विनोद मेहता (जन्म: 31 मई, 1942)

May 31, 2017

विनोद मेहता (जन्म: 31 मई, 1942; मृत्यु: 8 मार्च, 2015) जानेमाने पत्रकार, आउटलुक पत्रिका के संस्थापक एवं मुख्य संपादक थे। पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए विनोद मेहता को प्रतिष्ठित जी.के. रेड्डी मेमोरियल पुरस्कार और यश भारती पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। संपादक, लेखक और टेलीविजन टिप्पणीकार की अपनी लंबी पारी के दौरान विनोद मेहता मेज पर हाज़िरजवाबी, बेबाकी और निष्पक्षता लेकर आए। इस वजह से वह देशभर और पूरी दुनिया में अपने पाठकों एवं दर्शकों, यहां तक कि दोस्तों और दुश्मनों के भी चहेते बने रहे। ऐसा प्रतिद्वंद्वी विरला ही मिलेगा जिसके पास उनके लिए दो अच्छे शब्द न हों।


जीवन परिचय
विनोद मेहता का जन्म 1942 में रावलपिंडी में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। उन्हें पत्रकारिता जगत में एक बोल्ड फिगर के रूप में जाना जाता था। वह न्यूज चैनलों में बतौर पैनलिस्ट बहुत बेबाकी से अपनी राय रखते थे। विनोद मेहता ने 2011 में आत्मकथा ‘लखनऊ ब्वॉय’ लिखी और वे टीवी पर चर्चा करने वालों में लोकप्रिय चेहरा थे। हाल ही में उन्होंने एक और पुस्तक ‘एडिटर अनप्लग्ड’ लिखी लेकिन दिसंबर में इसके लोकार्पण में हिस्सा नहीं ले सके। विनोद मेहता को कुत्तों से काफी प्रेम था और उन्होंने एक गली के कुत्ते को गोद भी लिया था जिसका नाम एडिटर रखा था। इस कुत्ते का जिक्र आउटलुक में उनके लेख में अक्सर आता था। विनोद मेहता प्रतिष्ठित संपादक थे जिन्होंने सफलतापूर्वक ‘संडे ऑब्जर्वर, ‘इंडियन पोस्ट’, ‘द इंडिपेंडेंट’, द पायनियर (दिल्ली संस्करण) और फिर आउटलुक की शुरुआत की। मेहता तीन वर्ष के थे जब भारत विभाजन के बाद वह अपने परिवार के साथ भारत आए। उनका परिवार लखनऊ में बस गया जहां से उन्होंने स्कूली शिक्षा और फिर बीए की डिग्री हासिल की। बीए डिग्री के साथ उन्होंने घर छोड़ा और एक फैक्टरी में काम करने से लेकर कई नौकरियां की। साल 1974 में उन्हें डेबोनियर का संपादन करने का मौका मिला। कई वर्ष बाद वह दिल्ली चले आए जहां उन्होंने ‘द पायनियर’ अखबार के दिल्ली संस्करण पेश किया। उन्होंने सुमिता पाल से विवाह किया जिन्होंने पत्रकार के रूप में पायनियर में काम किया। इस दम्पति को कोई संतान नहीं है। 
लम्बी बीमारी के कारण 8 मार्च, 2015 को इनका निधन हो गया। वे 73 वर्ष के थे। मेहता आउटलुक पत्रिका के संपादकीय अध्यक्ष थे जिसकी उन्होंने शुरुआत की थी। वह कई महीने से बीमार थे और एम्स में भर्ती थे। वह फेफडे के संक्रमण से पीड़ित थे और जीवन रक्षक यंत्र पर थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विनोद मेहता के निधन पर शोक प्रकट किया। नरेन्द्र मोदी ने सोशल नेटवर्क वेबसाइट ट्विटर पर ट्वीट किया, ‘‘अपने विचार में स्पष्ट और बेबाक विनोद मेहता को एक शानदार पत्रकार और लेखक के रूप में जाना जायेगा। उनके निधन पर उनके परिवार के प्रति संवेदना प्रकट करता हूं।


अपनी पुस्तक ‘लखनऊ ब्यॉय’ में विनोद मेहता ने लिखा है कि उनके अपने जवानी के दिनों के प्रेम संबंध से एक बेटी है। उन्होंने बताया था कि अपनी आत्मकथा में जब तक उन्होंने यह बात नहीं लिखी थी तब तक उनकी बेटी के बारे में सिर्फ उनकी पत्नी को जानकारी थी। विनोद मेहता ने बताया था कि उन्होंने अपनी पत्नी को इस बारे में बताया और उसने मुझे किताब में इसका जिक्र करने के लिए प्रोत्साहित किया। विनोद मेहता ने मीना कुमारी और संजय गांधी की जीवनी लिखी और 2001 में उनके लेखों का संकलन ‘मिस्टर एडिटर : हाउ क्लोज आर यू टू द पीएम’ प्रकाशित हुआ।
आउटलुक के संस्थापक प्रधान संपादक के तौर पर विनोद मेहता ने भारतीय मैगजीन पत्रकारिता में रुख की ताजगी, मन का खुलापन और स्पर्श की सहजता भरकर उसे फिर ऊर्जावान कर दिया। ये बातें अब भी भारत के प्रमुख अंग्रेजी समाचार साप्ताहिक आउटलुक और उसकी सहयोगी पत्रिकाओं आउटलुक हिंदी, आउटलुक बिजनेस, आउटलुक मनी और आउटलुक ट्रेवलर को दिशा दे रहे हैं। खुल्लम-खुल्ला कट्टर क्रिकेटप्रेमी और भोजनभट्ट विनोद मेहता सुरुचिपूर्ण गपशप के चुंबक थे। अपनी गपशप वह आउटलुक के अंतिम पृष्ठ पर अपनी बहुपठित डायरियों के जरिये बड़ी दक्षता से पूरी व्यवस्था में खोलकर फैला देते थे। अतिशयोक्ति और भारी-भरकम शब्दों से विनोद मेहता को नफरत थी। महत्वपूर्ण को दिलचस्प बनाना उनकी पत्रिका का सिद्घांत था।


विनोद मेहता मौजूदा दौर के सबसे प्रयोगधर्मी संपादक रहे। उन्होंने अपने पत्रकारीय करियर की शुरुआत प्लेब्वॉय के भारतीय संस्करण डेबोनियर के संपादक के तौर पर की। चलताऊ मैगजीन से शुरू हुआ उनका सफर हार्डकोर न्यूज़ की दुनिया के सबसे कद्दावर संपादक के रूप में पूरा हुआ। उन्होंने अपने इस सफर के दौरान भारत के सबसे पहले साप्ताहिक अखबार, द संडे आब्जर्वर को शुरू किया। इसके बाद इंडियन पोस्ट और इंडिपेंडेंट जैसे अखबारों को संभाला। पायनियर के दिल्ली संस्करण की शुरुआत की और इन सबके बाद करीब डेढ़ दशक तक आउटलुक समूह की दस पत्रिकाओं का संपादन किया जिसमें आउटलुक भी शामिल है जिसने भारतीय समाचार पत्रिकाओं में सबसे लोकप्रिय पत्रिका इंडिया टुडे को पीछे छोड़ दिया था। एक पत्रकार और संपादक के तौर पर विनोद मेहता का बायोडाटा बेहद कामयाब और चमकदार रहा। इतना ही नहीं उनके तमाम अखबार और पत्रिकाओं ने अपने लुक और कंटेंट से एक खास पहचान बनाई। इस कामयाबी के पीछे कैसे-कैसे संघर्ष और चुनौतियों का सामना विनोद मेहता को करना पड़ा, इसका सिलसिलेवार और बेहद दिलचस्प विवरण उन्होंने अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक लखनऊ ब्वॉय ए मेमोयार में किया। चूंकि विनोद कई प्रतिष्ठानों में संपादक की हैसियत में रहे, लिहाजा उनकी किताब में स्कैंडल और गॉसिप भी कम नहीं हैं जिसका विस्तार उनकी दूसरी पुस्तक 'एडिटर अनप्लगड' में भी नज़र आया है।


आउटलुक को अलग बनाने की उनकी जद्दोजेहद किसी को भी प्रेरित कर सकती है। मैच फिक्सिंग की खबर हो, या फिर अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के बीच टकराव की खबर हो या फिर राडिया टेप से जुड़े दस्तावेज को प्रकाशित करने का मामला, इन तमाम खबरों पर काम करने के दौरान किस तरह की चुनौतियां सामने थीं, इसको उन्होंने सहज अंदाज में बताया है। वाजपेयी सरकार ने जिस तरह से आउटलुक के प्रकाशकों को तंग किया, उस पर भी लेखक ने निशाना साधा है। पुस्तक का एक हिस्सा पत्रकारिता से जुड़े लोगों के लिए बेहद उपयोगी है जिसमें लेखक ने अपने अनुभव के आधार पर पत्रकारिता कर रहे लोगों को अपना काम बेहतर करने के रास्ते सुझाए हैं। चार दशकों के अपने संपादकत्व के अनुभव के आधार पर विनोद मेहता लिखते हैं कि आप जो भी काम करें, उसमें दक्षता हासिल कीजिए तो आपकी जरूरत हमेशा बनी रहेगी। जहां लखनऊ ब्वॉय में विनोद अपने करियर के बारे में विस्तार से बताते हैं, वहीं उनकी आत्मकथा का दूसरे हिस्सा एडिटर अनप्लगड में उन्होंने पत्रकारीय प्रबंधन और कारपोरेट के बारीक रिश्तों को उजागर किया है।


Vinod Mehta (31 May 1942 – 8 March 2015) was an Indian journalist, editor and political commentator. He was also the founder editor-in-chief of Outlook from 1995 to 2012 and had been editor of publications such as The Pioneer, The Sunday Observer, The Independent and The Indian Post. He was also the author of several books.


On 31 May 1942, Mehta was born in Rawalpindi, in Punjab, British India. His family became refugess in 1945. He grew up as an army boy in Lucknow, an experience that turned him into an determined secularist. He attended La Martinere school and the university there.


Mehta lived in New Delhi. He was married to Sumita Paul, a journalist who has worked for The Pioneer and the Sunday edition of The Times of India. He had a daughter from a prior relationship, the existence of whom he revealed in a memoir after encouragement from his wife.


Mehta died of multi-organ failure in New Delhi on 8 March 2015, after a prolonged illness.
Leaving home with a third-class BA degree, Mehta experimented with a string of jobs, including that of a factory-hand in suburban Britain, before accepting an offer to edit Debonair in 1974, a men's magazine.


Mehta became one of India's most influential editors by launching a number of successful publications such as the Sunday Observer in 1981, The Indian Post in 1987, The Independent in 1989, The Pioneer (Delhi edition) in 1990 and, finally, Outlook in 1995. He was editorial chairman of the Outlook Group.


Mehta was forced to resign from the editorship of The Independent newspaper in 1989, 29 days after launching it, because of a story based on a dubious RAW[clarification needed] report, calling the Maharashtrian politician Y. B. Chavan a spy, which Mehta ran with an eight-column banner headline.


Vinod Mehta has authored a biography of Meena Kumari and Sanjay Gandhi, and published (in 2001) a collection of his articles under the title Mr Editor, How Close Are You to the PM? His memoir, Lucknow Boy, was published in 2011.


Mehta was a TV panellist and frequently appeared on TV shows like Newshour on Times Now and India at 9 at CNN-IBN. He was called upon by news anchors as a senior journalist and was sought after for his analysis of major issues and scenarios. He remained editor-in-chief of Outlook till February 2012.


He was president of the Editors Guild of India and was, briefly, the writer and presenter of "Letter from India" on the BBC World Service and BBC Radio 4.


On 9 February 2015 he was awarded the Yash Bharti Award by the Government of Uttar Pradesh for his work in the field of journalism.
In 2012 the Indian Express attempted to sue Mehta for defamation after he had hinted that a story it had run was planted.