पृथ्वीराज कपूर (मृत्यु: 29 मई, 1972 )

May 29, 2017

पृथ्वीराज कपूर (जन्म: 3 नवंबर, 1906 पंजाब, पाकिस्तान (पहले भारत में) - मृत्यु: 29 मई, 1972 बंबई, महाराष्ट्र हिंदी फ़िल्म और रंगमंच अभिनय के इतिहास पुरुष, जिन्होंने बंबई में पृथ्वी थिएटर स्थापित किया। भारतीय सिनेमा जगत के युगपुरुष पृथ्वीराज कपूर का नाम एक ऐसे अभिनेता के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने अपनी कड़क आवाज, रोबदार भाव भंगिमाओं और दमदार अभिनय के बल पर लगभग चार दशकों तक सिने दर्शकों के दिलों पर राज किया।


जीवन परिचय
पृथ्वीराज ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लायलपुर और लाहौर (पाकिस्तान) में रहकर पूरी की। पृथ्वीराज के पिता दीवान बशेस्वरनाथ कपूर पुलिस विभाग में सब इंस्पेक्टर के रूप में कार्यरत थे। बाद में उनके पिता का तबादला पेशावर में हो गया। पृथ्वीराज ने अपनी आगे की पढ़ाई पेशावर के एडवर्ड कॉलेज से की। साथ ही उन्होंने एक वर्ष तक क़ानून की पढ़ाई भी की लेकिन बीच मे ही उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी, क्योंकि उस समय तक उनका रुझान थिएटर की ओर हो गया था। उनकी अंतिम फ़िल्मों में राज कपूर की आवारा (1951), कल आज और कल, जिसमें कपूर परिवार की तीन पीढ़ियों ने अभिनय किया था और ख़्वाजा अहमद अब्बास की 'आसमान महल' भी थी। एक अभिनेता और प्रतिभा पारखी के रूप में उनकी दुर्जेय प्रतिष्ठा मूल रूप से उनके शान्दार फ़िल्मी जीवन के पूर्वार्द्ध पर आधारित है। फ़िल्मों में अपने अभिनय से सम्मोहित करने वाले और रंगमंच को नई दिशा देने वाली यह महान् हस्ती का 29 मई, 1972 को इस दुनिया से रुखसत हो गए। उन्हें मरणोपरांत दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।


 पृथ्वीराज कपूर का महज 18 वर्ष की उम्र में ही विवाह हो गया और वर्ष 1928 में अपनी चाची से आर्थिक सहायता लेकर पृथ्वीराज कपूर अपने सपनों के शहर मुंबई पहुंचे।


पृथ्वीराज कपूर 1928 में मुंबई में इंपीरियल फ़िल्म कंपनी से जुडे़ थे। वर्ष 1930 में बीपी मिश्रा की फ़िल्म 'सिनेमा गर्ल' में उन्होंने अभिनय किया। इसके कुछ समय पश्चात् एंडरसन की थिएटर कंपनी के नाटक शेक्सपियर में भी उन्होंने अभिनय किया। लगभग दो वर्ष तक फ़िल्म इंडस्ट्री में संघर्ष करने के बाद पृथ्वीराज को वर्ष 1931 में प्रदर्शित फ़िल्म आलम आरा में सहायक अभिनेता के रूप में काम करने का मौक़ा मिला।


वर्ष 1933 में पृथ्वीराज कपूर कोलकाता के मशहूर न्यू थिएटर के साथ जुड़े। वर्ष 1933 में प्रदर्शित फ़िल्म 'राज रानी' और वर्ष 1934 में देवकी बोस की फ़िल्म 'सीता' की कामयाबी के बाद बतौर अभिनेता पृथ्वीराज अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। इसके बाद पृथ्वीराज ने न्यू थिएटर की निर्मित कई फ़िल्मों मे अभिनय किया। इन फ़िल्मों में 'मंजिल' 1936 और 'प्रेसिडेंट' 1937 जैसी फ़िल्में शामिल हैं। वर्ष 1937 में प्रदर्शित फ़िल्म विद्यापति में पृथ्वीराज के अभिनय को दर्शकों ने काफ़ी सराहा। वर्ष 1938 में चंदू लाल शाह के रंजीत मूवीटोन के लिए पृथ्वीराज अनुबंधित किए गए। रंजीत मूवी के बैनर तले वर्ष 1940 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पागल' में पृथ्वीराज कपूर अपने सिने कैरियर में पहली बार एंटी हीरो की भूमिका निभाई। इसके बाद वर्ष 1941 में सोहराब मोदी की फ़िल्म सिकंदर की सफलता के बाद पृथ्वीराज कामयाबी के शिखर पर जा पहुंचे। 
वर्ष 1944 में पृथ्वीराज कपूर ने अपनी खुद की थियेटर कंपनी पृथ्वी थिएटर शुरू की। पृथ्वी थिएटर में उन्होंने आधुनिक और शहरी विचारधारा का इस्तेमाल किया, जो उस समय के फारसी और परंपरागत थिएटरों से काफ़ी अलग था। धीरे-धीरे दर्शको का ध्यान थिएटर की ओर से हट गया, क्योंकि उन दिनों दर्शकों के उपर रूपहले पर्दे का क्रेज कुछ ज़्यादा ही हावी हो चला था। सोलह वर्ष में पृथ्वी थिएटर के 2662 शो हुए जिनमें पृथ्वीराज ने लगभग सभी शो में मुख्य किरदार निभाया। पृथ्वी थिएटर के प्रति पृथ्वीराज इस क़दर समर्पित थे कि तबीयत ख़राब होने के बावजूद भी वह हर शो में हिस्सा लिया करते थे। वह शो एक दिन के अंतराल पर नियमित रूप से होता था। एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनसे विदेश में जा रहे सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल का प्रतिनिधित्व करने की पेशकश की, लेकिन पृथ्वीराज ने नेहरू जी से यह कह उनकी पेशकश नामंजूर कर दी कि वह थिएटर के काम को छोड़कर वह विदेश नहीं जा सकते। पृथ्वी थिएटर के बहुचर्चित कुछ प्रमुख नाटकों में दीवार, पठान, 1947, गद्दार, 1948 और पैसा 1954 शामिल है। पृथ्वीराज ने अपने थिएटर के जरिए कई छुपी हुई प्रतिभा को आगे बढ़ने का मौक़ा दिया, जिनमें रामानंद सागर और शंकर जयकिशन जैसे बड़े नाम शामिल है।


आकर्षक व्यक्तित्व व शानदार आवाज़ के स्वामी पृथ्वीराज कपूर ने सिनेमा और रंगमंच दोनों माध्यमों में अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया हालांकि उनका पहला प्यार थिएटर ही था। उनके पृथ्वी थिएटर ने क़रीब 16 वर्षों में दो हज़ार से अधिक नाट्य प्रस्तुतियां कीं। पृथ्वी राज कपूर ने अपनी अधिकतर नाट्य प्रस्तुतियों मे महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। थिएटर के प्रति उनकी दीवानगी स्पष्ट थी। पृथ्वी थिएटर की नाट्य प्रस्तुतियों में सामाजिक जागरूकता के साथ ही देशभक्ति और मानवीयता को प्रश्रय दिया गया। वर्ष 1944 में स्थापित पृथ्वी थिएटर के नाटकों में यथार्थवाद और आदर्शवाद पर भी पर्याप्त ज़ोर दिया गया।


इसी दौरान पृथ्वीराज कपूर की मुग़ले आजम, हरिश्चंद्र तारामती, सिकंदरे आजम, आसमान, महल जैसी कुछ सफल फ़िल्में प्रदर्शित हुई। वर्ष 1960 में प्रदर्शित के. आसिफ की मुग़ले आजम में उनके सामने अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे, इसके बावजूद पृथ्वीराज कपूर अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म आसमान महल में पृथ्वीराज ने अपने सिने कैरियर की एक और न भूलने वाली भूमिका निभाई। इसके बाद वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म तीन बहुरानियां में पृथ्वीराज ने परिवार के मुखिया की भूमिका निभाई, जो अपनी बहुरानियों को सच्चाई की राह पर चलने केलिए प्रेरित करता है। इसके साथ ही अपने पुत्र रणधीर कपूर की फ़िल्म कल आज और कल में भी पृथ्वीराज कपूर ने यादगार भूमिका निभाई। वर्ष 1969 में पृथ्वीराज कपूर ने एक पंजाबी फ़िल्म नानक नाम जहां है में भी अभिनय किया। फ़िल्म की सफलता ने लगभग गुमनामी में आ चुके पंजाबी फ़िल्म इंडस्ट्री को एक नया जीवन दिया।


पचास के दशक में पृथ्वीराज कपूर की जो फ़िल्में प्रदर्शित हुईं उनमें शांताराम की दहेज 1950 के साथ ही उनके पुत्र राज कपूर की निर्मित फ़िल्म आवारा प्रमुख है। फ़िल्म आवारा में पृथ्वीराज कपूर ने अपने पुत्र राजकपूर के साथ अभिनय किया। साठ का दशक आते-आते पृथ्वीराज कपूर ने फ़िल्मों में काम करना काफ़ी कम कर दिया।
पृथ्वीराज को देश के सर्वोच्च फ़िल्म सम्मान दादा साहब फाल्के के अलावा पद्म भूषण तथा कई अन्य पुरस्कारों से भी नवाजा गया। उन्हें राज्यसभा के लिए भी नामित किया गया था l


Prithviraj Kapoor (3 November 1906;– 29 May 1972) was a pioneer of Indian theatre and of the Hindi film industry, who started his career as an actor in the silent era of Hindi cinema, associated with IPTA as one of its founding members and who founded the Prithvi Theatres, a travelling theatre company based in Mumbai, in 1944.


Born in Samundri, Samundri Tehsil, Lyallpur District, Punjab, British India (present-day Samundri, Samundri Tehsil, Faisalabad District, Punjab, Pakistan), and lived in the village Lasara, Punjab (India) he was also the patriarch of the Kapoor family of Hindi films, four generations of which, beginning with him, have played active roles in the Hindi film industry. However, his father, Basheshwarnath Nath Kapoor, also played a short role in his movie Awaara. The Government of India honoured him with the Padma Bhushan in 1969 and the Dadasaheb Phalke Award in 1971 for his contributions towards Indian cinema.


Kapoor was born on 3 November 1903, in a Punjabi Hindu family, in Samundri, Punjab Province in British India, in what today is the Punjab province of Pakistan. His father, Basheshwarnath Kapoor, served as a police officer in the Indian Imperial Police in the city of Peshawar; while his grandfather, Keshavmal Kapoor, was a Tehsildar in Samundri, Punjab, British India.Surinder Kapoor, the famous Bollywood producer and father of actor Anil Kapoor was a first cousin of Prithviraj Kapoor.


Kapoor began his acting career in the theatres of Lyallpur and Peshawar. In 1928, he moved to Bombay with a loan from an aunt. There he joined the Imperial Films Company. He acted as an extra in his first film, Do Dhari Talwar, though he went on to earn a lead role for his third film, titled Cinema Girl, in 1929.


After featuring in nine silent films, including Do Dhari Talwar, Cinema Girl,Sher-e-Arab and Prince Vijaykumar, Kapoor did a supporting role in India's first film talkie, Alam Ara (1931). His performance in Vidyapati (1937) was much appreciated.[by whom?] His best-known performance is perhaps as Alexander the Great in Sohrab Modi's Sikandar (1941). He also joined the Grant Anderson Theater Company, an English theatrical company that remained in Bombay for a year.Through all these years, Kapoor remained devoted to the theatre and performed on stage regularly. He developed a reputation as a very fine and versatile actor on both stage and screen.


Awards and honours


Prithvi Theatre Festival commemorating the birth centenary of Prithviraj Kapoor, in 2006.
In 1954, he was awarded the Sangeet Natak Akademi Fellowship, and in 1969, the Padma Bhushan by the Government of India. He remained Nominated Rajya Sabha Member for eight years.


He was posthumously awarded the Dadasaheb Phalke Award for the year 1971. He was the third recipient of that award, the highest accolade in Indian cinema.


Awards
1954: Sangeet Natak Akademi Fellowship by the Sangeet Natak Akademi
1956: Sangeet Natak Akademi Award by the Sangeet Natak Akademi
1969: Padma Bhushan by the Government of India
1972: Dadasaheb Phalke Award (Posthumous) for the year 1971, for his immense contribution to Indian theatre and cinema


Kapoor was aged 17 when he was married to the 14-year-old Ramsarni Mehra, a lady of his own community and similar background, in a match arranged by their parents. The marriage was harmonious and conventional. Ramsarni's brother, Jugal Kishore Mehra, would later enter films.


The couple's eldest child, Raj Kapoor, was born in December 1924. By the time Prithviraj moved to Mumbai in 1927, the couple were the parents of three children. In 1930, Ramsarni joined Prithviraj in Mumbai. The following year, while she was pregnant for the fourth time, two of their sons died in the space of one week. One of their children, Devinder (Devi), died of double-pneumonia while the other child, Ravinder (Bindi), died of poisoning in a freak incident when he swallowed rat-poison pills strewn in the garden.


The couple went on to have three more children: sons Shamsher Raj (Shammi) and Balbir Raj (Shashi) (who were to become famous actors and filmmakers in their own right), and daughter, Urmila Sial.


After his retirement, Prithviraj settled in a cottage called Prithvi Jhonpra near Juhu beach. The property was on lease, which was bought by Shashi Kapoor, and later converted into a small, experimental theatre, the Prithvi Theatre. Both Prithviraj and Ramsarni had cancer and died about a fortnight apart: Prithviraj died on 29 May 1972 and was followed by his wife on 14 June.


Selected filmography
Do Dhari Talwar (1928)
Cinema Girl (1929)
Alam Ara (1931)
Draupadi (1931)
Rajrani Meera (1933)
Daku Mansoor (1934)
Seeta (1934)
Manzil (1936)
Milap (1937)
President (1937)
Vidyapati (1937)
Dushman (1939)
Chingari (1940)
Sajani (1940)
Sikandar (1941)
Ishara (1943)
Maharathi Karna (1944)
Dahej (1950)
Awaara (1951)
Anand Math (1952)
Chhatrapati Shivaji (1953)[21]
Pardesi
Mughal-e-Azam (1960)
Rustom Sohrab (1963)
Gazal (1964)
Zindagi (1964)
Janwar (1965)
Sikandar-e-Azam (1965)
Daku Mangal Singh (1966)
Teen Bahuraniyan (1968)
Nanak Naam Jahaz Hai (1969)
Heer Raanjha (1970)
Sakshatkara - (Kannada), (1971)
Kal Aaj Aur Kal (1971)