नामवर सिंह -जन्म: (1 मई, 1927)

May 01, 2017

नामवर सिंह (जन्म: 1 मई, 1927) हिन्दी के प्रसिद्ध कवि और प्रमुख समकालीन आलोचक हैं।


जीवन परिचय-
नामवर सिंह का जन्म 1 मई, 1927 को वाराणसी ज़िले के जीयनपुर नामक गाँव में हुआ। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से उन्होंने हिन्दी में एम.ए. और पी.एच डी. की उपाधि ली। 82 वर्ष की उम्र पूर्ण कर चुके नामवर जी विगत 65 से भी अधिक वर्षो से साहित्य के क्षेत्र में हैं। पिछले 30-35 वर्षों से वे भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर व्याख्यान भी दे रहे हैं। जब वे गांव में थे तो ब्रजभाषा में प्रायः शृंगारिक कविताएं लिखा करते थे। अब उन्होंने खड़ी बोली हिंदी में लिखना शुरू किया। नामवर सिंह बनारस के ईश्वर गंगी मुहल्ले में रहते थे। 1940 ई. में उन्होंने 'नवयुवक साहित्यिक संघ', नामक एवं साहित्यिक संस्था अपने सहयोगी पारसनाथ मिश्र सेवक के साथ निर्मित की थी, जिसमें हर सप्ताह एक साहित्यिक गोष्ठी होती थी। 1944 ई. से नामवर भी इसकी गंगी मुहल्ले में शामिल होते थे। ठाकुर प्रसाद सिंह ने ईश्वर गंगी मुहल्ले में 'भारतेन्दु विद्यालय' एवं 'ईश्वर गंगी पुस्तकालय' की स्थापना की थी। 1947 ई.में उनकी नियुक्ति बलदेव इंटर कॉलेज, बडा़गांव में हो गई। नवयुवक साहित्य संघ की ज़िम्मेदारी उन्होंने नामवर और सेवक जी को दे दी। इसकी गोष्ठियां टाकुर प्रसाद सिंह के बगैर भी बरसों चलती रही। बाद में इसका नाम सिर्फ 'साहित्यिक संघ' हो गया। इसकी गोष्टियों में बनारस के तत्कालीन प्रायः सभी साहित्यकार उपस्थित होते थे। नामवर के साथ त्रिलोचन एवं साही की इसमें नियमित उपस्थिति होती थी। नामवर की काव्य-प्रतिभा के निर्माण में इस संस्था का भी अप्रतिम योगदान है।


नामवर सिंह के स्कूल के छात्र –संघ से एक मासिक पत्रिका निकलती थी- 'क्षत्रिय मित्र'। सरस्वती प्रसाद सिंह उसके संपादक थे। आगे चलकर शम्भूनाथ सिंह उसके संपादक हुए। कुछ समय तक त्रिलोचन ने भी उसका संपादन किया था। कवि नामवर की कवितांए उसमें छपने लगी। पहली कविता 'दीवाली' शीर्षक से छपी। दूसरी कविता थी-'सुमन रो मत, छेड़ गाना': त्रिलोचन ने पढने की ओर, ख़ासकर आधुनिक साहित्य, उन्हें प्रेरित किया। उनकी ही प्रेरणा से उन्होंने पहली बार दो पुस्तकें ख़रीदी। पहली निराला की 'अनामिका',एवं दूसरी इलाचन्द्र जोशी द्रारा अनूदित गोर्की की 'आवारा की डायरी'। बनारस में सरसौली भवन में सागर सिंह नामक एक साहित्यिक व्यक्ति रहते थे। उनके घर पर 'प्रगतिशील लेखक संघ' की एक गोष्ठी हुई थी, जिसमें त्रिलोचन कवि नामवर को भी ले गए थे यहीं पहली बार शिवदान सिंह चौहान और शमशेर बहादुर सिंह से परिचय हआ। यह बनारस की पहली गोष्ठी थी जिसमें उन्होंने कविता-पाठ किया।
कहा जाता है कि बनारस अपने आप में एक अद्भुत शहर है- तरह-तरह के मंदिर, गंगा के अनेक घाट, पंडे, पुरोहित और पाखंडी, पतली-पतली गलियां और सनातन काल से अपने पांडित्य, शास्त्रीयता के लिए प्रसिद्ध लोग! बनारस के विषय में नामवर सिंह कहते हैं कि काशी पंडे-पुरोहित और धार्मिक लोगों की है, किंतु उसमें कबीर और तुलसीदास की भी उपस्थिति है। उसी काशी में प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद हुए, इसलिए हमें कभी भूलना नहीं चाहिए कि काशी केवल एक पुरातनपंथी शहर ही नहीं है, बल्कि उसके विरोधी लड़ने वाले विचारक भी हुए। उसी काशी में सारनाथ भी है और विश्वनाथ भी है। काशी में क्वींस कॉलेज है, जो कभी अंग्रेज़ियत का गढ़ था और गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज हुआ करता था, जिसमें संस्कृत के बड़े-बड़े विद्वान् हुआ करते थे, जिसे अंग्रेज़ों ने बनाया था और वहीं मदनमोहन मालवीय ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित किया। वहीं बाबू शिवप्रसाद गुप्त और आदरणीय नरेन्द्र देव ने काशी विद्यापीठ स्थापित किया। उस काशी में आया तो एक ओर नागरी प्रचारिणी सभा और दूसरी ओर प्रगतिशील लेखक संघ था। उसी काशी में प्रेमचंद का ‘हंस’ निकलता था, जो तब प्रगतिशील लेखक संघ का मुख पत्र था। उस काशी में जहां एक ओर भारत धर्म मंडल था, वहां कम्युनिस्ट पार्टी का दफ्तर भी था। वहीं कांग्रेस का दफ्तर था, वहीं कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का भी दफ्तर था। तो काशी के कई रूप हैं।


‘तान के सोता रहा जल चादर, वायु-सा खींच जगा गया कोई।’ मैं जब उसे पढ़ता था तो वे साथ-साथ उसे गाते थे। बड़े सहृदय थे। संगीत के मर्मज्ञ थे। गाते अच्छा थे क्लासिकल। तो एक उनकी छाप पड़ी। उनकी याददाश्त अद्भुत थी। जिसका नाम वो एक बार सुन लेते थे, याद रहता था। स्कूल के हजार-बारह सौ विद्यार्थी और सबके नाम उन्हें याद थे। किसी को देख लेते तो नाम से बुलाते। एक बार की घटना है। कुछ विद्यार्थी छिपकर सिनेमा देखने गए थे और देर से लौटे थे। छह बजे शाम के बाद आए। सर्दियों के दिन थे। धुंधलका हो चुका था। तांगे पर से उतरकर जैसे ही अंदर घुसे कि प्रिंसिपल साहब छड़ी उठाकर सामने थे। टोका। बारहों विद्यार्थियों को खड़ा कर दिया। नए लड़के थे। सबका नाम पूछा और सबको जाने दिया। अगले दिन जिस क्रम से वे खड़े थे, उसी क्रम से नोटिस उनको पहुंच गया और उन्हें उसी क्रम से प्रिंसिपल रूम में बुलाया गया। तो अद्भुत स्मरणशक्ति थी। आवाज़ गूंजती थी।’ हीवेट क्षत्रिय स्कूल, इंटर में उदय प्रताप कॉलेज के नाम से जाना जाता था। पहले वहां इंटर तक की पढ़ाई होती थी। अब तो वह पी.जी. कॉलेज हो गया है। नामवर सिंह ने 1941 से 1947 तक वहां पढ़ाई की। जे.पी. सिंह के कारण स्कूल में कड़ा अनुशासन था। एक से एक शिक्षक थे। सुबह पी.टी. से लेकर शाम तक के हर घंटे का हिसाब था। पढ़ने का, खेलने का निर्धारित समय था। साप्ताहिक सांस्कृतिक-साहित्यिक कार्यक्रम होते थे।


नामवर सिंह ने अध्यापन कार्य का आरम्भ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (1953-1959) किया और फिर 'जोधपुर विश्वविद्यालय' में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष (1970-74), 'आगरा विश्वविद्यालय' के क.मु. हिन्दी विद्यापीठ के प्रोफेसर निदेशक (1974), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में 'भारतीय भाषा केन्द्र' के संस्थापक अध्यक्ष तथा हिन्दी प्रोफेसर (1965-92) और अब उसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर इमेरिट्स हैं। नामवर सिंह महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी रहे।


कृतियाँ-
1996 बकलम खुद
हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग
पृथ्वीराज रासो की भाषा,
आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ,
छायावाद, इतिहास और आलोचना ।
सम्मान -
साहित्य अकादमी पुरस्कार (1971)
हिन्दी अकादमी, दिल्ली का “शलाका सम्मान” (1991)
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का “साहित्य भूषण सम्मान" (1993)


Namvar Singh is a progressive literary critic, linguist, academician and theoretician.In the literary tradition of Rabindranath Tagore he has been a student of Acharya Hazari Prasad Dwivedi.


Namvar Singh was born on 1 May 1927 in village Jiyanpur in Varanasi (now under Chandauli) District of Uttar Pradesh, India. He got his early education at his native village. However, he moved to Varanasi to pursue his further studies. He did his matriculation and higher secondary from Udai Pratap Autonomous College, Varanasi. He enrolled in Banaras Hindu University (BHU) for higher studies. From Banaras Hindu University he completed his master's with gold medal and got the Ph.D. under the supervision of Acharya Hazari Prasad Dwivedi.Writer Kashinath Singh is younger brother of Dr. Namvar Singh.



After completing his Ph.D. Namvar Singh started teaching at Banaras Hindu University. However after a controversy he left BHU. For a brief period he also taught at Sagar University and Jodhpur University. But it was Jawaharlal Nehru University (JNU) where he created a new pattern of teaching and preparing of curriculum .He retired from JNU in the year 1992. He is still a 'professor emeritus' at the Center of Indian Languages at Jawaharlal Nehru University.


Apart from his academic engagement Dr. Namvar Singh worked as the Editor of 'Janyuga' (weekly news magazine) and 'Alochana'[17] (Hindi magazine for literary criticism). After retirement from JNU Namvar Singh was appointed as Chancellor of Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya, Wardha.He has also worked as the Chairman of Raja Ramnohun Roy Library Foundation.Till date Namvar Singh has written more than a dozen of books.Dr. Namvar Singh is currently chairman of selection board of prestigious 'Jnanpith Award'.


List of works
Some of books written by Namvar Singh are listed below:


Baklam Khud
Kavita Ke Naye Pratiman
Chhayavaad
Vaad Vivaad Samvaad
Kahaani Nai Kahaani
Itihaas Aur Alochana
Dusari Parampara Ki khoj
Adhunik Sahitya Ki Pravrittyan
Prithviraj Raso Ki Bhasha
Hindi Ke Vikas Me Apbhramsha Ka yogdaan


Awards and recognition
Kendra Sahitya Academy Award
Shalaka Samman by Hindi Academy, Delhi
Sahitya Bhushan Samman by Uttar Pradesh Hindi Sansthan
Kuvempu Rashtreeya Puraskar by Delhi Karnataka Sangha