ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर -मृत्यु: (8 मई, 2013)

May 08, 2017

ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर ( जन्म: 15 जून 1932 - मृत्यु: 8 मई, 2013) भारत के मशहूर ध्रुपद गायक थे। शानदार ध्रुपदिया गायक उस्ताद ज़ियाउददीन डागर के बेटे फ़रीदुद्दीन ने अपने दिवंगत भाई ज़िया मोहिउद्दीन डागर (मशहूर रुद्र वीणा वादक) के साथ मिलकर ध्रुपद शैली के गायन को पुनर्जीवित करने में अहम भूमिका निभाई है।


जीवन परिचय
फ़रीदुद्दीन का जन्म 15 जून 1932 को राजस्थान के उदयपुर में हुआ था, जहां उनके पिता उदयपुर के महाराणा भूपाल सिंह के दरबार में संगीतज्ञ थे। फ़रीदुद्दीन ने देश विदेश के कई बड़े उत्सवों में अपनी कला का प्रदर्शन किया था। उन्होंने संगीत की शिक्षा अपने पिता उस्ताद ज़ियाउद्दीन खान साहब से ली थी। पिता ने उन्हें ध्रुपद गायन और वीणा वादन में प्रशिक्षित किया। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने बड़े भाई से संगीत की शिक्षा ली। उस्ताद ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर उस परिवार से हैं जिसने 19 पीढिय़ों तक ध्रुपद गायकी को आगे बढ़ाया। उस्ताद ने ध्रुपद को लोकप्रिय बनाने के लिए अनेक प्रयास किए। उन्होंने बड़ी संख्या में देश-विदेश में कॉन्सर्ट किए, वर्कशॉप कीं। वे 1980 में आस्ट्रिया में निवास करने लगे इस दौरान उन्होंने फ्रांस और आस्ट्रिया में ध्रुपद की तालीम देना शुरू किया। तभी कुछ समय के लिए वे भोपाल आए। उस समय संस्कृति सचिव अशोक वाजपेयी ने उस्ताद के सामने ध्रुपद गुरुकुल शुरू करने का प्रस्ताव रखा जिसे उन्होंने मान लिया और फिर उन्होंने यहां ध्रुपद की तालीम देना शुरू की। और भारत वापस आ गए। उन्होंने ध्रुपद केंद्र में 25 साल तक ध्रुपद की तालीम दी। वे आईआईटी बॉम्बे के ध्रुपद संसार में 5 साल तक अतिथि अध्यापक (गैस्ट फ़ैकल्टी) भी रहे।


वे डागर घराने के अन्य कलाकारों के भाँति ही फ़कीरी प्रकृति के कलाकार थे। मन में आया तो दो मीठे बोल पर और लड्डुओं में रात भर गा दिया, अन्यथा लाख रुपए को भी ठुकरा दिए। भोपाल ध्रुपद केंद्र में संगीत साधना कर रहे बिहार निवासी मनोज कुमार को दो वर्षों तक उस्ताद का सान्निध्य प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा सिखाने का अद्भुत तरीका था उनका। बहुत प्यार से सिखाते थे। मुझे तो उस वक्त कुछ आता नहीं था बस उनको सिखाते हुए देखता था। वे सबसे पहले स्वर की तैयारी करवाते थे। गायकी में स्वर स्थान महत्त्वपूर्ण होता है। स्वर स्थान की तैयारी के बाद सामवेद की ऋचाएं जो ध्रुपद में गाई जाती है, उसे सिखाते थे। भोपाल ध्रुपद केंद्र में ही दीक्षा ले रहे मनीष कुमार कहते हैं वे हमारे दादा गुरु थे, उस्ताद के बारे में, उनके सिखाने की शैली के बारे में अपने गुरु उमाकांत गुंदेचा और रमाकांत गुंदेचा से अक्सर सुना करता था। लगभग वही चीजें, उसी शैली में हमारे गुरु भी सिखाते हैं। इसलिए हम ये नहीं कह सकते कि वे अब नहीं रहे। उनका शरीर भले ना रहा हो, शरीर तो नश्वर है लेकिन उनकी कृति तो हमेशा रहेगी और हमारा मार्गदर्शन करेगी।


वे हर साल मुहर्रम के अवसर पर जयपुर जाया करते थे। वे अपने घराने के कलाकारों के साथ रामगंज की घोड़ा निकास रोड स्थित बाबा बहराम ख़ाँ की चौखट पर रहकर मोहर्रम के नियम कायदों का निर्वहन किया करते थे। जयपुर की सुनीता अमीन ने भी उनसे ध्रुपद गायन की गहन शिक्षा ली। अपनी इसी शिष्या के साथ मिलकर यहां वे खो नागोरियान में ध्रुपद पीठ की स्थापना में लगे थे। जयपुर ध्रुपद के इस योगी की साधना का केंद्र बनने से तो रह गया, लेकिन उनकी कला और उनके द्वारा स्थापित की गई परंपराओं का यह शहर हमेशा गवाह रहेगा।


सम्मान और पुरस्कार
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उन्हें तानसेन सम्मान दिया गया। 1994 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से वे सम्मानित किए गए। उन्हें भारत सरकार द्वारा 2012 में पद्म श्री से सम्मानित करने की घोषणा की गई पर उन्होंने सम्मान लेने से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि सरकार ने सीनियरिटी को नजरअंदाज़ करते हुए उनसे जूनियर ध्रुपद गायकों यह सम्मान पहले ही दे दिया था।


प्रख्यात ध्रुपद गायक उस्ताद ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर का मुम्बई में 8 मई 2013 को निधन हो गया। वह 80 वर्ष के थे और कुछ समय से बीमार थे। उस्ताद ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर के इंतकाल की खबर से दिल को यकीन दिलाना मुश्किल हुआ कि ध्रुपद की सबसे बुलंद आवाज़ खामोश हो गई। उस्ताद की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने संगीत के दामन में सबसे ज़्यादा सितारे जड़े। उनके शागिर्द पं. उमाकांत-रमाकांत गुंदेचा, पं.ऋतिक सान्याल, उदय भवालकर, पुष्पराज कोष्ठी आज ध्रुपद के ऐसे बेनजीर हीरे हैं, जिनकी चमक ने दुनियाभर में ध्रुपद को रोशन किया है। उस्ताद ने स्वयं तो गुणी शिष्य तैयार किए ही साथ ही भोपाल स्थित गुंदेचा बंधुओं के ध्रुपद संस्थान का भूमिपूजन कर उन्होंने नए चिरागों को रोशन करने की ज़मीन में बीज भी डाल दिए। आज ध्रुपद संस्थान में जो देशी-विदेशी शागिर्दों का गुलिस्ता महकने लगा है, उसकी जड़ें उस्ताद ने ही सींची हैं।


Zia Fariduddin Dagar (15 June 1932 – 8 May 2013) was an Indian classical vocalist belonging to the Dhrupad tradition, the oldest existing form of north Indian classical music (Hindustani classical music).He was part of the Dagar family of musicians.


He taught at the Dhrupad Kendra in Bhopal with his elder brother Zia Mohiuddin Dagar. He also taught as a visiting professor up to the time of the Babri mosque riots. After the riots, he decided to live at the gurukul of his brother Zia Mohiuddin Dagar at Palaspe near Panvel.


He was awarded the 1994 Sangeet Natak Akademi Award in Hindustani music-Vocal by Sangeet Natak Akademi.


He was born in Udaipur, Rajasthan, where his father, the great Ustad Ziauddin Khansahib, was the court musician for Maharana Bhupal Singh of Udaipur. He was taught Dhrupad vocal and veena by his father. After his father’s demise, he continued learning under his elder brother, Late Ustad Z M Dagar.


He has performed widely in India and abroad, and received the Tansen Samman from the Madhya Pradesh government and the Sangeet Natak Akademi Award. In 2005, he was presented with the Lifetime Achievement Award by the North American Dhrupad Association.


By 1980, he had virtually settled down in Austria where he taught at the conservatory of Innsbruck teaching Dhrupad in Austria and France (mainly Paris). Once, during a visit to India, one of his disciples, the filmmaker, Mani Kaul came to him and pleaded with him to provide the background score for a film, The Cloud Door (1994) [7][8] he was making on Madhya Pradesh.


During the making of the film, they spent over two months in Madhya Pradesh, a lot of time in Bhopal. In those days, Shri Arjun Singh was the Chief Minister of Madhya Pradesh. Cultural development was one of his passions. It is because of him that the magnificent Bharat Bhavan cultural center came up in Bhopal.


At that time, the Secretary to the Department of Culture in Madhya Pradesh was Ashok Vajpayee. Vajpayee offered to start a government supported school for Dhrupad in Bhopal. Zia Fariduddin agreed to move back to India and to take charge as the teacher at this school. He taught dhrupad for 25 years at this Dhrupad Kendra, under the Ustad Allauddin Khan Music Academy, Bhopal, to students like the Gundecha Brothers and Uday Bhawalkar.


He was a distinguished guest faculty at 'Dhrupad Sansar', IIT Bombay for a span of 5 years. Dhrupad Sansar was started under the Cell for Human Values to create an appreciation about Indian Classical Arts and Culture among staff and students of the institution.


He was staying and teaching at the Dhrupad Gurukul near Panvel, which was built by his elder brother Ustad Zia Mohiuddin Dagar and continued to perform in India and abroad until his brief illness and death on 8 May 2013.