नारायण सुब्बाराव हार्डिकर - जन्म: (7 मई, 1889)

May 07, 2017

नारायण सुब्बाराव हार्डिकर (जन्म- 7 मई, 1889, धारवाड़ ज़िला, कर्नाटक, मृत्यु- 26 अगस्त, 1975) भारत के स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस के प्रसिद्ध राजनेता थे, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में प्रसिद्ध 'हिन्दुस्तान सेवादल' की स्थापना की थी। 'बंगाल विभाजन' के विरोध में नारायण सुब्बाराव ने 'आर्य बाल सभा' का गठन किया था। आज़ादी के बाद वर्ष 1952 में उन्हें राज्य सभा का सदस्य चुना गया था। देश के प्रति निष्ठा और सेवा भावना को देखते हुए भारत सरकार ने नारायण सुब्बाराव को 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया था।


जन्म-
नारायण सुब्बाराव हार्डिकर का जन्म 7 मई, 1889 ई. को ब्रिटिश शासन काल में मैसूर राज्य (कर्नाटक) के धारवाड़ ज़िले में हुआ था। इनके पिता का नाम सुब्बाराव तथा माता यमुनाबाई थीं। अपनी आरंभिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद वे अध्ययन के लिए पुणे चले गए। पुणे में प्रसिद्ध क्रांतिकारी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के समाचार पत्रों में अनेक विचार पढ़कर नारायण सुब्बाराव हार्डिकर के अंदर भी राष्ट्रीय भावना का उदय हुआ। देशभक्ति की भावना मन में जागृत होते ही वे विद्यार्थी जीवन से ही सार्वजनिक कार्यों में रुचि लेने लगे। 'बंग भंग' के विरोध में उन्होंने 'आर्य बाल सभा' का गठन भी किया था।
इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आगे उच्च शिक्षा के अध्ययन के लिए नारायण सुब्बाराव 1913 में अमरीका चले गए। वहाँ उन्होंने 'मैचिंगन यूनिवर्सिटी' में अपना अध्ययन पूरा किया। प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता लाला लाजपत राय भी उन दिनों अमरीका में ही थे। भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में वातावरण बनाने के लिए 'हिन्दुस्तान एसोसिएशन ऑफ़ अमरीका' नाम की संस्था काम कर रही थी। नारायण सुब्बाराव हार्डिकर भी उसकी गतिविधियों में रुचि लेने लगे। बाद में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में 'इंडियन लीग ऑफ़ अमरीका' नाम की संख्या बनी तो उसके मंत्री का पदभार डॉ. नारायण सुब्बाराव हार्डिकर ने संभाला।


भारत लौटने पर नारायण सुब्बाराव ने कर्नाटक में राष्ट्रीय भावनाओं के प्रचार के लिए अनेक संस्थाओं की स्थापना की। उनका सबसे महत्त्वपूर्ण काम 1923 में 'हिन्दुस्तान सेवादल' की स्थापना था। देश-भर में घूमकर हार्डिकर ने इस संस्था का विस्तार किया। 'हिन्दुस्तान सेवादल' का देश के स्वतंत्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था। इसके स्वयं सेवक हर संघर्ष में भाग लेते रहे। डॉ. नारायण सुब्बाराव हार्डिकर 1930 में गिरफ्तार कर लिए गए और सेवादल ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर दिया गया। इसके बाद भी हर आंदोलन में नारायण सुब्बाराव जेलों में बंद किए गए।


सम्मान-
भारत की स्वतंत्रता के बाद नारायण सुब्बाराव हार्डिकर को 1952 में राज्य सभा का सदस्य चुना गया। 1962 तक वे इस पद पर बने रहे। देश और उनकी सेवाओं को देखते हुए 'भारत सरकार' ने उन्हें 'पद्मभूषण' के मानद सम्मान से सम्मानित किया था।


नारायण सुब्बाराव हार्डिकर का रहन-सहन अत्यंत सादा था। भौतिक सुख-सुविधाओं ने कभी उन्हें आकृष्ट नहीं किया। उनका निधन 26 अगस्त, 1975 को हुआ।


Dr. Narayan Subbarao Hardikar (7 May 1889 – 26 August 1975) was a freedom fighter and Congress politician who founded the Congress Seva Dal.


Hardikar was born in Dharwar in 1889 to Subbarao and Yamunabai. He studied medicine at the College of Physicians and Surgeons, Calcutta and then went to the United States for higher education.


 In 1916, he completed his M.Sc in Public Health from the University of Michigan. During his years in America, Hardikar met and became a close associate of Lala Lajpat Rai. As Rai's colleague, Hardikar became an active participant in many political activities in America. He was secretary of the Home Rule League and helped organise the Indian Workers Union of America. As office bearers of the Home Rule League, Rai and Hardikar addressed the US Senate’s Foreign Relations Committee. He was also president of the Hindustan Association of America. Hardikar's pamphlet India – A Graveyard was extensively discussed in several newspapers and journals. He was managing editor of the journal Young India which Senator France of Maryland on the Foreign Relations Committee observed, had rendered "a valuable service in acquainting the people of America with the grave problems which confronted the people of India".


Hardikar returned to India in 1921. During the Flag Satyagraha of 1923, Hardikar and his Hubli Seva Mandal gained national prominence after they refused to apologise to the British authorities to gain a commutation in their prison sentences. This resistance prompted the Congress to set up an organisation along the lines of the Mandal to groom a band of volunteers to combat the British Raj. During the Kakinada Congress session of 1923 a 13-member committee under Hardikar was formed to look at the establishment of such an organisation. The Hindustani Seva Mandal was thus formed in 1923 and later rechristened the Seva Dal.Dr Hardikar was elected general secretary of the Karnataka Pradesh Congress Committee and published the monthly journal Volunteer.


The Seva Dal was formed in 1923 following the Kakinada session of the Congress in 1923. Although Jawaharlal Nehru supported Hardikar, the idea of forming a militia like organisation faced much resistance from Congressman who feared it would lead to the erosion of civilian authority within the party and who argued that it contravened the principle of non-violence. The Dal played a stellar role in the Civil Disobedience Movement, organising mass picketing and enrollment of new members into the Congress party. The significance of the Dal in the Civil Disobedience Movement can be gauged from the fact that in 1934, when the Movement came to an end and the colonial authorities lifted the ban on the Congress and its organisations, they continued to proscribe the Dal.The Seva Dal became the central volunteer organisation of the Congress and focused attention on imparting its volunteers physical training and worked towards promoting communal amity.


Dr Hardikar helped found the Karnatak Health Institute at Ghataprabha. He was a two-term Rajya Sabha MP from 1952 to 1962 and was conferred the Padma Bhushan in 1958. Dr Hardikar died on 26 August 1975. To commemorate his birth centenary, the Department of Posts issued a commemorative stamp in his honour in 1989.