कमाल अतातुर्क (जन्म- 19 मई, 1881)

May 19, 2017

कमाल अतातुर्क उर्फ "मुस्तफ़ा कमाल पाशा" (जन्म- 19 मई, 1881; मृत्यु- 10 नवम्बर, 1938 ई.) को 'आधुनिक तुर्की का निर्माता' कहा गया है। साम्राज्यवादी शासक सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय का तुर्की में पासा पलट कर वहाँ कमाल की सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था कायम करने का जो क्रान्तिकारी कार्य कमाल अतातुर्क ने किया, उस ऐतिहासिक कार्य ने उनके नाम को सार्थक सिद्ध कर दिया था। कमाल अतातुर्क ने तुर्की सेना को अत्यंत आधुनिक ढंग से संगठित किया। उनके विशेष प्रयासों से ही तुर्क जाति आधुनिक जाति बनी।


जन्म तथा शिक्षा
मुस्तफ़ा कमाल पाशा का जन्म 19 मई, 1881 ई. में सलोनिका में एक किसान परिवार में हुआ था। 11 साल की उम्र में ही वह इतने दुर्दांत मान लिए गए थे कि उन्हें साधारण विद्यालय से निकाल देना पड़ा और वह सलोनिका में सैनिक विद्यालय के विद्यार्थी हो गए। वहाँ भी उनका वही स्वभाव बना रहा। पर उन्हें सैनिक विद्या में दिलचस्पी रही। 17 वर्ष की उम्र में मोनास्तीर के उच्च सैनिक विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्हें सब-लेफ़्टिनेंट का पद देकर कुस्तुंतुनिया के 'स्टाफ़ कॉलेज' में भेज दिया गया। इसके साथ ही कमाल अतातुर्क ने तुर्की सेना को अत्यंत आधुनिक ढंग से संगठित किया। इस प्रकार तुर्क जाति उनके कारण आधुनिक जाति बनी। 1938 ई. के 10 नवम्बर में मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क की मृत्यु हुई तो आधुनिक तुर्की के निर्माता के रूप में उनका नाम संसार में चमक चुका था।


क्रांतिकारी दल के सदस्य


वहाँ वह अध्ययन के साथ-साथ बुरी संगत में घूमते रहे। कुछ काल तक उद्दंड जीवन बिताने के बाद वह 'वतन' नामक एक गुप्त क्रांतिकारी दल के सदस्य और थोड़े ही दिन में नेता बन गए। 'वतन' का उद्देश्य एक तरफ़ सुल्तान की तानाशाही और दूसरी तरफ़ विदेशियों के षड्यंत्रों को मिटाना था। एक दिन दल की बैठक हो रही थी कि एक गुप्तचर ने खबर दे दी और सबके सब षड्यंत्रकारी अफसर गिरप्तार करके जेल भेज दिए गए। प्रचलित क़ानून के अनुसार उन्हें मृत्युदंड दिया जा सकता था, पर दुर्बलचित्त सुल्तान को भय था कि कहीं ऐसा करने पर देश में विद्रोह न भड़क उठे, अत: उसने सबको क्षमादान करने का निश्चय किया। इस प्रकार कमाल छूट गए और द्रूज जाति के विद्रोह को दबाने के लिए दमिश्क भेजे गए। वहाँ कमाल ने अच्छा काम किया, पर कुस्तुंतुनिया लौटते ही उन्होंने 'वतन' दल का फिर से संगठन कर लिया।


इस बीच उन्हें यह ज्ञात हुआ कि मकदूनिया में सुल्तान के विरुद्ध खुला विद्रोह होने वाला है। इस पर कमाल ने छुट्टी ले ली और वह जाफ़ा, मिस्र, एथेंस होते हुए वेश बदलकर विद्रोह के केंद्र सलोनिका पहुँचे। लेकिन वहाँ वह पहचान लिए गए। फिर वह ग्रीस होते हुए जाफ़ा भागे। पर तब तक उनकी गिरप्तारी का आदेश वहाँ पहुँच चुका था। 'अहमद बे' नामक एक अफसर पर कमाल अतातुर्क को पकड़ने का भार था, पर अहमद स्वयं वतन का सदस्य था, इसलिए उसने कमाल को गिरफ्तार करने बजाय उन्हें गाजा मोर्चे पर भेज दिया और यह रिपोर्ट भेज दी कि वह छुट्टी पर गए ही नहीं थे। यद्यपि कमाल अतातुर्क सलोनिका में बहुत थोड़े समय तक रह पाए थे, फिर भी वह समझ गए थे कि उसे ही विद्रोह का केंद्र बनना है, इसलिए बड़े प्रयत्नों के बाद 1908 में उन्होंने अपना स्थानांतरण वहाँ करा लिया।


यहाँ अनवर के नेतृत्व में दो साल पहले ही 'एकता और प्रगति समिति' नाम से एक क्रांतिकारी दल की स्थापना हो चुकी थी। कमाल अतातुर्क फौरन इसके सदस्य बन गए, पर नेताओं से उनकी नहीं बनीं। फिर भी समिति का काम करते रहे। इस दल के एक नेता नियाज़ी ने केवल कुछ सौ आदमियों को लेकर तुर्की सरकार के विरुद्ध विद्रोह बोल दिया। हालांकि यह बड़ी मुर्खता की बात थी, पर देश तैयार था, इसलिए जो सेना उससे लड़ने के लिए भेजी गई, वह भी उससे जा मिली। इस प्रकार देश में अनवर का जय-जयकार हो गया। अब सह सम्मिलित सेना राजधानी पर आक्रमण करने की तैयारी कर रही थी। सुल्तान ने इन्हीं दिनों कुछ शासन सुधार भी किए। फिर भी विद्रोह की शक्तियाँ काम करती रहीं, पर जब विद्रोह सफल हो चुका, तब सुल्तान अब्दुल हमीद ने सेना के कुछ लोगों को यथेष्ट घूस देकर मिला लिया, जिससे सैनिकों ने विद्रोह करके अपने अफसरों को मार डाला और फिर एक बार इस्लाम, सुल्तान और खलीफ़ा की जय के नारे बुलंद हुए।


इन दिनों अनवर बर्लिन में थे। वह जल्दी ही लौटे और उन्होंने अब्दुल हमीद को सिंहासनच्युत करके प्रतिक्रियावादियों के बीसियों नेताओं को फाँसी पर चढ़ा दिया और क्रांतिकारी समिति के हाथ में शक्ति आ गई। अब्दुल हमीद का भांजा सिंहासन पर नाममात्र के लिए बिठाया गया। अब कमाल अतातुर्क अनवर के विरुद्ध षड्यंत्र करते रहे, क्योंकि उनके विचार से अनवर अव्यावहारिक व्यक्ति थे, आदर्शवादी अधिक थे। अनवर ने इस समय होने वाले विदेशी आक्रमणों को भी प्रतिहत किया और इससे उनकी ख्याति और बढ़ी। इसके बाद अनवर ने अपने सर्व इस्लामी स्वप्न को सत्य करने के लिए कार्य आरंभ किया और उन्होंने इसके लिए सबसे पहला काम यह किया कि तुर्की सेना को संगठित करने का भार एक जर्मन जनरल को दिया। कमाल अतातुर्क ने इसके विरुद्ध आंदोलन किया कि यह तुर्की जाति का अपमान है। इस पर कमाल सैनिक दूत बनाकर सोफ़िया भेज दिए गए।


इसी बीच महायुद्ध छिड़ गया। इसमें अनवर सफल नहीं हो सके, पर कमाल अतातुर्क ने एक युद्ध में कुस्तुंतुनिया पर अधिकार करने की ब्रिटिश चाल को व्यर्थ कर दिया और उसके बाद उनकी जीत पर जीत होती चली गई। फिर भी महायुद्ध में तुर्की हार गया। कमाल दिन रात परिश्रम करके विदेशियों के विरुद्ध आंदोलन करते रहे। 1920 ई. में 'स्व्रो की संधि' की घोषणा हुई, पर इसकी शर्तें इतनी खराब थीं कि कमाल ने फौरन ही एक सेना तैयार कर कुस्तुंतुनिया पर आक्रमण की तैयारी की। इसी बीच ग्रीस ने तुर्की पर हमला कर दिया और स्मरना में सेना उतार दी जो कमाल अतातुर्क के प्रधान केंद्र अंगारा की तरफ़ बढ़ने लगी। अब कमाल अतातुर्क के लिए बड़ी समस्या पैदा हो गई, क्योंकि इस युद्ध में यदि वे हार जाते तो आगे कोई संभावना न रहती। उन्होंने बड़ी तैयारी के साथ युद्ध किया और धीरे-धीरे ग्रीक सेना को पीछे हटना पड़ा।


इस बीच फ़्राँस और रूस ने भी कमाल अतातुर्क को गुप्त रूप से सहायता देना शुरू किया। थोड़े दिनों में ही ग्रीक निकाल बाहर किए गए। ग्रीकों को भगाने के बाद ही अंग्रेज़ों के हाथ से बाकी हिस्से निकालने का प्रश्न था। देश कमाल अतातुर्क के साथ था, इसके अतिरिक्त ब्रिटेन अब लड़ने के लिए तैयार नहीं था। इस कारण यह समस्या भी सुलझ गई। कमाल ने देश को प्रजातंत्र घोषित किया और स्वयं प्रथम राष्ट्रपति बने।


अब राज्य लगभग निष्कंटक हो चुका था, पर मुल्लाओं की ओर से उनका विरोध हो रहा था। इस पर कमाल ने सरकारी अखबारों में इस्लाम के विरुद्ध प्रचार शुरू किया। अब तो धार्मिक नेताओं ने उनके विरुद्ध फ़तवे जारी कर दिए और यह कहा कि- "कमाल ने अंगारा में स्त्रियों को पर्दे से निकाला और और देश में आधुनिक नृत्य का प्रचार किया है, जिसमें पुरुष स्त्रियों से सटकर नाचते हैं। इसका अंत होना चहिए।" हर मस्जिद से यह आवाज उठाई गई। तब कमाल अतातुर्क ने 1924 ई. के मार्च में खिलाफत प्रथा का अंत करते हुए और तुर्की को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करते हुए एक विधेयक रखा। अधिकांश संसद सदस्यों ने इसका विरोध किया, पर कमाल ने उन्हें धमकाया। इस पर विधेयक पारित हो गया। लेकिन भीतर-भीतर मुल्लाओं के विद्रोह की आग सुलगती रही। कमाल अतातुर्क के कई भूतपूर्व साथी मुल्लाओं के साथ मिल गए। इन लोगों ने विदेशी पूँजीपतियों से धन भी लिया। कमाल अतातुर्क ने एक दिन इनके मुख्य नेताओं को गिरफ्तार पर फाँसी पर चढ़ा दिया।


कमाल अतातुर्क ने देखा कि केवल फाँसी पर चढ़ाने से काम नहीं चलेगा, देश को आधुनिक रूप से शिक्षित करना है तथा पुराने रीति रिवाजों को ही नहीं, पहनावे आदि को भी समाप्त करना है। कमाल अतातुर्क ने हमला तुर्की टोपी पर किया। इस पर विद्रोह हुए, पर कमाल ने सेना भेज दी। इसके बाद इन्होंने इस्लामी क़ानूनों को हटाकर उनके स्थान पर एक नई संहिता स्थापित की, जिसमें स्विटज़रलैंड, जर्मनी और इटली की सब अच्छी बातें शामिल थीं। बहुविवाह ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही पतियों से यह कहा गया कि वे अपनी पत्नियों के साथ ढोरों की तरह-व्यवहार न करके बराबरी का बर्ताव रखें। प्रत्येक व्यक्ति को वोट का अधिकार दिया गया। सेवाओं में घूस लेना निषिद्ध कर दिया गया और घूसखोरों को बहुत कड़ी सजाएँ दी गईं। पर्दा उठा दिया गया और पुरुष पुराने ढंग के परिच्छेद छोड़कर सूट पहनने लगे। इससे भी बड़ा सुधार यह था कि अरबी लिपि को हटाकर रोमन लिपि की स्थापना की गई। कमाल अतातुर्क स्वयं सड़कों पर जाकर रोमन वर्णमाला पढ़ाते रहे।


Mustafa Kemal Atatürk (Turkish: [mustaˈfa ceˈmal aˈtaˌtyɾc]; 19 May 1881 (conventional) – 10 November 1938) was a Turkish army officer, revolutionary, and founder of the Republic of Turkey, serving as its first President from 1923 until his death in 1938. Ideologically a secularist and nationalist, his policies and theories became known as Kemalism.


Atatürk came to prominence for his role in securing the Ottoman Turkish victory at the Battle of Gallipoli during World War I. Following the Empire's defeat and subsequent dissolution, he led the Turkish National Movement, which resisted the mainland Turkey's partition among the victorious Allied powers. Establishing a provisional government in the present-day Turkish capital Ankara, he defeated the forces sent by the Allies, thus emerging victorious from what was later referred to as the Turkish War of Independence. He subsequently proceeded to abolish the decrepit Ottoman Empire and proclaimed the foundation of the Turkish Republic in its place.


As the president of the newly formed Turkish Republic, Atatürk initiated a rigorous program of political, economic, and cultural reforms with the ultimate aim of building a modern, progressive, and secular nation-state. He made primary education free and compulsory, opening thousands of new schools all over the country. He also introduced the Latin-based Turkish alphabet, replacing the old Ottoman Turkish alphabet. Turkish women received equal civil and political rights during Atatürk's presidency ahead of many Western countries. In particular, women were given voting rights in local elections by Act no. 1580 on 3 April 1930 and a few years later, in 1934, full universal suffrage, earlier than most other countries in the world.


His government carried out a policy of Turkicisation trying to create a homogeneous and unified nation.[4][5][6] Under Atatürk, non-Turkish minorities were pressured to speak Turkish in public, non-Turkish toponyms and last names of minorities had to be changed to Turkish renditions. The Turkish Parliament granted him the surname Atatürk in 1934, which means "Father of the Turks", in recognition of the role he played in building the modern Turkish Republic. He died on 10 November 1938 at the age of 57 in Dolmabahçe Palace; he was succeeded as President by İsmet İnönü and was honored with a state funeral. In 1953, his iconic mausoleum was built and opened, which is surrounded by a park called the Peace Park in honor of his famous expression "Peace at Home, Peace in the World".


In 1981, the centennial of Atatürk's birth, his memory was honoured by the UN and UNESCO, which declared it The Atatürk Year in the World and adopted the Resolution on the Atatürk Centennial, describing him as "the leader of the first struggle given against colonialism and imperialism" and a "remarkable promoter of the sense of understanding between peoples and durable peace between the nations of the world and that he worked all his life for the development of harmony and cooperation between peoples without distinction". Atatürk is commemorated by many memorials throughout Turkey and numerous countries all over the world, where place names are named in honor of him. Eleftherios Venizelos, former Prime Minister of Greece, forwarded Atatürk's name for the 1934 Nobel Peace Prize.
Mustafa Kemal Atatürk was born (under the name Ali Rıza oğlu Mustafa) in the early months of 1881, either in the Ahmet Subaşı neighbourhood or at a house (preserved as a museum) in Islahhane Street (now Apostolou Pavlou Street) in the Koca Kasım Pasha neighbourhood in Salonica (Selanik), Ottoman Empire (Thessaloniki in present-day Greece), to Ali Rıza Efendi, a militia officer, title-deed clerk and lumber trader, and Zübeyde Hanım. Only one of Mustafa's siblings, a sister named Makbule (Atadan) survived childhood; she died in 1956.According to Andrew Mango, his family was Muslim, Turkish-speaking and precariously middle-class. His father Ali Rıza is thought to have been of Albanian origin by some authors; however, according to Falih Rıfkı Atay, Vamık D. Volkan, Norman Itzkowitz, Müjgân Cunbur, Numan Kartal and Hasan İzzettin Dinamo, Ali Rıza's ancestors were Turks, ultimately descending from Söke in the Aydın Province of Anatolia.His mother Zübeyde is thought to have been of Turkish origin and according to Şevket Süreyya Aydemir, she was of Yörük ancestry.[28]



Mustafa Kemal with his mother Zübeyde Hanım (middle) and sister Makbule Atadan (left)
He was born Mustafa, and his second name Kemal (meaning Perfection or Maturity) was given to him by his mathematics teacher, Captain Üsküplü Mustafa Efendi, "in admiration of his capability and maturity" according to Afet Inan, and, according to Ali Fuat Cebesoy, because his teacher wanted to distinguish his student who had the same name as him,although his biographer Andrew Mango suggests that he may have chosen the name himself as a tribute to the nationalist poet Namık Kemal. In his early years, his mother encouraged Mustafa Kemal to attend a religious school, something he did reluctantly and only briefly. Later, he attended the Şemsi Efendi School (a private school with a more secular curriculum) at the direction of his father. His parents wanted him to learn a trade, but without consulting them, Mustafa Kemal took the entrance exam for the Salonica Military School (Selanik Askeri Rüştiyesi) in 1893. In 1896, he enrolled into the Monastir Military High School. On 14 March 1899,[33] he enrolled at the Ottoman Military Academy in the neighbourhood of Pangaltı within the Şişli district of the Ottoman capital city Constantinople (now Istanbul) and graduated in 1902. He later graduated from the Ottoman Military College in Constantinople on 11 January 1905.


Shortly after graduation, he was arrested by the police for his anti monarchist activities. Following a confinement of several months he was released only with the support of Rıza Pasha, his former school director.After his release, Mustafa Kemal was assigned to the Fifth Army based in Damascus as a Staff Captainin the company of Ali Fuat (Cebesoy) and Lütfi Müfit (Özdeş). He joined a small secret revolutionary society of reformist officers led by a merchant Mustafa Elvan (Cantekin) called Vatan ve Hürriyet ("Motherland and Liberty"). On 20 June 1907, he was promoted to the rank of Senior Captain (Kolağası) and on 13 October 1907, assigned to the headquarters of the Third Army in Manastır. He joined the Committee of Union and Progress, with membership number 322, although in later years he became known for his opposition to, and frequent criticism of, the policies pursued by the CUP leadership. On 22 June 1908, he was appointed the Inspector of the Ottoman Railways in Eastern Rumelia (Doğu Rumeli Bölgesi Demiryolları Müfettişi).[37] In July 1908, he played a role in the Young Turk Revolution which seized power from Sultan Abdülhamid II and restored the constitutional monarchy.



Mustafa Kemal Bey (4th from right) listening to the briefing of French Colonel Auguste Edouard Hirschauer during the Picardie army manoeuvres, September 1910
He was proposing depolitization in the army, a proposal which was disliked by the leaders of the CUP. As a result, he was sent away to Tripolitania Vilayet (present Libya, then an Ottoman territory) under the pretext of suppressing a tribal rebellion towards the end of 1908. According to Mikush however, he volunteered for this mission.He suppressed the revolt and returned to İstanbul in January 1909.


In April 1909 in İstanbul, a group of soldiers began a counter revolution (see 31 March Incident). Mustafa Kemal was instrumental in suppressing the revolt.


In 1910 he was called to the Ottoman provinces in Albania. At that time Isa Boletini was leading Albanian uprisings in Kosovo and there were revolts in Albania. In 1910 he met with Eqerem Vlora the Albanian lord, politician, writer, and one of the signatories of Albanian Declaration of Independence.


Later, in the autumn of 1910, he was among the Ottoman military observers who attended the Picardie army manoeuvres in France, and in 1911, served at the Ministry of War (Harbiye Nezareti) in Istanbul for a short time.


In 1911, he was assigned to the Ottoman Tripolitania Vilayet (present-day Libya) to fight in the Italo-Turkish War, mainly in the areas near Benghazi, Derna and Tobruk against a 150,000-strong Italian amphibious assault force, which had to be countered by 20,000 Bedouinsand 8,000 Turks[48] A short time before Italy declared war, a large portion of the Ottoman troops in Libya were sent to the Ottoman province of Yemen in order to put down the rebellion there, so the Ottoman government was caught with inadequate resources to counter the Italians in Libya; and the British government, which controlled the Ottoman provinces of Egypt and Sudan, did not allow sending additional Ottoman troops to Libya through Egypt. Ottoman soldiers like Mustafa Kemal went to Libya either dressed as Arabs (risking imprisonment if noticed by the British authorities in Egypt), or through very few available ferries (the Italians, who had superior naval forces, effectively controlled the sea routes to Tripoli). However, despite all the hardships, Mustafa Kemal's forces in Libya managed to repel the Italians on a number of occasions, such as the Battle of Tobruk on 22 December 1911. During the Battle of Derna on 16–17 January 1912, while Mustafa Kemal was assaulting the Italian-controlled fortress of Kasr-ı Harun, two Italian planes dropped bombs on the Ottoman forces and a piece of limestone from a damaged building's rubble entered Mustafa Kemal's left eye; which caused a permanent damage on his left eye's tissue, but not total loss of sight. He received medical treatment for nearly a month; he attempted to leave the Red Crescent's health facilities after only two weeks, but when his eye's situation worsened, he had to return and resume treatment. On 6 March 1912 Mustafa Kemal became the Commander of the Ottoman forces in Derna. He managed to defend and retain the city and its surrounding region until the end of the Italo-Turkish War on 18 October 1912. Mustafa Kemal, Enver Bey, Fethi Bey and the other Ottoman military commanders in Libya had to return to Ottoman Europe following the outbreak of the Balkan Wars on 8 October 1912. Losing the war, the Ottoman government had to surrender Tripolitania, Fezzan and Cyrenaica (3 provinces forming present-day Libya) to the Kingdom of Italy with the secret Treaty of Ouchy (the public version is First Treaty of Lausanne) signed ten days later, on 18 October.


During 1937, indications that Atatürk's health was worsening started to appear. In early 1938, while he was on a trip to Yalova, he suffered from a serious illness. He went to Istanbul for treatment, where he was diagnosed with cirrhosis of the liver. During his stay in Istanbul, he made an effort to keep up with his regular lifestyle for a while. He died on 10 November 1938, at the age of 57, in the Dolmabahçe Palace, where he spent his last days. The clock in the bedroom where he died is still set to the time of his death, 9:05 in the morning.


Atatürk's funeral called forth both sorrow and pride in Turkey, and 17 countries sent special representatives, while nine contributed armed detachments to the cortège. Mustafa Kemal's remains were originally laid to rest in the Ethnography Museum of Ankara, and transferred on 10 November 1953, 15 years after his death in a 42-ton sarcophagus, to a mausoleum that overlooks Ankara,Anıtkabir.


In his will, Atatürk donated all of his possessions to the Republican People's Party, providing that the yearly interest of his funds would be used to look after his sister Makbule and his adopted children, and fund the higher education of the children of İsmet İnönü. The remainder of this yearly interest was willed to the Turkish Language Association and the Turkish Historical Society.