टीपू सुल्तान - मृत्यु: (4 मई 1799 ई.)

May 04, 2017

टीपू सुल्तान (जन्म: 20 नवम्बर, 1750 ई. ; मृत्यु- 4 मई 1799 ई.) भारतीय इतिहास के प्रसिद्ध योद्धा हैदर अली का पुत्र था। पिता की मृत्यु के बाद पुत्र टीपू सुल्तान ने मैसूर सेना की कमान को संभाला था, जो अपनी पिता की ही भांति योग्य एवं पराक्रमी था। टीपू को अपनी वीरता के कारण ही 'शेर-ए-मैसूर' का ख़िताब अपने पिता से प्राप्त हुआ था। टीपू द्वारा कई युद्धों में हारने के बाद मराठों एवं निज़ाम ने अंग्रेज़ों से संधि कर ली थी। ऐसी स्थिति में टीपू ने भी अंग्रेज़ों से संधि का प्रस्ताव किया और चूंकि अंग्रेज़ों को भी टीपू की शक्ति का अहसास हो चुका था, इसलिए छिपे मन से वे भी संधि चाहते थे। दोनों पक्षों में वार्ता मार्च, 1784 में हुई और इसी के फलस्वरूप 'मंगलौर की संधि' सम्पन्न हुई। कई बार अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा देने वाले टीपू सुल्तान को भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं महान् वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने विश्व का सबसे पहला रॉकेट अविष्कारक बताया था।


परिचय-
टीपू सुल्तान का जन्म मैसूर के सुल्तान हैदर अली के घर 20 नवम्बर, 1750 को 'देवनहल्ली', वर्तमान में कर्नाटक का कोलार ज़िला में हुआ था। टीपू सुल्तान का पूरा नाम फ़तेह अली टीपू था। वह बड़ा वीर, विद्याव्यसनी तथा संगीत और स्थापत्य का प्रेमी था। उसके पिता ने दक्षिण में अपनी शक्ति का विस्तार आरंभ किया था। इस कारण अंग्रेज़ों के साथ-साथ निजाम और मराठे भी उसके शत्रु बन गए थे। टीपू ने 18 वर्ष की उम्र में अंग्रेज़ों के विरुद्ध पहला युद्ध जीता था। अंग्रेज़ संधि करने को बाध्य हुए। लेकिन पांच वर्ष बाद ही संधि को तोड़कर निजाम और मराठों को साथ लेकर अंग्रेज़ों ने फिर आक्रमण कर दिया। टीपू सुल्तान ने अरब, काबुल, फ्रांस आदि देशों में अपने दूत भेजकर उनसे सहायता मांगी, पर सफलता नहीं मिली। अंग्रेज़ों को इन कार्रवाइयों का पता था। अपने इस विकट शत्रु को बदनाम करने के लिए अंग्रेज़ इतिहासकारों ने इसे धर्मांध बताया है। परंतु वह बड़ा सहिष्णु राज्याध्यक्ष था। यद्यपि भारतीय शासकों ने उसका साथ नहीं दिया, पर उसने किसी भी भारतीय शासक के विरुद्ध, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, अंग्रेज़ों से गठबंधन नहीं किया।
टीपू सुल्तान काफ़ी बहादुर होने के साथ ही दिमागी सूझबूझ से रणनीति बनाने में भी बेहद माहिर था। अपने शासनकाल में भारत में बढ़ते ईस्ट इंडिया कंपनी के साम्राज्य के सामने वह कभी नहीं झुका और उसने अंग्रेज़ों से जमकर लोहा लिया। मैसूर की दूसरी लड़ाई में अंग्रेज़ों को खदेड़ने में उसने अपने पिता हैदर अली की काफ़ी मदद की। उसने अपनी बहादुरी से जहाँ कई बार अंग्रेज़ों को पटखनी दी, वहीं निज़ामों को भी कई मौकों पर धूल चटाई। अपनी हार से बौखलाए हैदराबाद के निज़ाम ने टीपू सुल्तान से गद्दारी की और अंग्रेज़ों से मिल गया।


मैसूर की तीसरी लड़ाई में भी जब अंग्रेज़ टीपू को नहीं हरा पाए तो उन्होंने मैसूर के इस शेर से 'मंगलोर की संधि' नाम से एक समझौता कर लिया। संधि की शर्तों के अनुसार दोनों पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए प्रदेशों को वापस कर दिया। टीपू ने अंग्रेज़ बंदियों को भी रिहा कर दिया। टीपू के लिए यह संधि उसकी उत्कृष्ट कूटनीतिक सफलता थी। उसने अंग्रेज़ों से अलग से एक संधि कर मराठों की सर्वोच्चता को अस्वीकार कर दिया। इस संधि से गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स असहमत था। उसने संधि के बाद कहा-


"यह लॉर्ड मैकार्टनी कैसा आदमी है। मैं अभी भी विश्वास करता हूँ कि वह संधि के बावजूद कर्नाटक को खो डालेगा।"
'पालक्काड क़िला', 'टीपू का क़िला' नाम से भी प्रसिद्ध है। यह पालक्काड टाउन के मध्य भाग में स्थित है। इसका निर्माण 1766 में किया गया था। यह क़िला भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के अंतर्गत संरक्षित स्मारक है। मैसूर के सुल्तान हैदर अली ने इस क़िले को 'लाइट राइट' यानी 'मखरला' से बनवाया था। जब हैदर ने मालाबार और कोच्चि को अपने अधीन कर लिया, तब इस क़िले का निर्माण करवाया। उनके पुत्र टीपू सुल्तान ने भी यहाँ अधिकार जमाया था। पालक्काड क़िला टीपू सुल्तान का केरल में शक्ति-दुर्ग था, जहाँ से वह ब्रिटिशों के ख़िलाफ़ लड़ता था। इसी तरह सन 1784 में एक युद्ध में कर्नल फुल्लेर्ट के नेतृत्व में ब्रिटिश सैनिकों ने 11 दिन दुर्ग को घेर कर रखा और अपने अधीन कर लिया। बाद में कोष़िक्कोड के सामूतिरि ने क़िले को जीत लिया ।1790 में ब्रिटिश सैनिकों ने क़िले पर पुनः अधिकार कर लिया। बंगाल में 'बक्सर का युद्ध' को तथा दक्षिण में मैसूर का चौथा युद्ध को जीत कर भारतीय राजनीति पर अंग्रेज़ों ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली।
'फूट डालो, शासन करो' की नीति चलाने वाले अंग्रेज़ों ने संधि करने के बाद टीपू से गद्दारी कर डाली। ईस्ट इंडिया कंपनी ने हैदराबाद के साथ मिलकर चौथी बार टीपू पर ज़बर्दस्त हमला किया और आख़िरकार 4 मई सन् 1799 ई. को मैसूर का शेर श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए शहीद हो गया। 1799 ई. में उसकी पराजय तथा मृत्यु पर अंग्रेज़ों ने मैसूर राज्य के एक हिस्से में उसके पुराने हिन्दू राजा के जिस नाबालिग पौत्र को गद्दी पर बैठाया, उसका दीवान पुरनिया को नियुक्त कर दिया।


Tipu Sultan (born Sultan Fateh Ali Sahab Tipu, 20 November 1750 – 4 May 1799), also known as the Tipu Sahib, was a ruler of the Kingdom of Mysore. He was the eldest son of Sultan Hyder Ali of Mysore.Tipu Sultan introduced a number of administrative innovations during his rule, including his coinage, a new Mauludi lunisolar calendar, and a new land revenue system which initiated the growth of the Mysore silk industry. He expanded the iron-cased Mysorean rockets and commissioned the military manual Fathul Mujahidin, and is considered a pioneer in the use of rocket artillery. He deployed the rockets against advances of British forces and their allies during the Anglo-Mysore Wars, including the Battle of Pollilur and Siege of Seringapatam. He also embarked on an ambitious economic development program that established Mysore as a major economic power, with some of the world's highest real wages and living standards in the late 18th century.


Napoleon Bonaparte, the French commander-in-chief, sought an alliance with Tipu Sultan. Both Tipu Sultan and his father used their French-trained army in alliance with the French in their struggle with the British, and in Mysore's struggles with other surrounding powers, against the Marathas, Sira, and rulers of Malabar, Kodagu, Bednore, Carnatic, and Travancore. Tipu's father, Hyder Ali, rose to power capturing Mysore, and Tipu succeeded Mysore upon his father's death in 1782. He won important victories against the British in the Second Anglo-Mysore War and negotiated the 1784 Treaty of Mangalore with them after his father died from cancer in December 1782 during the Second Anglo-Mysore War.


Tipu became involved in conflicts with his neighbors, including the Maratha–Mysore War which ended with Maratha and Tipu signing treaty of Gajendragad, as per which Tipu Sultan was obligated to pay 4.8 million rupees as a one time war cost to the Marathas, and an annual tribute of 1.2 million rupees, In addition to returning all the territory captured by Hyder Ali.


Tipu remained an implacable enemy of the British East India Company, renewing conflict with his attack on British-allied Travancore in 1789. In the Third Anglo-Mysore War, he was forced into the Treaty of Seringapatam, losing a number of previously conquered territories, including Malabar and Mangalore. He sent emissaries to foreign states, including the Ottoman Empire, Afghanistan, and France, in an attempt to rally opposition to the British.


In the Fourth Anglo-Mysore War, the forces of the British East India Company were supported by the Nizam of Hyderabad. They defeated Tipu, and he was killed on 4 May 1799 while defending his fort of Srirangapatna.


He was one of the few South Indian kings to provide stiff resistance to British imperialism, along with Hyder Ali. He is applauded as a ruler who fought against British colonialism.[14] Similarly he has been a controversial figure and criticized for his atrocities against Hindus, Christians, and Mappla Muslims.
Tipu Sultan was born on 20 November 1750 (Friday, 20th Dhu al-Hijjah, 1163 AH) at Devanahalli,[1] in present-day Bangalore Rural district, about 33 km (21 mi) north of Bangalore city. He was named "Tipu Sultan" after the saint Tipu Mastan Aulia of Arcot. Being illiterate, Hyder was very particular in giving his eldest son a prince's education and a very early exposure to military and political affairs. From the age of 17 Tipu was given independent charge of important diplomatic and military missions. He was his father's right arm in the wars from which Hyder emerged as the most powerful ruler of southern India.[citation needed]


Tipu's father, Hyder Ali, was a military officer in service to the Kingdom of Mysore who had become the de facto ruler of Mysore in 1761 while his mother Fatima Fakhr-un-Nisa was the daughter of Mir Muin-ud-Din, the governor of the fort of Kadapa. Hyder Ali appointed able teachers to give Tipu an early education in subjects like Urdu, Persian, Arabic, Kannada, Quran, Islamic jurisprudence, riding, shooting and fencing.


Horatio Nelson defeated François-Paul Brueys D'Aigalliers at the Battle of the Nile in Egypt in 1798. Three armies marched into Mysore in 1799—one from Bombay and two British, one of which included Arthur Wellesley. They besieged the capital Srirangapatna in the Fourth Mysore War.[36] There were more than 26,000 soldiers of the British East India Company, approximately 4,000 Europeans and the rest Indians. A column was supplied by the Nizam of Hyderabad consisting of ten battalions and more than 16,000 cavalry, and many soldiers were sent by the Marathas. Thus, the soldiers in the British force numbered more than 50,000, whereas Tipu Sultan had only about 30,000.


The British broke through the city walls, and French military advisers told Tipu Sultan[citation needed] to escape via secret passages, but he replied, "Better to live one day as a tiger than a thousand years as a sheep". Tipu Sultan died defending his capital on 4 May.[citation needed]


Tipu Sultan was killed at the Hoally (Diddy) Gateway, which was located 300 yards (270 m) from the N.E. Angle of the Srirangapatna Fort.[38] He was buried the next afternoon at the Gumaz, next to the grave of his father. Many members of the British East India Company believed that Nawab of Carnatic Umdat Ul-Umra secretly provided assistance to Tipu Sultan during the war and sought his deposition after 1799.