लाल बहादुर शास्त्री (जन्म: 2 अक्टूबर, 1904)

October 02, 2017

लाल बहादुर शास्त्री (अंग्रेज़ी: Lal Bahadur Shastri, जन्म: 2 अक्टूबर, 1904 - मृत्यु: 11 जनवरी, 1966) एक प्रसिद्ध भारतीय राजनेता, महान स्वतंत्रता सेनानी और जवाहरलाल नेहरू के बाद भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे। लाल बहादुर शास्त्री एक ऐसी हस्ती थे जिन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में देश को न सिर्फ सैन्य गौरव का तोहफा दिया बल्कि हरित क्रांति और औद्योगीकरण की राह भी दिखाई। शास्त्री जी किसानों को जहां देश का अन्नदाता मानते थे, वहीं देश के सीमा प्रहरियों के प्रति भी उनके मन में अगाध प्रेम था जिसके चलते उन्होंने 'जय जवान, जय किसान' का नारा दिया।


जीवन परिचय
लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को मुग़लसराय, उत्तर प्रदेश में 'मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव' के यहाँ हुआ था। इनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। अत: सब उन्हें 'मुंशी जी' ही कहते थे। बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में लिपिक (क्लर्क) की नौकरी कर ली थी। लालबहादुर की माँ का नाम 'रामदुलारी' था। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण बालक लालबहादुर को परिवार वाले प्यार से नन्हें कहकर ही बुलाया करते थे। जब नन्हें अठारह महीने का हुआ तब दुर्भाग्य से पिता का निधन हो गया। उसकी माँ रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्ज़ापुर चली गयीं। कुछ समय बाद उसके नाना भी नहीं रहे। बिना पिता के बालक नन्हें की परवरिश करने में उसके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी माँ का बहुत सहयोग किया। ननिहाल में रहते हुए उसने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलते ही प्रबुद्ध बालक ने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे शास्त्री लगा लिया। इसके पश्चात 'शास्त्री' शब्द 'लालबहादुर' के नाम का पर्याय ही बन गया।



शिक्षा


भारत में ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के एक कार्यकर्ता लाल बहादुर थोड़े समय (1921) के लिये जेल गए। रिहा होने पर उन्होंने एक राष्ट्रवादी विश्वविद्यालय काशी विद्यापीठ (वर्तमान महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ) में अध्ययन किया और स्नातकोत्तर शास्त्री (शास्त्रों का विद्वान) की उपाधि पाई। स्नातकोत्तर के बाद वह गांधी के अनुयायी के रूप में फिर राजनीति में लौटे, कई बार जेल गए और संयुक्त प्रांत, जो अब उत्तर प्रदेश है, की कांग्रेस पार्टी में प्रभावशाली पद ग्रहण किए। 1937 और 1946 में शास्त्री प्रांत की विधायिका में निर्वाचित हुए।


विवाह


1928 में उनका विवाह गणेशप्रसाद की पुत्री 'ललिता' से हुआ। ललिता जी से उनके छ: सन्तानें हुईं, चार पुत्र- हरिकृष्ण, अनिल, सुनील व अशोक; और दो पुत्रियाँ- कुसुम व सुमन। उनके चार पुत्रों में से दो- अनिल शास्त्री और सुनील शास्त्री अभी भी हैं, शेष दो दिवंगत हो चुके हैं।


नेहरू जी से मुलाकात
1929 में इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने श्री टंडन जी के साथ 'भारत सेवक संघ' के इलाहाबाद इकाई के सचिव के रूप में काम किया। यहीं उनकी नज़दीकी नेहरू जी से भी बढी। इसके बाद से उनका क़द निरंतर बढता गया जिसकी परिणति नेहरू मंत्रिमंडल में गृहमंत्री के तौर पर उनका शामिल होना था। इस पद पर वे 1951 तक बने रहे।


नारा 'मरो नहीं मारो'
"मरो नहीं मारो" का नारा "करो या मरो" का ही एक रूप था। गाँधीवादी सोच के चलते महात्मा गाँधी ने नारा दिया था- 'करो या मरो'। यह नारा उसी रात दिया गया था, जिस रात भारत छोड़ो आन्दोलन का आगाज़ हुआ। यह इसी नारे का असर था कि सम्पूर्ण देश में क्रान्ति की प्रचंड आग फ़ैल गई। ब्रिटिश शासन के खिलाफ इसे अगर एक हिंसक नारा कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यह नारा लाल बहादुर शास्त्री द्वारा 1942 में दिया गया था, जो कि बहुत ही चतुराई पूर्ण रूप से 'करो या मरो' का ही एक अन्य रूप था तथा समझने में आत्यधिक सरल था। सैंकड़ों वर्षों से दिल में रोष दबाए हुए बैठी जनता में यह नारा आग की तरह फ़ैल गया था। एक तरफ गाँधीवादी विचारधारा अहिंसा के रास्ते पर चलकर शांतिपूर्वक प्रदर्शन से ब्रिटिश सरकार से आज़ादी लिए जाने का रास्ता था, परन्तु अंग्रेज़ों ने शायद इसे आवाम का डर समझ लिया था। इसी कारण साफ़ अर्थों में अंग्रेज़ों की दमनकारी नीतियों तथा हिंसा के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना आवश्यक था। तत्पश्चात स्थिति को भांपते हुए शास्त्री जी ने चतुराईपूर्वक 'मरो नहीं मारो' का नारा दिया, जो एक क्रान्ति के जैसा साबित हुआ।


मंत्री पद


भारत की स्वतंत्रता के पश्चात शास्त्री जी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था। वो गोविंद बल्लभ पंत के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में प्रहरी एवं यातायात मंत्री बने। यातायात मंत्री के समय में उन्होंनें प्रथम बार किसी महिला को संवाहक (कंडक्टर) के पद में नियुक्त किया। प्रहरी विभाग के मंत्री होने के बाद उन्होंने भीड़ को नियंत्रण में रखने के लिए लाठी के जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारंभ कराया। 1951 में, जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व में वह अखिल भारत काँग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये। 1952 में वह संसद के लिये निर्वाचित हुए और केंद्रीय रेलवे व परिवहन मंत्री बने।




भारत के दूसरे प्रधानमंत्री
1961 में गृह मंत्री के प्रभावशाली पद पर नियुक्ति के बाद उन्हें एक कुशल मध्यस्थ के रूप में प्रतिष्ठा मिली। 3 साल बाद जवाहरलाल नेहरू के बीमार पड़ने पर उन्हें बिना किसी विभाग का मंत्री नियुक्त किया गया और नेहरू की मृत्यु के बाद जून 1964 में वह भारत के प्रधानमंत्री बने। भारत की आर्थिक समस्याओं से प्रभावी ढंग से न निपट पाने के कारण शास्त्री जी की आलोचना हुई, लेकिन जम्मू-कश्मीर के विवादित प्रांत पर पड़ोसी पाकिस्तान के साथ वैमनस्य भड़कने पर (1965) उनके द्वारा दिखाई गई दृढ़ता के लिये उन्हें बहुत लोकप्रियता मिली। ताशकंद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान के साथ युद्ध करने की ताशकंद घोषणा के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद उनकी मृत्यु हो गई।



लाल बहादुर शास्त्री के सम्मान में भारतीय डाक टिकट
धोती कुर्ते में सिर पर टोपी लगाए गांव-गांव किसानों के बीच घूमकर हाथ को हवा में लहराता, जय जवान, जय किसान का उद्घोष करता। ये उसके व्यक्तित्व का दूसरा पहलू है। भले ही इस महान व्यक्ति का कद छोटा हो लेकिन भारतीय इतिहास में उसका कद बहुत ऊंचा है। जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद शास्त्री जी ने 9 जून, 1964 को प्रधानमंत्री का पदभार ग्रहण किया। उनका कार्यकाल राजनीतिक सरगर्मियों से भरा और तेज गतिविधियों का काल था। पाकिस्तान और चीन भारतीय सीमाओं पर नज़रें गड़ाए खड़े थे तो वहीं देश के सामने कई आर्थिक समस्याएं भी थीं। लेकिन शास्त्री जी ने हर समस्या को बेहद सरल तरीक़े से हल किया। किसानों को अन्नदाता मानने वाले और देश की सीमा प्रहरियों के प्रति उनके अपार प्रेम ने हर समस्या का हल निकाल दिया "जय जवान, जय किसान" के उद्घोष के साथ उन्होंने देश को आगे बढ़ाया।


भारत-पाकिस्तान युद्ध (1965)


जिस समय लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने उस साल 1965 में पाकिस्तानी हुकूमत ने कश्मीर घाटी को भारत से छीनने की योजना बनाई थी। लेकिन शास्त्री जी ने दूरदर्शिता दिखाते हुए पंजाब के रास्ते लाहौर में सेंध लगा पाकिस्तान को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इस हरकत से पाकिस्तान की विश्व स्तर पर बहुत निंदा हुई। पाक हुक्मरान ने अपनी इज्जत बचाने के लिए तत्कालीन सोवियस संघ से संपर्क साधा जिसके आमंत्रण पर शास्त्री जी 1966 में पाकिस्तान के साथ शांति समझौता करने के लिए ताशकंद गए। इस समझौते के तहत भारत, पाकिस्तान के वे सभी हिस्से लौटाने पर सहमत हो गया, जहां भारतीय सेना ने विजय के रूप में तिरंगा झंडा गाड़ दिया था।[1]


ताशकंद समझौता


ताशकंद समझौते के दौरान लाल बहादुर शास्त्री और अयूब ख़ान
ताशकंद समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच 11 जनवरी, 1966 को हुआ एक शांति समझौता था। इस समझौते के अनुसार यह तय हुआ कि भारत और पाकिस्तान अपनी शक्ति का प्रयोग नहीं करेंगे और अपने झगड़ों को शान्तिपूर्ण ढंग से तय करेंगे। यह समझौता भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री तथा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयूब ख़ाँ की लम्बी वार्ता के उपरान्त 11 जनवरी, 1966 ई. को ताशकंद, रूस में हुआ।


निधन


लाल बहादुर शास्त्री अपने परिवार के साथ
ताशकंद समझौते के बाद दिल का दौरा पड़ने से 11 जनवरी, 1966 को ताशकंद में शास्त्री जी का निधन हो गया। हालांकि उनकी मृत्यु को लेकर आज तक कोई आधिकारिक रिपोर्ट सामने नहीं लाई गई है। उनके परिजन समय समय पर उनकी मौत का सवाल उठाते रहे हैं। यह देश के लिए एक शर्म का विषय है कि उसके इतने काबिल नेता की मौत का कारण आज तक साफ नहीं हो पाया है।


सम्मान और पुरस्कार
शास्त्रीजी को उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है। उन्हें वर्ष 1966 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।


प्रेरक प्रसंग
शास्त्री जी ने कभी भी अपने पद या सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग नहीं किया। सरकारी इंपाला शेवरले कार का उपयोग भी नहीं के बराबर ही किया। किसी राजकीय अतिथि के आने पर ही निकाली जाती थी वह गाड़ी। शास्त्री जी के पुत्र सुनील शास्त्री की पुस्तक 'लालबहादुर शास्त्री, मेरे बाबूजी' के अनुसार शास्त्री जी आज के राजनीतिज्ञों से बिल्कुल भिन्न थे। उन्होंने कभी भी अपने पद या सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग नहीं किया। अपनी इस दलील के पक्ष में एक नजीर देते हुए उन्होंने लिखा है, 'शास्त्री जी जब 1964 में प्रधानमंत्री बने, तब उन्हें सरकारी आवास के साथ ही इंपाला शेवरले कार मिली, जिसका उपयोग वह न के बराबर ही किया करते थे। वह गाड़ी किसी राजकीय अतिथि के आने पर ही निकाली जाती थी।' किताब के अनुसार एक बार उनके पुत्र सुनील शास्त्री किसी निजी काम के लिए इंपाला कार ले गए और वापस लाकर चुपचाप खड़ी कर दी। शास्त्रीजी को जब पता चला तो उन्होंने ड्राइवर को बुलाकर पूछा कि कल कितने किलोमीटर गाड़ी चलाई गई और जब ड्राइवर ने बताया कि चौदह किलोमीटर तो उन्होंने निर्देश दिया, 'लिख दो, चौदह किलोमीटर प्राइवेट यूज।' शास्त्रीजी यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने अपनी पत्नी को बुलाकर निर्देश दिया कि उनके निजी सचिव से कह कर वह सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में पैसे जमा करवा दें।


लाल बहादुर शास्त्री के सम्मान में भारतीय डाक टिकट
शास्त्री जी के पुत्र सुनील शास्त्री की लिखी पुस्तक 'लालबहादुर शास्त्री, मेरे बाबूजी' के अनुसार शास्त्री जी को खुद कष्ट उठाकर दूसरों को सुखी देखने में जो आनंद मिलता था, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। एक बार की घटना है, जब शास्त्रीजी रेल मंत्री थे और वह मुंबई जा रहे थे। उनके लिए प्रथम श्रेणी का डिब्बा लगा था। गाड़ी चलने पर शास्त्रीजी बोले, 'डिब्बे में काफ़ी ठंडक है, वैसे बाहर गर्मी है।' उनके पी.ए. कैलाश बाबू ने कहा, 'जी, इसमें कूलर लग गया है।' शास्त्रीजी ने पैनी निगाह से उन्हें देखा और आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा, 'कूलर लग गया है?...बिना मुझे बताए? आप लोग कोई काम करने से पहले मुझसे पूछते क्यों नहीं? क्या और सारे लोग जो गाड़ी में चल रहे हैं, उन्हें गरमी नहीं लगती होगी?' शास्त्रीजी ने कहा, 'कायदा तो यह है कि मुझे भी थर्ड क्लास में चलना चाहिए, लेकिन उतना तो नहीं हो सकता, पर जितना हो सकता है उतना तो करना चाहिए।' उन्होंने आगे कहा, 'बड़ा गलत काम हुआ है। आगे गाड़ी जहाँ भी रुके, पहले कूलर निकलवाइए।' मथुरा स्टेशन पर गाड़ी रुकी और कूलर निकलवाने के बाद ही गाड़ी आगे बढ़ी। आज भी फर्स्ट क्लास के उस डिब्बे में जहाँ कूलर लगा था, वहाँ पर लकड़ी जड़ी है।
'लालबहादुर शास्त्री, मेरे बाबूजी' पुस्तक में एक घटना का ज़िक्र करते हुए बताया गया है कि एक बार शास्त्रीजी की अलमारी साफ़ की गई और उसमें से अनेक फटे पुराने कुर्ते निकाल दिये गए। लेकिन शास्त्रीजी ने वे कुर्ते वापस मांगे और कहा, 'अब नवम्बर आयेगा, जाड़े के दिन होंगे, तब ये सब काम आयेंगे। ऊपर से कोट पहन लूँगा न।' शास्त्रीजी का खादी के प्रति अनुराग ही था कि उन्होंने फटे पुराने समझ हटा दिये गए कुर्तों को सहेजते हुए कहा, 'ये सब खादी के कपड़े हैं। बड़ी मेहनत से बनाए हैं बीनने वालों ने। इसका एक-एक सूत काम आना चाहिए।' इस पुस्तक के लेखक और शास्त्री जी के पुत्र ने बताया कि शास्त्रीजी की सादगी और किफायत का यह आलम था कि एक बार उन्होंने अपना फटा हुआ कुर्ता अपनी पत्नी को देते हुए कहा, 'इनके रूमाल बना दो।' इस सादगी और किफायत की कल्पना तो आज के दौर के किसी भी राजनीतिज्ञ से नहीं की जा सकती। पुस्तक में कहा गया है, 'वे क्या सोचते हैं, यह जानना बहुत कठिन था, क्योंकि वे कभी भी अनावश्यक मुंह नहीं खोलते थे। खुद कष्ट उठाकर दूसरों को सुखी देखने में उन्हें जो आनंद मिलता था, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।'


Lal Bahadur Shastri (2 October 1904 – 11 January 1966) was the 2nd Prime Minister of the Republic of India and a leader of the Indian National Congress party.


Shastri joined the Indian independence movement in the 1920s. Deeply impressed and influenced by Mahatma Gandhi (with whom he shared his birthday), he became a loyal follower, first of Gandhi, and then of Jawaharlal Nehru. Following independence in 1947, he joined the latter's government and became one of Prime Minister Nehru's principal, first as Railways Minister (1951–56), and then in a variety of other functions, including Home Minister.


He led the country during the Indo-Pakistan War of 1965. His slogan of "Jai Jawan Jai Kisan" ("Hail the soldier, Hail the farmer") became very popular during the war and is remembered even today. The war formally ended with the Tashkent Agreement on 10 January 1966; he died the following day, still in Tashkent, the cause of death was said to be a heart attack but there are various reasons to think that it was a planned murder by the CIA.


Shastri was born at the house of his maternal grandparents in Mughalsarai, Varanasi in a Kayastha Hindu family,that had traditionally been employed as Highly administrators and civil servants. Shastri's paternal ancestors had been in the service of the zamindar of Ramnagar near Varanasi and Shastri lived there for the first one year of his life. Shastri's father, Sharada Prasad Srivastava, was a school teacher who later became a clerk in the revenue office at Allahabad, while his mother, Ramdulari Devi, was the daughter of Munshi Hazari Lal, the headmaster and English teacher at a railway school in Mughalsarai. Shastri was the second child and eldest son of his parents; he had an elder sister, Kailashi Devi (b. 1900).


In April 1906, When Shastri was hardly one year old, his father, had only recently been promoted to the post of deputy tahsildar, died in an epidemic of bubonic plague. Ramdulari Devi, then only 23 and pregnant with her third child, took her two children and moved from Ramnnagar to her father's house in Mughalsarai and settled there for good. She gave birth to a daughter, Sundari Devi, in July 1906.Thus, Shastri and his sisters grew up in the household of his maternal grandfather, Hazari Lal. However, Hazari Lal himself died from a stroke in mid-1908, after which the family were looked after by his brother (Shastri's great-uncle) Darbari Lal, who was the head clerk in the opium regulation department at Ghazipur, and later by his son (Ramdulari Devi's cousin) Bindeshwari Prasad, a school teacher in Mughalsarai.


In Shastri's family, as with many Kayastha families, it was the custom in that era for children to receive an education in the Urdu language and culture. This is because Urdu/Persian had been the language of government for centuries, before being replaced by English, and old traditions persisted into the 20th century. Therefore, Shastri began his education at the age of four under the tutelage of a maulvi (a Muslim cleric), Budhan Mian, at the East Central Railway Inter college in Mughalsarai. He studied there until the sixth standard. In 1917, Bindeshwari Prasad (who was now head of the household) was transferred to Varanasi, and the entire family moved there, including Ramdulari Devi and her three children. In Varanasi, Shastri joining the seventh standard at Harish Chandra High School. At this time, he decided to drop his caste-derived surname of "Verma" (which is a traditional optional surname for all Kayastha families).


While Shastri's family had no links to the independence movement then taking shape, among his teachers at Harish Chandra High School was an intensely patriotic and highly respected teacher named Nishkameshwar Prasad Mishra, who gave Shastri much-needed financial support by allowing him to tutor his children. Inspired by Mishra's patriotism, Shastri took a deep interest in the freedom struggle, and began to study its history and the works of several of its noted personalities, including those of Swami Vivekananda, Bal Gangadhar Tilak, Gandhi and Annie Besant. In January 1921, when Shastri was in the 10 standard and three months from sitting the final examinations, he attended a public meeting in Benares hosted by Gandhi and Pandit Madan Mohan Malaviya. Inspired by the Mahatma's call for students to withdraw from government schools and join the non-cooperation movement, Shastri withdrew from Harish Chadra the next day and joined the local branch of the Congress Party as a volunteer, actively participating in picketing and anti-government demonstrations. He was soon arrested and jailed, but was then let off as he was still a minor. Shastri's immediate supervisor was a former Benares Hindu University lecturer named J.B. Kripalani, who would become one of the most prominent leaders of the Indian independence movement and among Gandhi's closest followers. Recognising the need for the younger volunteers to continue their educations, Kripalani and a friend, V.N. Sharma, had founded an informal school centered around "nationalist education" to educate the young activists in their nation's heritage. With the support of a wealthy philanthropist and ardent Congress nationalist, Shiv Prasad Gupta, the Kashi Vidyapith was inaugurated by Gandhi in Benares as a national institution of higher education on 10 February 1921. Among the first students of the new institution, Shastri graduated with a first-class degree in philosophy and ethics from the Vidyapith in 1925. He was given the title Shastri ("scholar"). The title was a bachelor's degree awarded by the Vidyapith, but it stuck as part of his name.


Shastri enrolled himself as a life member of the Servants of the People Society (Lok Sevak Mandal), founded by Lala Lajpat Rai, and began to work for the betterment of the Harijans under Gandhi's direction at Muzaffarpur. Later he became the President of the Society.


In 1928 shastri become an active member of congress at the call of gandhiji. Shastri participated in the Salt Satyagraha in 1930. He was imprisoned for two and a half years. Later, he worked as the Organizing Secretary of the Parliamentary Board of U.P. in 1937. In 1940, he was sent to prison for one year, for offering individual Satyagraha support to the independence movement.


On 8 August 1942, Mahatma Gandhi issued the Quit India speech at Gowalia Tank in Mumbai, demanding that the British leave India. Shastri, who had just then come out after a year in prison, travelled to Allahabad. For a week, he sent instructions to the independence activists from Jawaharlal Nehru's home, Anand Bhavan. A few days later, he was arrested and imprisoned until 1946. Shastri spent almost nine years in jail in total. During his stay in prison, he spent time reading books and became familiar with the works of western philosophers, revolutionaries and social reformers.



Political career (1947–64)
State minister
Following India's independence, Shastri was appointed Parliamentary Secretary in his home state, Uttar Pradesh. He became the Minister of Police and Transport under Govind Ballabh Pant's Chief Ministership on 15 August 1947 following Rafi Ahmed Kidwai's departure to become minister at centre. As the Transport Minister, he was the first to appoint women conductors. As the minister in charge of the Police Department, he ordered that police use jets of water instead of lathis to disperse unruly crowds. His tenure as police minister (As Home Minister was called prior to 1950) saw successful curbing of communal riots in 1947, mass migration and resettlement of refugees.


In 1951, Shastri was made the General Secretary of the All-India Congress Committee with Jawaharlal Nehru as the Prime Minister. He was directly responsible for the selection of candidates and the direction of publicity and electioneering activities. His cabinet consisted of the finest business men of India including Ratilal Premchand Mehta. He played an important role in the landslide successes of the Congress Party in the Indian General Elections of 1952, 1957 and 1962. In 1952, he successfully contested UP Vidhansabha from Soraon North cum Phulpur West seat and won getting over 69% of vote. He was believed to be retained as home minister of UP, but in a surprise move was called to Centre as minister by Nehru. Shastri was made Minister of Railways in First Cabinet of Republic of India on 13 May 1952.


Prime minister of India (1964–66)
Jawaharlal Nehru died in office on 27 May 1964 and left a void.[citation needed] Then Congress Party chief Minister K. Kamaraj was instrumental in making Shastri Prime Minister on 9 June. Shastri, though mild-mannered and soft-spoken, was a Nehruvian socialist and thus held appeal to those wishing to prevent the ascent of conservative right-winger Morarji Desai.


In his first broadcast as Prime Minister, on 11 June 1964, Shastri stated:


"There comes a time in the life of every nation when it stands at the cross-roads of history and must choose which way to go. But for us there need be no difficulty or hesitation, no looking to right or left. Our way is straight and clear—the building up of a secular mixed-economy democracy at home with freedom and prosperity, and the maintenance of world peace and friendship with select nations."



Jai Jawan Jai Kisan
For the outstanding slogan given by him during Indo-Pak war of 1965 Ministry of Information and Broadcasting (India) commemorated Shastriji even after 47 years of his death on his 48th martyr's day:


Former Prime Minister Lal Bahadur Shastri was one of those great Indians who has left an indelible impression on our collective life. Shri Lal Bahadur Shastri's contribution to our public life were unique in that they were made in the closest proximity to the life of the common man in India. Shri Lal Bahadur Shastri was looked upon by Indians as one of their own, one who shared their ideals, hopes and aspirations. His achievements were looked upon not as the isolated achievements of an individual but of our society collectively.


Under his leadership India faced and repulsed the Pakistani invasion of 1965. It is not only a matter of pride for the Indian Army but also for every citizen of the country. Shri Lal Bahadur Shastri's slogan Jai Jawan! Jai Kisan!! reverberates even today through the length and breadth of the country. Underlying this is the inner-most sentiments 'Jai Hind'. The war of 1965 was fought and won for our self-respect and our national prestige. For using our Defence Forces with such admirable skill, the nation remains beholden to Shri Lal Bahadur Shastri. He will be remembered for all times to come for his large heartedness and public service.


Shastri died in Tashkent, at 02:00 on the day after signing the Tashkent Declaration, reportedly due to a heart attack, but people allege conspiracy behind the death. He was the first Prime Minister of India to die overseas. He was eulogised as a national hero and the Vijay Ghat memorial established in his memory. Upon his death, Gulzarilal Nanda once again assumed the role of Acting Prime Minister until the Congress Parliamentary Party elected Indira Gandhi over Morarji Desai to officially succeed Shastri.

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