श्रमिक दिवस - 1 मई

May 01, 2017

मई दिवस या 'मज़दूर दिवस' या 'श्रमिक दिवस' 1 मई को सारे विश्व में मनाया जाता है। 'मई दिवस' के विषय में अधिकांश तथ्य उजागर हो चुके हैं, फिर भी कुछ ऐसे पहलू हैं, जो अभी तक अज्ञात है। कुछ भ्रांतियों का स्पष्टीकरण और इस विषय पर भारत तथा विश्व के बारे में कम ज्ञात तथ्यों को उजागर करने की आवश्यकता है। यह उल्लेखनीय है कि 'श्रमिक दिवस' का उदय 'मई दिवस' के रूप में नहीं हुआ था। वास्तव में अमरीका में श्रमिक दिवस मनाने की पुरानी परम्परा रही है, जो बहुत पहले से ही चली आ रही थी। मई दिवस भारत में 15 जून, 1923 ई. में पहली बार मनाया गया था।


 आज अन्तरराष्ट्रीय मजदूर दिवस है,जिसे मई दिवस के नाम से भी जाना जाता है.आज ही के दिन 1886 में अमेरिका के शिकागो शहर में मजदूरों ने पूंजीवादी शोषण के खिलाफ और काम के घंटे निर्धारित किये जाने,यूनियन बनाने के अधिकार समेत तमाम मजदूर अधिकारों के लिए ऐतिहासिक हड़ताल की थी.इस हड़ताल पर बर्बर दमन ढाया गया.कई दिनों तक चले संघर्ष में कई मजदूर हताहत हुए और 8 मजदूर नेताओं को तो एक साल बाद नवम्बर 1887 में फांसी पर चढ़ा दिया गया.8घंटे का कार्यदिवस जो पूरी दुनिया मे लागू हुआ,उस अधिकार के लिए मजदूरों की कुर्बानियों के इतिहास का प्रतीक दिन है-मई दिवस.
भारत में भी मजदूर अधिकारों के संघर्षों की लंबी परम्परा है.8 घंटे काम की मांग को लेकर पहली हड़ताल मार्च1862 में हावड़ा रेलवे स्टेशन के मजदूरों द्वारा की गई.इसमें 1200 रेलवे कामगार शामिल हुए.उसके बाद निरन्तर कपड़ा मिलों,जूट मिलों समेत तमाम कारखानों में मजदूर अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहे और हड़ताल को संघर्ष के सब से प्रभावी हथियार के तौर पर उपयोग में लाते रहे.1908 में देश के मजदूरों ने पहली राजनीतिक हड़ताल की.लोकमान्य तिलक को जून 1908 में अंग्रेजों ने राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया.इस गिरफ्तारी के खिलाफ हजारों मजदूर सड़कों पर उतर आए. जुलाई के महीने में जब मुकदमें की कार्यवाही शुरू हुई तो मजदूरों का संघर्ष और तीखा हो गया.रूस के क्रांतिकारी नेता कामरेड लेनिन ने इस हड़ताल का स्वागत किया और कहा कि तिलक की गिरफ्तारी के खिलाफ उभरा मजदूरों का यह संघर्ष और उससे पैदा हुए वर्ग चेतना अंग्रेजी साम्राज्य को नेस्तनाबूद कर देगी.
मई दिवस और मजदूरों की कुर्बानियों के इतिहास के बीच यह भी गौरतलब है कि लड़ कर हासिल तमाम मजदूर अधिकारों का आज छीनने का दौर चल रहा है.8 घण्टे काम का अधिकार हो या यूनियन बनाने का अधिकार, सब धीरे-धीरे खत्म किये जा रहे हैं.जहां मजदूर इन अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं,वहां उन पर बर्बर दमन ढाया जा रहा है.कोयम्बटूर की प्रिकॉल फैक्ट्री और मानेसर में मारुति के मजदूरों पर हुए दमन ज्वलन्त उदाहरण हैं.वाइट कॉलर नौकरीपेशा लोगों की एक बड़ी जमात है,जो स्वयं को मजदूर कहलाना पसंद नही करती,लेकिन पूंजी के शोषण की भरपूर मार झेलती है.मजदूर अधिकारों और श्रम कानूनों पर हमले के इस दौर में अथाह कुर्बानियों से हासिल इन अधिकारों को बचाने के लिए मजदूरों के एकताबद्ध संघर्ष ही एकमात्र रास्ता हैं.
दुनिया में मजदूर अधिकारों का संघर्ष और भारत मे मजदूर अधिकारों के संघर्ष का इतिहास बताता है कि दुनिया भर में मजदूरों ने एक ही तरह से लड़ कर अपने अधिकार हासिल किए हैं.इसलिये आज जो मई दिवस को बाहरी बता रहे हैं,वे मजदूरों की कुर्बानियों के समूचे इतिहास को ही मिटा देना चाहते हैं.वे मजदूरो के पक्षधर लोग नही हैं.वे मजदूरों के जायज हकों पर डाका डालने वाले,सत्ता में बैठे बाउंसर हैं.श्रम की लूट करने वाली बाहरी या भीतरी नही होता,वह सिर्फ लुटेरा होती है.उसी तरह मजदूर भी बाहरी या भीतरी नही होता,वह सिर्फ मजदूर होता है.इसलिए मजदूरों के कुर्बानियों के इतिहास में दरार पैदा करने की कोशिशों के खिलाफ मजदूरों की एकता के जरिये मुंहतोड़ जवाब दिया जाए.दुनियाभर के मेहनतकशों की एकजुटता का आह्वान करने वाले कार्ल मार्क्स के नारे को बुलन्द करें-दुनिया के मजदूरो, एक हो ।