शम्भाजी -जन्म: (14 मई, 1657)

May 14, 2017

शम्भाजी / शंभू राजे / शम्भुजी ( जन्म: 14 मई, 1657 – मृत्यु: 11 मार्च, 1689) शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र और उत्तराधिकारी थे, जिसने 1680 से 1689 ई. तक राज्य किया। शम्भुजी आरम्भ से ही अभिमानी, क्रोधी एवं भोग विलासी हो गया था। अपनी मृत्यु के समय शिवाजी ने उसे पन्हाला के क़िले में क़ैद कर रखा था। शम्भुजी में अपने पिता की कर्मठता और दृढ़ संकल्प का अभाव था। वह विलास-प्रेमी था, किन्तु उसमें शौर्य की कमी न थी। 4 अप्रैल, 1680 ई. को शिवाजी की मृत्योपरान्त उनकी पत्नि सूर्याबाई ने अपने दस वर्षीय पुत्र राजाराम का अप्रैल, 1680 ई. में रायगढ़ महाराष्ट्र में राज्याभिषेक कर दिया, किन्तु शम्भुजी ने मराठा सेनापति हमीरराव मोहिते को अपने पक्ष में करके आक्रमण कर दिया। उसने सूर्याबाई एवं राजाराम को क़ैद कर लिया और रायगढ़ पर अधिकार करके 30 जुलाई, 1680 ई. को अपना राज्याभिषेक करवाया।


शम्भुजी ने नीलोपन्त को अपना पेशवा बनाया। उसने 1689 ई. तक शासन किया। कालान्तर में शम्भुजी के विरुद्ध राजाराम, सूर्याबाई और अन्नाजी दत्तो ने एक संगठन बना लिया, परन्तु शम्भुजी ने इस संघ को बर्बरतापूर्वक कुचलते हुए सौतेली माँ सूर्याबाई और कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण मराठा सरदारों की हत्या करवा दी। शम्भुजी ने उज्जैन के हिन्दी एवं संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान कविकलश को अपना सलाहकार नियुक्त किया। औरंगज़ेब के विद्रोही पुत्र अकबर को शरण देने के कारण शम्भुजी को मुग़ल सेनाओं के आक्रमण का सामना करना पड़ा। लगभग 9 वर्षों तक वह निरन्तर औरंगज़ेब की विशाल सेनाओं का सफलतापूर्वक सामना करता रहा। संभाजी ने उन्होंने साहस एवं निडरता के साथ औरंगजेब की आठ लाख सेना का सामना किया तथा अधिकांश मुगल सरदारों को युद्ध में पराजित कर उन्हें भागने के लिए विवश कर दिया। 24 से 32 वर्षकी आयु तक शंभू राजा ने मुगलों की पाश्विक शक्ति से लडाई की एवं एक बार भी यह योद्धा पराजित नहीं हुआ। इसलिए औरंगजेब दीर्घकाल तक महाराष्ट्र में युद्ध करता रहा। उसके दबाव से संपूर्ण उत्तर हिंदुस्तान मुक्त रहा। यदि उन्होंने औरंगजेब के साथ समझौता किया होता अथवा उसका आधिपत्य स्वीकार किया होता तो, वह दो-तीन वर्षों में ही पुन: उत्तर हिंदुस्तान में आ धमकता; परंतु संभाजी राजा के संघर्ष के कारण औरंगजेब को 27 वर्ष दक्षिण भारत में ही रुकना पडा। इससे उत्तर में बुंदेलखंड, पंजाब और राजस्थान में हिंदुओं की नई सत्ताएं स्थापित होकर हिंदू समाज को सुरक्षा मिली। ज्येष्ठ शुद्ध 12 शके 1579, गुरुवार दिनांक 14 मई 1657 को पुरंदरगढ पर स्वराज्य के दूसरे छत्रपति का जन्म हुआ। शंभू राजा के जन्म के दो वर्ष पश्चात इनकी माता सई बाई की मृत्यु हो गई एवं राजा मातृसुख से वंचित हो गए। परंतु जिजाऊ ने इस अभाव की पूर्ति की। जिस जिजाऊ ने शिवाजी को तैयार किया, उसी जिजाऊ ने संभाजी राजा पर भी संस्कार किए। संभाजी शक्ति संपन्नता एवं रूप सौंदर्य की प्रत्यक्ष प्रतिमा ही थे।


हिंदुओं के शुद्धीकरण के लिए निरंतर सजग


संभाजी महाराज ने ‘शुद्धीकरणके लिए’ अपने राज्य में स्वतंत्र विभाग की स्थापना की थी। छत्रपति संभाजी महाराज एवं कवि कलश ने बलपूर्वक धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बनाए गए हरसुल के ब्राह्मण गंगाधर कुलकर्णी को शुद्ध कर पुनः हिंदू धर्म में परिवर्तित करने का साहस दिखाया। (यह एक साहस ही था; क्योंकि उस समय ऐसे हिंदुओं को पुनः अपने धर्म में लेने के लिए हिंदुओं द्वारा ही अत्यधिक विरोध होता था। इसलिए गंगाधर को त्र्यंबकेश्वर भेजकर वहां की प्रायश्चित्त विधि पूरी करा ली गई। उसे शुद्धिपत्र देकर अपनी पंक्ति में भोजन के लिए बिठाकर पुनर्प्रवेश करा लिया गया।)’ संभाजी राजा की इस उदारता के कारण बहुत से हिंदु पुनः स्वधर्म में आ गए। फोंडा का गढ पुर्तग़ाली-मराठा सीमा पर था। गोवा की पुर्तग़ाली सत्ता को उकसाने तथा उस सत्ता को पूरी तरह से उखाडने के लिए घेरा देने का जो प्रयास छत्रपति शिवाजी महाराज ने किया था, उसमें फोंडा गढ एक महत्त्वपूर्ण दुवा था। उसका नाम था ‘मर्दनगढ’ । पुर्तग़ालियों ने मर्दनगढ के तट पर तोपों का वर्षाव चालू रखा। तट में और एक दरार पड़ी। 9 नवंबर को पुर्तग़ालियों ने घाटी से अंदर प्रवेश करने का षडयंत्र रचा। उस समय संभाजी महाराज राजापुर में थे। उनका ध्यान इस लड़ाई पर केंद्रित था। महाराज ने फोंडा के मोरचे पर स्वयं उपस्थित रहने का निश्चय किया। वे शीघ्रता से फोंडा पहुंचे। उनका हठ एवं ईर्ष्या इतनी दुर्दम्य थी कि उन्होंने 800 सवारों की सुरक्षा में 600 पैदल सैनिकों को भली-भांति किले में पहुंचाया। पुर्तग़ाली उनके धैर्य एवं निडर मानसिकता को देखते ही रह गए। उन्हें उन पर आक्रमण करने का भान भी नहीं रहा। संभाजी महाराज युद्ध में सम्मिलित हुए, यह देखते ही वाइसरॉय ने अपने मन में ऐसा पक्का निश्चय किया कि यह युद्ध उसे बहुत महंगा पडेगा। महाराज की उपस्थिति देखकर मराठों को होश आया। किल्लेदार येसाजी कंक छत्रपति शिवाजी महाराज के समय का योद्धा था। अब वह वृद्ध हो चुका था; परंतु उसमें युवक को हटाने की शूरता, धीरता एवं सुदृढता थी। इस वृद्ध युवक ने पराक्रम की पराकाष्ठा की उसने अपने लडके कृष्णाजी के साथ चुनिंदे सिपाहियों को साथ लेकर गढ के बाहर जाकर पुर्तग़ालियों से लड़ाई की। जिनके साथ वे लड़े, उनको उन्होंने पूरी तरह पराजित किया; परंतु इस मुठभेड में येसाजी एवं उनके सुपुत्र कृष्णाजी को भयानक चोट लगी। 10 नवंबर को पुर्तग़ालियों ने लौटना आरंभ किया। मराठों ने उन पर छापे मारकर उन्हें अत्यधिक परेशान किया। तोप तथा बंदूकों को पीछे छोडकर उन्हें पलायन करना पड़ा। छत्रपति संभाजी राजा की मृत्यु तक पुर्तग़ाली एवं छत्रपति संभाजी दोनों में युद्ध चालू रह । तब तक मराठों ने पुर्तग़ालियों के नियंत्रण में रहने वाला जो प्रदेश जीत लिया था, उसका बहुत सा अंश मराठों के नियंत्रणमें था। गोवा के गवर्नर द रुद्रिगु द कॉश्त 24 जनवरी 1688 को पुर्तग़ाल के राजा को लिखते हैं : ‘…छत्रपति संभाजी राजा से चल रहा युद्ध अब तक समाप्त नहीं हुआ। यह युद्ध वाइसरॉय कॉट द आल्वेर के राज्यकाल में आरंभ हुआ था।’


मुक़र्रब ख़ाँ ने शंभु राजा एवं कवि कलश को जेर बंद कर हाथी पर बांधा। संभाजी राजा का, विदुषक की वेश-भूषा में, उस समय चित्रकार द्वारा बनाया गया चित्र हाथ पैरों को लकड़ी में फंसाकर रक्तरंजित अवस्था में, अहमदनगर के संग्रहालय में आज भी देखा जा सकता है। असंख्य यातनाएं सहने वाले यह हिंदू राजा चित्र में अत्यंत क्रोधित दिखाई देते हैं। संभाजी राजा के स्वाभिमान का परिचय इस क्रोधित भाव भंगिमा से ज्ञात होता है। जिस समय धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज एवं कवि कलश को लेकर मुक़र्रब ख़ाँ छावनी के पास आया, उस समय औरंगजेब ने उसके स्वागत के लिए सरदार खान को भेजा। संभाजी महाराज वास्तव में पकड़े गए, यह देखकर बादशाह को अत्यानंद हुआ। अल्ला के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु बादशाह तख्त से नीचे उतरा एवं घुटने टेककर ‘रूकता’ कहने लगा। कवि कलश बाजू में ही खडे थे। यह दृष्य देखकर शीघ्र ही कवि कलश ने एक काव्य कहा,


यावन रावन की सभा संभू बंध्यो बजरंग ।
लहू लसत सिंदूरसम खुब खेल्यो रनरंग ।।
जो रवि छवि लछत ही खद्योत होत बदरंग ।
त्यो तुव तेज निहारी ते तखत त्यज्यो अवरंग ।।


अर्थ : जिस प्रकार रावण की सभा में हनुमानजी को लाया गया था, उसी प्रकार संभाजी राजा को औरंगजेब के समक्ष उपस्थित किया गया है। जैसे हनुमानजी की देह पर सिंदूर शोभित होता है, वैसे ही भीषण युद्ध में देह रक्त से सन गई है। इसलिए हे राजन, तुझे यह सुशोभित कर रहा है। जिस प्रकार सूरज को देखते ही जुगनू का प्रकाश नष्ट होता है, उसी प्रकार तेरा तेज देखकर औरंगजेब ने अपने सिंहासन का त्याग किया है। इस कविता से अपमानित होकर औरंगजेब ने कवि कलश की जीभ काटने की आज्ञा दी। बादशाह के समक्ष खडा करने पर इखलास खान द्वारा बार बार अभिवादन करने को कहने पर भी शंभु राजा ने तनिक भी गर्दन नहीं हिलाई एवं बादशाह को थोड़ा भी महत्त्व नहीं दिया। इसके विपरीत वे संतप्त होकर बादशाह की ओर देख रहे थे। संतप्त बादशाह ने उन्हें उसी अवस्था में कारागृह में डालने का आदेश दिया। यह संघर्ष फ़रवरी, 1689 ई. में तब समाप्त हुआ, जब मुग़ल सेनापति मुकर्रब ख़ाँ ने संगमेश्वर में छिपे हुए शम्भुजी एवं कवि कलश को गिरफ़्तार कर लिया। 21 मार्च, 1689 ई. को शम्भुजी की हत्या कर उसकी खाल में भूसा भरवा दिया गया। इसे इतिहास का एक बर्बर हत्याकाण्ड माना जाता है।


Sambhaji (14 May 1657 – 11 March 1689) was the second ruler of the Maratha kingdom. He was the eldest son of Shivaji, the founder of the Maratha Empire and his first wife Saibai. He was successor of the realm after his father's death, and ruled it for nine years. Sambhaji's rule was largely shaped by the ongoing wars between the Maratha kingdom and Mughal Empire as well as other neighbouring powers such as the Siddis, Mysore and the Portuguese in Goa. In 1689, Sambhaji was captured, tortured and executed by the Mughals, and succeeded by his brother Rajaram I.


Sambhaji was born at Purandar fort to Saibai, Shivaji's first wife. His mother died when he was two years old and he was raised by his paternal grandmother Jijabai.[2] At the age of nine, Sambhaji was sent to live with Raja Jai Singh I of Amber as a political hostage to ensure compliance of the Treaty of Purandar that Shivaji had signed with the Mughals on 11 June 1665.[citation needed] As a result of the treaty, Sambhaji became a Mughal mansabdar.He and his father Shivaji presented themselves at Mughal emperor, Aurangzeb's court at Agra on 12 May 1666. Aurangzeb put both of them under house arrest but they escaped on 22 July 1666. However, the two sides reconciled and had cordial relations during the period 1666–1670. In this period Shivaji and Sambhaji fought alongside the Mughals against the Sultanate of Bijapur.



Sambhaji was married to Jivubai in a marriage of political alliance; per Maratha custom she took the name Yesubai. Jivubai was the daughter of Pilajirao Shirke, who had entered Shivaji's service following the defeat of a powerful deshmukh Rao Rana Suryajirao Surve who was his previous patron. This marriage thus gave Shivaji access to the Konkan coastal belt.


Sambhaji's behaviour, including alleged irresponsibility and addiction to sensual pleasures led Shivaji to imprison his son at Panhala fort in 1678 to curb his behaviour. Sambhaji escaped from the fort with his wife and defected to the Mughals in December 1678 for a year, but then returned home when he learnt of a plan by Dilir Khan, the Mughal viceroy of Deccan to arrest him and send him to Delhi. Upon returning home, Sambhaji was unrepentant and was put under surveillance at Panhala.


Sambhaji plundered and ravaged Burhanpur in 1680. His forces completely routed the Mughal garrison and punitively executed captives. The Marathas then looted the city and set its ports ablaze. Sambhaji then withdrew into Baglana, evading the forces of Mughal commander Khan Jahan Bahadur.During the attack on Burhanpur, among his 20,000 troops, many of them perpetrated atrocities against Muslims, including plunder, killing, and torture.


The Maratha Kingdom was put into disarray by Sambhaji's death and his younger half-brother Rajaram Chhatrapati assumed the throne. Rajaram shifted the Maratha capital far south to Jinji, while Maratha guerrilla fighters under Santaji Ghorpade and Dhanaji Jadhav continued to harass the Mughal army. A few days after Sambhaji's death, the capital Raigad Fort fell to the Mughals. Sambhaji's widow, Yesubai, son, Shahu and Shivaji's widow, Sakvarbai were captured; Sakvarbai died in Mughal captivity.[41] Shahu, who was seven years of age when captured, remained prisoner of the Mughals for 18 years from February 1689 until Mughal Emperor Aurangzeb's death in 1707. Shahu was then set free by Emperor Muhammad Azam Shah, son of Aurangzeb. After his release Shahu had to fight a brief war with his aunt Tarabai, Rajaram's widow who claimed the throne for her own son, Shivaji II.The Mughals kept Yesubai captive to ensure that Shahu adhered to the terms of his release. She was released in 1719 when Marathas became strong enough under Shahu and Peshwa Balaji Vishwanath.