बछेंद्री पाल (जन्म: 24 मई, 1954)

May 24, 2017

बछेंद्री पाल (जन्म: 24 मई, 1954) विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला। 'पहाड़ों की रानी' बछेंद्री पाल पर्वत शिखर एवरेस्ट की ऊंचाई को छूने वाली दुनिया की 5वीं महिला पर्वतारोही हैं। उन्होंने यह कारनामा 23 मई 1984 को दिन के 1 बजकर सात मिनट पर किया।


जीवन परिचय
बछेंद्री पाल ने उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी की पहाड़ों की गोद में सन् 1954 को जन्म लिया। भारत के उत्तराखंड राज्य के एक खेतिहर परिवार में जन्मी बछेंद्री ने बी.एड. किया। स्कूल में शिक्षिका बनने के बजाय पेशेवर पर्वतारोही का पेशा अपनाने पर बछेंद्री को परिवार और रिश्तेदारों का विरोध झेलना पड़ा।


भारतीय अभियान दल के सदस्य के रूप में माउंट एवरेस्ट पर आरोहण के कुछ ही समय बाद उन्होंने इस शिखर पर महिलाओं की एक टीम के अभियान का सफल नेतृत्व किया। 1994 में बछेंद्री ने महिलाओं के, गंगा नदी में हरिद्वार से कलकत्ता तक 2,500 किमी लंबे नौका अभियान का नेतृत्व किया। हिमालय के गलियारे में भूटान, नेपाल, लेह और सियाचिन ग्लेशियर से होते हुए कराकोरम पर्वत शृंखला पर समाप्त होने वाला 4,000 किमी लंबा अभियान उनके द्वारा इस दुर्गम क्षेत्र में प्रथम महिला अभियान का प्रयास था।


बछेंद्री पाल भारत की एक 'इस्पात कंपनी टाटा स्टील' में कार्यरत हैं, जहां वह चुने हुए लोगो को रोमांचक अभियानों का प्रशिक्षण देती हैं।


बछेंद्री के लिए पर्वतारोहण का पहला मौक़ा 12 साल की उम्र में आया, जब उन्होंने अपने स्कूल की सहपाठियों के साथ 400 मीटर की चढ़ाई की। यह चढ़ाई उन्होंने किसी योजनाबद्ध तरीके से नहीं की थी। दरअसल, वे स्कूल पिकनिक पर गई हुए थीं। चढ़ाई चढ़ती गईं। लेकिन तब तक शाम हो गई। जब लौटने का खयाल आया तो पता चला की उतरना सम्भव नहीं है। ज़ाहिर है, रातभर ठहरने के लिये उन के पास पूरा इंतज़ाम नहीं था। बगैर भोजन और टैंट के उन्होंने खुले आसमान के नीचे रात गुजार दी।[1]


मेधावी और प्रतिभाशाली होने के बावजूद उन्हें कोई अच्छा रोज़गार नहीं मिला। जो मिला वह अस्थायी, जूनियर स्तर का था और वेतन भी बहुत कम था। इस से बछेंद्री को निराशा हुई और उन्होंने नौकरी करने के बजाय 'नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग' कोर्स के लिये आवेदन कर दिया। यहाँ से बछेंद्री के जीवन को नई राह मिली। 1982 में एडवांस कैम्प के तौर पर उन्होंने गंगोत्री (6,672 मीटर) और रूदुगैरा (5,819) की चढ़ाई को पूरा किया। इस कैम्प में बछेंद्री को ब्रिगेडियर ज्ञान सिंह ने बतौर इंस्ट्रक्टर पहली नौकरी दी।


1984 में भारत का चौथा एवरेस्ट अभियान शुरू हुआ। दुनिया में अब तक सिर्फ 4 महिलाऐं एवरेस्ट की चढ़ाई में कामयाब हो पाई थीं। 1984 के इस अभियान में जो टीम बनी, उस में बछेंद्री समेत 7 महिलाओं और 11 पुरुषों को शामिल किया गया था। 1 बजे 29,028 फुट (8,848 मीटर) की ऊंचाई पर 'सागरमाथा (एवरेस्ट)' पर भारत का झंडा लहराया गया। इस के साथ एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक क़दम रखने वाले वे दुनिया की 5वीं महिला बनीं। केंद्र सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।[1]


उपलब्धियां
बछेन्द्री पाल भारत की प्रथम ऐसी महिला हैं जिन्होंने एवरेस्ट पर्वत पर विजय प्राप्त की। उनका स्थान विश्व में पांचवा है।[2]
बछेन्द्री पाल ने केवल महिलाओं के पर्वतारोही दल का एवरेस्ट अभियान में नेतृत्व किया।
1994 में बछेन्द्री पाल ने गंगा राफ्टिंग की। यह राफ्टिंग उन्होंने हरिद्वार से कलकत्ता तक महिला दल का नेतृत्व करते हुए की।
1997 में बछेन्द्री पाल ने केवल महिला दल का नेतृत्व करते हुए हिमालय पर्वतारोहण किया।
बछेन्द्री पाल का नाम 1990 में ‘गिनीज बुक ऑफ़ रिकार्ड’ में शामिल किया गया।
1985 में उन्हें ‘कलकत्ता स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट एसोसिएशन पुरस्कार’ प्रदान किया गया।
1985 में उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया।
1986 में उन्हें कलकत्ता ‘लेडीज स्टडी ग्रुप’ अवॉर्ड दिया गया।
आई.एम.एफ. द्वारा पर्वतारोहण में सर्वश्रेष्ठ होने का स्वर्ण पदक दिया गया।
1986 में उन्हें ‘अर्जुन पुरस्कार’ दिया गया।
1994 में बछेन्द्री पाल को ‘नेशनल एडवेंचर अवॉर्ड’ दिया गया।
उन्हें 1995 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘यश भारती’ पुरस्कार प्रदान किया गया।
1997 में ‘लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड’ में उनका नाम दर्ज किया गया।
1997 में गढ़वाल युनिवर्सिटी द्वारा उन्हें आनरेरी डी. लिट. की डिग्री प्रदान की गई।
1997 में बछेन्द्री पाल को ‘महिला शिरोमणि अवॉर्ड’ दिया गया ।
वह आई.एम.एफ., एच.एम.आई., एडवेंचर फाउंडेशन जैसी संस्थाओं की कार्यसमिति की सदस्या हैं।
वह सेवन सिस्टर्स एडवेंचर क्लब, उत्तरकाशी तथा आल इंडिया वीमेन्स जूडो-कराटे फेडरेशन की वाइस चेयरमेन हैं।
वह ‘लायन्स क्लब ऑफ इंडिया’ की प्रेसिडेंट हैं।
वह विश्व के अनेकों देशों में पर्वतारोहण सबंधी विषय पर भाषण देती रहती हैं।
बछेन्द्री पाल ने एक पुस्तक भी लिखी है, जिसका नाम है ‘एवरेस्ट-माई जर्नी टू द टॉप’।


'Bachendri Pal' was biharn (born 24 May 1954) is an Indian mountaineer, who in 1984 became the first Indian woman to reach the summit of Mount Everest.


Bachendri Pal belonged to a family of very moderate means. She was born on 24 May 1954 in a village in the Himalayas named Nakuri in Uttarkashi, District of Garhwal, what is now Uttarakhand, a state in the northern part of India. She was one of seven children to Hansa Devi and Shri Kishan Singh Pal – a border tradesman who supplied groceries from India to Tibet. She was born only five days before the first anniversary of the original ascension of Mount Everest by Tenzing Norgay and Edmund Hillary. She completed her M.A. and B.Ed. from D.A.V.Post Graduate College Dehradun. She got her first taste of mountaineering thrill at the age of 12, along with her friends, scaled a 13,123 ft (3,999.9 m) high peak during a school picnic. On the invitation of her school principal, she was sent to college for higher studies and became the first girl to 1982, during her course at NIM, she climbed Mt. Gangotri 21,900 ft (6,675.1 m) and Mt. Rudragaria 19,091 ft (5,818.9 m). In that time, she got employment as an instructor at the National Adventure Foundation (NAF), which had set up an adventure school for training women to learn mountaineering.


Pal encountered stiff opposition from her family and relatives when she decided to opt for a career as a professional mountaineer rather than as a schoolteacher. She soon found success in her chosen field, however.


After summitting a number of smaller peaks, she was selected to join India's first mixed-gender team to attempt an expedition to Mount Everest in 1984.


In 1984, India had scheduled its fourth expedition, christened Everest'84, to Mount Everest. Bachendri Pal was selected as one of the members of the elite group of six Indian women and eleven men who were privileged to attempt an ascent to the Mount Everest (Sagarmatha in Nepalese). The news filled them with a sense of ecstasy and excitement.[citation needed] The team was flown to Kathmandu, the capital of Nepal, in March 1984, and from there the team moved onwards. Recalling her first glimpse of the Mount Everest, Bachendri once reminisced: "We the hill people have always worshiped the mountains…my overpowering emotion at this awe-inspiring spectacle was, therefore, devotional".The team commenced its ascent in May 1984. Her team almost met disaster when an avalanche buried its camp, and more than half the group abandoned the ascent because of injury or fatigue. Bachendri Pal and the remainder of the team pressed on to reach the summit.[3] Bachendri Pal recalls this accident: "I was sleeping in one of the tents with my teammates at Camp III at an altitude of 24,000 ft (7,315.2 m). On the night of 15–16 May 1984, at around 00:30 hours IST, I was jolted awake; something had hit me hard; I also heard a deafening sound and soon after I found myself being enveloped within a very cold mass of material".


On 22 May 1984, Ang Dorjee (the Sherpa Sirdar) and some other climbers joined the team to ascend to the summit of Mount Everest; Bachendri was the only woman in this group. They reached the South Col and spent the night there at Camp IV at the altitude of 26,000 ft (7,924.8 m). On 23 May 1984, early morning at 6:20 a.m., they continued the ascent, climbing "vertical sheets of frozen ice"; cold winds were blowing at the speed of about 100 km per hour and temperatures touching minus 30 to 40 degrees Celsius. On 23 May 1984, the team reached the summit of Mount Everest at 1:07 p.m. IST and Bachendri Pal created history. She achieved this feat on the day before her 30th birthday, and six days before the 31st anniversary of the first ascension to Mount Everest.


Awards and accolades
Bachendri Pal has been conferred with following awards and accolades:


Gold Medal for Excellence in Mountaineering by the Indian Mountaineering Foundation (1984)
Padma Shri – the fourth highest civilian award in the Republic of India (1984)
Gold Medal by the Department of Education, Government of Uttar Pradesh, India (1985)
Arjuna Award by the Government of India (1986)
Calcutta Ladies Study Group Award (1986)
Listed in the Guinness Book of World Records (1990)
National Adventure Award by the Government of India (1994)
Yash Bharti Award by the Government of Uttar Pradesh, India (1995)
Honorary Doctorate from the Hemwati Nandan Bahuguna Garhwal University (formerly known as Garhwal University) (1997)
She is the first recipient of Virangana Lakshmibai Rashtriya Samman 2013–14, which was given by the Ministry of Culture, Government of Madhya Pradesh, India at Gwalior on 18 June 2013 for her personal achievement in Adventure sports and women's upliftment in the country.