बिपिन चन्द्र पाल-(मृत्यु: 20 मई)

May 20, 2017

बिपिन चंद्र पाल (अंग्रेज़ी: Bipin Chandra Pal, जन्म: 7 नवंबर, 1858 - मृत्यु: 20 मई, 1932) का नाम भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में 'क्रान्तिकारी विचारों के जनक' के रूप में आता है, जो अंग्रेज़ों की चूलें हिला देने वाली 'लाल' 'बाल' 'पाल' तिकड़ी का एक हिस्सा थे।




जन्म
बंगाल में हबीबगंज ज़िले के पोइल गाँव (वर्तमान में बांग्लादेश) में 7 नवम्बर 1858 को जन्मे विपिन चन्द्र पाल बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वह शिक्षक और पत्रकार होने के साथ-साथ एक कुशल वक्ता और लेखक भी थे। इतिहासकार वी. सी. साहू के अनुसार विपिन चन्द्र कांग्रेस के क्रान्तिकारी देशभक्तों लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चन्द्र पाल (लाल बाल पाल) की तिकड़ी का हिस्सा थे, जिन्होंने 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में ज़बर्दस्त आंदोलन चलाया था।


जीवन परिचय
'वंदे मातरम्' पत्रिका के संस्थापक रहे पाल एक बड़े समाज सुधारक भी थे, जिन्होंने परिवार के विरोध के बावज़ूद एक विधवा से शादी की। बाल गंगाधर तिलक की गिरफ़्तारी और 1907 में ब्रितानिया हुकूमत द्वारा चलाए गए दमन के समय पाल इंग्लैंण्ड गए। वह वहाँ क्रान्तिकारी विधार धारा वाले 'इंडिया हाउस' से जुड़ गए और 'स्वराज पत्रिका' की शुरुआत की। मदन लाल ढींगरा के द्वारा 1909 में कर्ज़न वाइली की हत्या कर दिये जाने के कारण उनकी इस पत्रिका का प्रकाशन बंद हो गया और लंदन में उन्हें काफ़ी मानसिक तनाव से गुज़रना पड़ा। इस घटना के बाद वह उग्र विचारधारा से अलग हो गए और स्वतंत्र देशों के संघ की परिकल्पना पेश की। पाल ने कई मौक़ों पर महात्मा गांधी की आलोचना भी की। 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पाल ने अध्यक्षीय भाषण में गांधीजी की आलोचना करते हुए कहा था-
आप जादू चाहते हैं, लेकिन मैं तर्क में विश्वास करता हूँ। आप मंत्रम चाहते हैं, लेकिन मैं कोई ­ऋषि नहीं हूँ और मंत्रम नहीं दे सकता।
आज़ादी में योगदान


बिपिन चन्द्र पाल के सम्मान में जारी डाक टिकट
वंदे मातरम् राजद्रोह मामले में भी श्री अरबिन्दो के ख़िलाफ़ गवाही देने से इंकार करने के कारण वह छह महीने जेल में रहे। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1958 में पाल की जन्मशती के मौक़े पर अपने सम्बोधन में उन्हें एक ऐसा महान व्यक्तित्व क़रार दिया, जिसने धार्मिक और राजनीतिक मोर्चों पर उच्चस्तरीय भूमिका निभाई। पाल ने आज़ादी की लड़ाई के दौरान विदेशी कपड़ों की होली जलाने और हड़ताल जैसे आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भूमिका निभाई।


निधन
विपिनचन्द्र पाल 1922 में राजनीतिक जीवन से अलग हो गए और 20 मई, 1932 में अपने निधन तक राजनीति से अलग ही रहे।


Bipin Chandra Pal (About this sound pronunciation (help·info); November 7, 1858 – May 20, 1932) was an Indian nationalist, a freedom fighter and social reformer.


Bipin Chandra Pal was born in Poil Village, Habiganj District Sub-Division, Sylhet, Bengal Presidency of British India (now partly in Bangladesh and partly in Assam , India), in a Hindu Bengali Kayastha Vaishnava family. His father was Ramchandra Pal, a Persian scholar and small landowner. He studied and taught at the Church Mission Society College (now the St. Paul's Cathedral Mission College), an affiliated college of the University of Calcutta. His son was Niranjan Pal, one of the founders of Bombay Talkies. His son-in-law was the ICS officer, S. K. Dey, who later became an union minister.


Pal is known as the 'Father of Revolutionary Thoughts' in India and was one of the freedom fighters of India.[3] Pal became a major leader of the Indian National Congress. At the Madras session of congress held in 1887, Bipin Chandra Pal made a strong plea for repeal of the Arms Act which was discriminatory in nature. Along with Lala Lajpat Rai and Bal Gangadhar Tilak he belonged to the Lal, Bal and Pal trio that was associated with revolutionary activity. Aurobindo Ghosh and Pal were recognised as the chief exponents of a new national movement revolving around the ideals of Purna Swaraj, Swadeshi, boycott and national education. His programme consisted of Swadeshi, Boycott and national education. He preached and encouraged the use of Swadeshi and the Boycott of foreign goods to eradicate poverty and unemployment. He wanted to remove social evils from the form and arouse the feelings of nationalism through national criticism. He had no faith in mild protests in the form of Non-Cooperation with the British colonialists. On that one issue, the Assertive nationalist leader had nothing common with Mahatma Gandhi. During last six years of his life he parted company with the Congress and led a secluded life. Sri Aurobindo referred to him as one of mightiest prophets of Nationalism.