नरसिंह राव पी. वी. (जन्म- 28 जून, 1921)

June 28, 2017

पी. वी. नरसिम्हा राव (जन्म- 28 जून, 1921, मृत्यु- 23 दिसम्बर, 2004) भारत के नौवें प्रधानमंत्री के रूप में जाने जाते हैं। इनके प्रधानमंत्री बनने में भाग्य का बहुत बड़ा हाथ रहा है। 29 मई, 1991 को राजीव गांधी की हत्या हो गई थी। ऐसे में सहानुभूति की लहर के कारण कांग्रेस को निश्चय ही लाभ प्राप्त हुआ। 1991 के आम चुनाव दो चरणों में हुए थे। प्रथम चरण के चुनाव राजीव गांधी की हत्या से पूर्व हुए थे और द्वितीय चरण के चुनाव उनकी हत्या के बाद में। प्रथम चरण की तुलना में द्वितीय चरण के चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा। इसका प्रमुख कारण राजीव गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर थी। इस चुनाव में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं प्राप्त हुआ लेकिन वह सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। कांग्रेस ने 232 सीटों पर विजय प्राप्त की थी। फिर नरसिम्हा राव को कांग्रेस संसदीय दल का नेतृत्व प्रदान किया गया। ऐसे में उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश किया। सरकार अल्पमत में थी, लेकिन कांग्रेस ने बहुमत साबित करने के लायक़ सांसद जुटा लिए और कांग्रेस सरकार ने पाँच वर्ष का अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूर्ण किया।


जन्म एवं परिवार
पी. वी. नरसिम्हा राव का जन्म 28 जून, 1921 को आंध्र प्रदेश के वांगरा ग्राम करीम नागर में हुआ था। राव का पूरा नाम परबमुल पार्थी वेंकट नरसिम्हा राव था। इन्हें पूरे नाम से बहुत कम लोग ही जानते थे। इनके पिता का नाम पी. रंगा था। नरसिम्हा राव ने उस्मानिया विश्वविद्यालय तथा नागपुर और मुम्बई विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने विधि संकाय में स्नातक तथा स्नातकोत्तर की उपाधियाँ प्राप्त कीं। इनकी पत्नी का निधन इनके जीवन काल में ही हो गया था। वह तीन पुत्रों तथा चार पुत्रियों के पिता बने। पी. वी. नरसिम्हा राव विभिन्न अभिरुचियों वाले इंसान थे। वह संगीत, सिनेमा और थियेटर अत्यन्त पसन्द करते थे। उनको भारतीय संस्कृति और दर्शन में काफ़ी रुचि थी। इन्हें काल्पनिक लेखन भी पसन्द था। वह प्राय: राजनीतिक समीक्षाएँ भी करते थे। नरसिम्हा राव एक अच्छे भाषा विद्वानी भी थे। उन्होंने तेलुगु और हिन्दी में कविताएँ भी लिखी थीं। समग्र रूप से इन्हें साहित्य में भी काफ़ी रुचि थी। इन्होंने तेलुगु उपन्यास का हिन्दी में तथा मराठी भाषा की कृतियों का अनुवाद तेलुगु में किया था।


नरसिम्हा राव में कई प्रकार की प्रतिभाएँ थीं। उन्होंने छद्म नाम से कई कृतियाँ लिखीं। अमेरिकन विश्वविद्यालय में व्याख्यान दिया और पश्चिमी जर्मनी में राजनीति एवं राजनीतिक सम्बन्धों को सराहनीय ढंग से उदघाटित किया। नरसिम्हा राव ने द्विमासिक पत्रिका का सम्पादन भी किया। मानव अधिकारों से सम्बन्धित इस पत्रिका का नाम 'काकतिया' था। ऐसा माना जाता है कि इन्हें राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की 17 भाषाओं का ज्ञान था तथा भाषाएँ सीखने का जुनून था। वह स्पेनिश और फ़्राँसीसी भाषाएँ भी बोल व लिख सकते थे।
नरसिम्हा राव ने स्वाधीनता संग्राम में भी भाग लिया था। आज़ादी के बाद वह पूर्ण रूप से राजनीति में आ गए लेकिन उनकी राजनीति की धुरी उस समय आंध्र प्रदेश तक ही सीमित थी। नरसिम्हा राव को राज्य स्तर पर काफ़ी ख्याति भी मिली। 1962 से 1971 तक वह आंध्र प्रदेश के मंत्रिमण्डल में भी रहे। 1971 में राव प्रदेश की राजनीति में कद्दावर नेता बन गए। वह 1971 से 1973 तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। पी. वी. नरसिम्हा राव ने संकट के समय में भी इंदिरा गांधी के प्रति वफ़ादारी निभाई। 1969 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ, तो वह इंदिरा गांधी के साथ ही रहे। इससे इन्हें लाभ प्राप्त हुआ और इनका राजनीतिक क़द भी बढ़ा। इंदिरा गांधी ने जब आपातकाल लगाया तब नरसिम्हा राव की निष्ठा में कोई भी कमी नहीं आई। इंदिरा गांधी का जब पराभव हुआ तब भी इन्होंने पाला बदलने का कोई प्रयास नहीं किया। वह जानते थे कि परिवर्तन स्थायी नहीं है और इंदिरा गांधी का शासन पुन: आएगा। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय तथा सुरक्षा मंत्रालय भी देखा। नरसिम्हा राव ने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी दोनों का कार्यकाल देखा था। दोनों नेता इनकी विद्वता और योग्यता के कारण हृदय से इनका सम्मान करते थे।


प्रधानमत्री के पद पर
राजीव गांधी के निधन के बाद कांग्रेस में यह बवाल मचा कि संसदीय दल के नेता के रूप में किसे प्रधानमंत्री का पद प्रदान किया जाए। काफ़ी लोगों के नाम विचारणीय थे। लेकिन जिस नाम पर सहमति थी, वह नरसिम्हा राव का था। उस समय उनका स्वास्थ्य अनुकूल नहीं था। इस कारण वह इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी उठाने से बचना चाहते थे। परन्तु इन पर दिग्गज नेताओं का दबाव था। इस कारण अनिच्छुक होते हुए भी वह प्रधानमंत्री बनाए गए। इस प्रकार दक्षिण भारत का प्रथम प्रधानमंत्री देश को प्राप्त हुआ। संयोगवश प्रधानमंत्री बनने के बाद नरसिम्हा राव में अपेक्षित सुधार होता गया। इनके जीवन में बीमारी के कारण जो निष्क्रियता आ गई थी, वह प्रधानमंत्री के कर्तव्यबोध से समाप्त हो गई। यही इनके स्वास्थ्य लाभ का कारण भी था। इन्होंने अपने जीवन में इतना कुछ 1991 तक देखा था कि अस्वस्थ रहने के कारण स्वयं इन्हें भी अपने लम्बे जीवन की आशा नहीं थी। लेकिन प्रधानमंत्री का पद इनके लिए प्राणवायु बनकर आया। पद के दायित्वों को निभाते हुए इनके जीवन की डोर भी लम्बी हो गई।
नरसिम्हा राव के लिए प्रधानमंत्री का पद पाना तो अवश्य सहज रहा लेकिन इनको 5 वर्ष के अपने शासन काल में काफ़ी संघर्ष करना पड़ा। परन्तु राजनीति और कोयले की ख़दान में रहने वाले व्यक्ति पर दाग़ न लगे, यह कभी सम्भव ही नहीं था। इन पर भी भ्रष्टाचार और हवाला क़ारोबार के आरोप लगे। इनके विरुद्ध हर्षद मेहता ने यह दावा किया कि स्वयं पर लगे आरोपों से मुक्त होने के लिए उसने राव को एक करोड़ रुपयों की रिश्वत दी थी। यह आरोप काफ़ी समय तक चर्चा का विषय बना रहा। कांग्रेस ने अपने प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव पर विश्वास बनाए रखा और हर्षद मेहता के आरोपों को नकार दिया। यद्यपि इस मामले को मीडिया ने ख़ूब उछाला था। तब कांग्रेस ने यह तर्क दिया था कि जिस प्रकार सूटकेस में एक करोड़ रुपये भरकर देने की बाता हर्षद मेहता ने कही है, उसमें एक करोड़ रुपया आ ही नहीं सकता। इस पर हर्षद मेहता ने सूटकेस के एक करोड़ रुपये भरकर टी. वी. पर दिखाया था। लेकिन एक जालसाज़ व्यक्ति पर विश्वास करने का कोई औचित्य नहीं था। हर्षद मेहता के विरुद्ध इस आरोप हेतु कार्रवाई नहीं की गई, इससे लोगों को काफ़ी आश्चर्य हुआ।


अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के प्रकरण में भी प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की काफ़ी आलोचना हुई। तब उन पर यह आरोप लगा कि बाबरी मस्जिद ढहाए जाने को लेकर उनकी उदासीनता ही उनकी मूक सहमति थी और वह अपनी हिन्दुत्ववादी सोच पर क़ायम थे। इससे कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की छवि भी संदेह के घेरे में आ गई और मुसलमान उनसे बिदककर समाजवादी पार्टी की ओर आकृष्ट हुए। अयोध्या के विवादित ढाँचे को ढहाए जाने के विरोध में देश भर में साम्प्रदायिक दंगे भी हुए और कई बम कांड भी हुए। इनमें सैकड़ों लोगों की मौत हो गई। अनेक राज्यों की अरबों रुपयों की सार्वजनिक सम्पत्ति को भी दंगाईयों ने ध्वस्त कर दिया। देश का साम्प्रदायिक सौहार्द समाप्त होने के कग़ार पर पहुँच गया। वस्तुत: प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव ने बाबरी मस्जिद की सुरक्षा के लिए प्रभावी क़दम नहीं उठाए थे। वह चाहते तो बाबरी मस्जिद को बचा सकते थे। इस प्रकार उनकी अदूरदर्शिता के कारण ही सार्वजनिक दंगे हुए थे। नरसिम्हा राव पर यह भी आरोप लगा कि श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में प्रतिहिंसा के स्वरूप जो दंगे भड़के थे, उनकी प्रभावी रोकथाम नहीं की गई। इस समय राव देश के गृहमंत्री थे। इन्हें हिन्दू-सिख दंगों को रोकने के लिए कड़े से कड़े क़दम उठाने चाहिए थे। दिल्ली तीन दिन तक प्रतिहिंसा की अग्नि में झुलसती रही। इस कारण भी नरसिम्हा राव की निष्क्रियता की काफ़ी आलोचना की गई। यदि वह सख़्त क़दम उठाते तो सैकड़ों जीवन बचाए जा सकते थे। गृहमंत्री के दायित्व इन्हें हर क़ीमत पर पूर्ण करने चाहिए थे।


वी. पी. नरसिम्हा राव की आर्थिक सफलताएँ भुला दी गईं। 1996 के आम चुनाव में कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा। संसद में उनके पास इतने सांसद नहीं थे कि वह सरकार बनाने का दावा पेश कर सकें। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ही सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई। इस कारण राष्ट्रपति डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा ने भाजपा को सरकार बनाने और बहुमत सिद्ध करने का न्योता दिया। लेकिन यह उसी समय तय हो चुका था कि भाजपा आवश्यक बहुमत पेश नहीं कर सकेगी। अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, लेकिन 13 दिन के बाद ही सरकार गिर गई। इस चुनाव में विभिन्न कारणों से कांग्रेस की पराजय का ज़िम्मेदार नरसिम्हा राव को ही माना गया और पार्टी में उनकी स्थिति दिनों-दिन कमज़ोर होने लगी। अन्तत: जब सोनिया गांधी का सक्रिय राजनीति में प्रवेश हुआ तो पार्टी संगठन उन्हीं के ईद-गिर्द मंडराता नज़र आने लगा।


विभिन्न उपलब्धियाँ
सन् 1996 में प्रधानमंत्री के पद से हटने के बाद से ही पी. वी. नरसिम्हा राव का हाशिय पर जाना आरम्भ हो गया तथा कांग्रेस संगठन ने इन्हें विस्मृत कर दिया तथापि वह निम्नवत् उपलब्धियों के लिए सदैव जाने जाएँगे-


पी. वी. नरसिम्हा राव प्रथम दक्षिण भारतीय प्रधानमंत्री बने और उन्होंने अपना कार्यकाल सम्पूर्ण किया।
नरसिम्हा राव पर हिन्दुत्ववादी शक्तियों का प्रश्रय देने का आरोप भी लगा।
राव पर भ्रष्टाचार के भी कई आरोप लगे, लेकिन न्यायालय में इन्हें अन्तिम रूप से साबित नहीं किया जा सका।
अब तक नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य ही प्रधानमंत्री के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा करते रहे। लेकिन नरसिम्हा राव ने इस परम्परा को तोड़ते हुए पूरे पाँच वर्ष का समय प्रधानमंत्री के रूप में गुज़ारा।
बाबरी मस्जिद प्रकरण के बाद नरसिम्हा राव ने मुस्लिमों को सम्बोधित करते समय उर्दू भाषा का प्रयोग किया। लेकिन आवश्यकता पड़ने पर हिन्दू मतावलम्बियों के समक्ष उन्होंने संस्कृतनिष्ठ श्लोकों द्वारा अपनी बात कही।
नरसिम्हा राव की राजनीतिक दक्षता के कारण आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी और जनता पार्टी की स्थिति कमज़ोर तथा कांग्रेस की स्थिति मज़बूत हुई।
जब राजनीतिक व्यक्ति अपनी पार्टी में उपेक्षित होता है तो वह सामान्यत: दूसरी पार्टी से जुड़ जाता है। लेकिन राव ने मृत्यु पर्यन्त कांग्रेस को ही अपना प्रथम और अन्तिम घर माना। यह किसी भी व्यक्ति की चारित्रिक महानता ही कही जानी चाहिए कि वह अपनी पार्टी के साथ में वफ़ादारी बरते।
लेखन कार्य
राजनीतिक सन्न्यास का जीवन जीते हुए भी पी. वी. नरसिम्हा राव ने सार्थक जीवन गुज़ारा। इस समय का उपयोग उन्होंने लेखन और अनुवाद कार्यों में किया। उन्होंने तेलुगु भाषा के विश्वनाथ सत्यनारायण जैसे महान साहित्यकार के उपन्यास 'सहस्त्र फण' का हिन्दी में अनुवाद भी किया। जीवन के अन्तिम दौर में राव ने एक राजनीतिक उपन्यास 'दि इंसाइडर' लिखा। साथ ही साथ राम मन्दिर और मस्जिद प्रकरण पर इनकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसमें इन्होंने तथ्यात्मक एवं विश्लेषणात्मक स्थितियों का चित्रण करते हुए अपनी भूमिका को स्पष्ट किया था।
नरसिम्हा राव का स्वास्थ्य 2004 के आसपास ख़राब रहने लगा था। उन्हें 9 दिसम्बर को एम्स में दाख़िल कराया गया। इन्हें साँस लेने में कठिनाई हो रही थी। अन्तत: 83 वर्ष पूरे करने के बाद 23 दिसम्बर, 2004 की दोपहर 2:40 पर अपना शरीर त्याग दिया। अन्तिम समय में उनके बेटे प्रभाकर राव उनके पास उपस्थित थे। इस प्रकार देश के नौवें प्रधानमंत्री के रूप में पी. वी. नरसिम्हा राव ने अपना जीवन सफर पूर्ण किया। लेकिन आर्थिक सुधारों के लिए इन्हें सदैव याद रखा जाएगा। विभिन्न भाषाओं का ज्ञान रखने वाले विद्वान के रूप में भी यह देशवासियों की स्मृति में सदा बने रहेंगे।


 


Pamulaparti Venkata Narasimha Rao (28 June 1921 – 23 December 2004) was an Indian lawyer and politician who served as the 9th Prime Minister of India (1991–1996).[3] His ascendancy to the prime ministership was politically significant in that he was the first holder of this office from a non-Hindi-speaking region, belonging to the southern part of India. He led an important administration, overseeing a major economic transformation and several home incidents affecting national security of India. Rao, who held the Industries portfolio, was personally responsible for the dismantling of the Licence Raj, as this came under the purview of the Ministry of Commerce and Industry.He is often referred to as the "Father of Indian Economic Reforms".Future prime ministers Atal Bihari Vajpayee and Manmohan Singh continued the economic reform policies pioneered by Rao's government. Rao accelerated the dismantling of the License Raj, reversing the socialist policies of Rajiv Gandhi's government. He employed Dr. Manmohan Singh as his Finance Minister to embark on historic economic transition. With Rao's mandate, Dr. Manmohan Singh launched India's globalisation angle of the reforms that implemented the International Monetary Fund (IMF) policies to rescue the almost bankrupt nation from economic collapse.Rao was also referred to as Chanakya for his ability to steer tough economic and political legislation through the parliament at a time when he headed a minority government.


According to a former Foreign Minister of India Natwar Singh, "Unlike Nehru, his knowledge of Sanskrit was profound. Nehru had a temper, PV a temperament. His roots were deep in the spiritual and religious soil of India. He did not need to 'Discover India'". 11th President of India APJ Abdul Kalam described Rao as a "patriotic statesman who believed that the nation is bigger than the political system". Kalam acknowledged that Rao in fact asked him to get ready for nuclear tests in 1996 but they were not carried out as government at center got changed due to 1996 general election. The tests were later conducted by Vajpayee-led NDA government. In fact Rao briefed Vajpayee on nuclear plans.


Rao's term as Prime Minister was an eventful one in India's history. Besides marking a paradigm shift from the industrialising, mixed economic model of Jawaharlal Nehru to a market driven one, his years as Prime Minister also saw the emergence of the Bharatiya Janata Party (BJP), a major right-wing party, as an alternative to the Indian National Congress which had been governing India for most of its post-independence history. Rao's term also saw the destruction of the Babri Mosque in Ayodhya in Uttar Pradesh when BJP's Kalyan Singh was CM which triggered one of the worst Hindu-Muslim riots in the country since its independence. Rao died in 2004 of a heart attack in New Delhi. He was cremated in Hyderabad. He was a versatile personality with interests in a variety of subjects (other than politics) such as literature and computer software (including computer programming) He spoke 17 languages.



PV Narasimha Rao had humble social origins. He was born in a Niyogi Brahmin family in a village Laknepalli , Narsampet Mandal, in Warangal District, now in Telangana, but later adopted and brought to Vangara village of Bheemadevarapalli mandal of Karimnagar district in Telangana, then part of Hyderabad State, when he was three years old. His father, Pamulaparthi Sitarama Rao, and mother, Pamulaparthi Rukmini (Rukminamma), hailed from agrarian families. Popularly known as PV, he completed part of his primary education in Katkuru village of Bheemdevarapalli mandal in Karimnagar district by staying in his relative Gabbeta Radhakishan Rao's house and studying for his Bachelor's degree in the Arts college at the Osmania University. P.V. Narasimha Rao was part of Vande Matram movement in late 1930s in the Hyderabad state. He later went on to Hislop College, now under Nagpur University, where he completed a Master's degree in law.


Rao's mother tongue was Telugu, and he had an excellent command of Marathi. In addition to eight other Indian languages (Hindi, Oriya, Bengali, Gujarati, Kannada, Sanskrit, Tamil and Urdu), he spoke English, French, Arabic, Spanish, German and Persian.[18][19] Along with his distant cousin Pamulaparthi Sadasiva Rao, Ch. Raja Narendra and Devulapalli Damodar Rao, PV edited a Telugu weekly magazine called Kakatiya Patrika in the 1940s. Both PV and Sadasiva Rao contributed articles under the pen-name Jaya-Vijaya.


Narasimha Rao was married to Satyamma Rao, who died in 1970. They had three sons and five daughters. His eldest son late P.V. Rangarao was an education minister in Kotla Vijaya Bhaskara Reddy's cabinet and MLA from Hanamakonda Assembly Constituency, in Warangal District for two terms. His second son, Late P.V. Rajeswara Rao, was a Member of Parliament of the 11th Lok Sabha (15 May 1996 – 4 December 1997) from Secunderabad Lok Sabha constituency.


Narasimha Rao was an active freedom fighter during the Indian Independence movementand joined full-time politics after independence as a member of the Indian National Congress. His tenure as Chief minister of Andhra Pradesh is well remembered even today for his land reforms and strict implementation of land ceiling acts in Telangana region. President's rule had to be imposed to counter the Jai Andhra movement during his tenure.He rose to national prominence in 1972 for handling several diverse portfolios, most significantly Home, Defence and Foreign Affairs, in the cabinets of both Indira Gandhi and Rajiv Gandhi. In fact, it is speculated that he was in the running for the post of India's President along with Zail Singh in 1982.


Rao very nearly retired from politics in 1991. It was the assassination of the Congress President Rajiv Gandhi that persuaded him to make a comeback. As the Congress had won the largest number of seats in the 1991 elections, he had an opportunity to head the minority government as Prime Minister. He was the first person outside the Nehru-Gandhi family to serve as Prime Minister for five continuous years, the first to hail from the state of Andhra Pradesh, and also the first from southern India. Since Rao had not contested the general elections, he then participated in a by-election in Nandyal to join the parliament. Rao won from Nandyal with a victory margin of a record 5 lakh (500,000) votes and his win was recorded in the Guinness Book Of World Records and he was Prime Minister of India at the time when he was MP from Berhampur, Ganjam, Odisha.His cabinet included Sharad Pawar, himself a strong contender for the Prime Minister's post, as Defence Minister. He also broke a convention by appointing a non-political economist and future prime minister, Manmohan Singh as his Finance Minister.He also appointed Subramanian Swamy, an Opposition party member as the Chairman of the Commission on Labour Standards and International Trade. This has been the only instance that an Opposition Party member was given a Cabinet rank post by the ruling party. He also sent Opposition leader Atal Bihari Vajpayee, to represent India in a UN meeting at Geneva.


Rao suffered a heart attack on 9 December 2004, and was taken to the All India Institute of Medical Sciences where he died 14 days later at the age of 83.[80] His family wanted the body cremated in Delhi."This is his karmabhoomi", Rao's son Prabhakara told Manmohan Singh. But it is alleged that Sonia Gandhi's closest aides ensured that the body was moved to Hyderabad.[81] In Delhi, his body was not allowed inside AICC building. His body was kept in state at the Jubilee Hall in Hyderabad. His funeral was attended by the then Prime Minister Manmohan Singh, the then Home Affairs Minister Shivraj Patil, the then Bharatiya Janata Party (BJP) president L.K. Advani, the then Defence Minister Pranab Mukherjee, the then Finance Minister P. Chidambaram and many other dignitaries. Rao was a long-time widower, since his wife died in 1970 and he was survived by his eight children.[83] The Government of Telangana declared his birthday to be celebrated as a Telangana State function in 2014.