पी. सी. महालनोबिस (मृत्यु: 28 जून, 1972)

June 28, 2017

प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस (जन्म: 29 जून, 1893 - मृत्यु: 28 जून, 1972) एक प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक एवं सांख्यिकीविद थे। उन्हें दूसरी पंचवर्षीय योजना के अपने मसौदे के कारण जाना जाता है। भारत की आज़ादी के पश्चात नवगठित मंत्रिमंडल के सांख्यिकी सलाहकार बने तथा औद्योगिक उत्पादन की तीव्र बढ़ोतरी के जरिए बेरोज़गारी समाप्त करने के सरकार के प्रमुख उद्देश्य को पूरा करने के लिए योजना का खाका खींचे।


जीवन परिचय
प्रशांत चंद्र महालनोबिस का जन्म कोलकाता के 210 कार्नवालिस स्ट्रीट स्थित उनके पैतृक आवास में 29 जून, 1893 को हुआ था। उनके पिता का नाम प्रबोध चंद्र महालनोबिस था जो साधारण ब्रह्मो समाज के सक्रिय सदस्य थे। उनकी माता निरोदबसिनी का संबंध बंगाल के पढ़े-लिखे कुल से था। महालनोबिस की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा उनके दादा, गुरु चरन महालनोबिस द्वारा स्थापित ब्रह्मो ब्वायज स्कूल में हुई। उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा इसी स्कूल से 1908 ई में पास की। प्रेसीडेंसी कालेज से भौैतिकी विषय में आनर्स करने के बाद उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए ये लंदन चले गए। वहां इन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से भौतिकी और गणित दोनों विषयों से डिग्री हासिल की। ये एकमात्र छात्र थे जिसने भौतिकी में पहला स्थान प्राप्त किया था। उसके बाद ये कोलकाता लौट आए। प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस एक दूरद्रष्टा भी थे। उन्होंने दुनिया को यह बताया कि कैसे सांख्यिकी का प्रयोग आम लोगों की भलाई के लिए किया जा सकता है। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के काफी नजदीक रहने के बावजूद उन्होंने कभी कोई पद आधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया। उन्हें विज्ञान में ब्यूरोक्रेसी पसंद नहीं थी। उन्हें अपने संस्थान से काफी लगाव था और वे इसे हमेशा एक स्वतंत्र संस्था के रूप में देखना चाहते थे। शायद यही वजह है कि जब 1971 में इस संस्थान से जुड़े अधिकांश लोगों ने सरकार के साथ जाने का फैसला किया तो उन्हें आंतरिक तकलीफ पहुंची। वे इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सके और 28 जून, 1972 को उनकी मृत्यु हो गई। वैज्ञानिक होने के अलावा श्री महालनोबिस की रुचि साहित्य में भी थी। उनके गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर के साथ काफी अच्छे संबंध थे। बचपन में वे अपने दादा, गुरु चंद्र महालनोबिस के साथ गुरुदेव के पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर के पास आते-जाते थे। प्रोफेसर महालनोबिस के संबंध गुरुदेव के साथ 1910 से ज्यादा प्रगाढ़ होने लगे जब वे पहली बार शांति-निकेतन पहुंचे। यहां महालनोबिस ने टैगोर के साथ दो महीने का समय बिताया। इस दरम्यान टैगोर ने उन्हें आश्रमिका संघ का सदस्य बना दिया। बाद में जब टैगोर ने ‘विश्व भारती’ की स्थापना की तो प्रोफेसर महालनोबिस को संस्थान का सचिव नियुक्त किया। इतना ही नहीं प्रोफेसर ने गुरुदेव के साथ कई देशों की यात्रा भी की और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज भी लिखे। इस दौरान प्रोफेसर महालनोबिस की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनकी मदद लेनी शुरु कर दी और उन्होंने कृषि व बाढ़ नियंत्रण के क्षेत्र में कई अभिनव प्रयोग किए। उनके द्वारा सुझाए गए बाढ़ नियंत्रण के उपायों पर अमल करते हुए सरकार को इस दिशा में अप्रत्याशित सफलता मिली।


इन उपलब्धियों के अलावा प्रोफेसर प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस का सबसे बड़ा योगदान उनके द्वारा शुरु किया गया ‘सैंपल सर्वे’ है, जिसके आधार पर आज बड़ी-बड़ी नीतियां और योजनाएं बनाई जा रही हैं। उन्होंने इसकी शुरुआत एक निश्चित भूभाग पर होने वाली जूट की फसल के आंकड़ों से की और यह बताया कि कैसे उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। हालांकि उनके काम के तरीक़े पर शुरुआत में सवालिया निशान लगाए गए पर उन्होंने बार-बार खुद को सिद्ध किया और अंततः उनके द्वारा किए गए कार्यों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली। उन्हें आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा 1944 में ‘वेलडन मेडल’ पुरस्कार दिया गया जबकि 1945 में रायल सोसायटी ने उन्हें अपना फेलो नियुक्त किया। प्रोफेसर महालनोबिस चाहते थे कि सांख्यिकी का उपयोग देशहित में भी हो। यही वजह है कि उन्होंने पंचवर्षीय योजनाओं के निर्माण में अहम भूमिका निभाई


17 दिसंबर 1931 का दिन भारत के इतिहास में काफी महत्वपूर्ण है। इस दिन प्रोफेसर प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस का सपना साकार हुआ और कोलकाता में ‘भारतीय सांख्यिकी संस्थान’ की स्थापना हुई। आज कोलकाता के अलावा इस संस्थान की शाखाएं दिल्ली, बैंगलोर, हैदराबाद, पुणे, कोयंबटूर, चेन्नई, गिरिडीह सहित देश के दस स्थानों में हैं। संस्थान का मुख्यालय कोलकाता है जहाँ मुख्य रूप से सांख्यिकी की पढ़ाई होती है। सन 1959 में भारतीय सांख्यिकी संस्थान को ‘राष्ट्रीय महत्व का संस्थान’ घोषित किया गया। प्रोफेसर महालनोबिस को 1957 में अंतर्राष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान का सम्मानित अध्यक्ष बनाया गया।


भारत सरकार ने 1959 में प्रोफेसर प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस को देश के दूसरे सर्वोच्च सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया।


Prasanta Chandra Mahalanobis OBE, FNA,[5] FASc, (29 June 1893 – 28 June 1972) was an Indian scientist and applied statistician. He is best remembered for the Mahalanobis distance, a statistical measure, and for being one of the members of the first Planning Commission of free India. He made pioneering studies in anthropometry in India. He founded the Indian Statistical Institute, and contributed to the design of large-scale sample surveys. For his contributions, Mahalanobis has been considered the father of modern statistics in India.


Mahalanobis belonged to a family of Bengali landed gentry who lived in Bikrampur (now in Bangladesh). His grandfather Gurucharan (1833–1916) moved to Calcutta in 1854 and built up a business, starting a chemist shop in 1860. Gurucharan was influenced by Debendranath Tagore (1817–1905), father of the Nobel Prize–winning poet, Rabindranath Tagore. Gurucharan was actively involved in social movements such as the Brahmo Samaj, acting as its Treasurer and President. His house on 210 Cornwallis Street was the center of the Brahmo Samaj. Gurucharan married a widow, an action against social traditions.


Gurucharan's elder son, Subodhchandra (1867–1953), became a distinguished educator after studying physiology at Edinburgh University. He was elected as a Fellow of the Royal Society of Edinburgh.[2] He was the Head of the Dept. of Physiology, University of Cardiff (the first Indian to occupy this post in a British university). In 1900, Subodhchandra returned to India, founding the Dept. of Physiology in the Presidency College, Calcutta. Subodhchandra also became a member of the Senate of the University of Calcutta.


Gurucharan's younger son, Prabodh Chandra (1869–1942), was the father of P. C. Mahalanobis. Born in the house at 210 Cornwallis Street, Mahalanobis grew up in a socially active family surrounded by intellectuals and reformers.


Mahalanobis received his early schooling at the Brahmo Boys School in Calcutta, graduating in 1908. He joined the Presidency College, then affiliated with the University of Calcutta, where he was taught by teachers who included Jagadish Chandra Bose, and Prafulla Chandra Ray. Others attending were Meghnad Saha, a year junior, and Subhas Chandra Bose, two years his junior at college. Mahalanobis received a Bachelor of Science degree with honours in physics in 1912. He left for England in 1913 to join the University of London.


After missing a train, he stayed with a friend at King's College, Cambridge. He was impressed by King's College Chapel and his host's friend M. A. Candeth suggested that he could try joining there, which he did. He did well in his studies at King's, but also took an interest in cross-country walking and punting on the river. He interacted with the mathematical genius Srinivasa Ramanujan during the latter's time at Cambridge. After his Tripos in physics, Mahalanobis worked with C. T. R. Wilson at the Cavendish Laboratory. He took a short break and went to India, where he was introduced to the Principal of Presidency College and was invited to take classes in physics.


After returning to England, Mahalanobis was introduced to the journal Biometrika. This interested him so much that he bought a complete set and took them to India. He discovered the utility of statistics to problems in meteorology and anthropology, beginning to work on problems on his journey back to India.


In Calcutta, Mahalanobis met Nirmalkumari, daughter of Herambhachandra Maitra, a leading educationist and member of the Brahmo Samaj. They married on 27 February 1923, although her father did not completely approve of the union. He was concerned about Mahalanobis's opposition to various clauses in the membership of the student wing of the Brahmo Samaj, including prohibitions against members' drinking alcohol and smoking. Sir Nilratan Sircar, P. C. Mahalanobis' maternal uncle, took part in the wedding ceremony in place of the father of the bride.


Honours
Fellow of the Indian Academy of Sciences (FASc, 1935)
Fellow of the Indian National Science Academy (FNA, 1935)
Officer of the Order of the British Empire (Civil Division), 1942 New Year Honours list
Weldon Memorial Prize from the University of Oxford (1944)
Fellow of the Royal Society, London (1945)
President of Indian Science Congress (1950)
Fellow of the Econometric Society, US (1951)
Fellow of the Pakistan Statistical Association (1952)
Honorary Fellow of the Royal Statistical Society, UK (1954)
Sir Deviprasad Sarvadhikari Gold Medal (1957)
Foreign member of the Academy of Sciences of the USSR (1958)
Honorary Fellow of King's College, Cambridge (1959)
Fellow of the American Statistical Association (1961)
Durgaprasad Khaitan Gold Medal (1961)
Padma Vibhushan (1968)
Srinivasa Ramanujan Gold Medal (1968)
The government of India decided in 2006 to celebrate his birthday, 29 June, as National Statistical Day.


On the occasion of his 125th birth anniversary on 29 June, 2018, Indian Vice-President M Venkaiah Naidu released a commemorative coin at a programme at ISI, Kolkata.