तलत महमूद -मृत्यु: (9 मई, 1998)

May 09, 2017

तलत महमूद ( जन्म- 24 फरवरी, 1924, लखनऊ; मृत्यु- 9 मई, 1998, मुंबई) भारत के प्रसिद्ध पार्श्वगायक और फ़िल्म अभिनेता थे। इन्होंने ग़ज़ल गायक के रूप में बहुत ख्याति प्राप्त की थी। शुरुआत में उन्होंने 'तपन कुमार' के नाम से गाने गाये थे। बेहद सौम्य और विनम्र स्वभाव के तलत महमूद के लिए संगीत एक जुनून था, जबकि उनकी अदाकारी ने उन्हें बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार के रूप में पहचान दिलाई। मात्र सोलह वर्ष की उम्र में ही ग़ज़ल गायक के तौर पर अपने सफर की शुरुआत करने वाले तलत महमूद ने उस जमाने की जानी-मानी अभिनेत्रियों- सुरैया, नूतन और माला सिन्हा के साथ भी हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय किया था। उनके योगदान के लिए सन 1992 में उन्हें 'पद्मभूषण' की उपाधि से सम्मानित किया गया।


जन्म-
तलत महमूद का जन्म लखनऊ (उत्तर प्रदेश) के एक खानदानी मुस्लिम परिवार में 24 फ़रवरी, 1924 को हुआ था। उनके पिता का नाम मंजूर महमूद था। तीन बहन और दो भाइयों के बाद तलत महमूद छठी संतान थे। घर में संगीत और कला का सुसंस्कृत परिवेश इन्हें मिला। इनकी बुआ को तलत की आवाज़ की 'लरजिश' पसंद थी। भतीजे तलत महमूद बुआ से प्रोत्साहन पाकर गायन के प्रति आकर्षित होने लगे। इसी रुझान के चलते 'मोरिस संगीत विद्यालय', वर्तमान में 'भातखंडे संगीत विद्यालय', में उन्होंने दाखिला लिया।शुरुआत में तलत महमूद ने लखनऊ आकाशवाणी से गाना शुरू किया। उन्होंने सोलह साल की उम्र में ही पहली बार आकाशवाणी के लिए अपना पहला गाना रिकॉर्ड करवाया था। इस गाने को लखनऊ शहर में काफ़ी प्रसिद्धि मिली। इसके बाद प्रसिद्ध संगीत कम्पनी एचएमवी की एक टीम लखनऊ आई और इस गाने के साथ-साथ तीन और गाने तलत से गवाए गए। इस सफलता से तलत की किस्मत चमक गई। यह वह दौर था, जब सुरीले गायन और आकर्षक व्यक्तित्व वाले युवा हीरो बनने के ख्वाब सँजोया करते थे। तलत महमूद गायक और अभिनेता बनने की चाहत लिए 1944 में कोलकात चले गए। उन्होंने शुरुआत में तपन कुमार के नाम से गाने गाए, जिनमें कई बंगाली गाने भी थे। वास्तव में कैमरे के सामने आते ही तलत महमूद तनाव में आ जाते थे, जबकि गायन में सहज महसूस करते थे। कोलकाता में बनी फ़िल्म 'स्वयंसिद्धा' (1945) में पहली बार उन्होंने पार्श्वगायन किया। अपनी सफलता से प्रेरित होकर बाद में तलत मुंबई आ गए और संगीतकार अनिल विश्वास से मिले।
शुरुआत में तो उन्हें मुंबई में कोई ख़ास सफलती नहीं मिली, लेकिन बाद में मुंबई में प्रदर्शित फ़िल्म 'राखी' (1949), 'अनमोल रतन' (1950) और 'आरजू' (1950) से उनके करियर को विशेष चमक मिली। फ़िल्म 'आरजू' की ग़ज़ल "ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो..." ने अपार लोकप्रियता अर्जित की। यहीं से तलत और दिलीप कुमार का अनूठा संयोग बना, जो कई फ़िल्मों में दोहराया गया। तलत महमूद ने हिन्दी की तैरह फ़िल्मों और तीन बांग्ला फ़िल्मों में अभिनय भी किया। उन्होंने 17 भारतीय भाषाओं में गाने गाये। मशहूर संगीतकार नौशाद ने भी तलत को फ़िल्म 'बाबुल' के लिए गाने का मौका दिया। अभिनेता दिलीप कुमार पर फ़िल्माया गया उनका गाना "मिलते ही आंखे दिल हुआ दीवाना किसी का..." बहुत सराहा गया। इसके बाद तो तलत ने लगातार कई फ़िल्मों में लगातार हिट गने दिए और खूब नाम कमाया। साठ का दशक आते-आते तलत की आवाज़ की मांग घटने लगी। उसी समय फ़िल्म 'सुजाता' के लिए उनका गाना "जलते हैं जिसके लिए..." कूब चला और पसंद किया गया। तलत महमूद ने हिन्दी फ़िल्मों में आखिरी बार 'जहाँआरा' के लिए गाया। इस फ़िल्म का संगीत मदन मोहन ने दिया था।
'ग़ज़ल' गायकी को तलत महमूद ने सम्माननीय ऊँचाईयाँ प्रदान कीं। हमेशा उत्कृष्ट शब्दावली की गजलें ही चयनित कीं। सस्ते बोलों वाले गीतों से उन्हें हमेशा परहेज रहा। यहाँ तक कि गीतकार और संगीतकार उन्हें रचना देने से पहले इस बात को लेकर आशंकित रहते थे कि तलत उसे पसंद करेंगे या नहीं। ग़ज़ल के आधुनिक स्वरूप से वे काफ़ी निराश थे। विशेषकर बीच में सुनाए जाने वाले चुटकुलों पर उन्हें सख्त एतराज था। बतौर तलत महमूद के कथनानुसार- "ग़ज़ल प्रेम का गीत होती है, हम उसे बाज़ारू क्यों बना रहे हैं। इसकी पवित्रता को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए।" मदन मोहन, अनिल विश्वास और खय्याम की धुनों पर सजे उनके तराने बरबस ही दिल मोह लेते हैं। मुश्किल से मुश्किल बंदिशों को सूक्ष्मता से तराश कर पेश करना उनकी ख़ासियत थी।


प्रसिद्ध नगमें-
जाएँ तो जाएँ कहाँ - (टैक्सी ड्राइवर)
सब कुछ लुटा के होश - (एक साल)
फिर वही शाम, वही गम - (जहाँआरा)
मेरा करार ले जा - (आशियाना)
शाम-ए-ग़म की कसम - (फुटपाथ)
हमसे आया न गया - (देख कबीरा रोया)
प्यार पर बस तो नहीं - (सोने की चिड़िया)
ज़िंदगी देने वाले सुन - (दिल-ए-नादान)
अंधे जहान के अंधे रास्ते - (पतिता)
इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा - (छाया)
आहा रिमझिम के ये - (उसने कहा था)
दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है - (मिर्ज़ा ग़ालिब)


फ़िल्मी सफर
मालिक - 1958
सोने की चिड़िया - 1958
एक गाँव की कहानी - 1957
दीवाली की रात - 1956
रफ़्तार - 1955
डाक बाबू - 1954
वारिस- 1954
दिल-ए-नादान - 1953
आराम - 1951
सम्पत्ति - 1949
तुम और मैं - 1947
राजलक्ष्मी - 1945


सम्मान तथा पुरस्कार-
'पद्मभूषण' - 1992
राष्ट्रीय लता मंगेशकर सम्मान - 1995-1996


तलत महमूद ने अपने लम्बे कैरियर में हिन्दी समेत विभिन्न भाषाओं में क़रीब 800 गीत गाए, जिनमें से उनके कई गीत आज भी लोगों के जहन में ताजा हैं। साठ के दशक में फ़िल्मी गीतों के अंदाज में आए बदलाव से तलत महमूद जैसे गायक तालमेल नहीं बैठा सके और उनका कैरियर उतार पर आ गया। फ़िल्मी गीतों में मुहम्मद रफ़ी और मुकेश जैसे नए गायकों के छा जाने से महमूद का दायरा सीमित हो गया।
मखमली आवाज़ के जरिए लोगों को अर्से तक अपना दीवाना बनाने वाले इस कलाकार ने 9 मई, 1998 को दुनिया से विदा ली।


Talat Mahmood (24 February 1924 – 9 May 1998) is considered one of the greatest male Indian non-classical and semi-classical singers. He was a born singer with an intuitive sense of beauty, charm and grace. He was an Indian playback singer. Although he tried his luck as a film actor, he didn't succeed a great deal in acting.


Talat received Padma Bhushan in 1992, in recognition of his artistic contributions in the spheres of cinematic and ghazal music. he had a unique, elegant and profoundly artistic style of singing. Talat was a very gifted singer in every sense. He was particularly famous for singing soft and sombre semi-classical and non-classical ghazals, but the film songs sung by him are also considered critically flawless and outstanding. Although Talat's typical genre was Ghazal, he was an astoundingly brilliant film singer who sung innumerable fantastic film songs.


Romantic and tragic were the moods he liked most and it was he who helped a great deal in shaping the style and method of modern ghazal singing. He can be described as the real founder of modern semi-classical and non-classical ghazal. During the 1950s and 60s, Talat was the first choice of the high-brow literary and artistic community of Indian sub-continent, especially Urdu-speaking community. Even his cancelled songs were immensely popular among them. No other singer had such intellectually high-class and learned audience at the time with an exception of Manna Dey. Talat's voice has often been described as the softest male voice of the Indian sub-continent; not only this, but his voice is also considered among the most soulful male voices ever heard in the Indian sub-continent.


Talat Mahmood was born in Lucknow, Uttar Pradesh, to Manzoor Mahmood. Talat showed his musical leanings from a very young age and would enjoy sitting through all-night music soirees listening patiently to some of the biggest names in classical Indian music then.


Coming from a conservative Muslim background, singing was not encouraged. Talat had to choose between working in films and staying at home. Despite his parental objection he opted for the former, though his family accepted the fact only about a decade later when he gained respect in the industry.
Talat apprenticed classical music under Pandit S.C.R. Bhat at Marris College of Music, Lucknow (presently Bhatkhande Music Institute) some time in late-30s. He started his career purely as a ghazal singer in 1939. Talat Mahmood began his singing career at the age of 16 in 1939 when he began singing the Ghazals of Daag, Mir, Jigar etc. on All India Radio, Lucknow. His voice had a quality distinct from all the other singers. HMV was quick to notice this and offered Talat his first disc in 1941 Sab din ek samaan nahin tha, Bun jaoon ga kya se kya main, Iska to kuch dhyan nahin tha.


His reputation as a ghazal singer was not limited to his hometown of Lucknow, but it reached the city that proved to shape his destiny – Calcutta. The then famous ghazal singers were Ustad Barkat Ali Khan, K.L. Saigal and M.A. Rauf. The classical songs he sang were " Sapnon Ki Suhaani Duniyaa Ko " for film Shikast and " Laage Tose Naina " for Chaandi Ki Deewar.


In 1944 came the hit Tasveer teri dil mera behela nah sake gi. Its popularity was so phenomenal and unrivalled that even today it remains one of the top selling non-film discs[citation needed]. This disc brought Talat the fame throughout India and soon he was beckoned by the Calcutta film industry. Talat made cameo appearances and starred in about 16 movies, for both the Calcutta (film hub of the 1940s) and Bombay Film Industry. The three movies in which he starred were regional hits in Calcutta. Initially, in Calcutta, he recorded a lot of Bangla songs (basic album) under the assumed name of "Tapankumar". Several of his Bangla numbers were super hits in Bengal and are still aired on All India Radio old song reminisces. He sang to the tune of eminent music directors like Kamal Dasgupta [" Du'ti paakhi du'ti teere... "], Sudhin Dasgupta [" Ei rimjhimjhim barosha... "], Rabin Chattopadhyayaa [ " Chander eto aalo... " ], Hemanta Mukhopadhayay [ " E Jodi aakash hoy... " ] and V. Balsara [ " Tumi sundar jodi nahi... " ] during the 50s and early 60s.


In 1949 Talat moved to Bombay, to sing for the Hindi film industry. His name and fame had already preceded him and soon he was flooded with offers. His big break came with the song Ae dil mujhe aisi jagha le chal jahan koi na ho composed by music director Anil Biswas for the soundtrack of the movie Arzoo. The song proved to be extremely popular.


Talat Mehmood was the real founder of modern semi-classical and non-classical ghazal. So, his influence upon other contemporary and succeeding ghazal singers has been broad and profound. It was he who paved the way for such legendary ghazal singers as Mehdi Hassan and Jagjit Singh. Hence he will always be placed very high for his contributions to transform and revitalize the whole art and form ghazal singing.


Talat Mehmood can safely be placed among the greatest male gazal and/or film singers of the Indian subcontinent together with the singers like K. L. Saigal, Mohammed Rafi, Ahmed Rushdi, Mehdi Hassan, Manna Dey, K. J. Yesudas, Ustad Amanat Ali Khan, Kishore Kumar, Jagjit Singh, Ustad Ghulam Ali and Mukesh. Because of his soft and silky voice, subtly intricate and detailed method, correct pronunciation, infallible striking of the notes that are being tried, very sound knowledge of Indian music, striking the right note on the right time, and never missing a single bit of a beat, Talat conquered the souls of countless people throughout the globe, wherever Urdu and Hindi are spoken and understood. He is particularly and immensely popular among learned Urdu-speaking audiences having literary or artistic background, especially in Pakistan.


Talat was a member of the famous male singers' troika of the 1950s who had their respective separate fan-followings throughout the Indian subcontinent, the other two were Muhammad Rafi and Mukesh.This famous troika was the most popular group of the film singers of the 1950s in the entire sub-continent, who enjoyed the largest audience ever existed during any period of sub-continent's cinematic history. Talat exerted a profound influence upon the ghazal singing of his time with his immensely melodious voice and artistic craftsmanship, particularly suitable for typically semi-classical ghazal singing. He was born to be a Ghazal singer, with his majestic style and brilliant diction he conquered not only the hearts of innumerable high-brow listeners but also common folks of his time. He was the heart-favorite singer of the older and maturer audience of his time, and this type of audience still listens to him more than any of the ghazal singers who ever sung except the Shahenshah-e-Ghazal Mehdi Hassan and Jagjit Singh. So, in a sense, he still necessarily is a member of another troika, to be more precise, the three most influential ghazal singers of all time.


Talat particularly and profoundly influenced a whole generation of young singers who succeeded him; including legendary ghazal singers Jagjit Singh and Pankaj Udhas (who always honors him with the title of Shahenshah-E-Ghazal), singer Sajjad Ali and playback singer Abhijeet Bhattacharya.


Popular singles
Even though Talat sang hundreds of hits, some of his most memorable songs from Indian cinema are:


Humse aaya na gaya – Dekh Kabira Roya (1957)
Jayen to jayen kahan – Taxi Driver (1954)
Tasveer banata hoon – Baradari (1955)
Dil-E-Nadaan tujhe hua kya hai – Mirza Ghalib Duett with Suraiya, (1954)
Itna na mujhse tu pyar badha – Chhaya Duett with Lata Mangeshkar, (1961)
Seene me sulagtein hain armaan, aakhon mein udasi chhayee hai – Taraana duet with Lata Mangeshkar (1951)
Aansoo samajh ke kyon mujhe – Chhaya (1961)
Aha rim jhim ke ye pyare pyare geet liye – Usne kaha tha duet with Lata Mangeshkar (1960)
Sham-E-Gham ki qassam – Foothpath (1953)
Jalte hain jiske liye – Sujata (1959)
Meri yaad me tum na – Madhosh (1951)
Phir wohi sham wohi gam – Jahan Aara (1964)
Aye mere dil kahin aur chal – Daag (1952)
Zindagi dene wale sun – Dil-e-Nadaan (1953)
Main dil hoon ek armaan bhara – Anhonee (1952)
Andhe Jahan ke Andhe Raste – Patita
Kadale Neela Kadale- Malayalam Movie "Dweep" ( Music By M.S.Baburaj)
Ashkon ne jo Paya Hai – Chaandi ki Deewar (1964) (Music: N Dutta ; Lyricist: Sahir Ludhianv)
Bechain Nazar Betaab Jigar – Yasmeen (1955), Music: C Ramchandra, Lyricist: Jan Nisar Akhtar
Raat Ne Kya Kya Khwab Dikhaye – Ek Gaon KI Kahani (1957)
Chal diya caravaan, lut gaye hum yahan, tum vahaan - Laila Majnu
Hoke majboor mujhe usne bhulaaya hogaa - Haqeeqat song with Rafi, Manna-de & Bhupendra
Aye Dil Mujhe Aisi Jaga Le Chal - Aarzoo (1949)
Milte Hi AAnkhen Dil Hua Deewana - Baabul (1950)
Mera Jeevan Saathi Bichhar gaya - Baabul (1950)
Koi Nahin Mera Iss Duniya Mein - Daag (1952)
Hum Dard Ke Maron Ka - Daag (1952)