यदुनाथ सरकार-(मृत्यु- 15 मई, 1958 )

May 15, 2017

यदुनाथ अथवा जदुनाथ सरकार ( जन्म- 10 दिसम्बर, 1870 ई.; मृत्यु- 15 मई, 1958 ई.) को एक प्रसिद्ध इतिहासकार के रूप में जाना जाता है। ये ज़मींदार परिवार से सम्बन्ध रखते थे। इन्होंने 1892 में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. की परीक्षा पास की और जीवन का अधिकांश समय ग्रन्थों के अध्ययन और लेखन में व्यतीत किया। इतिहास और अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर के रूप में भी इन्होंने अपनी विशिष्ट सेवाएँ प्रदान की थीं। यदुनाथ सरकार ने मुग़ल और मराठा इतिहास पर कई ग्रन्थ लिखे, इन ग्रन्थों की प्रमाणिक सामग्री ने इन्हें ख्यातिप्राप्त इतिहासकार बना दिया।




जन्म तथा शिक्षा
प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता यदुनाथ सरकार का जन्म 10 दिसम्बर, 1870 ई. को राजशाही ज़िला, बांग्ला देश, के करछमरिया गांव में एक सम्पन्न ज़मींदार कायस्थ परिवार में हुआ था। 1892 में प्रेसिडेंसी कॉलेज, कोलकाता से 90 प्रतिशत अंक प्राप्त करके उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. की परीक्षा पास की। यदुनाथ सरकार ने अपना सम्पूर्ण जीवन अध्यापन और ग्रन्थों की रचना में व्यतीत किया। कुछ समय तक रिपन कॉलेज और विद्यासागर कॉलेज में अंग्रेज़ी के अध्यापक रहने के बाद वे बंगाल प्रान्तीय शिक्षा सेवा में चुन लिये गए।


अध्यापन कार्य


इसके बाद उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय और उत्कल विश्वविद्यालयों में इतिहास और अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर के पद पर काम किया। पटना में वे 1902 से 1917 तथा 1923 से 1926 तक रहे। 1917 में उनकी नियुक्ति 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' में इतिहास विभाग के अध्यक्ष पद पर हुई। वहाँ से ये उत्कल विश्वविद्यालय चले गए। 1919 में उन्हें 'भारतीय शिक्षा सेवा' में नियुक्त किया गया। अवकाश ग्रहण करने के बाद दो वर्षों तक वे 'कोलकाता विश्वविद्यालय' के अवैतनिक कुलपति भी रहे। इस दौरान यदुनाथ सरकार कभी भी भारत से बाहर नहीं गए।


रचनाएँ
यदुनाथ सरकार की मुख्य ख्याति उनके ऐतिहासिक ग्रन्थों के कारण है। मुग़ल और मराठा इतिहास पर लिखे उनके शोधपरक ग्रन्थ ऐतिहासिक ग्रन्थों में प्रमाणिक माने जाते हैं। उन्होंने अपनी ऐतिहासिक मान्यताओं की स्थापना यत्र-तत्र बिखरी हुई मूल सामग्री के आधार पर की है। उनकी कुछ मुख्य रचनाएँ हैं-


एनेकडोट्स ऑफ़ औरंगजेब (1912, तीसरा संशोधित संस्करण, 1949);
चैतन्याज लाइफ़ ऐंड टीचिग्ज़ (1922, मूल लेख 1912),
स्टडीज इन मुग़ल इंडिया (1919) मुग़ल ऐडमिनिस्ट्रेंशन, (दोनों खंड 1925);
बेगम समरू (1925);
इंडिया थ्रू दी एजेज़ (1928);
ए शार्ट हिस्टरी ऑफ़ औरंगजेब (1930);
बिहार ऐंड उड़ीसा ड्यूरिंग द फॉल ऑव द मुग़ल एंपायर (1932);
हाउस ऑव शिवाजी (1940),
मअसिर-ए-आलमगीरी (अंग्रेजी अनुवाद, 1947);
हिस्टरी ऑफ़ बंगाल (दूसरा भाग, संपा., 1948);
पूना रेज़ीडेंसी कारेस्पॉन्डेंस[1] जिल्द 1, 8 व 14 संपादित 1930, 1945, 1949)
आईन-ए-अकबरी (जैरेट कृत अनुवाद का संशोधित संस्कण, (1948-1950);
देहली अफ़ेयर्स, 1761-1788" (1953);
मिलिटरी हिस्टरी ऑफ़ इंडिया (1960)।
लेखन विशेषता
यदुनाथ सरकार की पहली पुस्तक "इंडिया ऑफ़ औरंगजेब: टॉपॉग्राफी, स्टेटिस्टिक्स ऐंड रोड्स"[2]1901 में प्रकाशित हुई। "औरंगजेब का इतिहास" के प्रथम दो खंड 1919 में और पाँचवाँ तथा अंतिम खंड 1928 में छपा। उनकी पुस्तक "शिवाजी ऐंड हिज टाइम्स[3] 1919 में प्रकाशित हुई। इन पुस्तकों में फ़ारसी, मराठी, राजस्थानी और यूरोपीय भाषाओं में उपलब्ध सामग्री का सावधानी से उपयोग कर सरकार ने ऐतिहासिक खोज का महत्त्वपूर्ण कार्य किया और मूलभूत सामग्री के आधार पर खोज करने की परंपरा को दृढ़ किया। विशेष रूप से जयपुर राज्य में सुरक्षित फारसी अखबारात और अन्य अभिलेखों की ओर ऐतिहासिकों का ध्यान आकर्षित करने और उनको खोज कार्य के लिए उपलब्ध कराने का महान् कार्य यदुनाथ सरकार ने किया। उनकी दृष्टि में औरंगजेब एक महान् विभूति था जिसने भारत को राजनीतिक एकतंत्र में बाँधने का प्रयास किया, किंतु अपनी योग्यता और अथक परिश्रम के बावजूद अपने दृष्टिकोण की संकीर्णता के कारण असफल रहा। शिवाजी ने भी एक नए एकतंत्र की नींव डाली, किंतु मराठा समाज की जातिव्यवस्था की विषमता को वह दूर न कर सके। अन्य मराठी नेताओं ने भी महाराष्ट्र के बाहर रहने वाले हिंदुओं को लूट-पाटकर संकीर्णता का सबूत दिया। उत्तर मुग़लकालीन भारत की ओर यदुनाथ सरकार का ध्यान विलियम इरविन कृत "लेटर मुग़ल्स 1707-1739" का संपादन करते समय (1922) आकर्षित हुआ। 1739 से 1803 तक मुग़ल साम्राज्य के विघटन और सूवाई रियासतों के उत्थान का इतिहास उन्होंने चार खंडों में 1932 और 1950 के बीच (हिं. मुग़ल साम्राज्य का पतन, 1961) प्रकाशित किया। ऐतिहासिक कला की दृष्टि से यह उनकी प्रौढ़तम रचना है। यदुनाथ सरकार की भाषा प्रभावशाली और सारगर्भित होते हुए भी बोझिल नहीं होती। ऐतिहासिक घटनाओं से नैतिक निष्कर्ष भी वे स्थान स्थान पर निकालते हैं।


निधन


भारतीय इतिहास से सम्बन्धित कई तथ्यों को उजागर करने वाले और इतिहासकारों में प्रसिद्धि प्राप्त यदुनाथ सरकार का 15 मई, 1958 को कलकत्ता में निधन हो गया।


Sir Jadunath Sarkar  (10 December 1870 – 19 May 1958) was a prominent Indian Bengali historian.
Born in Karachmaria village, he was the son of Rajkumar Sarkar, the Zamindar of Karachmaria in Natore in Bengal. In 1891, he passed the B.A. examination with honours in English and History from Presidency College, Calcutta. In 1892, he stood First in the First Class in the M.A. examination of Calcutta University in English. In 1897, he received the Premchand-Roychand Scholarship.


He became a teacher in English literature in 1893 at Ripon College, Calcutta (later renamed Surendranath College). In 1898, he started teaching at Presidency College, Calcutta. In 1899, he was transferred to Patna College, Patna, where he would continue teaching until 1926. In between, in 1917-1919, he taught Modern Indian History in Benaras Hindu University and during 1919-1923 he taught in Ravenshaw College, Cuttack, now in Odisha. In 1923, he became an honorary member of the Royal Asiatic Society of London. In August 1926, he was appointed as the Vice Chancellor of Calcutta University. In 1928, he joined as Sir W. Meyer Lecturer in Madras University.


Sarkar was honored by Britain with a Companion of the Order of the Indian Empire CIE and knighted in the 1929 Birthday Honours list. He was invested with his knighthood at Simla by the acting Viceroy, Lord Goschen, on 22 August 1929.


The Centre for Studies in Social Sciences, Calcuttaan autonomous research centre has been located at 10, Lake Terrace, Sarkar's house, from 1973 to 2000. This house was handed over to the state government by Sarkar's wife, Kadambini Sarkar, just before she died. The building now houses the newly established Jadunath Sarkar Resource Centre for Historical Research, which has been established under the aegis of the CSSSC. The Jadunath Bhavan Museum and Resource Centre, a museum-cum-archive was set up at Jadunath Bhavan on 1 February 2015.


Academically, Jos J. L. Gommans compares Sarkar's work with those of the Aligarh historians, noting that while the historians from the Aligarh worked mainly on the mansabdari system and gunpowder technology in the Mughal Empire, Sarkar concentrated on military tactics and sieges.[7] Kaushik Roy notes that the works of Jadunath Sarkar along with those of Jagadish Narayan Sarkar are now "forgotten due to pressure of Marxism and Postmodernism".


He has been called the "greatest Indian historian of his time" and one of the greatest in the world, whose erudite works "have established a tradition of honest and scholarly historiography" by E. Sreedharan.[9] He has also been compared with Theodor Mommsen and Leopold von Ranke.[10]


Publications
Books
A History of Jaipur (1984)
The Fall of the Mughal Empire (in 4 volumes), (1932–38)
Military History of India
The House of Shivaji
The Rani of Jhansi
Famous Battles of Indian History
Chronology of Indian History
Shivaji (in Bengali)
History of Aurangzib (in 5 volumes), (1912–24)
Mughal Administration (1920)
Shivaji and his Times (1919)
Anecdotes of Aurangzib
Studies in Mughal India
India of Aurangzib (1901)
A Short History of Aurangzib
A History of Bengal
Translation, Maāsir-i-ʻĀlamgiri : a history of the emperor Aurangzib-ʻl̀amgir (reign 1658-1707 A.D.) by Muḥammad Sāqī Mustaʻidd Khān
Economics of British India
India through the ages, a survey of the growth of Indian life and thought
Nadir Shah in India
Studies in Aurangzib's reign (being Studies in Mughal India, First series)
Chaitanya's pilgrimages and teachings, from his contemporary Bengali biography, the Chaitanya-charit-amrita: Madhya-lila by Kr̥ṣṇadāsa Kavirāja Gosvāmi