पीरू सिंह (जन्म- 20 मई, 191)

May 20, 2017

पीरू सिंह (अंग्रेज़ी: Piru Singh, 6 राजपूताना राइफ़ल्स, नं. 2831592; जन्म- 20 मई, 1918, झुंझुनू ज़िला, राजस्थान; मृत्यु- 18 जुलाई, 1948, तिथवाल, कश्मीर) भारतीय सेना के वीर अमर शहीदों में एक थे। कश्मीर घाटी के युद्ध में सक्रिय रूप से जूझते हुए उन्होंने पीरकांती और लेडीगनी ठिकानों पर अपनी फ़तेह हासिल की थी। वर्ष 1948 में दारापारी के युद्ध में पीरू सिंह ने वीरगति प्राप्त की। उनकी वीरता और बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैनिक सम्मान "परमवीर चक्र" से सम्मानित किया गया था।


जन्म तथा शिक्षा
पीरू सिंह का जन्म 20 मई, 1918 को राजस्थान के झुंझुनू ज़िले के बेरी गाँव में हुआ था। उनके पिता के तीन पुत्र तथा चार पुत्रियाँ थीं। पीरू सिंह अपने भाइयों में सबसे छोटे थे। सात वर्ष की आयु में उन्हें स्कूल भेजा गया, लेकिन पीरू सिंह का मन स्कूली शिक्षा में नहीं लगा। स्कूल में एक साथी से उनका झगड़ा हो गया था। तब स्कूल के अध्यापक ने उन्हें डाँट लगाई। पीरू सिंह ने भी अपनी स्लेट वहीं पर पटकी और भाग गये। इसके बाद वे कभी पलट कर स्कूल नहीं गये।


स्कूली शिक्षा में मन नहीं लगने पर पीरू सिंह के पिता ने उन्हें खेती बाड़ी में लगा लिया। वह एक सम्पन्न किसान थे। खेती में पीरू सिंह ने अपनी रुचि दिखाई। वह अपने पिता की भरपूर मदद किया करते थे। उन्होंने किसानी का कार्य अच्छी तरह से सीख लिया था। किसानी के अतिरिक्त कई प्रकार के साहसिक खेलों में भी उनका बहुत मन लगता था। शिकार करने के तो वह बचपन से ही शौकीन रहे थे। अपने इस शौक़ के कारण वह कई बार घायल भी हुए थे।


शिकार के शौक़ ने ही पीरू सिंह को सेना में आने और फौजी बनने के लिए प्रेरित किया था। 1936 को पीरू सिंह ने फौज में कदम रखा। उन्हें 10/1st पंजाब में प्रशिक्षण के लिए लिया गया। फिर 1 मई, 1937 को उन्हें 5/1st पंजाब में नियुक्त कर लिया गया। फौज में आने के बाद ही पीरू सिंह के चरित्र में आश्चर्यजनक बदलाव आया। स्कूल में उन्हें पढ़ाई से चिढ़ थी, लेकिन फौज में वह पढ़ाई की ओर से बेहद गंभीर सैनिक सिद्ध हुए। कुछ ही वर्षों में उन्होंने 'इंडियन आर्मी फर्स्ट क्लास सर्टिफिकेट ऑफ़ एजुकेशन' सफलतापूर्वक पा लिया।


अपनी शिक्षा के आधार पर 17 अगस्त, 1940 को पीरू सिंह लांस नायक के रूप में पदोन्नत हो गए। इसी दौरान उन्होंने उत्तर-पश्चिम सीमा पर युद्ध में भी भाग लिया। मार्च, 1941 में वह नायक बनाये गए। सितम्बर, 1941 को वह शिक्षा के बल पर ही पंजाब रेजिमेंटल सेंटर में इंस्ट्रक्टर बने, जहाँ वह अक्टूबर, 1945 तक कार्य करते रहे। फ़रवरी, 1942 में वे हवलदार के रूप में पदोन्नत हुए। फिर मई, 1943 में वह कम्पनी हवलदार मेजर बन गये। उनकी तरक्की का यह रुझान हमेशा यह बताता रहा कि पीरू सिंह एक कर्मठ, बहादुर और जिम्मेदार फौजी हैं।


वर्ष 1947-1948 में जम्मू-कश्मीर क्षेत्र, जो लड़ाई का मैदान बन गया था, उसके पीछे ब्रिटिश राज द्वारा 3 जून, 1947 को की गई वह घोषणा थी, जो उन्होंने देश के विभाजन के साथ-साथ की थी। दरअसल, वह एक चाल थी, जो ब्रिटिश राज की कुटिलता को उजागर कर गई थी। वह भी तब, जब वह भारत को स्वतंत्र करने का निर्णय बाकायदा घोषित कर चुके थे। ब्रिटिश राज ने प्रस्ताव किया था कि देश के विभाजन के बाद अखण्ड भारत की सभी रियासतें यह चुनने के लिए स्वतंत्र हैं कि वह भारत में रहना चाहती हैं या पाकिस्तान से जुड़ना चाहती हैं या फिर उन्हें स्वतंत्र रहना ही पसन्द है। इनमें से जो रियासतें स्वतंत्र रहना चाहती थीं, उनमें महाराजा हरिसिंह भी थे, जिनका राज्य जम्मू-कश्मीर में था। उन्होंने इसके निर्णय करने की प्रक्रिया में जनमत जुटाना पसन्द किया, जिसके लिए उन्हें कुछ समय चाहिए था।


हरिसिंह ने इसके लिए भारत तथा पाकिस्तान से कुछ समय ठहरने का निवेदन किया। भारत ने उनके इस निवेदन को मान लिया, लेकिन पाकिस्तान तो बस हर हाल में कश्मीर को पाना चाहता था। उसने महाराजा हरिसिंह के निवेदन को नहीं माना। पाकिस्तान ने एक रणनीति के तहत कश्मीर की वह आपूर्ति रोक दी, जो उसके क्षेत्र से कश्मीर हमेशा पहुँचती थी। इस आपूर्ति में राशन, तेल, ईधन आदि की बहुत ही आवश्यक सामग्री थीं। इसके बाद पाकिस्तान ने पूरे सैन्य बल के साथ कश्मीर पर हमला कर दिया। उसका इरादा महाराजा हरिसिंह पर दबाव डालने का था कि वह पाकिस्तान के पक्ष में अपना मत प्रकट करें और पाकिस्तान के साथ जुड़ जायें। लेकिन पाकिस्तान को निराशा ही हाथ आई, क्योंकि महाराजा हरिसिंह ने भारत के पक्ष में मत प्रकट किया और भारत से मदद की गुहार की। ऐसी स्थिति में अब भारत के लिए मदद करना आसान था, क्योंकि महाराजा की सहमति से जम्मू-कश्मीर भारत का हो चुका था। 26 अक्टूबर, 1947 को महाराजा हरिसंह ने भारत के पक्ष में अपना मत रखा और 31 अक्टूबर को भारत इस युद्ध में पाकिस्तान से मुकाबले के लिए आ खड़ा हुआ। यह युद्ध कई मोर्चों पर एक साथ लड़ा गया। उनमें से एक मोर्चा दारापारी का था, जहाँ कम्पनी हवलदार पीरू सिंह नियुक्त थे।


उत्तरी तिथवाल की 'डी' कम्पनी में पीरू सिंह हवलदार मेजर के रूप में नियुक्त थे और इस कम्पनी को जिम्मेदारी सौंपी गई थी कि वह पहाड़ी पर जमी दुश्मन की टुकड़ी पर हमला करके उस पर काबू कर ले। दुश्मन ने बहुत सलीके से मीडियम मशीनगनें लगा कर अपनी रणनीति जमा रखी थी और उसकी ओर से वह सब रास्ते निशाने पर थे, जिनके जरिए उन पर हमला बोला जा सकता था। दुश्मन के बंकरों से ग्रेनेड फेंके जा रहे थे। हवलदार मेजर कम्पनी की एकदम अग्रिम पंक्ति में आगे बढ़ रहे थे। पीरू सिंह ने देखा कि उनकी आधे से ज्यादा टुकड़ी तबाह हो चुकी है, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पूरे जोश से युद्धनाद करते हुए उन्होंने अपने बचे हुए जवानों का हौसला बढ़ाया और तेजी से दुश्मन के निकटमत मीडियम मशीनगन दल की ओर बढ़ गए। फटते हुए ग्रेनेड की किर्चें पीरू सिंह के कपड़ों और शरीर को चीरते हुए निकलती जा रही थीं, लेकिन पीरू सिंह को इसकी जरा भी परवाह नहीं थी और वह अपनी हिफाजत की चिन्ता किए बगैर आगे बढ़ रहे थे। उनके शरीर से ख़ून बह रहा था, लेकिन उनका ध्यान इस ओर नहीं था। वह तो अपना सारा ध्यान बस लक्ष्य को पाने में लगा रहे थे। उन्होंने उत्तेजना से भरकर एक छलांग दुश्मन के उस मीडियम मशीनगन के दस्ते पर लगाई और बैनेट से भेदते हुए उन्हें मौत की नींद सुला दिया।


इसी समय पीरू सिंह को एहसास हुआ कि वह अपनी टुकड़ी में अकेले ही बचे हैं और एक मात्र योद्धा हैं। उनके शेष साथी या तो मौत की नींद सो गए हैं या बुरी तरह घायल हैं। अचानक एक ग्रेनेड आकर सीधे उनके चेहरे पर लगा। उनका चेहरा और आँखें ख़ून से भीग गईं। इसके बावजूद उन्होंने रेंगकर लुढ़कते हुए, ग्रेनेड की परवाह किए बगैर दुश्मन की दूसरी पोजीशन की ओर कूच कर दिया। पीरू सिंह ने पूरे जोश से युद्ध घोष किया और दूसरी खाई में छिपे दुश्मनों पर भी संगीन से वार किया और दो सैनिकों को ठिकाने लगा दिया। उनके इस हमले का सारा नज़ारा उनकी 'सी' कम्पनी के कमाण्डर ने देखा, जो पीरू सिंह की कम्पनी की गोलीबारी में मदद कर रहा था। इसी घायल अवस्था में हवलदार पीरू सिंह दूसरी खाई से निकल कर दुश्मन के तीसरे बंकर की ओर बढ़े। इसी वक्त एक गोली आकर सीधे उनके सिर में लगी और उन्हें दुश्मन की खाई से टकरा कर गिरते देखा गया। यकायक दुश्मन को धमाके की आवाज आई, जिससे पता चला कि पीरू सिंह का ग्रेनेड अपना काम कर गया। ठीक इसी समय पीरू सिंह ने भी गोली को झेलकर प्राण त्याग दिये।


पीरू सिंह ने अपनी बहादुरी भरे कारनामे के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन वह अपने साथियों के आगे एक जिन्दा मिसाल छोड़ गए कि अकेले दम पर भी लड़ी गई लड़ाई हिम्मत के बल पर क्या नतीजा दिखाती है। युद्ध में वे वीरगति को प्राप्त हुए। जिस हिम्मत, बहादुरी और सूझ-बूझ से हवलदार मेजर पीरू सिंह ने मोर्चा संभाला, उसके लिए उन्हें मरणोपरान्त "परमवीर चक्र" से सम्मानित किया गया।


Company Havildar MajorPiru Singh Shekhawat (20 May 1918 – 18 July 1948) was an Indian Army non-commissioned officer, awarded the Param Vir Chakra (PVC), India's highest military decoration.


Singh enrolled in the British Indian Army on 20 May 1936, and was assigned to the 1st Punjab Regiment. Between 1940 and 1945, he served on the North-West Frontier and as an instructor, before deploying to Japan as part of the British Commonwealth Occupation Force. After independence, he took part in the Indo-Pakistani War of 1947, serving with the Indian Army's 6th Rajputana Rifles. During the battle, Singh was part of the leading section of a company that was assigned to capture a Pakistani post at Tithwal, in Jammu and Kashmir. Soon after their attack was launched, the company suffered heavy casualties. In time, Singh successfully occupied a Pakistani medium machine-gun post. But, by that time, the entire company lay dead or wounded. Singh was left alone to achieve the objective. He moved out and lobbed grenades at the next enemy post. Before moving to another trench, he received a mortal bullet wound to the head.


Piru Singh was born on 20 May 1918, in village Beri, Jhunjhunu, Rajasthan. He was the son of Lal Singh. His family consisted of seven children—three brothers and four sisters—with Singh being the youngest son. As a young boy, Singh always hated school, as he was unable to cope with the restricted environment. One day, after being scolded by his class teacher for quarreling with one of his classmates, Singh ran away, and never returned to school. After that, Singh continued to help his parents in their farm, and grew up to be well-built and handsome youth. Shikar, a local Indian sport, was his favourite game.[3] Though Singh wanted to join the army from his childhood, he was rejected twice, as he was too young, before he was accepted at the age of eighteen.


Piru Singh Shekhawat was enrolled in the 10th Battalion of the 1st Punjab Regiment on 20 May 1936 at Jhelum. After completion of his training, on 1 May 1937, Singh was posted to the 5th Battalion of the same regiment. Despite his earlier hostility to schooling, Singh took education seriously and passed the Indian Army Class Certificate of Education. After clearing a few other tests, he was promoted to lance naik (lance corporal) on 7 August 1940. During his tenure with the 5th Battalion of the 1st Punjab, he saw action on the North-West Frontier.


In March 1941, he was promoted to naik (corporal), and was posted as an instructor to the Punjab Regimental Centre at Jhelum in September. In February 1942, he was promoted to havildar (sergeant). Singh was an outstanding sportsman, he represented his regiment in hockey, basketball and cross-country running at inter-regimental and national level championships. In May 1945, he was promoted to company havildar major (company sergeant major). He served as an instructor until October 1945. After the end of the Second World War, he was sent to Japan as part of the British Commonwealth Occupation Force, where he served until September 1947. Following the partition, Singh was transferred to the 6th Battalion of the Rajputana Rifles.