विजय तेंदुलकर (मृत्यु: 19 मई 2008)

May 19, 2017

विजय तेंदुलकर (अंग्रेज़ी: Vijay Tendulkar, जन्म: 6 जनवरी 1928 - मृत्यु: 19 मई 2008) का नाम आधुनिक भारतीय नाटक और रंगमंच के विकास में अग्रणी है। पांच दशक से ज़्यादा समय तक सक्रिय रहे तेंदुलकर ने रंमगंच और फ़िल्मों के लिए लिखने के अलावा कहानियाँ और उपन्यास भी लिखे।


परिचय
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में 6 जनवरी, 1928 को एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए विजय ढोंडोपंत तेंदुलकर ने महज़ छह साल की उम्र में अपनी पहली कहानी लिखी थी। उनके पिता नौकरी के साथ ही प्रकाशन का भी छोटा-मोटा व्यवसाय करते थे इसलिए पढ़ने-लिखने का माहौल उन्हें घर में ही मिल गया। पश्चिमी नाटकों को देखते हुए बड़े हुए विजय ने मात्र 11 साल की उम्र में पहला नाटक लिखा, उसमें काम किया और उसे निर्देशित भी किया। उन्हें मानव स्वभाव की गहरी समझ थी। शुरुआती दिनों में विजय ने अख़बारों में काम किया था। बाद में भी वे अख़बारों के लिए लिखते रहे।[1] सन बयालिस के दौर में उन्होंने पढ़ाई छोड़ कर आजादी के आंदोलन में कूदने का फैसला किया। वास्तव में उनके लेखन की शुरूआत अखबारों के लिए लिखने से हुई। बीस साल की उम्र में उन्होंने दो नाटक लिखे, ‘अमायाचार कोन प्रेम करेन’ (हमें कौन प्यार करेगा) एवं ‘गृहस्थ’। लेकिन इन नाटकों को कोई सफलता नहीं मिली। इससे युवा तेंदुलकर का उत्साह टूट गया और उन्होंने नाटक नहीं लिखने का फैसला किया। लेकिन उनकी लेखनी ने एक बार फिर जोर मारा और सन 1956 में उन्‍होंने ‘श्रीमंत टक’ लिखा। इस नाटक में एक बिन ब्याही मां के अमीर पिता के मना करने के बावजूद अपने बच्चे को जन्म देने के फैसले को दर्शाया गया था। नाटक जगत में इसे खूब सराहा गया। इस नाटक की तत्कालीन रूढिवादियों ने कड़ी आलोचना की, लेकिन तेंदुलकर पर इसका कोई असर नहीं हुआ। 19 मई, 2008 को परम्परावादी मराठी थियेटर के पुरोधा विजय तेंदुलकर का निधन हो गया। महाराष्ट्र के पुणे शहर के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम साँस ली।


मराठी की पत्रकारिता से सक्रिय जीवन शुरू करने के बाद सातवें दशक के उत्तरार्ध में भारतीय रंगमंच पर एक धूमकेतु की भाँति उनका उदय हुआ। उनका नाटक शांतता कोर्ट चालू आहे अपनी क्रान्तिकारी वस्तु और संरचना के कारण इतना लोकप्रिय हुआ, कि देखते-देखते अनेक भाषाओं में[3] उसके अनुवाद हुए और देश-विदेश में शताधिक उसकी प्रस्तुतियाँ हो चुकी हैं। 'शांताता! कोर्ट चालू आहे', 'घासीराम कोतवाल' और 'सखाराम बाइंडर' उनके लिखे बहुचर्चित नाटक हैं। सत्तर के दशक में उनके कुछ नाटकों को विरोध भी झेलना पड़ा लेकिन वास्तविकता से जुड़े इन नाटकों का मंचन आज भी होना उनकी स्वीकार्यता का प्रमाण है।


विजय तेंदुलकर ने अपने थियेटर समूह ‘रंगायन’ के जरिये नाटकों में नए प्रयोग करने शुरू किए। इस काम में उन्हें सहयोग मिला श्रीराम लागू, मोहन अगाशे और सुलभा देशपांडे से। इन नए कलाकारों ने तेंदुलकर की रचनाओं को रंगमंचीय स्‍वरूप प्रदान किया।
सन 1961 में उन्‍होंने ‘गिद्वे-गिद्व’ नाटक लिखा, लेकिन इस नाटक के एकदम नए विषय होने की वजह से इसका प्रदर्शन नौ साल बाद सन 1970 में संभव हो सका। इस नाटक में नैतिक रूप से परिवार के टूटते ढांचे और हिंसा के छिपे हुए स्वरूपों को रंग की भाषा में दिखाया गया। तेंदुलकर ने इस नाटक में घरेलू लिंग आधारित सांप्रदायिक और राजनीतिक हिंसा को नए तरह से परिभाषित किया। इस नाटक ने उन्हें रंग जगत में ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।
ड्रिग ड्यूरमर की लघु कहानी ‘ ट्रैप्स’ को आधार बना कर उन्होंने एक नाटक लिखा ‘शांतता कोर्ट चालू आहे' (खामोश अदालत जारी है)। सन 1967 में लिखे और खेले गए इस नाटक ने नाट्यजगत में धूम मचा दी और उन्हें एक सिद्धहस्त लेखक के रूप में स्थापित कर दिया। इस नाटक की लोकप्रियता आज चालीस साल बाद भी उतनी ही बनी हुई है। आज भी इसके मंचन में लोगो की भारी भीड़ इस बात को साबित करती है।
सन 1972 में तेंदुलकर की कलम से एक और नाटक आया ‘सखाराम बाइंडर’। नैतिकता और मूल्यों के द्वन्द्वों को उभारता यह नाटक आलोचको के साथ-साथ दर्शकों को भी काफ़ी पसंद आया। लेकिन इसी साल उन्होंने एक और नाटक लिखा ‘घासीराम कोतवाल’। अठारवीं सदी के मराठा शासन में आई कमज़ोरियों को दर्शाता यह नाटक अमरता का तत्व लिए हुए था।[4]

तेंडुलकर के ‘गिधाड़े’, ‘कमला’, ‘कन्यादान’, आदि नाटक भी बहुचर्चित हुए। विजय तेंदुलकर ने पचास से भी अधिक नाटकों की रचना की है। हिंदी में उनके तीस नाटकों का अनुवाद और मंचन किया जा चुका है। वर्ष 2007 में ‘भूत’ और वर्ष 2008 में ‘विट्ठला’ और ‘एक जिद्दी लड़की’ का हिंदी अनुवाद भी प्रकाशित हो गया है। ‘खामोश अदालत जारी है’, ’ गिद्ध’ ‘,सखाराम बाइंडर’ ,‘जाति ही पूछो साधु की’,‘ घासीराम कोतवाल’,‘ कन्यादान’,‘ कमला’ आदि नाटकों के जरिए तेंदुलकर की जो छवि नाट्य जगत में स्वीकृत हुई वह मराठी नाटककार की सीमा में बंधकर नहीं रह सकी।


उनके बहुचर्चित नाटक 'घासीराम कोतवाल' का छह हज़ार से ज़्यादा बार मंचन हो चुका है। इतनी बड़ी संख्या में किसी और भारतीय नाटक का अभी तक मंचन नहीं हो सका है। उनके लिखे कई नाटकों का अंग्रेज़ी समेत दूसरी भाषाओं में अनुवाद और मंचन हुआ है।


‘निशान्त’ आदि कई, ‘समांतर सिनेमा’ आन्दोलन से जुड़ी, फ़िल्मों की पटकथा उन्होंने लिखीं। महाराष्ट्र के सांस्कृतिक जीवन में उनका व्यक्तित्व अलग से पहचाना जाता है।


उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, कालिदास सम्मान तथा पद्मभूषण आदि कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। पद्मभूषण से सम्मानित तेंदुलकर को श्याम बेनेगल की फ़िल्म 'मंथन' की पटकथा के लिए वर्ष 1977 में राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। बचपन से ही रंगमंच से जुड़े रहे तेंदुलकर को मराठी और हिंदी में अपने लेखन के लिए 'संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप', 'महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार' जैसे सम्मान भी मिले। अपने जीवनकाल में विजय तेंडुलकर ने पद्मभूषण (1984), महाराष्ट्र राज्य सरकार सम्मान (1956, 69, 72), संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड (1971), 'फिल्म फेयर अवॉर्ड (1980, 1999) एवं महाराष्ट्र गौरव (1999) जैसे सम्मानजनक पुरस्कार प्राप्त किए थे। 


Vijay Dhondopant Tendulkar (6 January 1928 – 19 May 2008) was a leading Indian playwright, movie and television writer, literary essayist, political journalist, and social commentator primarily in Marāthi. He is best known for his plays Shantata! Court Chalu Aahe (1967), Ghāshirām Kotwāl (1972), and Sakhārām Binder (1972). Many of Tendulkar's plays derived inspiration from real-life incidents or social upheavals, which provides clear light on harsh realities. He has provided guidance to students studying "play writing" in US universities. For over five decades Tendulkar had been a highly influential dramatist and theatre personality in Mahārāshtra.


Vijay Dhondopant Tendulkar was born on 6 January 1928 in Girgaon, Mumbai, Maharashtra, where his father held a clerical job and ran a small publishing business. The literary environment at home prompted young Vijay to take up writing. He wrote his first story at age six.


He grew up watching western plays and felt inspired to write plays himself. At age eleven, he wrote, directed, and acted in his first play.


At age 14, he participated in the 1942 Indian freedom movement, leaving his studies. The latter alienated him from his family and friends. Writing then became his outlet, though most of his early writings were of a personal nature, and not intended for publication.


Tendulkar began his career writing for newspapers. He had already written a play, Āmcyāvar Koṇ Preṃ Karṇār (आम्च्यावऱ कोण प्रेम करणार Who will Love us?), and he wrote the play, Gṛhastha (The Householder), in his early 20s. The latter did not receive much recognition from the audience, and he vowed never to write again.


Breaking the vow, in 1956 he wrote Śrīmant, which established him as a good writer. Śrīmant jolted the conservative audience of the times with its radical storyline, wherein an unmarried young woman decides to keep her unborn child while her rich father tries to "buy" her a husband in an attempt to save his social prestige.


Tendulkar's early struggle for survival and living for some time in tenements ("cāḷ/chawls") in Mumbai provided him first-hand experience about the life of urban lower middle class. He thus brought new authenticity to their depiction in Marathi theatre.[5] Tendulkar's writings rapidly changed the storyline of modern Marathi theatre in the 1950s and the 60s, with experimental presentations by theatre groups like Rangayan. Actors in these theatre groups like Shriram Lagoo, Mohan Agashe, and Sulabha Deshpande brought new authenticity and power to Tendulkar's stories while introducing new sensibilities in Marathi theatre.


Tendulkar wrote the play Gidhāḍe (The Vultures) in 1961, but it was not produced until 1970. The play was set in a morally collapsed family structure and explored the theme of violence. In his following creations, Tendulkar explored violence in its various forms: domestic, sexual, communal, and political. Thus, Gidhāḍe proved to be a turning point in Tendulkar's writings with regard to establishment of his own unique writing style.


Based on a 1956 short story, Die Panne ("Traps") by Friedrich Dürrenmatt, Tendulkar wrote the play, Śāntatā! Court Cālū Āhe ("Silence! The Court Is in Session"). It was presented on the stage for the first time in 1967 and proved as one of his finest works. Satyadev Dubey presented it in movie form in 1971 with Tendulkar's collaboration as the screenplay writer.


In his 1972 play, Sakhārām Binder (Sakhārām, the Binder), Tendulkar dealt with the topic of domination of the male gender over the female. The main character, Sakhārām, is a man devoid of ethics and morality, and professes not to believe in "outdated" social codes and conventional marriage. He accordingly uses the society for his own pleasure. He regularly gives "shelter" to abandoned wives and uses them for his sexual gratification while remaining oblivious to the emotional and moral implications of his exploits. He justifies all his acts through claims of modern, unconventional thinking, and comes up with hollow arguments meant in fact to enslave women. Paradoxically, some of the women which Sakhārām had enslaved buy into his arguments and simultaneously badly want freedom from their enslavement.


In 1972, Tendulkar wrote another, even much more acclaimed play, Ghāshirām Kotwāl ("Officer Ghāshirām"), which dealt with political violence. The play is a political satire created as a musical drama set in 18th century Pune. It combined traditional Marathi folk music and drama with contemporary theatre techniques, creating a new paradigm for Marathi theatre. The play demonstrates Tendulkar's deep study of group psychology,[10] and it brought him a Jawaharlal Nehru Fellowship (1974–75) for a project titled, "An Enquiry into the Pattern of Growing Violence in Society and Its Relevance to Contemporary Theatre". With over 6,000 performances thus far in its original and translated versions, Ghāshirām Kotwāl remains one of the longest-running plays in the history of Indian theatre.


Tendulkar wrote screenplays for the movies Nishānt (1974), Ākrosh (The Cry) (1980), and Ardh Satya (The Half-Truth) (1984) which established him as an important "Chronicler of Violence" of the present.He has written eleven movies in Hindi and eight movies in Marathi. The latter include Sāmanā ("Confrontation") (1975), Simhāasan ("Throne") (1979), and Umbartha ("The Threshold") (1981). The last one is a groundbreaking feature film on women's activism in India. It was directed by Jabbar Patel and stars Smitā Pātil and Girish Karnād.


In 1991, Tendulkar wrote a metaphorical play, Safar, and in 2001 he wrote the play, The Masseur. He next wrote two novels — Kādambari: Ek and Kādambari: Don — about sexual fantasies of an ageing man. In 2004, he wrote a single-act play, His Fifth Woman — his first play in the English language — as a sequel to his earlier exploration of the plight of women in Sakhārām Binder. This play was first performed at the Vijay Tendulkar Festival in New York in October 2004.


In the 1990s, Tendulkar wrote an acclaimed TV series, SwayamSiddha, in which his daughter Priyā Tendulkar, noted Television actress of 'Rajani' fame, performed in the lead role. His last screenplay was for Eashwar Mime Co. (2005), an adaptation of Dibyendu Palit's story, Mukhabhinoy, and directed by theatre director, Shyamanand Jalan and with Ashish Vidyarthi and Pawan Malhotra as leads.
He was the brother of acclaimed cartoonist and humourist Mangesh Tendulkar.


Tendulkar died in Pune on 19 May 2008,[16] battling the effects of the rare autoimmune disease of myasthenia gravis.


Tendulkar's son Raja and wife Nirmala had died in 2001; his daughter Priya Tendulkar died the next year (2002) of a heart attack following a long battle with breast cancer.


Awards
Tendulkar won Maharashtra State government awards in 1969 and 1972; and Mahārāshtra Gaurav Puraskār in 1999. He was honoured with the Sangeet Nātak Akademi Award in 1970, and again in 1998 with the Academy's highest award for "lifetime contribution", the Sangeet Natak Akademi Fellowship ("Ratna Sadasya").In 1984, he received the Padma Bhushan award from the Government of India for his literary accomplishments.


In 1977, Tendulkar won the National Film Award for Best Screenplay for his screenplay of Shyām Benegal's movie, Manthan (1976). He has written screenplays for many significant art movies, such as Nishānt, Ākrosh, and Ardh Satya.


A comprehensive list of awards is given below:


1970 Sangeet Nātak Akademi Award
1970 Kamaladevi Chattopadhyay Award
1977 National Film Award for Best Screenplay: Manthan
1981 Filmfare Best Screenplay Award: Aakrosh
1981 Filmfare Best Story Award: Aakrosh
1983 Filmfare Best Screenplay Award: Ardh Satya
1984 Padma Bhushan
1993 Saraswati Samman
1998 Sangeet Natak Akademi Fellowship
1999 Kalidas Samman
2001 Katha Chudamani Award
2006 The Little Magazine SALAM Award[32]
Bibliography
Novels
Kādambari: Ek (Novel: One) (1996)
Kādambari: Don (Novel: Two) (2005)
Short story anthologies
Dwandwa (Duel) (1961)
Phulāpākhare (Butterflies) (1970)
Plays
Gruhastha (Householder) (1947)
Shrimant (The Rich) (1956)
Mānoos Nāwāche Bet (An Island Named 'Man') (1958)
Thief! Police!
Bāle Miltāt (1960)
Gidhāde (The Vultures) (1961)
Pātlāchyā Poriche Lagin (Marriage of a Village Mayor's Daughter) (1965)
Shantata! Court Chalu Aahe(Hindi: Khāmosh! Adālat Jāri Hai) (Silence! The Court is in Session) (1967)
Ajgar Ani Gandharwa (A Boa Constrictor and "Gandharwa")
Sakharam Binder (Sakhārām, the Book-Binder) (1972)
Kamalā ("Kamala") (1981)
Mādi [in Hindi]
Kanyādān (Giving Away of a Daughter in Marriage) (1983)
Anji
Dāmbadwichā Mukābalā (Encounter in Umbugland)
Ashi Pākhare Yeti (Hindi: Panchi Aise Aate Hain) (Thus Arrive the Birds)
Kutte
Safar/Cyclewallah (The Cyclist) (1991)
The Masseur (2001)
Pāhije Jātiche (It Has to Be in One's Blood)
Jāt Hi Poochho Sādhu Ki (Ask a Fakir's Lineage)
Mājhi Bahin (My Sister)
Jhālā Ananta Hanumanta ("Infinite" Turned "Hanumanta")
Footpāyrichā Samrāt (Sidewalk Emperor)
Mitrāchi Goshta (A Friend's Story) (2001)
Anand Owari [A play based on a novel by D. B. Mokashi]
Bhāu MurārRāo
Bhalyākākā
Mee Jinkalo Mee Haralo (I won, I Lost)
His Fifth Woman [in English] (2004)
Bebi
Mita ki kahani "(Mita's Story)
Musicals
Ghashiram Kotwal (Ghashiram, the Constable) (1972)
Translations
Mohan Rakesh's Adhe Adhure (originally in Hindi)
Girish Karnad's Tughlaq (originally in Kannada) Popular Prakashan Pvt. Ltd. ISBN 81-7185-370-6.
Tennessee Williams' A Streetcar Named Desire (originally in English)
Tendulkar's works available in English
Silence! The Court Is in Session (Three Crowns). Priya Adarkar (Translator), Oxford University Press, 1979. ISBN 0-19-560313-3.
Ghashiram Kotwal, Sangam Books, 1984 ISBN 81-7046-210-X.
The Churning, Seagull Books, India, 1985 ISBN 0-85647-120-8.
The Threshold: (Umbartha - Screenplay), Shampa Banerjee (Translator), Sangam Books Ltd.,1985 ISBN 0-86132-096-4.
Five Plays (Various Translators), Bombay, Oxford University Press, 1992 ISBN 0-19-563736-4.
The Last Days of Sardar Patel and The Mime Players: Two Screen Plays New Delhi, Permanent Black, 2001 ISBN 81-7824-018-1.
Modern Indian Drama: An Anthology Sāhitya Akademi, India, 2001 ISBN 81-260-0924-1.
Mitrāchi Goshta : A Friend’s Story: A Play in Three Acts Gowri Ramnarayan (Translator). New Delhi, Oxford University Press, 2001 ISBN 0-19-565317-3.
Kanyādān, Oxford University Press, India, New Ed edition, 2002 ISBN 0-19-566380-2.
Collected Plays in Translation New Delhi, 2003, Oxford University Press. ISBN 0-19-566209-1.
The Cyclist and His Fifth Woman: Two Plays by Vijay Tendulkar Balwant Bhaneja (Translator), 2006 Oxford India Paperbacks ISBN 0-19-567640-8.
Filmography
Screenplays
Shantata! Court Chalu Aahe (Silence! The Court Is in Session) (1972)
Nishant (End of Night) (1975)
Samna (Confrontation) (1975)
Manthan (Churning) (1976)
Sinhasan (Throne) (1979)
Gehrayee (The Depth) (1980)
Aakrosh (Cry of the Wounded) (1980)
Akriet (Unimaginable) (1981)
Umbartha (The Threshold) (1981)
Ardh Satya (Half Truth) (1983)
Kamala (Kamala) (1984)
Sardar (1993)
Yeh Hai Chakkad Bakkad Bumbe Bo (2003)
Eashwar Mime Co. (The Mime Players) (2005)