।२४७५ ई० पू० में छठे वंश के पतन के बाद लगभग तीन सौ वर्ष तक मिस्र में घोर अव्यवस्था रही और स्थानीय सामंत लगभग स्वतंत्र रूपेण शासन करने लगे। उनकी शक्ति तोड़ने में कुछ सफलता ग्यारहवें वंश (२१६०-२००० ई० पू०) के राजाओं ने प्राप्त की। लेकिन लगभग समस्त मिस्र के स्वामी होते हुए भी वे सामंतवादी व्यवस्था को बदलने में असमर्थ रहे। उनसे अधिक सफलता बारहवें वंश (२०००-१७८८ ई० पू०) के शासकों को मिली। इस वंश का संस्थापक एमेन म्हेत प्रथम था। इन दो वंशों के राजाओं का शासनकाल सांस्कृतिक प्रगति के लिये प्रसिद्ध है।१७८८ ई० पू० में १२वें वंश के पतन के साथ सामंतों में सत्ता हड़पने के लिये पुन: संघर्ष प्रारंभ हो गया। इस अराजकता के कारण वे १७६५ ई० पू० में एशिया से आने वाले हिक्सोस नामक आक्रमणकारियों को नहीं रोक पाए। हिक्सोस सांस्कृतिक दृष्टि से मिस्रियों से बहुत पिछड़े थे। लेकिन वे अश्वों और रथों के प्रयोग से परिचित थे, इसलिये मिस्रियों को लगभग दो सौ वर्ष तक अपने अधीन रखने में सफल रहे (१३ वाँ-१७वाँ वंश)। उनको देश से खदेड़ने का महनीय कार्य किया अहमोस प्रथम ने। उसके द्वारा अठारहवें वंश की स्थापना से मिस्री इतिहास का 'साम्राज्य युग' प्रारंभ होता है। उसके एक उत्तराधिकारी थटमोस प्रथम ने अपनी सत्ता कार्शैमिश तक स्थापित की। उनकी पुत्री हतशेपशुत विश्व इतिहास की पहली पूर्ण सत्तासंपन्न शासिका थी। हतशेपशुत के उत्तराधिकारी थटमोस तृतीय को 'प्राचीन मिस्र का नेपोलियन' कहा जाता है। उसने पश्चिमी एशिया पर पंद्रह बार आक्रमण किए थे। उन्नीसवें वंश के शासकों में रेमेसिस द्वितीय सर्वाधिक प्रसिद्ध है। वह साहसी और बलवान् था। युद्धकला में भी उसकी उतनी ही रुचि थी जितनी प्रेमव्यापार में। फिलिस्तीन विजय के बाद उसने हित्तियों के विरुद्ध कादेशाँ की प्रसिद्ध लड़ाई लड़ी। १२६१ ई० पू० में उसने हित्तियों से इतिहासप्रसिद्ध संधि की। वह महान भवन निर्माता भी था।बीसवें वंश के काल में फेराओ रेमेसिस तृतीय के शासन काल तक मिस्र का कुछ एशियाई प्रांतों पर नियंत्रण बना रहा। लेकिन उसके बाद स्थिति शीघ्रता से बिगड़ी और बारहवीं शती ई०पू० के मध्य तक मिस्र का एशियाई साम्राज्य अतीत की कहानी रह गया। इस वंश का पतन और २१ वें वंश की स्थापना १०९० ई० पू० में हुई। उसके बाद मिस्र एक शती तक दुर्बल परंतु, स्वतंत्र रहा। दसवीं शती के मध्य उसकी स्वतंत्रता का भी अंत हो गया और कई शती तक क्रमश: लीबियनों, इथियोपियनों असीरियनों का प्रभुत्व उसे मानना पड़ा।६६३ ई० पू० में नील के मुहाने के पश्चिमी भाग में स्थित साइस स्थान के एक महत्वाकांक्षी शासक साम्तिक ने असीरियन सेनाओं को निकाल बाहर किया और कई शती बाद मिस्र में एक स्वतंत्र राज्य (२६ वाँ वंश) की स्थापना की। उसके उत्तराधिकारी ५२५ ई० पू० तक राज्य करते रहे। नीको द्वितीय के शासनकाल में तो उन्होंने एशिया पर भी आक्रमण किए। उनके शासनकाल को साइतयुग कहा जाता है। ५२५ ई० पू० में उनका पतन हो गया और मिस्र हखामशी साम्राज्य में मिला लिया गया। फारसी आधिपत्य के अंत (३३२ ई० पू०) के बाद मिस्र पर पहले यूनानियों (३३२-४८ ई० पू०) और तत्पश्चात् रोमनों ने शासन किया। ३० ई० पू० में इसे रोम साम्राज्य का एक प्रांत बना लिया गया। इस प्रकार मिस्र की पाँच सहस्र वर्ष पुरानी सभ्यता और पृथक राजनीतिक अस्तित्व का अंत हुआ।

 

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