विष्णु प्रभाकर ( जन्म: 21 जून, 1912)

June 21, 2017

विष्णु प्रभाकर (जन्म: 21 जून, 1912 - मृत्यु: 11 अप्रैल, 2009) अपने साहित्य में भारतीय वाग्मिता और अस्मिता को व्यंजित करने के लिये प्रसिद्ध रहे हैं। विष्णु प्रभाकर जी ने कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, निबंध, एकांकी, यात्रा-वृत्तांत और कविता आदि प्रमुख विधाओं में अपनी बहुमूल्य रचनाएँ की हैं। प्रभाकर जी ने आकाशवाणी, दूरदर्शन, पत्र-पत्रिकाओं तथा प्रकाशन संबंधी मीडिया के प्रत्येक क्षेत्र में ख्याति प्राप्त की थी। देश-विदेश की अनेक यात्राएँ करने वाले विष्णुजी जीवन-पर्यन्त पूर्णकालिक मसिजीवी रचनाकार के रूप में साहित्य साधना में लीन रहे थे।


जीवन परिचय
विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून, सन 1912 को मीरापुर, ज़िला मुज़फ़्फ़रनगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। इन्हें इनके एक अन्य नाम 'विष्णु दयाल' से भी जाना जाता है। इनके पिता का नाम दुर्गा प्रसाद था, जो धार्मिक विचारधारा वाले व्यक्तित्व के धनी थे। प्रभाकर जी की माता महादेवी पढ़ी-लिखी महिला थीं, जिन्होंने अपने समय में पर्दाप्रथा का घोर विरोध किया था। प्रभाकर जी की पत्नी का नाम सुशीला था। भारत के प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकारों में से एक विष्णु प्रभाकर जी का निधन 96 वर्ष की उम्र में 11 अप्रैल, 2009 को नई दिल्ली में हो गया। हिन्दी साहित्य के इस अमूल्य मोती के चले जाने से साहित्य के एक अद्भुत सूरज का अंत हो गया। विष्णु प्रभाकर की आरंभिक शिक्षा मीरापुर में हुई थी। उन्होंने सन 1929 में चंदूलाल एंग्लो-वैदिक हाई स्कूल, हिसार से मैट्रिक की परीक्षा पास की। इसके उपरांत नौकरी करते हुए पंजाब विश्वविद्यालय से 'भूषण', 'प्राज्ञ', 'विशारद' और 'प्रभाकर' आदि की हिंदी-संस्कृत परीक्षाएँ भी उत्तीर्ण कीं। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से ही बी.ए. की डिग्री भी प्राप्त की थी। प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी महात्मा गाँधी जी के जीवन आदर्शों से प्रेम के कारण प्रभाकर जी का रुझान कांग्रेस की तरफ़ हो गया। वे आज़ादी के दौर में बजते राजनीतिक बिगुल में उनकी लेखनी का भी एक उद्देश्य बन गया था, जो आज़ादी के लिए संघर्षरत थी। अपने लेखन के दौर में वे प्रेमचंद, यशपाल और अज्ञेय जैसे महारथियों के सहयात्री भी रहे, किन्तु रचना के क्षेत्र में उनकी अपनी एक अलग पहचान बन चुकी थी। 1931 में 'हिन्दी मिलाप' में पहली कहानी दीवाली के दिन छपने के साथ ही उनके लेखन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह जीवनपर्यंत निरंतर चलता रहा। नाथूराम शर्मा प्रेम के कहने से वे शरतचन्द्र की जीवनी 'आवारा मसीहा' लिखने के लिए प्रेरित हुए, जिसके लिए वे शरतचन्द्र को जानने के लिये लगभग सभी स्रोतों और जगहों तक गए। उन्होंने बांग्ला भाषा भी सीखी और जब यह जीवनी छपी, तो साहित्य में विष्णु जी की धूम मच गयी। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य सभी विधाओं में प्रचुर साहित्य लिखने के बावजूद 'आवारा मसीहा' उनकी पहचान का पर्याय बन गयी। इसके बाद में 'अर्द्धनारीश्वर' पर उन्हें बेशक साहित्य अकादमी पुरस्कार हिन्दी प्राप्त हुआ, लेकिन 'आवारा मसीहा' ने साहित्य में उनकी एक अलग ही पहचान पुख्ता कर दी।


विष्णु प्रभाकर जी ने अपना पहला नाटक 'हत्या के बाद' लिखा और हिसार में एक नाटक मंडली के साथ भी कार्यरत हो गये। इसके पश्चात प्रभाकर जी ने लेखन को ही अपनी जीविका बना लिया। आज़ादी के बाद वे नई दिल्ली आ गये और सितम्बर 1955 में आकाशवाणी में नाट्यनिर्देशक नियुक्त हो गये, जहाँ उन्होंने 1957 तक अपनी सेवाएँ प्रदान की थीं। इसके बाद वे तब सुर्खियों में आए, जब राष्ट्रपति भवन में दुर्व्यवहार के विरोधस्वरूप उन्होंने 'पद्मभूषण' की उपाधि वापस करने घोषणा कर दी। विष्णु प्रभाकर जी आकाशवाणी, दूरदर्शन, पत्र-पत्रिकाओं तथा प्रकाशन संबंधी मीडिया के विविध क्षेत्रों में पर्याप्त लोकप्रिय रहे। देश-विदेश की अनेक यात्राएँ करने वाले विष्णुजी जीवनपर्यंत पूर्णकालिक मसिजीवी रचनाकार के रूप में साहित्य की साधना में लिप्त रहे थे।


विष्णु प्रभाकर जी की प्रमुख रचना 'आवारा मसीहा' सर्वाधिक चर्चित जीवनी है। इस जीवनी रचना के लिए इन्हें 'पाब्लो नेरूदा सम्मान', 'सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' जैसे कई विदेशी पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। इनका लिखा प्रसिद्ध नाटक 'सत्ता के आर-पार' पर उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा 'मूर्ति देवी पुरस्कार' प्रदान किया गया हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा प्रभाकर जी को 'शलाका सम्मान' भी मिल चुका है। 'पद्मभूषण' पुरस्कार भी मिला, किंतु राष्ट्रपति भवन में दुर्व्यवहार के विरोधस्वरूप उन्होंने 'पद्मभूषण' की उपाधि वापस करने घोषणा कर दी।


विष्णु प्रभाकर जी की प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं-


कहानी संग्रह - 'संघर्ष के बाद', 'धरती अब भी धूम रही है', 'मेरा वतन', 'खिलौने', 'आदि और अन्त', 'एक आसमान के नीचे', 'अधूरी कहानी', 'कौन जीता कौन हारा', 'तपोवन की कहानियाँ', 'पाप का घड़ा', 'मोती किसके'।
बाल कथा संग्रह - 'क्षमादान', 'गजनन्दन लाल के कारनामे', 'घमंड का फल', 'दो मित्र', 'सुनो कहानी', 'हीरे की पहचान'।
उपन्यास - 'ढलती रात', 'स्वप्नमयी', 'अर्द्धनारीश्वर', 'धरती अब भी घूम रही है', 'पाप का घड़ा', 'होरी', 'कोई तो', 'निशिकान्त', 'तट के बंधन', 'स्वराज्य की कहानी'।
आत्मकथा - 'क्षमादान' और 'पंखहीन' नाम से उनकी आत्मकथा 3 भागों में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हो चुकी है। 'और पंछी उड़ गया', 'मुक्त गगन में'।
नाटक - 'सत्ता के आर-पार', 'हत्या के बाद', 'नवप्रभात', 'डॉक्टर', 'प्रकाश और परछाइयाँ', 'बारह एकांकी', अब और नही, टूट्ते परिवेश, गान्धार की भिक्षुणी और 'अशोक'
जीवनी - 'आवारा मसीहा', 'अमर शहीद भगत सिंह'।
यात्रा वृतान्त - 'ज्योतिपुन्ज हिमालय', 'जमुना गंगा के नैहर में', 'हँसते निर्झर दहकती भट्ठी'।
संस्मरण - 'हमसफर मिलते रहे'।
कविता संग्रह - ‘चलता चला जाऊंगा’ (एकमात्र कविता संग्रह)।


Vishnu Prabhakar (21 June 1912 – 11 April 2009) was a Hindi writer. He had several short stories, novels, plays and travelogues to his credit. Prabhakar's works have elements of patriotism, nationalism and messages of social upliftment.


He was awarded the Sahitya Akademi Award in 1993, Mahapandit Rahul Sankrityayan Award in 1995 and the Padma Bhushan (the third highest civilian honour of India) by the Government of India in 2004.


Vishnu Prabhakar was born on 21 June 1912, in the Miranpur village of Muzaffarnagar district in Uttar Pradesh. His father, Durga Prasad, was a religious person who kept himself untouched by modern times. His mother, Mahadevi, was the first well-educated lady of the family who dared to reject the 'Parda Pratha' of the traditional Hindu families. Prabhakar stayed in Mirapur until the age of twelve, completing his primary education. His mother sent him to his maternal uncle in Hisar, located in the Haryana state. There he completed his matriculation at the age of sixteen in 1929.


He wanted to pursue higher education but owing to financial situation in his family at Mirapur, he had to find a job. Through the efforts of his maternal uncle he joined the government service. It was a fourth-class job and his salary was eighteen Rupee per month. He kept his studies going along with his work, and obtained degrees of Prabhakar and Hindi Bhushana in Hindi, Pragya in Sanskrit and B.A. in English.


Along with his work he pursued an interest in literature. He also joined a Natak company in Hissar. His literary life started with the publication of his first story Diwali in the Hindi Milap in 1931.[3] He wrote Hatya Ke Baad, his first play in 1939. Eventually he began writing as a full-time career. He stayed with the family of his maternal uncle until the age of twenty seven. He married Sushila Prabhakar in 1938 who stayed as an inspiration source for his literature until her death in 1980.


After Indian Independence he worked as a drama director, from September 1955 to March 1957, in Akashvani, All India Radio, New Delhi. He made news when in 2005 he threatened to return his Padma Bhushan award after he allegedly had to face misconduct at Rashtrapati Bhavan.


Vishnu Prabhakar died at the age of 96, on 11 April 2009 after a brief illness in New Delhi. He was suffering from a heart problem and infection of the urinary tract. His wife, Sushila Prabhakar, had died in 1980.[4] Prabhakar is survived by two sons and two daughters. His sons Atul Prabhakar and Amit Prabhakar decided to donate his body to the All India Institute of Medical Sciences, New Delhi as their father's last wishes.


He became 'Vishnu Prabhakar' from 'Vishnu'; his name was listed as 'Vishnu Dayal' in the primary school of Mirapur. In the Arya Samaj school, on being asked the 'Varna', he answered – 'Vaishya'. The teacher put down his name as 'Vishnu Gupta'. When he joined government service, the officers changed his name to 'Vishnu Dharmadutt' because there were many 'Guptas' in the office and it confused the officers. He continued writing by the pen name of 'Vishnu'. Once an editor asked, "Why do you use such a short name? Have you passed any examination?" Vishnu answered that he had passed 'Prabhakar' examination in Hindi. Thus the editor appended Prabhakar to his name making it 'Vishnu Prabhakar'.


Although mainly a story writer, Vishnu Prabhakar has written in almost all the genres of literature including poetry. Collection of his poems titled Chalta Chala Jaonga was published posthumously in the year 2010. He did not let himself limit to any special school of thought and it is reflected in his vast variety of works. Aawara Masiha, biography of Sharat Chandra Chatterjee and Ardhnarishwar, however remain the most awarded and widely acclaimed of his works. He was initially influenced by Munshi Premchand but later started following Sharatchandra. His works are said to be a mirror of modern Indian society.


Prabhakar's works concentrate on the problems of today's Indian society. In his drama, Tootate Parivesh, he writes about a modern family in which gaps between younger and older generation are increasing. His novel Koi To tells how corrupt politics has become in modern times.


Prabhakar was influenced by Mahatma Gandhi's principles of non-violence. This can be seen in his writing very often. In some of his works, oppressed female characters talk like philosophers and even dacoits who usually are expected to have negative roles are full of humanitarian values. This is the reason why some critics labelled him as a Gandhian ideologist.


Prabhakar was also affected by many foreign authors. He had studied Leo Tolstoy, Thomas Hardy, Charles Dickens, O. Henry and O'Neill in-depth. In an interview, he said that Tolstoy's War and Peace had influenced him very much.


Prabhakar was very fond of travelling. He travelled for fourteen years continuously to collect material for his book – Aawara Masiha which is a biography of famous Bengali author, Sharatchandra. For this he had to visit all the places linked to Sharatchandra, even to Myanmar(Burma). His love of travels also resulted in many travelogues.