अहिल्याबाई होल्कर (जन्म: 31 मई, 1725 )

May 31, 2017

रानी अहिल्याबाई होल्कर (जन्म: 31 मई, 1725 - मृत्यु: 13 अगस्त, 1795) मल्हारराव होल्कर के पुत्र खंडेराव की पत्नी थी। अहिल्याबाई किसी बड़े राज्य की रानी नहीं थीं लेकिन अपने राज्य काल में उन्होंने जो कुछ किया वह आश्चर्य चकित करने वाला है। वह एक बहादुर योद्धा और कुशल तीरंदाज थीं। उन्होंने कई युद्धों में अपनी सेना का नेतृत्व किया और हाथी पर सवार होकर वीरता के साथ लड़ी।


जीवन परिचय
अहिल्याबाई का जन्म 31 मई सन् 1725 में हुआ था। अहिल्याबाई के पिता मानकोजी शिंदे एक मामूली किंतु संस्कार वाले आदमी थे। इनका विवाह इन्दौर राज्य के संस्थापक महाराज मल्हार राव होल्कर के पुत्र खंडेराव से हुआ था। सन् 1745 में अहिल्याबाई के पुत्र हुआ और तीन वर्ष बाद एक कन्या। पुत्र का नाम मालेराव और कन्या का नाम मुक्ताबाई रखा। उन्होंने बड़ी कुशलता से अपने पति के गौरव को जगाया। कुछ ही दिनों में अपने महान पिता के मार्गदर्शन में खण्डेराव एक अच्छे सिपाही बन गये। मल्हारराव को भी देखकर संतोष होने लगा। पुत्र-वधू अहिल्याबाई को भी वह राजकाज की शिक्षा देते रहते थे। उनकी बुद्धि और चतुराई से वह बहुत प्रसन्न होते थे। मल्हारराव के जीवन काल में ही उनके पुत्र खंडेराव का निधन 1754 ई. में हो गया था। अतः मल्हार राव के निधन के बाद रानी अहिल्याबाई ने राज्य का शासन-भार सम्भाला था। रानी अहिल्याबाई ने 1795 ई. में अपनी मृत्यु पर्यन्त बड़ी कुशलता से राज्य का शासन चलाया। उनकी गणना आदर्श शासकों में की जाती है। वे अपनी उदारता और प्रजावत्सलता के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके एक ही पुत्र था मालेराव जो 1766 ई. में दिवंगत हो गया। 1767 ई. में अहिल्याबाई ने तुकोजी होल्कर को सेनापति नियुक्त किया।


निर्माण कार्य
रानी अहिल्याबाई ने भारत के भिन्न-भिन्न भागों में अनेक मन्दिरों, धर्मशालाओं और अन्नसत्रों का निर्माण कराया था। कलकत्ता से बनारस तक की सड़क, बनारस में अन्नपूर्णा का मन्दिर , गया में विष्णु मन्दिर उनके बनवाये हुए हैं। इन्होंने घाट बँधवाए, कुओं और बावड़ियों का निर्माण करवाया, मार्ग बनवाए, भूखों के लिए सदाब्रत (अन्नक्षेत्र ) खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बिठलाईं, मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति शास्त्रों के मनन-चिंतन और प्रवचन हेतु की। उन्होंने अपने समय की हलचल में प्रमुख भाग लिया। रानी अहिल्याबाई ने इसके अलावा काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारिका, बद्रीनारायण, रामेश्वर, जगन्नाथ पुरी इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थस्थानों पर मंदिर बनवाए और धर्म शालाएं खुलवायीं। कहा जाता है कि रानी अहिल्‍याबाई के स्‍वप्‍न में एक बार भगवान शिव आए। वे भगवान शिव की भक्‍त थीं और इसलिए उन्‍होंने 1777 में विश्व प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया।


शिव जी की भक्त
उनका सारा जीवन वैराग्य, कर्त्तव्य-पालन और परमार्थ की साधना का बन गया। भगवान शिव की वह बड़ी भक्त थी। बिना उनके पूजन के मुँह में पानी की बूंद नहीं जाने देती थी। सारा राज्य उन्होंने शंकर को अर्पित कर रखा था और आप उनकी सेविका बनकर शासन चलाती थी। 'संपति सब रघुपति के आहि'—सारी संपत्ति भगवान की है, इसका भरत के बाद प्रत्यक्ष और एकमात्र उदाहरण शायद वही थीं। राजाज्ञाओं पर हस्ताक्षर करते समय अपना नाम नहीं लिखती थी। नीचे केवल श्री शंकर लिख देती थी। उनके रुपयों पर शंकर का लिंग और बिल्व पत्र का चित्र अंकित है ओर पैसों पर नंदी का। तब से लेकर भारतीय स्वराज्य की प्राप्ति तक इंदौर के सिंहासन पर जितने नरेश उनके बाद में आये सबकी राजाज्ञाऐं जब तक की श्रीशंकर आज्ञा जारी नहीं होती, तब तक वह राजाज्ञा नहीं मानी जाती थी और उस पर अमल भी नहीं होता था। अहिल्याबाई का रहन-सहन बिल्कुल सादा था। शुद्ध सफ़ेद वस्त्र धारण करती थीं। जेवर आदि कुछ नहीं पहनती थी। भगवान की पूजा, अच्छे ग्रंथों को सुनना ओर राजकाज आदि में नियमित रहती थी।


शांति और सुरक्षा की स्थापना
मल्हारराव होल्कर के जीवन काल में ही उनके पुत्र खंडेराव का निधन 1754 ई. में हो गया था। अतः मल्हार राव के निधन के बाद रानी अहिल्याबाई ने राज्य का शासन-भार सम्भाला था। रानी अहिल्याबाई ने 1795 ई. में अपनी मृत्यु पर्यन्त बड़ी कुशलता से राज्य का शासन चलाया। उनकी गणना आदर्श शासकों में की जाती है। 
शासन की बागडोर जब अहिल्याबाई ने अपने हाथ में ली, राज्य में बड़ी अशांति थी। चोर, डाकू आदि के उपद्रवों से लोग बहुत तंग थे। ऐसी हालत में उन्होंने देखा कि राजा का सबसे पहला कर्त्तव्य उपद्रव करने वालों को काबू में लाकर प्रजा को निर्भयता और शांति प्रदान करना है। उपद्रवों में भीलों का ख़ास हाथ था। उन्होंने दरबार किया और अपने सारे सरदारों और प्रजा का ध्यान इस ओर दिलाते हुए घोषणा की—'जो वीर पुरुष इन उपद्रवी लोगों को काबू में ले आवेगा, उसके साथ मैं अपनी लड़की मुक्ताबाई की शादी कर दूँगी।' इस घोषणा को सुनकर यशवंतराव फणसे नामक एक युवक उठा और उसने बड़ी नम्रता से अहिल्याबाई से कहा कि वह यह काम कर सकता है। महारानी बहुत प्रसन्न हुई। यशवंतराव अपने काम में लग गये और बहुत थोड़े समय में उन्होंने सारे राज्य में शांति की स्थापना कर दी। महारानी ने बड़ी प्रसन्नता और बड़े समारोह के साथ मुक्ताबाई का विवाह यशवंतराव फणसे से कर दिया। इसके बाद अहिल्याबाई का ध्यान शासन के भीतरी सुधारों की तरफ गया। राज्य में शांति और सुरक्षा की स्थापना होते ही व्यापार-व्यवसाय और कला-कौशल की बढ़ोत्तरी होने लगी और लोगों को ज्ञान की उपासना का अवसर भी मिलने लगा। नर्मदा के तीर पर महेश्वरी उनकी राजधानी थी। वहाँ तरह-तरह के कारीगर आने लगे ओर शीघ्र ही वस्त्र-निर्माण का वह एक सुंदर केंद्र बन गया।



अहिल्याबाई होल्कर प्रतिमा, मथुरा
राज्य के विस्तार को व्यवस्थित करके उसे तहसीलों और ज़िलों में बाँट दिया गया ओर प्रजा की तथा शासन की सुविधा को ध्यान में रखते हुए तहसीलों और ज़िलों के केद्र क़ायम करके जहाँ-जहाँ आवश्यकता प्रतीत हुई, न्यायालयों की स्थापना भी कर दी गई। राज्य की सारी पंचायतों के काम को व्यवस्थित किया और न्याय पाने की सीढियाँ बना दी गईं। आख़िरी अपील मंत्री सुनते थे। परंतु यदि उनके फैसले से किसी को संतोष न होता तो महारानी खुद भी अपील सुनती थी।


सेनापति के रूप में
मल्हारराव के भाई-बंदों में तुकोजीराव होल्कर एक विश्वासपात्र युवक थे। मल्हारराव ने उन्हें भी सदा अपने साथ में रखा था और राजकाज के लिए तैयार कर लिया था। अहिल्याबाई ने इन्हें अपना सेनापति बनाया और चौथ वसूल करने का काम उन्हें सौंप दिया। वैसे तो उम्र में तुकोजीराव होल्कर अहिल्याबाई से बड़े थे, परंतु तुकोजी उन्हें अपनी माता के समान ही मानते थे और राज्य का काम पूरी लगन ओर सच्चाई के साथ करते थे। अहिल्याबाई का उन पर इतना प्रेम और विश्वास था कि वह भी उन्हें पुत्र जैसा मानती थीं। राज्य के काग़ज़ों में जहाँ कहीं उनका उल्लेख आता है वहाँ तथा मुहरों में भी 'खंडोजी सुत तुकोजी होल्कर' इस प्रकार कहा गया है।


महिला सशक्तीकरण की पक्षधर
भारतीय संस्कृति में महिलाओं को दुर्गा और चण्डी के रूप में दर्शाया गया है। ठीक इसी तरह अहिल्याबाई ने स्त्रियों को उनका उचित स्थान दिया। नारीशक्ति का भरपूर उपयोग किया। उन्होंने यह बता दिया कि स्त्री किसी भी स्थिति में पुरुष से कम नहीं है। वे स्वयं भी पति के साथ रणक्षेत्र में जाया करती थीं। पति के देहान्त के बाद भी वे युध्द क्षेत्र में उतरती थीं और सेनाओं का नेतृत्व करती थीं। अहिल्याबाई के गद्दी पर बैठने के पहले शासन का ऐसा नियम था कि यदि किसी महिला का पति मर जाए और उसका पुत्र न हो तो उसकी संपूर्ण संपत्ति राजकोष में जमा कर दी जाती थी, परंतु अहिल्या बाई ने इस क़ानून को बदल दिया और मृतक की विधवा को यह अधिकार दिया कि वह पति द्वारा छोड़ी हुई संपत्ति की वारिस रहेगी और अपनी इच्छानुसार अपने उपयोग में लाए और चाहे तो उसका सुख भोगे या अपनी संपत्ति से जनकल्याण के काम करे। अहिल्या बाई की ख़ास विशेष सेवक एक महिला ही थी। अपने शासनकाल में उन्होंने नदियों पर जो घाट स्नान आदि के लिए बनवाए थे, उनमें महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था भी हुआ करती थी। स्त्रियों के मान-सम्मान का बड़ा ध्यान रखा जाता था। लड़कियों को पढ़ाने-लिखाने का जो घरों में थोड़ा-सा चलन था, उसे विस्तार दिया गया। दान-दक्षिणा देने में महिलाओं का वे विशेष ध्यान रखती थीं।


कुछ उदाहरण
एक समय बुन्देलखंड के चन्देरी मुकाम से एक अच्छा ‘धोती-जोड़ा’ आया था, जो उस समय बहुत प्रसिद्ध हुआ करता था। अहिल्या बाई ने उसे स्वीकार किया। उस समय एक सेविका जो वहां मौजूद थी वह धोती-जोड़े को बड़ी ललचाई नजरों से देख रही थी। अहिल्याबाई ने जब यह देखा तो उस कीमती जोड़े को उस सेविका को दे दिया।
इसी प्रकार एक बार उनके दामाद ने पूजा-अर्चना के लिए कुछ बहुमूल्य सामग्री भेजी थी। उस सामान को एक कमज़ोर भिखारिन जिसका नाम था सिन्दूरी, उसे दे दिया। किसी सेविका ने याद दिलाया कि इस सामान की जरूरत आपको भी है परन्तु उन्होंने यह कहकर सेविका की बात को नकार दिया कि उनके पास और हैं।
किसी महिला का पैरों पर गिर पड़ना अहिल्या बाई को पसन्द नहीं था। वे तुरंत अपने दोनों हाथों का सहारा देकर उसे उठा लिया करती थीं। उनके सिर पर हाथ फेरतीं और ढाढस बंधाती। रोने वाली स्त्रियों को वे उनके आंसुओं को रोकने के लिए कहतीं, आंसुओं को संभालकर रखने का उपदेश देतीं और उचित समय पर उनके उपयोग की बात कहतीं। उस समय किसी पुरुष की मौजूदगी को वे अच्छा नहीं समझती थीं। यदि कोई पुरुष किसी कारण मौजूद भी होता तो वे उसे किसी बहाने वहां से हट जाने को कह देतीं। इस प्रकार एक महिला की व्यथा, उसकी भावना को एकांत में सुनतीं, समझतीं थीं। यदि कोई कठिनाई या कोई समस्या होती तो उसे हल कर देतीं अथवा उसकी व्यवस्था करवातीं। महिलाओं को एकांत में अपनी बात खुलकर कहने का अधिकार था। राज्य के दूरदराज के क्षेत्रों का दौरा करना, वहां प्रजा की बातें, उनकी समस्याएं सुनना, उनका हल तलाश करना उन्हें बहुत भाता था। अहिल्याबाई, जो अपने लिए पसन्द करती थीं, वही दूसरों के लिए पसंद करती थीं। इसलिए विशेषतौर पर महिलाओं को त्यागमय उपदेश भी दिया करती थीं।


एक बार होल्कर राज्य की दो विधवाएं अहिल्याबाई के पास आईं, दोनों बड़ी धनवान थीं परन्तु दोनों के पास कोई सन्तान नहीं थी। वे अहिल्याबाई से प्रभावित थीं। अपनी अपार संपत्ति अहिल्या बाई के चरणों में अर्पित करना चाहती थीं। संपत्ति न्योछावर करने की आज्ञा मांगी, परन्तु उन्होंने उन दोनों को यह कहकर मना कर दिया कि जैसे मैंने अपनी संपत्ति जनकल्याण में लगाई है उसी प्रकार तुम भी अपनी संपत्ति को जनहित में लगाओ। उन विधवाओं ने ऐसा ही किया और वे धन्य हो गईं।
राज्य की चिंता का भार और उस पर प्राणों से भी प्यारे लोगों का वियोग। इस सारे शोक-भार को अहिल्याबाई का शरीर अधिक नहीं संभाल सका। और 13 अगस्त सन् 1795 को उनकी जीवन-लीला समाप्त हो गई। अहिल्याबाई के निधन के बाद तुकोजी इन्दौर की गद्दी पर बैठा।


Maharani Ahilyabai Holkar (31 May 1725 – 13 August 1795) was the Holkar Queen of the Maratha Malwa kingdom, India. Rajmata Ahilyabai was born in the village of Chondi in Jamkhed, Ahmednagar, Maharashtra. She moved the capital to Maheshwar south of Indore on the Narmada River.


Ahilyabai's husband Khanderao Holkar was killed in the battle of Kumbher in 1754. Twelve years later, her father-in-law, Malhar Rao Holkar, died. A year after that she was crowned as the queen of the Malwa kingdom. She tried to protect her kingdom from plundering invaders. She personally led armies into battle. She appointed Tukojirao Holkar as the Chief of Army.


Rani Ahilyabai was a great pioneer and builder of Hindu temples. She built hundreds of temples and Dharmashalas throughout India.
Ahilyabai was born on 31 May 1725 in the village of Chaundi, in the present-day Ahmednagar district in Maharashtra. Her father, Mankoji Rao Shinde, was the Patil of the village. Women then did not go to school, but Ahilyabai's father taught her to read and write.


Her entrance on to the stage of history was something of an accident: Malhar Rao Holkar, a commander in the service of the Maratha Peshwa Balaji Baji Rao and lord of the Malwa territory, stopped in Chaundi on his way to Pune and, according to legend, saw the eight-year-old Ahilyabai at the temple service in the village. Recognising her piety and her character, he brought the girl to the Holkar territory as a bride for his son, Khanderao (1723–1754). She was married to Khanderao Holkar in 1733. In 1745, she gave birth to their son Malerao and in 1748, a daughter Muktabai. Malerao was mentally unwell and died of his illness in 1767. Ahilyabai broke another tradition when she married her daughter to Yashwantrao a brave but poor man after he succeeded in defeating the dacoits.
Her husband was killed during the siege of Kumher in 1754. In 1754, on request of support from Imad-ul-Mulk, the Mughal Emperor Ahmad Shah Bahadur's Mir Bakhshi, Ahilya Bai’s husband Khanderao Holkar, in the army of his father Malhar Rao Holkar, laid the siege of Kumher fort of Jat Maharaja Suraj Mal of Bharatpur State who had sided with the Mughal Emperor's rebellious wazir Safdar Jang. Khanderao was inspecting his troops on an open palanquin in the battle of Kumher when was hit and killed by a cannonball from the Jat army. After his death in 1754, his father Malhar Rao prevented his wife Ahilya Bai from committing sati.[2] Malhar Rao Holkar died in 1766, 12 years after the death of his son Khanderao. Malhar Rao's grandson and Khanderao's only son Male Rao Holkar became the ruler of Indore in 1766, under the regentship of Ahilyabai, but he too died within few months on 5 April 1767. Ahilyabai became the ruler of Indore after the death of her son with Khanderao.


A letter to her from her father-in-law Malhar Rao in 1765 illustrates the trust he had in her ability during the tempestuous battle for power in the 18th century:


"Proceed to Gwalior after crossing the Chambal. You may halt there for four or five days. You should keep your big artillery and arrange for its ammunition as much as possible….On the march you should arrange for military posts being located for protection of the road."
Already trained to be a ruler, Ahilyabai petitioned the Peshwa after Malhar’s death, and the death of her son, to take over the administration herself. Some in Malwa objected to her assumption of rule, but the army of Holkar supported her leadership. She led them in person, with four bows and quivers of arrows fitted to the corners of the howdah of her favourite elephant. The Peshwa granted her permission on 11 December 1767, and, with Subhedar Tukojirao Holkar (Malharrao's adopted son) as the head of military matters, she proceeded to rule Malwa in a most enlightened manner, even reinstating a Brahmin who had opposed her. Ahilyabai daily public audience and was always accessible to anyone who needed her ear.


Among Ahilyabai's accomplishments was the development of Indore from a small village to a prosperous and beautiful city; her own capital, however, was in nearby Maheshwar, a town on the banks of the Narmada river. She also built forts and roads in Malwa, sponsored festivals and gave donations for regular worship in many Hindu temples. Outside Malwa, she built dozens of temples, ghats, wells, tanks and rest-houses across an area stretching from the Himalayas to pilgrimage centres in South India. The Bharatiya Sanskritikosh lists as sites she embellished, Kashi, Gaya, Somnath, Ayodhya, Mathura, Hardwar, Kanchi, Avanti, Dwarka, Badrinarayan, Rameshwar and Jaganathpuri. Ahilyadevi also supported the rise of merchants, farmers and cultivators to levels of affluence, and did not consider that she had any legitimate claim to their wealth, be it through taxes or feudal right.


There are many stories of her care for her people. In one instance, when her minister refused to allow the adoption unless he was suitably bribed, she is said to have sponsored the child herself, and given him clothes and jewels as part of the ritual. To honour the memory of Ahilyadevi Holkar, in 1996 leading citizens of Indore instituted an award in her name to be bestowed annually on an outstanding public figure. The Prime Minister of India gave away the first award to Nanaji Deshmukh.


Ahilyadevi was not able to settle the conflict peacefully in the case of the Bhils and Gonds, who plundered her borders; but she granted them waste hilly lands and the right to a small duty on goods passing through their territories. Even in this case, according to Malcolm, she did give "considerate attention to their habits".


Ahilyabai’s capital at Maheshwar was the scene of literary, musical, artistic and industrial enterprise. She entertained the famous Marathi poet, Moropant and the shahir, Anantaphandi from Maharashtra, and also patronised the Sanskrit scholar, Khushali Ram. Craftsmen, sculptors and artists received salaries and honours at her capital, and she even established a textile industry in the city of Maheshwar.


After her death, she was succeeded by Tukoji Rao Holkar I, her commander-in-chief, who soon abdicated the throne in favour of his son Kashi Rao Holkar in 1797.