ऋतुपर्णो घोष (मृत्यु- 30 मई, 2013))

May 30, 2017

ऋतुपर्णो घोष (जन्म- 31 अगस्त, 1963 - मृत्यु- 30 मई, 2013) बंगाली फ़िल्मों के प्रसिद्ध निर्देशक, लेखक और अभिनेता थे। 'चोखेर बाली', 'रेनकोट' और 'अबोहोमन' जैसी फ़िल्मों के लिए 'राष्ट्रीय पुरस्कार' विजेता ऋतुपर्णो घोष की ख्याति राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जगत में थी। उन्होंने और उनकी फ़िल्मों ने रिकॉर्ड बारह 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीते थे। ऋतुपर्णो घोष उन निर्देशकों में से एक थे, जो फ़िल्म को एक कला मानते थे। व्यवसाय या बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रखकर उन्होंने कभी फ़िल्में नहीं बनाईं। उनकी अपनी सोच थी, शैली थी और अपने मिजाज के अनुरूप ही ‍वे फ़िल्में बनाते थे। बहुत कम समय में ही उन्होंने अपनी एक ख़ास पहचान बना ली थी। घोष ने विज्ञापन की दुनिया से अपना व्यवसाय प्रारम्भ किया था और जल्द ही फ़िल्मों की ओर मुड़ गए थे। अपने 19 साल के फ़िल्मी करियर में ऋतुपर्णो घोष ने 19 फ़िल्मों का निर्देशन और तीन फ़िल्मों में अभिनय किया।



जन्म तथा शिक्षा


 जन्म 31 अगस्त, 1963 को कोलकाता, पश्चिम बंगाल में हुआ था। इनके पिता का नाम सुनील घोष था। सुनील घोष डॉक्युमेंट्री फ़िल्म मेकर और पैंटर थे। ऋतुपर्णो घोष को फ़िल्म मेकिंग की प्रेरणा अपने पिता से ही मिली थी। ऋतुपर्णो घोष ने अपनी प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा 'साउथ पॉइंट हाईस्कूल' से प्राप्त की। उन्होंने अपनी अर्थशास्त्र की डिग्री 'जादवपुर यूनिवर्सिटी', कोलकाता से प्राप्त की थी। आगे चलकर अपने आधुनिक विचारों को उन्होंने फ़िल्मों के जरिये पेश किया और जल्दी ही अपनी पहचान एक ऐसे फ़िल्म मेकर के रूप में बना ली, जिसने 'भारतीय सिनेमा' को समृद्ध किया। 'भारतीय सिनेमा' को अपनी सूझबूझ और फ़िल्मों के माध्यम से समृद्ध बनाने वाले ऋतुपर्णो घोष पैन्क्रियाटाइटिस से पीड़ित थे। 30 मई, 2013 को कोलकाता में सुबह के समय साढ़े सात बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया। उनकी आखिरी फ़िल्म 'चित्रांगदा' थी, जो हाल ही में मुंबई में हुए समलैंगिक फ़िल्म महोत्सव की क्लोज़िग फ़िल्म थी। इस महोत्सव के निर्देशक श्रीधर रंगायन का कहना था कि- "हमने एक ऐसा निर्देशक खोया है, जो समलैंगिक विषयों पर खुलकर, बिना डरे और बेहद ही संजीदगी से फ़िल्में बनाता था।"


विज्ञापन की दुनिया से अपना कैरियर शुरू करने वाले ऋतुपर्णो घोष ने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत बाल फ़िल्मों के निर्माण से की। वर्ष 1994 में बाल फ़िल्म 'हिरेर आंग्टी' के निर्देशन से उन्हें शोहरत मिलने लगी थी। इसके बाद 'उनिशे एप्रिल' के लिए उन्हें 1995 में 'राष्ट्रीय पुरस्कार' से नवाज़ा गया था। यह फ़िल्म प्रख्यात फ़िल्म निर्देशक इंगमार बर्गमन की 'ऑटम सोनाटा' से प्रेरित थी। इस फ़िल्म में ऋतुपर्णो घोष ने माँ-बेटी के तनावपूर्ण रिश्तों को बारीकी से रेखांकित किया था। एक कामकाजी महिला अपने व्यावसायिक कैरियर में सफल है, लेकिन अपनी पारिवारिक ज़िंदगी में वह असफल रहती है। इसका असर उसकी बेटी पर होता है और बेटी अपनी माँ से इस बात को लेकर नाराज है कि वह अपने व्यवसाय को कुछ ज़्यादा ही महत्त्व देती है। इस फ़िल्म में अपर्णा सेन, देबश्री राय और प्रसन्नजीत चटर्जी ने अभिनय किया था। इस फ़िल्म को सिने प्रेमियों ने खूब सराहा था। उनके जानने-पहचानने वाले लोग उन्हें 'ऋतु दा' के नाम से पुकारने लगे थे।


अपनी फ़िल्मों के माध्यम से ऋतुपर्णो घोष ने बहुत लोकप्रियता प्राप्त की। सारे बड़े फ़िल्मी कलाकार उनके साथ काम करने के लिए तुरंत राजी हो जाते थे, क्योंकि उनकी फ़िल्मों में काम करना गर्व की बात थी। रिश्तों की जटिलता और लीक से हट कर विषय उनकी फ़िल्मों की ख़ासियत होते थे। बांग्ला उनकी मातृभाषा थी और इस भाषा में वे सहज महसूस करते थे। इसलिए अधिकतर फ़िल्में उन्होंने बांग्ला भाषा में ही बनाईं। फ़िल्म फेस्टिवल में सिनेमा देखने वाले दर्शक और ऑफबीट फ़िल्मों के शौकीन ऋतु दा की फ़िल्मों का बेसब्री से इंतज़ार करते थे।


फ़िल्म 'हिरेर आंग्टी', जो कि एक बाल फ़िल्म थी, उसकी सफलता के बाद से ही ऋतुपर्णो घोष की फ़िल्मों को 'राष्ट्रीय पुरस्कार' मिलना आम बात हो गई। कभी कलाकारों को, कभी लेखकों तो कभी फ़िल्म को 'राष्ट्रीय पुरस्कार' मिलता। वर्ष 1999 में ऋतुपर्णो घोष द्वारा निर्देशित फ़िल्म 'बारीवाली' के लिए अभिनेत्री किरण खेर ने श्रेष्ठ अभिनेत्री का 'राष्ट्रीय पुरस्कार' हासिल किया था। 'बारीवाली' एक ऐसी महिला की कहानी थी, जिसके होने वाले पति की विवाह के एक दिन पहले ही मौत हो जाती है और इसके बाद वह एकांकी जीवन बिताती है। ऋतुपर्णो घोष ने कुल 19 फ़िल्में बनाईं और 12 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीते। ये पुरस्कार उनकी काबलियत को जाहिर करते हैं।
'उत्सव' (2000), 'तितली' (2002), 'शुभो महुर्त' (2003) जैसी ‍बांग्ला भाषा में बनी फ़िल्मों ने ऋतुपर्णो घोष की ख्याति को बढ़ाया। इसके बाद ऋतुपर्णो ने हिन्दी फ़िल्मों की मशहूर अभिनेत्री ऐश्वर्या राय को लेकर 'चोखेर बाली' (2003) बनाई। यह फ़िल्म रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास पर आधारित थी। इस फ़िल्म में महिला किरदारों को बखूबी पेश किया गया था।
वर्ष 2004 में ऋतुपर्णो घोष ने हिन्दी भाषा में फ़िल्म 'रेनकोट' बनाई। 'रेनकोट' ऐसे दो प्रेमियों की कहानी है, जो वर्षों बाद बरसात की एक रात में मिलते हैं। इस फ़िल्म को ऐश्वर्या राय के कैरियर की श्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक माना जाता है। अभिनेता अजय देवगन ने भी इस फ़िल्म में शानदार अभिनय किया।
वर्ष 2007 में ऋतुपर्णो घोष ने सिनेमा के दिग्गज अभिनेता अमिताभ बच्चन के साथ किया और फ़िल्म 'द लास्ट लियर' बनाई।
ऋतुपर्णो घोष की दूसरी हिन्दी फ़िल्म 'सनग्लास' थी, जो 2012 में रिलीज हुई थी।



प्रमुख फ़िल्में
ऋतुपर्णो घोष की प्रमुख फ़िल्में
वर्ष फ़िल्म भाषा
1994 हिरेर आंग्टी बंगाली
1995 उनिशे एप्रिल बंगाली
1997 दहन बंगाली
1999 बेरीवाली बंगाली
2003 चोखेर बाली बंगाली
2004 रेनकोट हिन्दी
2005 अंतरमहल बंगाली
2006 दोसर बंगाली
2007 द लास्ट लीअर अंग्रेज़ी
2008 शोभ चरित्रो काल्पोनिक बंगाली
2010 अबोहोमन बंगाली
2010 नौकाडूबी बंगाली
2012 चित्रांगदा बंगाली
2012 सनग्लास हिन्दी



चाहे हिन्दी फ़िल्म 'रेनकोट' में ऐश्वर्या राय और अजय देवगन से संवेदनशील अभिनय करवाना हो या फिर बांग्ला और हिन्दी में 'चोखेरबाली' हो, ऋतुपर्णो घोष ने न केवल महिलाओं से जुड़े मुद्दों को उठाया, बल्कि समलैंगिक मुद्दों को भी वे उठाते रहे। उनकी फ़िल्मों में समलैंगिक विषयों का काफ़ी संजीदा तरीके से चित्रण हुआ है। सर्वश्रेष्ठ अंग्रेज़ी फ़िल्म के लिए 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीतने वाली फ़िल्म 'मेमरीज़ इन मार्च' भी समलैंगिक विषय पर बनाई गई थी, जिसमें ऋतुपर्णो के अभिनय को काफ़ी सराहा गया था। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ऋतुपर्णो ने कभी भी बॉलीवुड की मुख्य धारा का रुख नहीं किया और कोलकाता में ही रह कर अलग-अलग विषयों पर अर्थपूर्ण फ़िल्में बनाते रहे। इस बात का अंदाजा़ इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें सिर्फ 49 वर्ष की आयु में ही बारह 'राष्ट्रीय पुरस्कार' और कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके थे। सिर्फ़ 21 वर्ष में बहुत कम ही फ़िल्मकारों को इतने पुरस्कार नसीब हुए हैं, लेकिन ऋतुपर्णो घोष अपने आप में ख़ास किस्म के निर्देशक और अभिनेता रहे थे।


ऋतुपर्णो घोष ने कई श्रेणियों में बारह 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' जीते थे। उन्हें 'चोखेर बाली', 'उन्नीशे अप्रैल', 'रेनकोट' और 'द लास्ट लीअर' जैसी फ़िल्मों के लिए याद किया जाता है। वर्ष 2012 में आई उनकी आखिरी फ़िल्म 'चित्रांगदा' के लिए उन्हें 60वें 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' समारोह में 'स्पेशल ज्यूरी अवार्ड' दिया गया था। घोष ने अपनी फ़िल्मों 'अरेक्ती प्रेमेर गोल्पो' 'मेमोरीज इन मार्च' और 'चित्रांगदा' में अपना अभिनय कौशल भी दिखाया था।


Rituparno Ghosh (31 August 1963 – 30 May 2013) was an Indian film director, actor, writer and lyricist in the Bengali cinema.[1] After pursuing a degree in economics he started his career as a creative artist at an advertising agency. In 1992, his debut film Hirer Angti released. In 1994, his next film Unishe April released which won National Film Award for Best Feature Film.


Ghosh was a self-professed Satyajit Ray fan and inspired other filmmakers like Mithaq Kazimi who adapted Ghosh's film Raincoat in English In his career spanning almost two decades, he won 12 National and many International awards.Ghosh died on 30 May 2013 in Kolkata after a heart attack.


His unreleased Bengali movie Taak Jhaank was honoured and released at the 19th Kolkata International Film Festival.
Rituparno Ghosh was born in a Bengali Kayastha Hindu family on 31 August 1963 in Kolkata. His father, Sunil Ghosh, was a documentary film maker and painter.He completed his schooling at South Point High School, and earned a degree in economics from the Jadavpur University, Kolkata.


He was one of the few openly gay figures in Indian cinema and was considered an icon of the LGBT community of India.
Before his career in film, Rituparno Ghosh worked at the Response India advertising agency and became known as an especially effective copywriter in Kolkata. He was particularly noted for composing succinct, appealing one-liners and slogans for ad campaigns in Bengali during the 1980s. At the time, the trend in Kolkata was to translate all-India advertisement campaigns originally composed in English and Hindi into Bengali. Ghosh won recognition for his ability to initiate campaigns in Bengali. Among his noted ad campaigns were 'Sharad Samman' and 'Bongo Jiboner Ango' for the antiseptic ointment, Boroline, and others for Frooti, the largest-selling mango drink in India. Some commentators noted that his power to appeal to consumers through ad campaigns helped make his films appealing to wider audiences, particularly to middle class Bengalis. In 1990, Rituparno got his first break in documentary film when his own agency, Tele-Response, a member of the Response family of companies, was commissioned to make a documentary on Vande Mataram for Doordarshan.



Rituparno suffered from diabetes mellitus type 2 for ten years, and pancreatitis for five years. He experienced insomnia and had been taking medication for it.According to Dr Rajiv Seal of Fortis Hospitals, who had been his physician for almost two decades, Rituparno was also facing complications from hormone treatments after abdominoplasty and breast implants operations which he underwent for his role in Kaushik Ganguly's film, 'Arekti Premer Golpo', in which he played a transgender filmmaker with a bisexual lover.


Ghosh died at his Kolkata residence on 30 May 2013, following a massive heart attack. His attendants, Dileep and Bishnu, found him lying unconscious in bed. Nilanjana Sengupta, wife of actor Jisshu Sengupta, sent for Dr. Nirup Mitra, who declared Ghosh dead.Ghosh was 49 years old.


Many Bengali film actors and directors went to Ghosh's residence to pay tribute. In the afternoon his body was taken to Nandan and kept outside the Nandan complex for some time to allow his fans to see him one last time. Thousands of people came to Nandan to pay homage.[14] Then his body was taken to Tollygunge Technician Studios, where West Bengal's Chief Minister Mamata Banerjee spoke of him in tribute.From Tollygunge, Ghosh's body was taken to Siriti cremation ground where his funeral took place.[29] He was given gun salute by Kolkata Police before cremation.


Rituparno suffered from diabetes mellitus type 2 for ten years, and pancreatitis for five years.He experienced insomnia and had been taking medication for it. According to Dr Rajiv Seal of Fortis Hospitals, who had been his physician for almost two decades, Rituparno was also facing complications from hormone treatments after abdominoplasty and breast implants operations which he underwent for his role in Kaushik Ganguly's film, 'Arekti Premer Golpo', in which he played a transgender filmmaker with a bisexual lover.


Ghosh died at his Kolkata residence on 30 May 2013, following a massive heart attack. His attendants, Dileep and Bishnu, found him lying unconscious in bed. Nilanjana Sengupta, wife of actor Jisshu Sengupta, sent for Dr. Nirup Mitra, who declared Ghosh dead.Ghosh was 49 years old.


Many Bengali film actors and directors went to Ghosh's residence to pay tribute. In the afternoon his body was taken to Nandan and kept outside the Nandan complex for some time to allow his fans to see him one last time. Thousands of people came to Nandan to pay homage. Then his body was taken to Tollygunge Technician Studios, where West Bengal's Chief Minister Mamata Banerjee spoke of him in tribute.From Tollygunge, Ghosh's body was taken to Siriti cremation ground where his funeral took place. He was given gun salute by Kolkata Police before cremation.