राजा राममोहन राय -जन्म: ( जन्म: 22 मई, 1772)

May 22, 2017

राजा राममोहन राय (अंग्रेज़ी: Raja Ram Mohan Roy, जन्म: 22 मई, 1772 - मृत्यु: 27 सितम्बर, 1833) को 'आधुनिक भारतीय समाज' का जन्मदाता कहा जाता है। वे ब्रह्म समाज के संस्थापक, भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता तथा बंगाल में नव-जागरण युग के पितामह थे। धार्मिक और सामाजिक विकास के क्षेत्र में राजा राममोहन राय का नाम सबसे अग्रणी है। राजा राम मोहन राय ने तत्कालीन भारतीय समाज की कट्टरता, रूढ़िवादिता एवं अंध विश्वासों को दूर करके उसे आधुनिक बनाने का प्रयास किया।




जीवन परिचय
जन्म


राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई 1772 ई. को राधा नगर नामक बंगाल के एक गाँव में, पुराने विचारों से सम्पन्न बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने अपने जीवन में अरबी, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, ग्रीक, हिब्रू आदि भाषाओं का अध्ययन किया था। हिन्दू, ईसाई, इस्लाम और सूफी धर्म का भी उन्होंने गम्भीर अध्ययन किया था। 17 वर्ष की अल्पायु में ही वे मूर्ति पूजा विरोधी हो गये थे। वे अंग्रेज़ी भाषा और सभ्यता से काफ़ी प्रभावित थे। उन्होंने इंग्लैंड की यात्रा की। धर्म और समाज सुधार उनका मुख्य लक्ष्य था। वे ईश्वर की एकता में विश्वास करते थे और सभी प्रकार के धार्मिक अंधविश्वास और कर्मकांडों के विरोधी थे। अपने विचारों को उन्होंने लेखों और पुस्तकों में प्रकाशित करवाया। किन्तु हिन्दू और ईसाई प्रचारकों से उनका काफ़ी संघर्ष हुआ, परन्तु वे जीवन भर अपने विचारों का समर्थन करते रहे और उनके प्रचार के लिए उन्होंने ब्रह्मसमाज की स्थापना की।


युवावस्था में ही मूर्तिपूजा खंडन


जब वे मुश्किल से 15 वर्ष के थे, तब उन्होंने बंगाल में एक छोटी सी पुस्तिका लिखी थी, जिसमें उन्होंने मूर्तिपूजा का खंडन किया था, जिसके सम्बंध में उनका कहना था कि वह वेदों में नहीं है। नवयुवक राममोहन को इसके लिए बहुत कष्ट उठाने पड़े। उन्हें कट्टरवादी परिवार से निकाल दिया गया और उन्हें देश निकाले के रूप में अपना जीवन व्यतीत करना पड़ा। तथापि उन्होंने ईश्वर प्रदत्त परिस्थितियों से पूर्ण लाभ उठाया। उन्होंने दूर दूर तक यात्राएं की और इस प्रकार बहुत सा ज्ञान और अनुभव संचित किया। राममोहन राय को मूर्तिपूजा एवं परम्पराओं के विरोध के कारण अपना घर भी छोड़ना पड़ा था। उन्होंने तिब्बत यात्रा की तो उनके क्रान्तिकारी विचारों के कारण वहाँ के लामा भी उनके विरोधी हो गये। वे अरबी और फ़ारसी पहले से ही जानते थे, अब उन्होंने संस्कृत की भी योग्यता प्राप्त कर ली। उन्होंने अंग्रेज़ी, फ्रेंच, लैटिन, हिब्रू और ग्रीक का भी कुछ ज्ञान प्राप्त कर लिया। एकेश्वरवादी राममोहन राय ने जैन, इस्लाम आदि धर्मों का अध्ययन किया था। वे संसार के महत्त्वपूर्ण धर्मग्रंथों का मूल रूप में अध्ययन करने में समर्थ थे। इस कारण वे संसार के सब महत्त्वपूर्ण धर्मों की तुलना करने में सफल हो गये। विश्वधर्म की उनकी धारणा किन्हीं संश्लिष्ट सिद्धांतों पर आधारित नहीं थी, अपितु विभिन्न धर्मों के गम्भीर ज्ञान पर ही आधारित थी। उन्होंने वेदों और उपनिषदों का बंगला अनुवाद किया। वेदान्त के ऊपर अंग्रेज़ी में लिखकर उन्होंने यूरोप तथा अमेरिका में भी बहुत ख्याति अर्जित की।


महान समाज सुधारक
ब्रह्मसमाज की स्थापना


 मुख्य लेख : ब्रह्मसमाज
राजा राममोहन राय आधुनिक शिक्षा के समर्थक थे तथा उन्होंने गणित एवं विज्ञान पर अनेक लेख तथा पुस्तकें लिखीं। 1821 में उन्होंने 'यूनीटेरियन एसोसिएशन' की स्थापना की। हिन्दू समाज की कुरीतियों के घोर विरोधी होने के कारण 1828 में उन्होंने 'ब्रह्म समाज' नामक एक नये प्रकार के समाज की स्थापना की। 1805 में राजा राममोहन राय बंगाल में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेवा में सम्मलित हुए और 1814 तक वे इसी कार्य में लगे रहे। नौकरी से अवकाश प्राप्त करके वे कलकत्ता में स्थायी रूप से रहने लगे और उन्होंने पूर्ण रूप से अपने को जनता की सेवा में लगाया। 1814 में उन्होंने आत्मीय सभा को आरम्भ किया। 20 अगस्त 1828 में उन्होंने ब्रह्मसमाज की स्थापना की। 1831 में एक विशेष कार्य के सम्बंध में दिल्ली के मुग़ल सम्राट के पक्ष का समर्थन करने के लिए इंग्लैंड गये। वे उसी कार्य में व्यस्त थे कि ब्रिस्टल में 27 सितंबर , 1833 को उनका देहान्त हो गया। उन्हें मुग़ल सम्राट की ओर से 'राजा' की उपाधि दी गयी। अपने सब कार्यों में राजा राममोहन राय को स्वदेश प्रेम, अशिक्षितों और निर्धनों के लिए अत्यधिक सहानुभूति की भावना थी। अंग्रेज़ों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह के सम्भव होने के कारण उन्होंने अपने देशवासियों में राजनीतिक जागृति की भावना को प्रोत्साहित करने के लिए जनमत को शिक्षित किया। उन्होंने सम्भव उपायों से लोगों की नैतिक उन्नति के यथासम्भव प्रयत्न किए।


हिन्दू कॉलेज की स्थापना में योगदान


वे अपने समय के सबसे बड़े प्राच्य भाषों के ज्ञाताओं में से एक थे। उनका विश्वास था कि भारत की प्रगति केवल उदार शिक्षा के द्वारा होगी, जिसमें पाश्चात्य विद्या तथा ज्ञान की सभी शाखाओं की शिक्षण व्यवस्था हो। उन्होंने ऐसे लोगों का पूर्ण समर्थन किया, जिन्होंने अंग्रेज़ी भाषा तथा पश्चिमी विज्ञान के अध्ययन का भारत में आरम्भ किया और वे अपने प्रयत्नों में सफल भी हुए। उन्होंने हिन्दू कॉलेज की स्थापना में सहायता दी। यह संस्था उन दिनों की सर्वाधिक आधुनिक संस्था थी।


धार्मिक सुधारक



राजा राममोहन राय
राजा राममोहन राय एक धार्मिक सुधारक तथा सत्य के अन्वेषक थे। सभी धर्मों के अध्ययन से वे इस परिणाम पर पंहुचे कि सभी धर्मों में अद्वैतवाद सम्बधी सिद्धांतों का प्रचलन है। मुसलमान उन्हें मुसलमान समझते थे, ईसाई उन्हें ईसाई समझते थे, अद्वैतवादी उन्हें अद्वैतवाती मानते थे तथा हिन्दू उन्हें वेदान्ती स्वीकार करते थे। वे सब धर्मों की मौलिक सत्यता तथा एकता में विश्वास करते थे।


समाचार पत्रों की स्वतंत्रता के लिये संघर्ष


अंग्रेज़ ईसाई मिशनरी ने अंग्रेज़ी भाषा में 'फ्रेंड ऑफ़ इण्डिया' नामक एक पत्र जारी किया था। इसी वर्ष गंगाधर भट्टाचार्य ने 'बंगाल समाचार' का प्रकाशन शुरू किया। बंगाल में एक उदारवादी पत्र 'केलकटा जर्नल' जेम्स सिल्क बकिंधम ने अक्टूबर सन् 1818 ई. में शुरू किया। सन् 1821 ई. में ताराचंद्र दंत और भवानी चरण बंधोपाध्याय ने बंगाली भाषा में साप्ताहिक पत्र 'संवाद कौमुदी' निकाला, लेकिन दिसंबर 1821 ई. में भवानी चरण ने संपादक पद से त्याग पत्र दे दिया, तो उसका भार राजा राममोहन राय ने संभाला। अप्रैल 1822 ई. में राजा राममोहन राय ने फ़ारसी भाषा में एक साप्ताहिक अख़बार 'मिरात-उल-अख़बार' नाम से शुरू किया, जो भारत में पहला फ़ारसी अख़बार था। साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार को राजा राममोहन राय के धार्मिक वाचिर और इंग्लैण्ड की आयलैंड विरोधी निति को आलोचना पसंद नहीं आई। परिणामस्वरूप सरकार ने प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने के लिए अध्यादेश जारी किया, जिसके विरोध में राजा राममोहन राय ने 'मिरात-उल-अख़बार' का प्रकाशन बंद कर दिया।



राजा राममोहन राय के सम्मान में जारी डाक टिकट
राजा राममोहन राय ने समाचार पत्रों की स्वतंत्रता के लिए भी कड़ा संघर्ष किया था। उन्होंने स्वयं एक बंगाली पत्रिका 'सम्वाद-कौमुदी' आरम्भ की और उसका सम्पादन भी किया। यह पत्रिका भारतीयों द्वारा सम्पादित सबसे पुरानी पत्रिकाओं में से थी। उन्होंने 1833 ई. के समाचारपत्र नियमों के विरुद्ध प्रबल आन्दोलन चलाया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय को एक स्मृति-पत्र दिया, जिसमें उन्होंने समाचार पत्रों की स्वतंत्रता के लाभों पर अपने विचार प्रकट किए थे। समाचार पत्रों की स्वतंत्रता के लिए उनके द्वारा चलाये गये आन्दोलन के द्वारा ही 1835 ई. में समाचार पत्रों की अज़ादी के लिए मार्ग बना।


सती प्रथा हटाने को आन्दोलन


राजा राममोहन राय
राजा राम मोहन राय के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी - सती प्रथा का निवारण। उन्होंने ही अपने अथक प्रयासों से सरकार द्वारा इस कुप्रथा को ग़ैर-क़ानूनी दंण्डनीय घोषित करवाया। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा को मिटाने के लिए प्रयत्न किया। उन्होंने इस अमानवीय प्रथा के विरुद्ध निरन्तर आन्दोलन चलाया। यह आन्दोलन समाचार पत्रों तथा मंच दोनों माध्यमों से चला। इसका विरोध इतना अधिक था कि एक अवसर पर तो उनका जीवन ही खतरे में था। वे अपने शत्रुओं के हमले से कभी नहीं घबराये। उनके पूर्ण और निरन्तर समर्थन का ही प्रभाव था, जिसके कारण लॉर्ड विलियम बैंण्टिक 1829 में सती प्रथा को बन्द कराने में समर्थ हो सके। जब कट्टर लोगों ने इंग्लैंड में 'प्रिवी कॉउन्सिल' में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया, तब उन्होंने भी अपने प्रगतिशील मित्रों और साथी कार्यकर्ताओं की ओर से ब्रिटिश संसद के सम्मुख अपना विरोधी प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। उन्हें प्रसन्नता हुई जब 'प्रिवी कॉउन्सिल' ने 'सती प्रथा' के समर्थकों के प्रार्थना पत्र को अस्वीकृत कर दिया। सती प्रथा के मिटने से राजा राममोहन राय संसार के मानवतावादी सुधारकों की सर्वप्रथम पंक्ति में आ गये।


विदेश में प्रथम भारतीय
1831 से 1834 तक अपने इंग्लैंड प्रवास काल में राममोहन जी ने ब्रिटिश भारत की प्राशासनिक पद्धति में सुधार के लिए आन्दोलन किया। ब्रिटिश संसद के द्वारा भारतीय मामलों पर परामर्श लिए जाने वाले वे प्रथम भारतीय थे। हाउस ऑफ कॉमन्स की प्रवर समिति के समक्ष अपना साक्ष्य देते हुए उन्होंने भारतीय प्राशासन की प्राय: सभी शाखाओं के सम्बंध में अपने सुझाव दिया। राममोहन जी के राजनीतिक विचार बेकन, ह्यूम,बैंथम, ब्लैकस्टोन और मॉन्टेस्क्यू जैसे यूरोपीय दार्शनिकों से प्रभावित थे। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय विवादों के शान्तिपूर्वक निबटारे के सम्बंध में कांग्रेस के माध्यम से सुझाव प्रस्तुत किया, जिसमें सम्बंधित देशों की संसदों से सदस्य लिए जाने का निश्चय हुआ।


मृत्यु


राजा राममोहन राय की प्रतिमा, ब्रिस्टल, ब्रिटेन
27 सितम्बर, 1833 में इंग्लैंड में राजा राममोहन राय की मृत्यु हो गई।


ब्रिटेन में भव्य समाधि


ब्रिटेन के ब्रिस्टल नगर के आरनोस वेल क़ब्रिस्तान में राजा राममोहन राय की समाधि है। 27 सितंबर 2013 को उनकी 180वीं पुण्यतिथि थी। बहुत ही कम लोगों को ज्ञात होगा कि यात्रा के मध्य मेनिनजाईटिस हो जाने के कारण यहाँ ब्रिटेन में ही उनका अप्रत्याशित निधन हो गया था। उस युग में ब्रिटेन में दाह-संस्कार की अनुमति नहीं थी, अतः उनके शव को भूमि में यों ही दबा / समाहित कर दिया गया था। वह समाधि तब से धूल-धूसरित, टूटी-फूटी, अज्ञात, उपेक्षित व बुरे हाल में पड़ी थी। एक भारतीय पारसी से विवाह करने वाली अंग्रेज़ महिला 'कार्ला कॉन्ट्रैक्टर' ने इसके जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया। कोलकाता के एक व्यवसायी व तत्कालीन मेयर के सहयोग से 5 वर्ष पूर्व ही उन्होंने इसका पुनरुद्धार करवाया और इसे एक भव्य समाधि का रूप दिया। कार्ला के प्रयासों से ही हाथीदाँत से बनी राजा की एक दुर्लभ मूर्ति को भी समाधि-भवन में सँजो कर रखा गया है। 27 सितंबर 2013 को ब्रिस्टल में राजा राममोहन राय की उसी समाधि पर श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। स्मरणीय है कि ब्रिस्टल नगर में एक प्रमुख स्थान पर चमकीले काले पत्थर से बनी राजा राममोहन राय की लगभग दो मंजिला ऊँचाई की एक प्रतिमा भी स्थापित है, जिसमें में वे पुस्तकें हाथ में पकड़े खड़े हैं।


राजा जी के बाद ब्रह्मसमाज
राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद ब्रह्मसमाज धीरे धीरे कई शाखाओं में बँट गया। महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर ने 'आदि ब्रह्म समाज', श्री केशवचन्द्रसेन ने 'भारतीय ब्रह्मसमाज' की और उनके पश्चात 'साधारण ब्रह्म समाज', की स्थापना हुई। ब्रह्मसमाज के विचारों के समान ही डॉ. आत्माराम पाण्डुरंग ने 1867 में महाराष्ट्र में 'प्रार्थना समाज' की स्थापना की जिसे आर. जी. भण्डारकर और महादेव गोविन्द रानाडे जैसे व्यक्तियों का समर्थन प्राप्त हुआ। इस प्रकार ब्रह्मसमाज यद्यपि विभिन्न शाखाओं में विभक्त हो गया, परन्तु उसका मूल आधार एक ही था। सभी का उद्देश्य हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म का सुधार करना था और सभी ने ईसाई धर्म और पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित होते हुए भी हिन्दू धार्मिक ग्रंथों, मुख्यतया वेदों को ही अपना मुख्य आधार बनाया था।


विद्वानों की राय में राजा राममोहन राय
विद्वानों की राय में राजा राममोहन राय को नये युग का अग्रदूत ठीक ही कहा गया है।


मोनियर विलियम के अनुसार, राजा महोदय सम्भवत: तुलनात्मक धर्मशास्त्र के प्रथम सच्चे अन्वेषक थे।
सील (Seal) के अनुसार, राजा विश्व मानवता के विचार के संदेशवाहक थे। वे मानवतावादी, पवित्र तथा सरल थे। वे विश्व इतिहास में विश्व मानवता के दिग्दर्शन करते थे।
मिस कोलेट के कथनानुसार, इतिहास में राममोहन राय ऐसे जीवित पुल के समान हैं, जिस पर भारत अपने अपरिमित भूतकाल से अपने अपरिमित भविष्य की ओर चलता है। वे एक ऐसे वृत खंड थे, जो प्राचीन जातिवाद तथा अर्वाचीन मानवता, अंधविश्वास तथा विज्ञान, अनियन्त्रित सत्ता तथा प्रजातंत्र, स्थिर रिवाज तथा अनुदार प्रगति, भयावने अनेक देवताओं में विश्वास तथा पवित्र, यद्यपि अस्पष्ट आस्तिकता के बीच की खाई को ढके हुए थे।
नन्दलाल चटर्जी के अनुसार, राजा राममोहन राय अविनष्ट भूतकाल और उदित होते हुए भविष्य, स्थिर अनुदारता तथा क्रांतिकारी सुधार, अंध परम्परागत पृथकता तथा प्रगतिशील एकता के मध्य मानव सम्बंध स्थापित करने वाले थे। संक्षेप में वे प्रतिक्रिया तथा प्रगति के मध्य बिंदु थे।
रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार, राममोहन राय ने भारत में आधुनिक युग का सूत्रपात किया। उन्हें भारतीय पुनर्जागरण का पिता तथा भारतीय राष्ट्रवाद का प्रवर्तक भी कहा जाता है उनके धार्मिक और सामाजिक सब विचारों के पीछे अपने देशवासियों की राजनीतिक उन्नति करने की भावना मौजूद रहती थी। वे आगे लिखते हैं कि मुझे यह खेदपूर्वक कहना पड़ता है कि हिन्दुओं की वर्तमान पद्धति उनके राजनीतिक हितों की दृष्टि से ठीक नहीं है। जात पात के भाव ने उन्हें राजनीतिक भावना में शून्य कर दिया है। सैकड़ों हज़ारों धार्मिक कृत्यों और शुद्धता के नियमों ने उन्हें कोई भी कठिन काम करने के अयोग्य बना दिया है। मैं समझता हूँ कि यह आवश्यक है कि उनके राजनीतिक लाभ और सामाजिक सुविधा के लिए उनके धर्म में कुछ परिवर्तन हो।


Raja Ram Mohan Roy (22 May 1772 – 26 September 1833) was the founder of the Brahmo Sabha movement in 1828, which engendered the Brahmo Samaj, an influential social-religious reform movement.His influence was apparent in the fields of politics, public administration and education as well as religion. He was known for his efforts to abolish the practice of sati, the Hindu funeral practice in which the widow was compelled to sacrifice herself in her husband’s funeral pyre in some parts of Bengal. Raja Ram Mohan Roy was known as the Father of the Indian Renaissance.


In 2004, Ram Mohan Roy was ranked number 10 in BBC's poll of the Greatest Bengali of all time.
Ram Mohan Roy was born in Radhanagar, Hooghly District, Bengal Presidency, on 22 May 1772.His father Ramkanta was a Vaishnavite, while his mother, Tarinidevi, was from a Shivaite family.


Thus one parent prepared him for the occupation of a scholar, the sastrin, the other secured for him all the worldly advantages needed to launch a career in the laukik or worldly sphere of public administration. Torn between these two parental ideals from early childhood, Ram Mohan vacillated the rest of his life, moving from one to the other and back.


Ram Mohan Roy was married three times. His first wife died early. He had two sons, Radhaprasad in 1800 and Ramaprasad in 1812 with his second wife, who died in 1824. Roy's third wife outlived him.


Ram Mohan Roy's early education is disputed. One view is that "Ram Mohan started his formal education in the village pathshala where he learned Bengali and some Sanskrit and Persian. Later he is said to have studied Persian and Arabic in a madrasa in Patna and after that he was sent to Benares (Kashi) to learn the intricacies of Sanskrit and Hindu scripture, including the Vedas and Upanishads. The dates of his time in both these places are uncertain. However, it is believed that he was sent to Patna when he was nine years old and two years later to Benares."


The Persian and Arabic studies influenced his thinking about One God more than studies of European deism, which he didn't know at least while writing his first scriptures as at that stage he didn't speak or understand English.


Ram Mohan Roy's impact on modern Indian history was his revival of the pure and ethical principles of the Vedanta school of philosophy as found in the Upnishads. He preached the unity of God, made early translations of Vedic scriptures into English, co-founded the Calcutta Unitarian Society and founded the Brahma Samaj. The Brahma Samaj played a major role in reforming and modernising the Indian society. He successfully campaigned against sati, the practice of burning widows. He sought to integrate Western culture with the best features of his own country's traditions. He established a number of schools to popularise a modern system (effectively replacing Sanskrit based education with English based education) of education in India. He promoted a rational, ethical, non-authoritarian, this-worldly, and social-reform Hinduism. His writings also sparked interest among British and American Unitarians.


During these overlapping periods, Ram Mohan Roy acted as a political agitator whilst employed by the East India Company.


In 1792, the British Baptist shoemaker William Carey published his influential missionary tract, An Enquiry of the obligations of Christians to use means for the conversion of heathens.


In 1793, William Carey landed in India to settle. His objective was to translate, publish and distribute the Bible in Indian languages and propagate Christianity to the Indian peoples.He realised the "mobile" (i.e. service classes) Brahmins and Pundits were most able to help him in this endeavour, and he began gathering them. He learnt the Buddhist and Jain religious works to better argue the case for Christianity in the cultural context.


In 1795, Carey made contact with a Sanskrit scholar, the Tantric Hariharananda Vidyabagish, who later introduced him to Ram Mohan Roy, who wished to learn English.


Between 1796 and 1797, the trio of Carey, Vidyavagish, and Roy created a religious work known as the "Maha Nirvana Tantra" (or "Book of the Great Liberation") and positioned it as a religious text to "the One True God". Carey's involvement is not recorded in his very detailed records and he reports only learning to read Sanskrit in 1796 and only completed a grammar in 1797, the same year he translated part of The Bible from Joshua to Job, a massive task. For the next two decades this document was regularly augmented. Its judicial sections were used in the law courts of the English Settlement in Bengal as Hindu Law for adjudicating upon property disputes of the zamindari. However, a few British magistrates and collectors began to suspect and its usage (as well as the reliance on pundits as sources of Hindu Law) was quickly deprecated. Vidyavagish had a brief falling out with Carey and separated from the group, but maintained ties to Ram Mohan Roy.


In 1797, Ram Mohan reached Calcutta and became a "banian" (moneylender), mainly to impoverished Englishmen of the Company living beyond their means. Ram Mohan also continued his vocation as pundit in the English courts and started to make a living for himself. He began learning Greek and Latin.


In 1799, Carey was joined by missionary Joshua Marshman and the printer William Ward at the Danish settlement of Serampore.


From 1803 till 1815, Ram Mohan served the East India Company's "Writing Service", commencing as private clerk "munshi" to Thomas Woodroffe, Registrar of the Appellate Court at Murshidabad (whose distant nephew, John Woodroffe — also a Magistrate — and later lived off the Maha Nirvana Tantra under the pseudonym Arthur Avalon). Roy resigned from Woodroffe's service and later secured employment with John Digby, a Company collector, and Ram Mohan spent many years at Rangpur and elsewhere with Digby, where he renewed his contacts with Hariharananda. William Carey had by this time settled at Serampore and the old trio renewed their profitable association. William Carey was also aligned now with the English Company, then head-quartered at Fort William, and his religious and political ambitions were increasingly intertwined.


The East India Company was draining money from India at a rate of three million pounds a year in 1838. Ram Mohan Roy was one of the first to try to estimate how much money was being driven out of India and to where it was disappearing. He estimated that around one-half of all total revenue collected in India was sent out to England, leaving India, with a considerably larger population, to use the remaining money to maintain social well-being.Ram Mohan Roy saw this and believed that the unrestricted settlement of Europeans in India governing under free trade would help ease the economic drain crisis.


During the next two decades, Ram Mohan launched his attack against the bastions of Hinduism of Bengal, namely his own Kulin Brahmin priestly clan (then in control of the many temples of Bengal) and their priestly excesses. The Kulin excesses targeted include sati (the co-cremation of widows), polygamy, idolatry, child marriage and dowry.


 


In September 2008, representatives from the Indian High Commission came to Bristol to mark the 175th anniversary of Ram Mohan Roy's death. During the ceremony Brahmo and Unitarian prayers were recited and songs of Ram Mohan and other Brahmosangeet were performed.


Following on from this visit the Mayor of Kolkata, Bikash Ranjan Bhattacharya (who was amongst the representatives from the India High Commission) decided to raise funds to restore the mausoleum.
In 1983, a full scale Exhibition on Ram Mohan Roy was held in Bristol's Museum and Art Gallery. His enormous 1831 portrait by Henry Perronet Briggs still hangs there, and was the subject of a talk by Sir Max Muller in 1873. At Bristol's centre, on College Green, is a full-size bronze statue of the Raja by the modern Kolkata sculptor Niranjan Pradhan. Another bust by Pradhan, gifted to Bristol by Jyoti Basu, sits inside the main foyer of Bristol's City Hall.


A pedestrian path at Stapleton has been named "Rajah Rammohun Walk". There is a 1933 Brahmo plaque on the outside west wall of Stapleton Grove, and his first burial place in the garden is marked by railings and a granite memorial stone. His tomb and chattri at Arnos Vale are listed Grade II* by English Heritage, and attract many admiring visitors today.