रवीन्द्र जयन्ती - 7 मई

May 07, 2017

रवीन्द्र जयंती ( रवीन्द्र जयंती ) एक सालाना मनाया जाता है सांस्कृतिक उत्सव, दुनिया भर के बंगालियों के बीच प्रचलित, रबिंद्रनाथ टैगोर की जन्मदिन की सालगिरह की याद में यह मई के शुरू में बसाई बंगाल महीने के 25 वें दिन (25 बोधीष) में मनाया जाता है, क्योंकि टैगोर का जन्म बंगाली कैलेंडर के वर्ष 1268 (25 बोधीष, 1268) के इस दिन हुआ था। हर साल, कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों और घटनाओं, जैसे कि: कबीरनाम (कबीप्रणम) - टैग्स ( रवीन्द्र संगीत ), कविताओं, नृत्य और नाटक, टैगोर द्वारा लिखित और रचित हैं, इस विशेष दिन में विभिन्न स्कूलों द्वारा आयोजित किए जाते हैं, बंगाल के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के साथ-साथ टैगोर और उनके कार्यों को श्रद्धांजलि के रूप में विदेशों में अलग-अलग समूहों द्वारा मनाया गया। दुनिया भर में, टैगोर की जयंती का बड़े पैमाने पर पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन , बीरभूम में विश्वभारती विश्वविद्यालय , छात्रों और सांस्कृतिक, सामाजिक और शैक्षिक उत्थान के लिए टागोर द्वारा स्थापित संस्था में मुख्य रूप से मनाया जाता है। भारत सरकार ने रवींद्रनाथ टैगोर के सम्मान में 150 जयंती दर्शाने के लिए 2011 में 5 रुपये का सिक्का जारी किया था। 
जीवन परिचय:- रबीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई, 1861 कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में देवेंद्रनाथ टैगोर और शारदा देवी के पुत्र के रूप में एक संपन्न बांग्ला परिवार में हुआ था। बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री टैगोर सहज ही कला के कई स्वरूपों की ओर आकृष्ट हुए जैसे- साहित्य, कविता, नृत्य और संगीत।
दुनिया की समकालीन सांस्कृतिक रुझान से वे भली-भाँति अवगत थे। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में टैगोर की चित्रकला यात्रा शुरू हुई। यह उनके कवित्य सजगता का विस्तार था। हालांकि उन्हें कला की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी उन्होंने एक सशक्त एवं सहज दृश्य शब्दकोश का विकास कर लिया था। श्री टैगोर की इस उपलब्धि के पीछे आधुनिक पाश्चात्य, पुरातन एवं बाल्य कला जैसे दृश्य कला के विभिन्न स्वरूपों की उनकी गहरी समझ थी।
शिक्षा :- रबीन्द्रनाथ टैगोर की स्कूल की पढ़ाई प्रतिष्ठित सेंट ज़ेवियर स्कूल में हुई। टैगोर ने बैरिस्टर बनने की चाहत में 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन पब्लिक स्कूल में नाम दर्ज कराया। उन्होंने लंदन कॉलेज विश्वविद्यालय में क़ानून का अध्ययन किया लेकिन 1880 में बिना डिग्री हासिल किए ही वापस आ गए। रबीन्द्रनाथ टैगोर को बचपन से ही कविताऐं और कहानियाँ लिखने का शौक़ था। उनके पिता देवेन्द्रनाथ ठाकुर एक जाने-माने समाज सुधारक थे। वे चाहते थे कि रबीन्द्र बडे होकर बैरिस्टर बनें। इसलिए उन्होंने रबीन्द्र को क़ानून की पढ़ाई के लिए लंदन भेजा। लेकिन रबीन्द्र का मन साहित्य में ही रमता था। उन्हें अपने मन के भावों को काग़ज़ पर उतारना पसंद था। आख़िरकार, उनके पिता ने पढ़ाई के बीच में ही उन्हें वापस भारत बुला लिया और उन पर घर-परिवार की ज़िम्मेदारियाँ डाल दीं। रबीन्द्रनाथ टैगोर को प्रकृति से बहुत प्यार था। वे गुरुदेव के नाम से लोकप्रिय थे। भारत आकर गुरुदेव ने फिर से लिखने का काम शुरू किया।
सम्मान :- टैगोर के गीतांजलि (1910) समेत बांग्ला काव्य संग्रहालयों से ली गई कविताओं के अंग्रेज़ी गद्यानुवाद की इस पुस्तक की डब्ल्यू.बी.यीट्स और आंद्रे जीद ने प्रशंसा की और इसके लिए टैगोर को 1913 में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।