कृष्ण चन्द्र भट्टाचार्य -जन्म: (12 मई, 1875)

May 12, 2017

कृष्ण चन्द्र भट्टाचार्य ( जन्म: 12 मई, 1875 - मृत्यु: 11 दिसंबर, 1949) कलकत्ता विश्वविद्यालय में दार्शनिक थे, जिन्होंने हिन्दू दर्शन पर अध्ययन किया।
जीवन-
कृष्णचन्द्र भट्टाचार्य का जन्म 12 मई, 1875 ई. को सिरामपुर पश्चिम बंगाल में हुआ था। वे बंगाल शिक्षा सेवा से बहाल होकर कई कॉलेजों में व्याख्याता रहे। 1930 में उन्होंने हुगली कॉलेज के स्थानापन्न प्रधानाचार्य के पद पर करते हुए अवकाश ग्रहण किया। अमलनेर के भारतीय दर्शन संस्थान के निदेशक के पद पर भी वे कुछ दिन रहे। 1935 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र के पंचम जॉर्ज प्रोफ़ेसर का पद उनको दिया गया।
कृष्णचन्द्र भट्टाचार्य के दर्शन के विकास को तीन सुस्पष्ट अवधियों में विभक्त किया जा सकता है- प्रथम अवधि 1918 तक, द्वितीय अवधि 1925 से 1932 तक, और तृतीय 1934 से 1938 तक।  प्रथम अवधि में जिस मुख्य विषय को उन्होंने लिया, वह 'निश्चित' और 'अनिश्चित' के स्वरूप तथा इन दोनों के मध्य संबंध की समस्या थी। निश्चित वह है जिसका अनुभव इतना सुस्पष्ट हो कि कम से कम अनुभव के समय तो उसके किसी एक पक्ष या पूरे के बारे में किसी भी तरह का कोई संदेह विद्यमान न हो। अनिश्चित ठीक इसके विपरीत है। इस अर्थ में इन्द्रियानुभववादियों के लिए जो कुछ भी इन्द्रियों द्वारा प्राप्त है, वह निश्चित है। इसी तरह से तर्क बुद्धिवादियों के लिए विषय का तार्किक, संप्रत्ययात्मक और संबंधात्मक पक्ष निश्चित है। इन्द्रियानुभववादियों तथा तर्क बुद्धिवादियों, दोनों के ही अपने अपने 'निश्चित' हैं, जिनसे वे आरम्भ करते हैं तथा जो उनकी स्वीकृति के आधार स्तम्भ व अन्तिम मानदण्ड हैं। किन्तु फिर भी दोनों ही तत्संबंधी अनिश्चित से पूर्णतया मुक्त नहीं हो पाए हैं। हर एक ने जहाँ तक सम्भव हो सका है, अपने अनिश्चित की व्याख्या अपने निश्चित की भाषा में ही करने का प्रयास किया है, किन्तु फिर भी इसमें अनिश्चित का कुछ अंश सदा विद्यमान रहा है। उदाहरण के लिए, इन्द्रियानुभववादियों ने तर्कशास्त्र और संबंधों को 'इन्द्रियदत्त' के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है। इसके विपरीत तर्क बुद्धिवादियों ने इस दत्त को अपूर्ण तर्कबुद्धि कहा और उसको ऐसी बाधा माना, जिससे छुटकारा पाना अत्यन्त आवश्यक है। उन्होंने इसे तर्कबुद्धि का अपने आप को नकारना तक कहा है। किन्तु इन्द्रियानुभववादियों के लिए यह एक समस्या है कि वे संबंधों को उन वास्तविक पदों से कैसे संबंधित करें, जो दत्त हैं, क्योंकि इस प्रक्रम में वही समस्या फिर उठ खड़ी होती है। इसके अतिरिक्त इन्द्रियानुभववादियों को तर्क शास्त्र की विभिन्न इन्द्रियानुभवपरक व्याख्याओं का तुलनात्मक मूल्यांकन भी करना है, जो कि तब तक सम्भव नहीं है, जब तक कि किसी आधारभूत अनिंद्रियानुभविक, फलत: अनिश्चित तर्क शास्त्र का, स्वीकार नहीं किया जाता। दूसरी ओर तर्कबुद्धिवादी भी इसी तरह दत्त से पूर्णतया मुक्त नहीं हो पाए हैं। उनको एक अंधकारमय पृष्ठभूमि या किसी अतार्किक तत्व को स्वीकार करने को बाध्य होना पड़ा है। हेगेलवादियों ने दत्त को तर्कबुद्धि का अपने आप को नकारना कहकर उससे छुटकारा पाने की कोशिश अवश्य की, पर इससे दत्त का ठोसपन जाता रहा।


हम शान्ति के साथ (वर्तमान संदर्भ में) निश्चित और अनिश्चित को-विचार और अनुभव को, मिला भी नहीं सकते। इसका कारण यह है कि ऐसा करने के लिए हमें संबंधों को संबंधियों से जोड़ने का असंभव कार्य करना होगा। वास्तव में इस तरह से दोनों को मिलाने की कोई आवश्यकता ही नहीं है, क्योंकि हर एक का यह दावा है कि वह अपने ही बल-बूते पर एक सांगोंपांग दर्शन प्रदान कर सकता है। चाहे इन्द्रियानुभववादी हों या तर्क बुद्धिवादी, दोनों के लिए दर्शन, अनिश्चित को निश्चित में परिवर्तित करने, यानी अनुभव में जो भी अनिश्चित का अंश है, उसको निरन्तर निश्चित में परिवर्तित करने रहने का, सतत प्रयास है, भले ही वह कई चरणों में हो। तर्क बुद्धिवादियों के लिए सदैव असमाधेय बना रहने वाला दत्त हर स्थिति में वह अनिश्चित है, जो वहीं तक निश्चित में परिवर्तित हो सकता है, जहाँ तक विचार, जिसे अन्यथा तार्किक तत्व भी कहा जाता है, 'दत्त' से सतत मुक्त अनुभूत होता है। इसको दूसरे रूप में इस तरह भी कहा जा सकता है कि नीचे घोर इन्द्रियपरता के स्तर तक प्रत्येक चरण में दत्त का अनुभव स्वयं को प्रदान करने वाले विचार के रूप में होता है। विचार का मात्र स्वयं के रूप में ही नहीं, बल्कि जो दत्त नहीं है, उस रूप में भी 'अ' सही 'अ' केवल तभी है, जब वह न केवल 'अ' है, बल्कि वह अन्य सब चीजों का निषेध भी है। अपने परवर्ती चिंतन में भट्टाचार्य ने इसको दत्त का विभेदन करने वाला विचार कहा। केवल विचार को उन्होंने विच्छिन्न विचार कहा और बाद के चिंतन में विच्छेदन और विभेदन को मुक्ति के क्रमश: निषेधात्मक और विध्यात्मक रूप कहा।


Krishna Chandra Bhattacharya, also known as K.C. Bhattacharya, (12 May 1875 – 11 December 1949) was a philosopher at the University of Calcutta known for his method of "constructive interpretation" through which relations and problematics of ancient Indian philosophical systems are drawn out and developed so that they can be studied like problems of modern philosophy. He was especially interested in the problematic of how the mind (or consciousness) creates an apparently material universe.Bhattacharya encouraged the idea of an immersive cosmopolitanism in which Indian systems of philosophy were modernized through assimilation and immersion rather than to through a blind imitation of European ideas.



Krishna Chandra Bhattacharya was born on 12 May 1875 at Serampore in a family of Sanskrit scholars. Krishnachandra took his school education in a local school. After passing matriculation examination in 1891 he went to the Presidency College, then affiliated with the University of Calcutta.