गुरु गोबिन्द सिंह (मृत्यु- 7 अक्तूबर, 1708 ई. )

October 07, 2017

गुरु गोबिन्द सिंह (जन्म- 22 दिसंबर, 1666 ई. पटना, बिहार; मृत्यु- 7 अक्तूबर, 1708 ई. नांदेड़, महाराष्ट्र) सिक्खों के दसवें व अंतिम गुरु माने जाते हैं। वे 11 नवंबर, 1675 को सिक्खों के गुरु नियुक्त हुए थे और 1708 ई. तक इस पद पर रहे। वे सिक्खों के सैनिक संगति, ख़ालसा के सृजन के लिए प्रसिद्ध थे। कुछ ज्ञानी कहते हैं कि जब-जब धर्म का ह्रास होता है, तब-तब सत्य एवं न्याय का विघटन भी होता है तथा आतंक के कारण अत्याचार, अन्याय, हिंसा और मानवता खतरे में होती है। उस समय दुष्टों का नाश एवं सत्य, न्याय और धर्म की रक्षा करने के लिए ईश्वर स्वयं इस भूतल पर अवतरित होते हैं। गुरु गोबिन्द सिंह जी ने भी इस तथ्य का प्रतिपादन करते हुए कहा है,


"जब-जब होत अरिस्ट अपारा। तब-तब देह धरत अवतारा।"


जीवन परिचय
गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर सन् 1666 ई. को पटना, बिहार में हुआ था। इनका मूल नाम 'गोबिन्द राय' था। गोबिन्द सिंह को सैन्य जीवन के प्रति लगाव अपने दादा गुरु हरगोबिन्द सिंह से मिला था और उन्हें महान बौद्धिक संपदा भी उत्तराधिकार में मिली थी। वह बहुभाषाविद थे, जिन्हें फ़ारसी अरबी, संस्कृत और अपनी मातृभाषा पंजाबी का ज्ञान था। उन्होंने सिक्ख क़ानून को सूत्रबद्ध किया, काव्य रचना की और सिक्ख ग्रंथ 'दसम ग्रंथ' (दसवां खंड) लिखकर प्रसिद्धि पाई। उन्होंने देश, धर्म और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सिक्खों को संगठित कर सैनिक परिवेश में ढाला। दशम गुरु गोबिन्द सिंह जी स्वयं एक ऐसे ही महापुरुष थे, जो उस युग की आतंकवादी शक्तियों का नाश करने तथा धर्म एवं न्याय की प्रतिष्ठा के लिए गुरु तेग़बहादुर सिंह जी के यहाँ अवतरित हुए। इसी उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा था।


"मुझे परमेश्वर ने दुष्टों का नाश करने और धर्म की स्थापना करने के लिए भेजा है।"
बचपन


गुरु गोबिन्द सिंह के जन्म के समय देश पर मुग़लों का शासन था। हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की औरंगज़ेब ज़बरदस्ती कोशिश करता था। इसी समय 22 दिसंबर, सन् 1666 को गुरु तेग़बहादुर की धर्मपत्नी माता गुजरी ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया, जो गुरु गोबिन्द सिंह के नाम से विख्यात हुआ। पूरे नगर में बालक के जन्म पर उत्सव मनाया गया। खिलौनों से खेलने की उम्र में गोबिन्द जी कृपाण, कटार और धनुष-बाण से खेलना पसंद करते थे। गोबिन्द बचपन में शरारती थे लेकिन वे अपनी शरारतों से किसी को परेशान नहीं करते थे। गोबिन्द एक निसंतान बुढ़िया, जो सूत काटकर अपना गुज़ारा करती थी, से बहुत शरारत करते थे। वे उसकी पूनियाँ बिखेर देते थे। इससे दुखी होकर वह उनकी मां के पास शिकायत लेकर पहुँच जाती थी। माता गुजरी पैसे देकर उसे खुश कर देती थी। माता गूजरी ने गोबिन्द से बुढ़िया को तंग करने का कारण पूछा तो उन्होंने सहज भाव से कहा,


"उसकी ग़रीबी दूर करने के लिए। अगर मैं उसे परेशान नहीं करूँगा तो उसे पैसे कैसे मिलेंगे।"



9 वर्ष की आयु में गद्दी


तेग़बहादुर की शहादत के बाद गद्दी पर 9 वर्ष की आयु में 'गुरु गोबिन्द राय' को बैठाया गया था। 'गुरु' की गरिमा बनाये रखने के लिए उन्होंने अपना ज्ञान बढ़ाया और संस्कृत, फ़ारसी, पंजाबी और अरबी भाषाएँ सीखीं। गोबिन्द राय ने धनुष- बाण, तलवार, भाला आदि चलाने की कला भी सीखी। उन्होंने अन्य सिक्खों को भी अस्त्र शस्त्र चलाना सिखाया। सिक्खों को अपने धर्म, जन्मभूमि और स्वयं अपनी रक्षा करने के लिए संकल्पबद्ध किया और उन्हें मानवता का पाठ पढ़ाया। उनका नारा था- सत श्री अकाल



गुरु गोबिन्द सिंह जी
पंच प्यारे
पाँच प्यारे जो देश के विभिन्न भागों से आए थे और समाज के अलग- अलग जाति और सम्प्रदाय के लोग थे, उन्हें एक ही कटोरे में अमृत पिला कर गुरु गोबिन्द सिंह ने एक बना दिया। इस प्रकार समाज में उन्होंने एक ऐसी क्रान्ति का बीज रोपा, जिसमें जाति का भेद और सम्प्रदायवाद, सब कुछ मिटा दिया। बैसाखी का एक महत्त्व यह है कि परम्परा के अनुसार पंजाब में फ़सल की कटाई पहली बैसाख को ही शुरू होती है और देश के दूसरे हिस्सों में भी आज ही के दिन फ़सल कटाई का त्योहार मनाया जाता है, जिनके नाम भले ही अलग-अलग हों। आज के दिन यदि हम श्री गुरु गोबिन्द सिंह के जीवन के आदर्शों को, देश, समाज और मानवता की भलाई के लिए उनके समर्पण को अपनी प्रेरणा का स्रोत बनाऐं और उनके बताये गए रास्ते पर निष्ठापूर्वक चलें तो कोई कारण नहीं कि देश के अन्दर अथवा बाहर से आए आतंकवादी और हमलावर हमारा कुछ भी बिगाड़ सकें।


सिक्खों में युद्ध का उत्साह
गुरु गोबिन्द सिंह ने सिक्खों में युद्ध का उत्साह बढ़ाने के लिए हर क़दम उठाया। वीर काव्य और संगीत का सृजन उन्होंने किया था। उन्होंने अपने लोगों में कृपाण जो उनकी लौह कृपा था, के प्रति प्रेम विकसित किया। खालसा को पुर्नसंगठित सिक्ख सेना का मार्गदर्शक बनाकर, उन्होंने दो मोर्चों पर सिक्खों के शत्रुओं के ख़िलाफ़ क़दम उठाये।


पहला मुग़लों के ख़िलाफ़ एक फ़ौज और
दूसरा विरोधी पहाड़ी जनजातियों के ख़िलाफ़।
सवा लाख से एक लड़ाऊँ चिड़ियों सों मैं बाज तड़ऊँ तबे गोबिंदसिंह नाम कहाऊँ Blockquote-close.gif
- गुरु गोबिन्द सिंह
उनकी सैन्य टुकड़ियाँ सिक्ख आदर्शो के प्रति पूरी तरह समर्पित थीं और सिक्खों की धार्मिक तथा राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार थीं। लेकिन गुरु गोबिन्द सिंह को इस स्वतंत्रता की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी। अंबाला के पास एक युद्ध में उनके चारों बेटे मारे गए।[2]


वीरता और बलिदान
गुरु गोबिन्द सिंह ने धर्म, संस्कृति व राष्ट्र की आन-बान और शान के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया था। गुरु गोबिन्द सिंह जैसी वीरता और बलिदान इतिहास में कम ही देखने को मिलता है। इसके बावज़ूद इस महान शख़्सियत को इतिहासकारों ने वह स्थान नहीं दिया जिसके वे हक़दार हैं। कुछ इतिहासकारों का मत है कि गुरु गोबिन्द सिंह ने अपने पिता का बदला लेने के लिए तलवार उठाई थी। क्या संभव है कि वह बालक स्वयं लड़ने के लिए प्रेरित होगा जिसने अपने पिता को आत्मबलिदान के लिए प्रेरित किया हो। गुरु गोबिन्द सिंह जी को किसी से बैर नहीं था, उनके सामने तो पहाड़ी राजाओं की ईर्ष्या पहाड़ जैसी ऊँची थी, तो दूसरी ओर औरंगज़ेब की धार्मिक कट्टरता की आँधी लोगों के अस्तित्व को लील रही थी। ऐसे समय में गुरु गोबिन्द सिंह ने समाज को एक नया दर्शन दिया। उन्होंने आध्यात्मिक स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए तलवार धारण की।


वो पाँच प्यारे जो देश के विभिन्न भागों से आए थे और समाज के अलग- अलग जाति और सम्प्रदाय के लोग थे, उन्हें एक ही कटोरे में अमृत पिला कर गुरु गोबिन्द सिंह ने एक बना दिया। इस प्रकार समाज में उन्होंने एक ऐसी क्रान्ति का बीज रोपा, जिसमें जाति का भेद और सम्प्रदायवाद, सब कुछ मिटा दिया। 



बहादुर शाह प्रथम से भेंट


8 जून 1707 ई. आगरा के पास जांजू के पास लड़ाई लड़ी गई, जिसमें बहादुरशाह की जीत हुई। इस लड़ाई में गुरु गोबिन्द सिंह की हमदर्दी अपने पुराने मित्र बहादुरशाह के साथ थी। कहा जाता है कि गुरु जी ने अपने सैनिकों द्वारा जांजू की लड़ाई में बहादुरशाह का साथ दिया, उनकी मदद की। इससे बादशाह बहादुरशाह की जीत हुई। बादशाह ने गुरु गोबिन्द सिंह जी को आगरा बुलाया। उसने एक बड़ी क़ीमती सिरोपायो (सम्मान के वस्त्र) एक धुकधुकी (गर्दन का गहना) जिसकी क़ीमत 60 हज़ार रुपये थी, गुरुजी को भेंट की। मुग़लों के साथ एक युग पुराने मतभेद समाप्त होने की सम्भावना थी। गुरु साहब की तरफ से 2 अक्टूबर 1707 ई. और धौलपुर की संगत तरफ लिखे हुक्मनामा के कुछ शब्दों से लगता है कि गुरुजी की बादशाह बहादुरशाह के साथ मित्रतापूर्वक बातचीत हो सकती थी। जिसके खत्म होने से गुरु जी आनंदपुर साहिब वापस आ जांएगे, जहाँ उनको आस थी कि खालसा लौट के इकट्ठा हो सकेगा। पर हालात के चक्कर में उनको दक्षिण दिशा में पहुँचा दिया। जहाँ अभी बातचीत ही चल रही थी। बादशाह बहादुरशाह कछवाहा राजपूतों के विरुद्ध कार्यवाही करने कूच किया था कि उसके भाई कामबख़्श ने बग़ावत कर दी। बग़ावत दबाने के लिए बादशाह दक्षिण की तरफ़ चला और विनती करके गुरु जी को भी साथ ले गया।[3]


वीरता व बलिदान की मिसालें


परदादा गुरु अर्जन देव की शहादत।
दादा गुरु हरगोबिन्द द्वारा किए गए युद्ध।
पिता गुरु तेग़बहादुर सिंह की शहादत।
दो पुत्रों का चमकौर के युद्ध में शहीद होना।
दो पुत्रों को ज़िंदा दीवार में चुनवा दिया जाना।
इस सारे घटनाक्रम में भी अड़िग रहकर गुरु गोबिन्द सिंह संघर्षरत रहे, यह कोई सामान्य बात नहीं है। यह उनके महान कर्मयोगी होने का प्रमाण है। उन्होंने ख़ालसा के सृजन का मार्ग देश की अस्मिता, भारतीय विरासत और जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए, समाज को नए सिरे से तैयार करने के लिए अपनाया था। वे सभी प्राणियों को आध्यात्मिक स्तर पर परमात्मा का ही रूप मानते थे। 'अकाल उस्तति' में उन्होंने स्पष्ट कहा है कि जैसे एक अग्नि से करोड़ों अग्नि स्फुर्ल्लिंग उत्पन्न होकर अलग-अलग खिलते हैं, लेकिन सब अग्नि रूप हैं, उसी प्रकार सब जीवों की भी स्थिति है। उन्होंने सभी को मानव रूप में मानकर उनकी एकता में विश्वास प्रकट करते हुए कहा है कि


"हिन्दू तुरक कोऊ सफजी इमाम शाफी। मानस की जात सबै ऐकै पहचानबो।"
ख़ालसा पंथ

ख़ालसा का अर्थ है ख़ालिस अर्थात विशुद्ध, निर्मल और बिना किसी मिलावट वाला व्यक्ति। इसके अलावा हम यह कह सकते हैं कि ख़ालसा हमारी मर्यादा और भारतीय संस्कृति की एक पहचान है, जो हर हाल में प्रभु का स्मरण रखता है और अपने कर्म को अपना धर्म मान कर ज़ुल्म और ज़ालिम से लोहा भी लेता है। गोबिन्द सिंह जी ने एक नया नारा दिया है- वाहे गुरु जी का ख़ालसा, वाहे गुरु जी की फतेह।[4] गुरु जी द्वारा ख़ालसा का पहला धर्म है कि वह देश, धर्म और मानवता की रक्षा के लिए तन-मन-धन सब न्यौछावर कर दे। निर्धनों, असहायों और अनाथों की रक्षा के लिए सदा आगे रहे। जो ऐसा करता है, वह ख़लिस है, वही सच्चा ख़ालसा है। ये संस्कार अमृत पिलाकर गोबिन्द सिंह जी ने उन लोगों में भर दिए, जिन्होंने ख़ालसा पंथ को स्वीकार किया था। 'ज़फ़रनामा' में स्वयं गुरु गोबिन्द सिंह जी ने लिखा है कि जब सारे साधन निष्फल हो जायें, तब तलवार ग्रहण करना न्यायोचित है। गुरु गोबिन्द सिंह ने 1699 ई. में धर्म एवं समाज की रक्षा हेतु ही ख़ालसा पंथ की स्थापना की थी। ख़ालसा यानि ख़ालिस (शुद्ध), जो मन, वचन एवं कर्म से शुद्ध हो और समाज के प्रति समर्पण का भाव रखता हो। सभी जातियों के वर्ग-विभेद को समाप्त करके उन्होंने न सिर्फ़ समानता स्थापित की बल्कि उनमें आत्म-सम्मान और प्रतिष्ठा की भावना भी पैदा की। उनका स्पष्ट मत व्यक्त है-


"मानस की जात सभैएक है।"
ख़ालसा पंथ की स्थापना (1699) देश के चौमुखी उत्थान की व्यापक कल्पना थी। एक बाबा द्वारा गुरु हरगोबिन्द को 'मीरी' और 'पीरी' दो तलवारें पहनाई गई थीं।


एक आध्यात्मिकता की प्रतीक थी।
दूसरी सांसारिकता की।
गुरु गोबिन्द सिंह ने आत्मविश्वास एवं आत्मनिर्भरता का संदेश दिया था। ख़ालसा पंथ में वे सिख थे, जिन्होंने किसी युद्ध कला का कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं लिया था। सिखों में समाज एवं धर्म के लिए स्वयं को बलिदान करने का जज़्बा था।


एक से कटाने सवा लाख शत्रुओं के सिर
गुरु गोबिन्द ने बनाया पंथ ख़ालसा
पिता और पुत्र सब देश पे शहीद हुए
नहीं रही सुख साधनों की कभी लालसा
ज़ोरावर फतेसिंह दीवारों में चुने गए
जग देखता रहा था क्रूरता का हादसा
चिड़ियों को बाज से लड़ा दिया था गुरुजी ने
मुग़लों के सर पे जो छा गया था काल सा


गुरु गोबिन्द सिंह का एक और उदाहरण उनके व्यक्तित्व को अनूठा साबित करता है- पंच पियारा बनाकर उन्हें गुरु का दर्जा देकर स्वयं उनके शिष्य बन जाते हैं और कहते हैं- ख़ालसा मेरो रूप है ख़ास, ख़ालसा में हो करो निवास।[5]


पाँच ककार
युद्ध की प्रत्येक स्थिति में सदा तैयार रहने के लिए उन्होंने सिखों के लिए पाँच ककार अनिवार्य घोषित किए, जिन्हें आज भी प्रत्येक सिख धारण करना अपना गौरव समझता है:-


केश : जिसे सभी गुरु और ऋषि-मुनि धारण करते आए थे।
कंघा : केशों को साफ़ करने के लिए।
कच्छा : स्फूर्ति के लिए।
कड़ा : नियम और संयम में रहने की चेतावनी देने के लिए।
कृपाण : आत्मरक्षा के लिए।[6]
जहाँ शिवाजी राजशक्ति के शानदार प्रतीक हैं, वहीं गुरु गोबिन्द सिंह एक संत और सिपाही के रूप में दिखाई देते हैं। क्योंकि गुरु गोबिन्द सिंह को न तो सत्ता चाहिए और न ही सत्ता सुख। शान्ति एवं समाज कल्याण उनका था। अपने माता-पिता, पुत्रों और हज़ारों सिखों के प्राणों की आहुति देने के बाद भी वह औरंगज़ेब को फ़ारसी में लिखे अपने पत्र ज़फ़रनामा में लिखते हैं- औरंगजेब तुझे प्रभु को पहचानना चाहिए तथा प्रजा को दु:खी नहीं करना चाहिए। तूने क़ुरान की कसम खाकर कहा था कि मैं सुलह रखूँगा, लड़ाई नहीं करूँगा, यह क़सम तुम्हारे सिर पर भार है। तू अब उसे पूरा कर।


महान विद्वान
एक आध्यात्मिक गुरु के अतिरिक्त गुरु गोबिन्द सिंह एक महान विद्वान भी थे। उन्होंने 52 कवियों को अपने दरबार में नियुक्त किया था। गुरु गोबिन्द सिंह की महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं- ज़फ़रनामा एवं विचित्र नाटक। वह स्वयं सैनिक एवं संत थे। उन्होंने अपने सिखों में भी इसी भावनाओं का पोषण किया था। गद्दी को लेकर सिखों के बीच कोई विवाद न हो इसके लिए गुरु गोबिन्द सिंह ने 'गुरु ग्रन्थ साहिब' को अन्तिम गुरु का दर्जा दिया। इसका श्रेय भी प्रभु को देते हुए कहते हैं-


"आज्ञा भई अकाल की तभी चलाइयो पंथ, सब सिक्खन को हुकम है गुरु मानियहु ग्रंथ।"
गुरु नानक की दसवीं जोत गुरु गोबिन्द सिंह अपने जीवन का सारा श्रेय प्रभु को देते हुए कहते है-


"मैं हूँ परम पुरखको दासा, देखन आयोजगत तमाशा।"



ज़फ़रनामा
गुरु गोबिन्द सिंह मूलतः धर्मगुरु थे, लेकिन सत्य और न्याय की रक्षा के लिए तथा धर्म की स्थापना के लिए उन्हें शस्त्र धारण करने पड़े। औरंगज़ेब को लिखे गए अपने 'ज़फ़रनामा' में उन्होंने इसे स्पष्ट किया है। उन्होंने लिखा था,


"चूंकार अज हमा हीलते दर गुजशत, हलाले अस्त बुरदन ब समशीर ऐ दस्त।"
अर्थात जब सत्य और न्याय की रक्षा के लिए अन्य सभी साधन विफल हो जाएँ तो तलवार को धारण करना सर्वथा उचित है। उनकी यह वाणी सिख इतिहास की अमर निधि है, जो आज भी हमें प्रेरणा देती है।


गुरु गोबिन्द सिंह ने धर्म, संस्कृति व राष्ट्र की आन-बान और शान के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया था। गुरु गोबिन्द सिंह जैसी वीरता और बलिदान इतिहास में कम ही देखने को मिलता है। इसके बावज़ूद इस महान शख़्सियत को इतिहासकारों ने वह स्थान नहीं दिया जिसके वे हक़दार हैं। कुछ इतिहासकारों का मत हैं कि गुरु गोबिन्द सिंह ने अपने पिता का बदला लेने के लिए तलवार उठाई थी। क्या संभव है कि वह बालक स्वयं लड़ने के लिए प्रेरित होगा जिसने अपने पिता को आत्मबलिदान के लिए प्रेरित किया हो। 



ज्ञाता और ग्रंथकार
यद्यपि सब गुरुओं ने थोड़े बहुत पद, भजन आदि बनाए हैं, पर गुरु गोबिन्द सिंह काव्य के अच्छे ज्ञाता और ग्रंथकार थे। सिखों में शास्त्रज्ञान का अभाव इन्हें बहुत खटका था और इन्होंने बहुत से सिखों को व्याकरण, साहित्य, दर्शन आदि के अध्ययन के लिए काशी भेजा था। ये हिंदू भावों और आर्य संस्कृति की रक्षा के लिए बराबर युद्ध करते रहे। 'तिलक' और 'जनेऊ' की रक्षा में इनकी तलवार सदा खुली रहती थी। यद्यपि सिख संप्रदाय की निर्गुण उपासना है, पर सगुण स्वरूप के प्रति इन्होंने पूरी आस्था प्रकट की है और देव कथाओं की चर्चा बड़े भक्तिभाव से की है। यह बात प्रसिद्ध है कि ये शक्ति के आराधक थे। इन्होंने हिन्दी में कई अच्छे और साहित्यिक ग्रंथों की रचना की है जिनमें से कुछ के नाम ये हैं - सुनीतिप्रकाश, सर्वलोहप्रकाश, प्रेमसुमार्ग, बुद्धि सागर और चंडीचरित्र। चंडीचरित्र की रचना पद्धति बड़ी ही ओजस्विनी है। ये प्रौढ़ साहित्यिक ब्रजभाषा लिखते थे। चंडीचरित्र की दुर्गासप्तशती की कथा बड़ी सुंदर कविता में कही गई है -


निर्जर निरूप हौ, कि सुंदर सरूप हौ,
कि भूपन के भूप हौ, कि दानी महादान हौ?
प्रान के बचैया, दूध-पूत के देवैया,
रोग-सोग के मिटैया, किधौं मानी महामानहौ?
विद्या के विचार हौ, कि अद्वैत अवतार हौ,
कि सुद्ध ता की मूर्ति हौ कि सिद्ध ता की सान हौ?
जोबन के जाल हौ, कि कालहू के काल हौ,
कि सत्रुन के साल हौ कि मित्रन के प्रान हौ?


रचनाएँ
गुरु गोबिन्द सिंह कवि भी थे। चंडी दीवार गुरु गोबिन्द सिंह की पंजाबी भाषा की एकमात्र रचना है। शेष सब हिन्दी भाषा में हैं। इनकी मुख्य रचनाएँ हैं-


चण्डी चरित्र- माँ चण्डी (शिवा) की स्तुति
दशमग्रन्थ- गुरु जी की कृतियों का संकलन
कृष्णावतार- भागवत पुराण के दशमस्कन्ध पर आधारित
गोबिन्द गीत
प्रेम प्रबोध
जाप साहब
अकाल उस्तुता
चौबीस अवतार
नाममाला
विभिन्न गुरुओं, भक्तों एवं सन्तों की वाणियों का गुरु ग्रन्थ साहिब में संकलन।
भाई मणिसिंह
Main.jpg मुख्य लेख : मणिसिंह
भाई मणि सिंह जी गुरु साहिब के एक दीवान (मंत्री) थे। भाई मणिसिंह ने गुरु गोबिन्द सिंह की रचनाओं को एक जिल्द (दशमग्रंथ) में प्रस्तुत किया था।


मृत्यु
गुरु गोबिन्द सिंह ने अपना अंतिम समय निकट जानकर अपने सभी सिखों को एकत्रित किया और उन्हें मर्यादित तथा शुभ आचरण करने, देश से प्रेम करने और सदा दीन-दुखियों की सहायता करने की सीख दी। इसके बाद यह भी कहा कि अब उनके बाद कोई देहधारी गुरु नहीं होगा और 'गुरुग्रन्थ साहिब' ही आगे गुरु के रूप में उनका मार्ग दर्शन करेंगे। गुरु गोबिन्दसिंह की मृत्यु 7 अक्तूबर सन् 1708 ई. में नांदेड़, महाराष्ट्र में हुई थी। आज मानवता स्वार्थ, संदेह, संघर्ष, हिंसा, आतंक, अन्याय और अत्याचार की जिन चुनौतियों से जूझ रही है, उनमें गुरु गोबिन्द सिंह का जीवन-दर्शन हमारा मार्गदर्शन कर सकता है।


गुरु स्तुति
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द
गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत


गुरु मेरा देऊ, अलख अभेऊ, सर्व पूज चरण गुरु सेवऊ
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत


गुरु का दर्शन .... देख - देख जीवां, गुरु के चरण धोये -धोये पीवां


गुरु बिन अवर नहीं मैं ठाऊँ, अनबिन जपऊ गुरु गुरु नाऊँ
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत


गुरु मेरा ज्ञान, गुरु हिरदय ध्यान, गुरु गोपाल पुरख भगवान
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत


ऐसे गुरु को बल-बल जाइये ..-2 आप मुक्त मोहे तारें ..


गुरु की शरण रहो कर जोड़े, गुरु बिना मैं नहीं होर
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत


गुरु बहुत तारे भव पार, गुरु सेवा जम से छुटकार
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत


अंधकार में गुरु मंत्र उजारा, गुरु के संग सजल निस्तारा
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत


गुरु पूरा पाईया बडभागी, गुरु की सेवा जिथ ना लागी
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत


Guru Gobind Singh  (22 December 1666 – 7 October 1708), born Gobind Rai, was the tenth Sikh Guru, a spiritual master, warrior, poet and philosopher. When his father, Guru Tegh Bahadur, was beheaded for refusing to convert to Islam, Guru Gobind Singh was formally installed as the leader of the Sikhs at age nine, becoming the tenth Sikh Gurus.His four sons died during his lifetime in Mughal-Sikh wars – two in battle, two executed by the Mughal army.


Among his notable contributions to Sikhism are founding the Sikh warrior community called Khalsa in 1699 and introducing the Five Ks, the five articles of faith that Khalsa Sikhs wear at all times. Guru Gobind Singh also continued the formalisation of the religion, wrote important Sikh texts,and enshrined the scripture the Guru Granth Sahib as Sikhism's eternal Guru.



Gobind Singh was the only son of Guru Tegh Bahadur, the ninth Sikh guru, and Mata Gujri. He was born in Patna, Bihar in the Sodhi Khatri family  while his father was visiting Bengal and Assam. His birth name was Gobind Rai, and a shrine named Takht Sri Patna Harimandar Sahib marks the site of the house where he was born and spent the first four years of his life. In 1670, his family returned to Punjab, and in March 1672 they moved to Chakk Nanaki in the Himalayan foothills of north India, called the Sivalik range, where he was schooled. Gobind Singh's father Tegh Bahadur founded the city of Chakk Nanaki, now known as Anandpur Sahib, in 1665, on land purchased from the ruler of Bilaspur (Kahlur).


His father Guru Tegh Bahadur was petitioned by Kashmiri Pandits in 1675 for protection from the fanatic persecution by Iftikar Khan, an Islamic satrap of the Mughal Emperor Aurangzeb.Tegh Bahadur considered a peaceful resolution by meeting Aurangzeb, but was cautioned by his advisors that his life may be at risk. The young Gobind Rai – to be known as Gobind Singh after 1699 – advised his father that no one was more worthy to lead and make a sacrifice than him. His father made the attempt, but was arrested then publicly beheaded in Delhi on 11 November 1675 under the orders of Aurangzeb for refusing to convert to Islam and the ongoing conflicts between Sikhism and the Islamic Empire.After this martyrdom, the young Gobind Rai was installed by the Sikhs as the tenth Sikh Guru on Vaisakhi on 29 March 1676.


The education of Guru Gobind Singh continued after he became the 10th Guru, both in reading and writing as well as martial arts such as horse riding and archery. In 1684, he wrote the Chandi di Var in Punjabi language – a legendary war between the good and the evil, where the good stands up against injustice and tyranny, as described in the ancient Sanskrit text Markandeya Purana.He stayed in Paonta, near the banks of river Yamuna, till 1685.


at age 10, he married Mata Jito on 21 June 1677 at Basantgaṛh, 10 km north of Anandpur. The couple had three sons: Jujhar Singh (b. 1691), Zorawar Singh (b. 1696) and Fateh Singh (b. 1699).


at age 17, he married Mata Sundari on 4 April 1684 at Anandpur. The couple had one son, Ajit Singh (b. 1687).
at age 33, he married Mata Sahib Devan on 15 April 1700 at Anandpur. They had no children, but she had an influential role in Sikhism. Guru Gobind Singh proclaimed her as the Mother of the Khalsa.
The life example and leadership of Guru Gobind Singh has been of historic importance to the Sikhs. He institutionalized the Khalsa (literally, Pure Ones), which played the key role in protecting the Sikhs long after his death, such as during the nine invasions of Panjab and holy war led by Ahmad Shah Abdali from Afghanistan between 1747 and 1769.


A Fresco of Guru Gobind Singh and The Panj Piare in Gurdwara Bhai Than Singh built in the reign of Maharaja Ranjit Singh.


In 1699, the Guru requested the Sikhs to congregate at Anandpur on Vaisakhi (the annual spring harvest festival). According to the Sikh tradition, he asked for a volunteer from those who gathered, someone willing to sacrifice his head. One came forward, whom he took inside a tent. The Guru returned to the crowd without the volunteer, but with a bloody sword. He asked for another volunteer, and repeated the same process of returning from the tent without anyone and with a bloodied sword four more times. After the fifth volunteer went with him into the tent, the Guru returned with all five volunteers, all safe. He called them the Panj Pyare and the first Khalsa in the Sikh tradition.


Guru Gobind Singh then mixed water and sugar into an iron bowl, stirring it with a double-edged sword to prepare what he called Amrit ("nectar"). He then administered this to the Panj Pyare, accompanied with recitations from the Adi Granth, thus founding the khande ka pahul (baptization ceremony) of a Khalsa – a warrior community. The Guru also gave them a new surname "Singh" (lion). After the first five Khalsa had been baptized, the Guru asked the five to baptize him as a Khalsa. This made the Guru the sixth Khalsa, and his name changed from Guru Gobind Rai to Guru Gobind Singh.



Kanga, Kara and Kirpan – three of the five Ks
Guru Gobind Singh initiated the Five K's tradition of the Khalsa,


Kesh: uncut hair.
Kangha: a wooden comb.
Kara: an iron or steel bracelet worn on the wrist.
Kirpan: a sword or dagger.
Kacchera: short breeches.
He also announced a code of discipline for Khalsa warriors. Tobacco, eating 'halal' meat (a way of slaughtering in which the animal's throat is slit open and it is left to bleed before being slaughtered), fornication and adultery were forbidden. The Khalsas also agreed to never interact with those who followed rivals or their successors. The co-initiation of men and women from different castes into the ranks of Khalsa also institutionalized the principle of equality in Sikhism regardless of one's caste or gender. According to Owen and Sambhi, Guru Gobind Singh's significance to the Sikh tradition has been very important, as he institutionalized the Khalsa, resisted the ongoing persecution by the Mughal Empire, and continued "the defense of Sikhism and Hinduism against the Muslim assault of Aurangzeb".


He introduced ideas that indirectly challenged the discriminatory taxes imposed by Islamic authorities. For example, Aurangzeb had imposed taxes on non-Muslims that were collected from the Sikhs as well, for example the jizya (poll tax on non-Muslims), pilgrim tax and Bhaddar tax – the last being a tax to be paid by anyone following the Hindu ritual of shaving the head after the death of a loved one and cremation. Guru Gobind Singh declared that Khalsa do not need to continue this practice, because Bhaddar is not dharam, but a bharam (illusion). Not shaving the head also meant not having to pay the taxes by Sikhs who lived in Delhi and other parts of the Mughal Empire. However, the new code of conduct also led to internal disagreements between Sikhs in the 18th century, particularly between the Nanakpanthi and the Khalsa.


Guru Gobind Singh had deep respect for the Khalsa, and stated that there is no difference between the True Guru and the sangat (panth).Before his founding of the Khalsa, the Sikh movement had used the Sanskrit word Sisya (literally, disciple or student), but the favored term thereafter became Khalsa.Additionally, prior to the Khalsa, the Sikh congregations across India had a system of Masands appointed by the Sikh Gurus. The Masands led the local Sikh communities, local temples, collected wealth and donations for the Sikh cause.Guru Gobind Singh concluded that the Masands system had become corrupt, he abolished them and introduced a more centralized system with the help of Khalsa that was under his direct supervision. These developments created two groups of Sikhs, those who initiated as Khalsa, and others who remained Sikhs but did not undertake the initiation. The Khalsa Sikhs saw themselves as a separate religious entity, while the Nanak-panthi Sikhs retained their different perspective.


The Khalsa warrior community tradition started by Guru Gobind Singh has contributed to modern scholarly debate on pluralism within Sikhism. His tradition has survived into the modern times, with initiated Sikh referred to as Khalsa Sikh, while those who do not get baptized referred to as Sahajdhari Sikhs.
Aurangzeb died in 1707, and immediately a succession struggle began between his sons who attacked each other. The official successor was Bahadur Shah, who invited Guru Gobind Singh with his army to meet him in person in the Deccan region of India, for a reconciliation but Bahadur Shah then delayed any discussions for months.


Wazir Khan, a Muslim army commander against whose army the Guru had fought several wars, commissioned two Afghans, Jamshed Khan and Wasil Beg, to follow the Guru's army as it moved for the meeting with Bahadur Shah, and then assassinate the Guru. The two secretly pursued the Guru whose troops were in the Deccan area of India, and entered the camp when the Sikhs had been stationed near river Godavari for months.They gained access to the Guru and Jamshed Khan stabbed him with a fatal wound at Nanded.Some scholars state that the assassin who killed Guru Gobind Singh may not have been sent by Wazir Khan, but was instead sent by the Mughal army that was staying nearby.


According to Senapati's Sri Gur Sobha, an early 18th century writer, the fatal wounds of the Guru was one below his heart. The Guru fought back and killed the assassin, while the assassin's companion was killed by the Sikh guards as he tried to escape.


The Guru died of his wounds a few days later on 7 October 1708 His death fueled a long and bitter war of the Sikhs with the Mughals.