एनी बेसेंट (जन्म:1 अक्टूबर 1847)

October 01, 2017

एनी बेसेंट (अंग्रेज़ी:Annie Besant, जन्म:1 अक्टूबर 1847 - मृत्य: 20 सितंबर, 1933) भारत की मिट्टी से गहरा लगाव रखने वाली प्रख्यात समाजसेवी, लेखिका और स्वतंत्रता सेनानी थीं। एनी बेसेंट ने कई मौकों पर अन्याय का कड़ा प्रतिरोध करके 'आयरन लेडी' की छवि बनाई थी। एनी बेसेंट भारतीय दर्शन एवं हिन्दू धर्म से बहुत आकर्षित थी और थियोसॉफी का प्रसार करने के लिए भारत आईं थी। उन्हें भारत से अद्भुत प्रेम एवं अनुराग था और भारतवासियों द्वारा उन्हें दिया गया सम्मान एवं आदर भी दर्शनीय था। आध्यात्मिक और राजनीतिक रूप से सोए हुए भारत को जगाने के लिए, भारत को अपना घर कहने वाली एनी बेसेंट ने दुनिया भर के धर्मों का गहन अध्ययन किया। उन धर्मों को जाना परखा और समझा कि वेद और उपनिषद का धर्म ही सच्चा मार्ग है।


जीवन परिचय
एनी बेसेंट का जन्म 1 अक्टूबर 1847 को लंदन के 'वुड' परिवार में हुआ। एनी बेसेंट के पिता एक कुशल चिकित्सक थे। वह कई भाषाओं के ज्ञाता थे। माता धार्मिक आस्था वाली आयरिश महिला, पिता विद्वान गणितज्ञ अंग्रेज़, एक भाई दो वर्ष बड़ा था। एनी बेसेंट जब पाँच वर्ष की थीं तभी उनके पिता का स्वर्गवास हो गया था। 1852 को उनके पिता के निधन के बाद माता द्वारा बेहद गरीबी में दोनों बच्चों का पालन-पोषण किया गया। उनका पालन-पोषण उनकी माँ ने अभावों की स्थितियों में किया। एनी बेसेंट की अद्भुत प्रतिभा बचपन में ही दिखायी देने लगी थी जिससे प्रभावित होकर एक शिक्षाविद महिला 'सुश्री मेरियट' ने उन्हें उनकी माँ से अपने संरक्षण में ले लिया। सुश्री मेरियट के संरक्षण में उन्होंने 16 वर्ष तक विद्यार्जन किया, यूरोप तथा जर्मनी की यात्रा की, लैटिन एवं फ्रेंच भाषाओं का गहन अध्ययन किया। भारतीय संस्कृति से डॉ.बेसेंट का गहरा लगाव था। ब्रिटिश समाचार पत्रों ने उन्हें 'पूरब का सितारा' का ख़िताब दिया था। वह कहा करती थीं - ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि मेरा अगला जन्म हिन्दू परिवार में हो। भारत प्रेमी, हिन्दू धर्म प्रेमी एवं सच्चे अर्थों में शिक्षा शास्त्री एनी बेसेंट ने वाराणसी के गंगा तट पर अपना अंतिम संस्कार करने की इच्छा प्रकट की थी| 20 सितंबर सन् 1933 में अंडयार चेन्नई के निकट 86 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उस जमाने में यह संभव नहीं था कि विमान या रेल द्वारा उनका पार्थिव शरीर वाराणसी लाया जा सके। इतिहास की इस महान नायिका की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए उनकी इच्छाओं के अनुसार भारतीय पद्धति से उनका दाह संस्कार हुआ। उनका अस्थि कलश बनारस लाया गया तथा दशाश्वमेध घाट पर उसका विसर्जन हुआ।


एनी को धार्मिक, आध्यात्मिक, रहस्यवाद की पुस्तकें पढ़ने का शौक़ था। उसी दौरान ईसा के प्रति लगाव हुआ। 1867 को एनी बेसेंट का विवाह 22 वर्ष की उम्र में गिरजाघर के पादरी 'रेवेरेंड फ्रैंक बेसेंट' से हुआ। 1868-70 के मध्य एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया, किन्तु स्वभाव से स्वतंत्र विचारशील एवं धार्मिक प्रवृत्ति के कारण उनका अपने पति से अन्तर्विरोध रहा और इसी कारण से उन्होंने पति से संबंध विच्छेद कर मानवता से नाता जोड़ने का संकल्प लिया। उनके दोनों बच्चे ब्रिटिश क़ानून के अनुसार उनके पति के पास रहे। ईश्वर, बाइबिल और ईसाई धर्म पर से उनकी आस्था डिग गई। पादरी-पति और पत्नी का परस्पर निर्वाह कठिन हो गया इसी कारण वैचारिक मतभेद के चलते विवाह-सम्बन्ध कटुता के चलते विच्छेद हो गए। 'फ्रूट्स ऑफ फिलॉसफी' लेख में 'बर्थ-कन्ट्रोल' परिवार-परिसीमन पर लेख लिखकर समाज-सुधार की पक्षधर एनी द्वारा धर्म की अवज्ञा की गई। इस विद्रोहीपन के कारण पति द्वारा उत्पीड़न के चलते 1873 में उनका तलाक हो गया। धर्म विरुद्ध लेख लिखने पर मुक़दमा चला। न्यायाधीश उनके तर्कों से सहमत थे पर जूरी नहीं। दंड को अपील में माफ कर दिया गया और न्यायालय ने पुत्री दे दी, पर पुत्र छीन लिया


एक विदेशी महिला जब भारत में रहने लगी तो उन्होंने स्वयं को कभी विदेशी नहीं समझा। हिन्दू धर्म पर व्याख्‍यान से पूर्व वह 'ॐ नम: शिवाय' का उच्चारण करती थी। विलक्षण स्मरण शक्ति, नोट्स नहीं बनाती थी। वेशभूषा के प्रति अत्यन्त सावधान रहती थी। समय की अत्यंत पाबंद थी। 'मेम साहब' कहलाना पसंद नहीं करती थी। 'अम्मा' नाम उन्हें पसंद था। भारत से प्रेम किया और भारतवासियों ने उन्हें 'माँ बसंत' कहकर सम्मानित किया।


एनी बेसेंट ने गंभीर आर्थिक संकट के समय स्वतंत्र विचार संबंधी लेख लिखकर धनोपार्जन किया। ख्यातिलब्ध पत्रकार 'विलियम स्टीड' के संपर्क में उन्होंने लेखन एवं प्रकाशन का कार्य रुचिपूर्वक किया। वह इंग्लैंड की सबसे शक्तिशाली 'महिला ट्रेड यूनियन' की सचिव रहीं। उन्होंने अपना अधिकांश समय मज़दूरों, अकाल पीड़ितों तथा अभावग्रस्तों को सुविधाएँ दिलवाने में व्यतीत किया।


सन 1882 में वे 'थियोसॉफिकल सोसायटी' की संस्थापिका 'मैडम ब्लावत्सकी' के संपर्क में आईं और पूर्ण रूप से संत संस्कारों वाली महिला बन गईं। सन् 1889 में उन्होंने घोषणा कर स्वयं को 'थियोसाफिस्ट' घोषित किया और शेष जीवन भारत की सेवा में अर्पित करने की घोषणा की। 16 नवंबर 1893 को वे एक वृहद कार्यक्रम के साथ भारत आईं और सांस्कृतिक नगर काशी (बनारस) को अपना केन्द्र बनाया। उन्होंने काशी के तत्कालीन नरेश 'महाराजा प्रभु नारायण सिंह' से भेंट की और उनसे कामच्छा स्थित 'काशी नरेश सभा भवन' के समीप की भूमि प्राप्त कर 7 जुलाई 1898 को 'सेंट्रल हिन्दू कॉलेज' की स्थापना की। सामाजिक बुराइयों जैसे बाल विवाह, जातीय व्यवस्था, विधवा विवाह आदि को दूर करने के लिए 'ब्रदर्स ऑफ सर्विस' नामक संस्था बनाई। इस संस्था की सदस्यता पाने के लिये नीचे लिखे प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर करने पड़ते थे -


मैं जाति पाँति पर आधारित छुआछूत नहीं करुंगा।
मैं अपने पुत्रों का विवाह 18 वर्ष से पहले नहीं करुंगा।
मैं अपनी पुत्रियों का विवाह 16 वर्ष से पहले नहीं करुंगा।
मैं पत्नी, पुत्रियों और कुटुम्ब की अन्य स्त्रियों को शिक्षा दिलवाऊँगा, कन्या शिक्षा का प्रचार करुँगा। स्त्रियों की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करुंगा।
मैं जन साधारण में शिक्षा का प्रचार करुंगा।
मैं सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में वर्ग पर आधारित भेद-भाव को मिटाने का प्रयास करुंगा।
मैं सक्रिय रूप से उन सामाजिक बन्धनों का विरोध करुंगा जो विधवा स्त्री के सामने आते हैं जब वह पुनर्विवाह करती हैं।
मैं कार्यकर्ताओं में आध्यात्मिक शिक्षा एवं सामाजिक और राजनीतिक उन्नति के क्षेत्र में एकता लाने का प्रयत्न भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व व निर्देशन में करुंगा।


डा. एनी बेसेन्ट जानती थीं कि बिना राजनीतिक स्वतंत्रता के इन सभी कठिनाइयों का समाधान सम्भव नहीं है। उन्होंने अपने 40 वर्ष भारत के सर्वांगीण विकास में व्यतीत किए। उस समय महामना मदन मोहन मालवीय एक विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते थे परंतु नियमानुसार इसके लिए एक कॉलेज का होना अनिवार्य था। मालवीय जी ने एनी बेसेंट के समक्ष 'सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज' का प्रस्ताव रखा तो एनी बेसेंट ने तत्काल स्वीकार करते हुए कहा - 'मेरे पास जो कुछ भी है वह देश के लिए ही है, यह विद्यालय आपका ही है पंडित जी!' वह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की सह संस्थापिका के रूप में जानी जाती हैं। एनी बेसेंट ने भारत में पुनर्जागरण हेतु शिक्षा, नारी शिक्षा, आध्यात्मिक साहित्य का सृजन एवं विकास, धर्म का प्रसार, राजनीति आदि सभी क्षेत्रों में कार्य प्रारंभ कर दिया। वे एक अत्यंत कुशल संस्थापिका, लेखिका एवं उच्चकोटि की वक्ता थीं। भारत को स्वतंत्र कराने के प्रति वह चिन्तित थीं एवं इस दिशा में कार्य करने के लिए यहाँ के राजनीतिज्ञों से भी संपर्क बनाने लगी थीं। देशवासियों ने उन्हें माँ वसंत कहकर सम्मानित किया तो महात्मा गांधी ने उन्हें वसंत देवी की उपाधि से विभूषित किया।


भारतीय राजनीति में उन्होंने 1914 में 68 वर्ष की उम्र में प्रवेश किया और एक अत्यन्त प्रभावशाली 'क्रांतिकारी आंदोलन होम रूल' का आरंभ किया। यह आंदोलन भारतीय एवं कांग्रेस की राजनीति का नया जन्म माना जाता है। इस आंदोलन ने भारत की राजनीति तथा ब्रिटिश सरकार की नीति में नीतिगत परिवर्तन ला दिया। उस समय के मशहूर शायर 'ब्रजनारायण चकबस्त' ने होमरूल पर एक नज़्म भी कही जिसमें एनी बेसेंट के प्रति देशवासियों का आदर झलकता है।


एनी बेसेंट ने पूरे देश का भ्रमण प्रारंभ कर दिया। उन्होंने जगह-जगह पर होम रूल की शाखाएँ खोलीं तथा लोगों को स्वराज्य का अर्थ एवं उपयोगिता समझायी। उन्होंने विशाल प्रचार सामग्री तैयार की। यह भारतीय राजनीति में एक नया क़दम था। 1914 मे ही उन्होंने दो पत्रिकाएँ ‘न्यू इंडिया दैनिक’ तथा ‘द कॉमन व्हील साप्ताहिक’ प्रकाशित की। उन पत्रिकाओं में ब्रिटिश शासन के विरोध में लिखने के कारण उन्हें 20 हज़ार रुपये का दंड भी देना पड़ा। उन्होंने अमरीका और इंग्लैंड में भी होमरूल की शाखाएँ खोलीं। ये शाखाएँ भी भारत की स्वतंत्रता के लिए कार्य करती थीं। इंग्लैंड की होम रूल शाखा के मुख्य कार्यकर्ता 'लॉर्ड लेंसबरी' तथा 'जॉर्ज बर्नाड शॉ' जैसे महान व्यक्ति थे। उन्होंने एक और महत्त्वपूर्ण कार्य किया कि वैचारिक रूप से अलग हो गये लोकमान्य तिलक और गोखले को 1907 में अपनी कोशिशों से मिलाकर एक किया और साथ ही कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग में एकता बनाकर हिन्दू और मुस्लिम समुदायों में एकता स्थापित करने में मुख्य भूमिका निभाई। 1917 में ब्रिटिश सरकार ने एनी बेसेंट को उनके दो सहयोगियों के साथ नज़रबंद कर दिया गया। फलस्वरूप पूरे देश में सभाएँ हुईं, जुलूस निकले, महिलाओं ने खुलकर भाग लिया। अन्त में ब्रिटिश शासन ने उन्हें आज़ाद किया और क़ानून में कई सुधारों की घोषणा भी की। 1917 में ही कलकत्ता में कांग्रेस की सभा में उन्हें 'राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष' बनाया गया।


एनी भारतीयों की स्वतंत्रता की जबरदस्त पक्षधर थीं। 1914 में उन्होंने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया और 1917 में निर्वाचन समिति द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गई। आमतौर पर पार्टी का अधिवेशन समाप्त होने पर राजनीतिक दल के अध्यक्ष निजी जीवन में व्यस्त हो जाते थे, लेकिन डॉ. बेसेंट ने पूरे वर्ष देश के अलग-अलग हिस्सों में घूमकर पार्टी को संगठित करने का कार्य किया। उन्होंने 'न्यू इंडिया' नामक एक समाचारपत्र भी प्रारम्भ किया था। वह ब्रिटिश नागरिक थीं, इसलिए देशद्रोह के आरोप में उन्हें जेल भेजा गया। स्वतंत्रता के विषय में वह गांधी जी के विचारों से असहमत थीं। वह कांग्रेस के गरम दल के विचारों से प्रभावित थीं और उन्होंने आजीवन लोकमान्य तिलक के साथ देश की आज़ादी के लिए काम किया। गांधी जी से वैचारिक मतभेदों होने के कारण उन्होंने धीरे-धीरे कांग्रेस में अपनी सक्रियता कम कर दी। 1924 में गांधी जी के नेतृत्व में बेलगांव (कर्नाटक) में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। रेल की लंबी यात्रा कर डॉ. बेसेंट जब बेलगांव पहुंचीं तो अधिवेशन प्रारम्भ हो चुका था। तब गांधी जी सहित उपस्थित जनसमूह उनके स्वागत में उठकर खडा हो गया, किंतु वह अधिवेशन में अध्यक्ष के स्थान को छोडकर पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ बैठीं। गांधी जी ने अधिवेशन की कार्यवाही रोक कर डॉ. बेसेंट से आग्रह किया कि वह अपने विचार व्यक्त करें। अपने भाषण में उन्होंने कहा- 'अब मेरी उम्र ज़्यादा हो गई है। इसलिए मैं सक्रिय राजनीति से सन्न्यास ले रही हूं।' सन्न्यास के बाद भी वह भारत में शिक्षा के प्रचार-प्रसार और समाज सुधार संबंधी कार्यो में तन मन से लगी रहीं।1919 तक वे सक्रिय राजनीति में रहने के पश्चात राजनीति से अलग हो गईं।



एनी बेसेंट के जीवन का मूल मंत्र था - कर्म। वह जिस सिद्धांत पर विश्वास करती थीं उसे अपने जीवन में उतार लेती थीं। वह स्वभावत: धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। उनके राजनीतिक विचारों की आधारशिला उनके आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्य थे। उनका विचार था कि अच्छाई के मार्ग का निर्धारण बिना आध्यात्म के संभव नहीं है। राष्ट्र का विकास एवं निर्माण तभी संभव है, जब उस देश के विभिन्न धर्मों, मान्यताओं एवं संस्कृतियों में एकता स्थापित हो। उनका उद्देश्य हिन्दू समाज एवं उसकी आध्यात्मिकता में आई विकृतियों को दूर करना था।


पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ राजनेता वसंत साठे के मुताबिक एनी बेसेंट एक ऐसी महिला थीं जिनकी इच्छाशक्ति और संघर्ष करने की क्षमता ही उनकी पूंजी और पहचान थी। उन्होंने कहा कि बेसेंट एक नई सोच और क्षमता लेकर आईं और उन्होंने भारत की महिलाओं में एक नई चेतना का संचार किया।


भारत की ओर आकर्षित होने के कारण उन्हें लगा कि मेरा कर्मक्षेत्र भारत ही हो सकता है। 16 नवम्बर 1893 को भारत के तूतीकोरिन बंदरगाह पर उतरीं।
लगभग 505 ग्रंथों व लेखों की लेखिका डा. एनी बेसेन्ट ने 'हाऊ इण्डिया रौट् फॉर फ्रीडम' (1915) में भारत को अपनी मातृभूमि बतलाया है।
'इण्डिया : ए नेशन' नामक जो पुस्तक जब्त कर ली गयी थी उसमें उन्होंने स्वायत्त-शासन की विचार धारा प्रतिपादित की है।
1817 में नज़रबन्द किये जाने से पहले सत्तर वर्षीय वृद्धा ने अपने भारत के भाइयों और बहनों को आखिरी सन्देश दिया था- मैं वृद्धा हूँ, किन्तु मुझे विश्वास है कि मरने के पहले ही मैं देखूंगी कि भारत को स्वायत्त-शासन मिल गया है।
थियोसॉफिकल सोसायटी


1888 को श्रीमती स्टेड द्वारा 'रिव्यू और रिव्यूज' के लिए पुस्तक समालोचना लिखने के लिए मादाम ब्लावाटस्की की दो पुस्तकें दीं। एनी बेसेन्ट इन्हें पढ़कर बहुत प्रभावित हुईं। 1889 को मादाम ब्लावाटस्की से मिलीं। मादाम ब्लावाटस्की ने एनी बेसेन्ट को थियोसॉफिकल सोसायटी के उद्देश्य बताए। उनके उद्देश्य सुनकर 21 मई को थियोसॉफिकल सोसायटी में वे प्रविष्ट हो गईं। 1907 को थियोसॉफिकल सोसायटी की अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष चुनी गईं। जिद्दू कृष्णमूर्ति को अपनाया। 1908 को 'ऑर्डर ऑफ थियोसॉफिकल सन्न्यासी' पीत वस्त्रधारी, सेवाव्रती समर्पित लोगों की संस्था बनाई। जुलाई 1921 में पेरिस में आयोजित प्रथम थियोसॉफिकल वर्ल्ड कांग्रेस की अध्यक्ष बनाई गईं।


उन्होंने भारतीय धर्म का गंभीर अध्ययन किया। उन्होंने गीता का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया। उन्होंने लगभग 200 पुस्तकें लिखी हैं। कई पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। उन्हें 6 जुलाई 1907 में ही 'थियोसाफिकल सोसायटी' का अध्यक्ष चुन लिया गया था। वह जीवन पर्यन्त इस संस्था की अध्यक्ष रहीं। 1908 में अडयार (चेन्नई) में 'वसंत प्रेस' का शुभारंभ किया। 1918 में 'इंडियन भारत स्कॉउट' की नींव रखी। 14 दिसंबर 1921 को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ने इन्हें 'डॉक्टर ऑफ़ लेटर्स' की उपाधि से विभूषित किया।


अंडयार में जो थियोसाफिकल सोसायटी का अन्तरराष्ट्रीय मुख्यालय है, उन्होंने सभी धर्मों के मन्दिरों की स्थापना की। साथ ही विश्व बंधुत्व की भावना बढ़ाने पर निरंतर ज़ोर देती रहीं। इन्हीं संदर्भों में उनके जीवन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य था कि विश्व के महान दार्शनिक 'जे. कृष्णमूर्ति' को 1909 में अपने मातापिता से अपने संरक्षण में ले लेना। तब जे.कृष्णमूर्ति की आयु पाँच वर्ष थी। उन्हीं के संरक्षण में कृष्णमूर्ति ने ज्ञानार्जन किया। एनी बेसेंट ने यह कार्य मातृत्व के सर्वोच्च आदर्शों के अनुरूप ही किया। आज जे.कृष्णमूर्ति विश्वगुरु के रूप में सम्मानित हैं।


प्रतिभा-सम्पन्न लेखिका और स्वतंत्र विचारक होने के नाते श्रीमती एनी बेसेन्ट ने थियोसॉफी (ब्रह्मविद्या) पर क़रीब 220 पुस्तकें व लेख लिखे। 'अजैक्स' उपनाम से भी उन्होंने लेखन कार्य किया था। पूर्व-थियोसॉफिकल पुस्तकों एवं लेखों की संख्या लगभग 105 है। 1893 में उन्होंने अपनी आत्मकथा प्रकाशित की थी। उनकी जीवनीपरक पुस्तकों की संख्या 6 है। उन्होंने एक साल, 1995 में सोलह पुस्तकों और अनेक पैम्फलेट प्रकाशित किये, जिनकी संख्या 900 पृष्ठों से अधिक थी। एनी बेसेन्ट ने भगवद्गीता का अंग्रेजी-अनुवाद किया और पुस्तकों के लिए प्रस्तावनाएँ भी लिखीं। उनके द्वारा 'क्वीन्स हॉल' में दिये गये व्याख्यानों की संख्या लगभग 20 होगी। उन्होंने भारतीय संस्कृति, शिक्षा व सामाजिक सुधारों पर 48 ग्रंथों और पैम्फलेट की रचना की। भारतीय राजनीति पर लगभग 77 पुस्तकें लिखीं। उनकी मौलिक कृतियों में से चयनित 28 ग्रंथों का निर्माण हुआ। समय-समय पर 'लूसिफेर', 'द कामनवील' व 'न्यू इंडिया' के संपादन भी एनी बेसेन्ट ने किये। गत शताब्दी में प्रकाशित उनके प्रसिद्ध ग्रंथ इस प्रकार हैं -


1- डेथ-ऐण्ड आफ़्टर (थियोसॉफिकल मैन्युअल III) 1893
2- आत्मकथा 1893
3- इन द आउटर कोर्ट 1895
4- कर्म (थियोसॉफिकल मैन्युअल IV) 1895 कर्म-व्यवस्था का सुन्दर चित्रण।
5- द सेल्फ ऐण्ड इट्स शीथ्स 1895
6- मैन ऐण्ड हिज़ बॉडीज (थियोसॉफिकल मैन्युअल VII) 1896
7- द पाथ ऑफ डिसाइपिल्शिप 1896 मुमुक्ष का मार्ग।
8- द ऐंश्यिएण्ट विज़्डम 1897
9- फॉर ग्रेट रिलिजन्स 1897 धर्म पर प्रसिद्ध पुस्तक - कालान्तर में चार भागों में प्रकाशित -
हिन्दूइज्म,
ज़ोरैस्ट्रियनिज्म,
बुद्धिज्म,
क्रिश्चियैनिटी।
10- एवोल्यूशन ऑफ लाइफ एण्ड फॉर्म 1899
11- सम प्रॉब्लम्स ऑफ लाइफ 1900
12- थॉट पावर : इट्स कण्ट्रोल ऐण्ड कल्चर 1901
13- रिलिजस प्रॉब्लम इन इण्डिया 1902 यह उनकी एक महान साहित्यिक कृति थी जो कालान्तर में चार भागों - इस्लाम, जैनिज़्म, सिक्खिज़्म, थियोसॉफी - में प्रकाशित हुई।
14- द पेडिग्री ऑफ मैन 1904
15- ए स्टडी इन कॉंशसनेस 1904
16- ए स्टडी इन कर्म 1912 कर्म-सिद्धान्त पर प्रणीत।
17- वेक अप, इण्डिया : ए प्ली फॉर सोशल रिफॉर्म 1913
18- इण्डिया ऐण्ड ए एम्पायर 1914
19- फॉर इण्डियाज़ अपलिफ्ट 1914
20- द कॉमनवील 1914 जुलाई से निकालना शुरू किया (प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्र)।
21- न्यू इण्डिया 1915 मद्रास (चेन्नई) से निकलने वाला दैनिक पत्र।
22- हाऊ इण्डिया रौट् फॉर फ्रीडम 1915 यह प्रसिद्ध ग्रंथ ऑफिशियल रिकार्डों के आधार पर रचित राष्ट्रीय कांग्रेस की कहानी है।
23- इण्डिया : ए नेशन 1915 द पीपुल्स बुक्स सिरीज़ की इस पुस्तक को 1916 में अंग्रेज़ सरकार ने जब्त कर लिया और एनी बेसेन्ट को अलगे वर्ष नज़रबन्द कर दिया गया।
24- कांग्रेस स्पीचेज 1917
25- द बर्थ ऑफ न्यू इण्डिया 1917 यह पुस्तक फॉर इण्डियाज़ अपलिफ्ट - 1914, से मिलती जुलती है।
26- लेटर्स टू ए यंग इण्डियन प्रिन्स 1921 इस ग्रंथ में छोटे-छोटे देशी राज्यों को आधुनिक तरीकों से पुनर्गणित करने की संस्तुति की गयी है।
27- द फ्यूचर ऑफ इण्डियन पॉलिटिक्स 1922 इसकी उपादेयता तत्कालीन समस्याओं को समझने के लिए रही है।
28- ब्रह्म विद्या 1923
29- इण्डियन आर्ट 1925 भारतीय संस्कृति पर यह पुस्तक कलकत्ता विश्वविद्यालय में दिये गये कमला लेक्चर पर आधारित है।
30- इण्डिया : बौण्ड ऑर फ्री? 1926 यह पुस्तक अद्भुत साहित्यिक और माननीय रुचि का एक निजी दस्तावेज है। साथ ही साथ भारतीय इतिहास की एक अपूर्व निधि है। इसमें भारत के भूत, वर्तमान और भविष्य का व्यवस्थित सर्वेक्षण किया गया है।
15- ए स्टडी इन कॉंशसनेस 1904


Annie Besant, (1 October 1847 – 20 September 1933) was a British socialist, theosophist, women's rights activist, writer and orator and supporter of Irish and Indian self-rule.


In 1867, Annie at age 20, married Frank Besant, a clergyman, and they had two children, but Annie's increasingly anti-religious views led to a legal separation in 1873.She then became a prominent speaker for the National Secular Society (NSS) and writer and a close friend of Charles Bradlaugh. In 1877 they were prosecuted for publishing a book by birth control campaigner Charles Knowlton. The scandal made them famous, and Bradlaugh was elected M.P. for Northampton in 1880.


She became involved with union actions including the Bloody Sunday demonstration and the London matchgirls strike of 1888. She was a leading speaker for the Fabian Society and the Marxist Social Democratic Federation (SDF). She was elected to the London School Board for Tower Hamlets, topping the poll even though few women were qualified to vote at that time.


In 1890 Besant met Helena Blavatsky and over the next few years her interest in theosophy grew while her interest in secular matters waned. She became a member of the Theosophical Society and a prominent lecturer on the subject. As part of her theosophy-related work, she travelled to India. In 1898 she helped establish the Central Hindu College and in 1922 she helped establish the Hyderabad (Sind) National Collegiate Board in Mumbai, India. In 1902, she established the first overseas Lodge of the International Order of Co-Freemasonry, Le Droit Humain. Over the next few years she established lodges in many parts of the British Empire. In 1907 she became president of the Theosophical Society, whose international headquarters were in Adyar, Madras, (Chennai).


She also became involved in politics in India, joining the Indian National Congress. When World War I broke out in 1914, she helped launch the Home Rule League to campaign for democracy in India and dominion status within the Empire. This led to her election as president of the India National Congress in late 1917. In the late 1920s, Besant travelled to the United States with her protégé and adopted son Jiddu Krishnamurti, who she claimed was the new Messiah and incarnation of Buddha. Krishnamurti rejected these claims in 1929. After the war, she continued to campaign for Indian independence and for the causes of theosophy, until her death in 1933.



Annie Wood was born in 1847 in London into a middle-class family of Irish origin. She was proud of her heritage and supported the cause of Irish self-rule throughout her adult life. Her father died when she was five years old, leaving the family almost penniless. Her mother supported the family by running a boarding house for boys at Harrow School. However, she was unable to support Annie and persuaded her friend Ellen Marryat to care for her. Marryat made sure that she had a good education. Annie was given a strong sense of duty to society and an equally strong sense of what independent women could achieve. As a young woman, she was also able to travel widely in Europe. There she acquired a taste for Roman Catholic colour and ceremony that never left her.


In 1867, at age twenty, she married 26-year-old clergyman Frank Besant (1840–1917), younger brother of Walter Besant. He was an evangelical Anglican who seemed to share many of her concerns. On the eve of her marriage, she had become more politicised through a visit to friends in Manchester, who brought her into contact with both English radicals and the Manchester Martyrs of the Irish Republican Fenian Brotherhood, as well as with the conditions of the urban poor.


Soon Frank became vicar of Sibsey in Lincolnshire. Annie moved to Sibsey with her husband, and within a few years they had two children, Arthur and Mabel; however, the marriage was a disaster. As Annie wrote in her Autobiography, "we were an ill-matched pair".The first conflict came over money and Annie's independence. Annie wrote short stories, books for children, and articles. As married women did not have the legal right to own property, Frank was able to collect all the money she earned. Politics further divided the couple. Annie began to support farm workers who were fighting to unionise and to win better conditions. Frank was a Tory and sided with the landlords and farmers. The tension came to a head when Annie refused to attend Communion. In 1873 she left him and returned to London. They were legally separated and Annie took her daughter with her.


Besant began to question her own faith. She turned to leading churchmen for advice, going to see Edward Bouverie Pusey, one of the leaders of the Oxford Movement within the Church of England. When she asked him to recommend books that would answer her questions, he told her she had read too many already. Besant returned to Frank to make a last unsuccessful effort to repair the marriage. She finally left for London.



In the late 1880s she studied at the Birkbeck Literary and Scientific Institution, where her religious and political activities caused alarm. At one point the Institution's governors sought to withhold the publication of her exam results.She fought for the causes she thought were right, starting with freedom of thought, women's rights, secularism, birth control, Fabian socialism and workers' rights. She was a leading member of the National Secular Society alongside Charles Bradlaugh and the South Place Ethical Society.


Divorce was unthinkable for Frank, and was not really within the reach of even middle-class people. Annie was to remain Mrs Besant for the rest of her life. At first, she was able to keep contact with both children and to have Mabel live with her; she also got a small allowance from her husband.


Once free of Frank Besant and exposed to new currents of thought, she began to question not only her long-held religious beliefs but also the whole of conventional thinking. She began to write attacks on the churches and the way they controlled people's lives. In particular she attacked the status of the Church of England as a state-sponsored faith.


Soon she was earning a small weekly wage by writing a column for the National Reformer, the newspaper of the NSS. The NSS argued for a secular state and an end to the special status of Christianity, and allowed her to act as one of its public speakers. Public lectures were very popular entertainment in Victorian times. Besant was a brilliant speaker, and was soon in great demand. Using the railway, she criss-crossed the country, speaking on all of the most important issues of the day, always demanding improvement, reform and freedom.


For many years Besant was a friend of the National Secular Society's leader, Charles Bradlaugh. Bradlaugh, a former soldier, had long been separated from his wife; Besant lived with him and his daughters, and they worked together on many projects. He was an atheist and a republican; he was also trying to get elected as Member of Parliament (MP) for Northampton.


Besant and Bradlaugh became household names in 1877 when they published Fruits of Philosophy, a book by the American birth-control campaigner Charles Knowlton. It claimed that working-class families could never be happy until they were able to decide how many children they wanted. It also suggested ways to limit the size of their families. The Knowlton book was highly controversial, and was vigorously opposed by the Church. Besant and Bradlaugh proclaimed in the National Reformer:


The pair were arrested and put on trial for publishing the Knowlton book. They were found guilty, but released pending appeal. As well as great opposition, Besant and Bradlaugh also received a great deal of support in the Liberal press. Arguments raged back and forth in the letters and comment columns as well as in the courtroom. Besant was instrumental in founding the Malthusian League during the trial, which would go on to advocate for the abolition of penalties for the promotion of contraception. For a time, it looked as though they would be sent to prison. The case was thrown out finally only on a technical point, the charges not having been properly drawn up.


On 6 March 1881 she spoke at the opening of Leicester Secular Society's new Secular Hall in Humberstone Gate, Leicester. The other speakers were George Jacob Holyoake, Harriet Law and Charles Bradlaugh.


Bradlaugh's political prospects were not damaged by the Knowlton scandal and he was elected to Parliament in 1881. Because of his atheism, he asked to be allowed to affirm rather than swear the oath of loyalty. When the possibility of affirmation was refused, Bradlaugh stated his willingness to take the oath. But this option was also challenged. Although many Christians were shocked by Bradlaugh, others (like the Liberal leader Gladstone) spoke up for freedom of belief. It took more than six years before the matter was completely resolved (in Bradlaugh's favour) after a series of by-elections and court appearances.


Meanwhile, Besant built close contacts with the Irish Home Rulers and supported them in her newspaper columns during what are considered crucial years, when the Irish nationalists were forming an alliance with Liberals and Radicals. Besant met the leaders of the Irish home rule movement. In particular, she got to know Michael Davitt, who wanted to mobilise the Irish peasantry through a Land War, a direct struggle against the landowners. She spoke and wrote in favour of Davitt and his Land League many times over the coming decades.


However, Bradlaugh's parliamentary work gradually alienated Besant. Women had no part in parliamentary politics. Besant was searching for a real political outlet, where her skills as a speaker, writer and organiser could do some real good.Along with her theosophical activities, Besant continued to actively participate in political matters. She had joined the Indian National Congress. As the name suggested, this was originally a debating body, which met each year to consider resolutions on political issues. Mostly it demanded more of a say for middle-class Indians in British Indian government. It had not yet developed into a permanent mass movement with local organisation. About this time her co-worker Leadbeater moved to Sydney.


In 1914 World War I broke out, and Britain asked for the support of its Empire in the fight against Germany. Echoing an Irish nationalist slogan, Besant declared, "England's need is India's opportunity". As editor of the New India newspaper, she attacked the colonial government of India and called for clear and decisive moves towards self-rule. As with Ireland, the government refused to discuss any changes while the war lasted.


In 1916 Besant launched the All India Home Rule League along with Lokmanya Tilak, once again modelling demands for India on Irish nationalist practices. This was the first political party in India to have regime change as its main goal. Unlike the Congress itself, the League worked all year round. It built a structure of local branches, enabling it to mobilise demonstrations, public meetings and agitations. In June 1917 Besant was arrested and interned at a hill station, where she defiantly flew a red and green flag. The Congress and the Muslim League together threatened to launch protests if she were not set free; Besant's arrest had created a focus for protest.


The government was forced to give way and to make vague but significant concessions. It was announced that the ultimate aim of British rule was Indian self-government, and moves in that direction were promised. Besant was freed in September 1917, welcomed by crowds all over India, and in December she took over as president of the Indian National Congress for a year.


After the war, a new leadership emerged around Mohandas K. Gandhi – one of those who had written to demand Besant's release. He was a lawyer who had returned from leading Asians in a peaceful struggle against racism in South Africa. Jawaharlal Nehru, Gandhi's closest collaborator, had been educated by a theosophist tutor.


The new leadership was committed to action that was both militant and non-violent, but there were differences between them and Besant. Despite her past, she was not happy with their socialist leanings. Until the end of her life, however, she continued to campaign for India's independence, not only in India but also on speaking tours of Britain.[43] In her own version of Indian dress, she remained a striking presence on speakers' platforms. She produced a torrent of letters and articles demanding independence.
Besant tried as a person, theosophist, and president of the Theosophical Society, to accommodate Krishnamurti's views into her life, without success; she vowed to personally follow him in his new direction although she apparently had trouble understanding both his motives and his new message.The two remained friends until the end of her life.


She was survived by her daughter, Mabel. After her death, colleagues Jiddu Krishnamurti, Aldous Huxley, Guido Ferrando, and Rosalind Rajagopal, built the Happy Valley School in California, now renamed the Besant Hill School of Happy Valley in her honour.


Works
Besides being a prolific writer, Besant was a "practised stump orator" who gave sixty-six public lectures in one year. She also engaged in public debates.
List of Works on Online Books 
List of Work on Open Library 


The Political Status of Women (1874)
Christianity: Its Evidences, Its Origin, Its Morality, Its History (1876)
The Law of Population (1877)
My Path to Atheism (1878, 3rd ed 1885)
Marriage, As It Was, As It Is, And As It Should Be: A Plea for Reform (1878)
The Atheistic Platform: 12 Lectures One by Besant (1884)
Autobiographical Sketches (1885)
Why I Am a Socialist (1886)
Why I Became a Theosophist (1889)
The Seven Principles of Man (1892)
Bhagavad Gita (translated as The Lord's Song) (1895)
Karma (1895)
The Ancient Wisdom (1897)
Dharma (1898)
Thought Forms with C. W. Leadbeater (1901)
The Religious Problem in India (1901)
Thought Power: Its Control and Culture (1901)
Esoteric Christianity (1905 2nd ed)
A Study in Consciousness: A contribution to the science of psychology. (ca 1907, rpt 1918) [3]
Occult Chemistry with C. W. Leadbeater (1908) 
An Introduction to Yoga (1908) 
Australian Lectures (1908)
Annie Besant: An Autobiography (1908 2nd ed)
The Religious Problem in India Lectures on Islam, Jainism, Sikhism, Theosophy (1909) [6]
Man and His Bodies (1896, rpt 1911) 
Elementary Lessons on Karma (1912)
A Study in Karma (1912)
Initiation: The Perfecting of Man (1912) 
Man's Life in This and Other Worlds (1913) 
Man: Whence, How and Whither with C. W. Leadbeater (1913) 
The Doctrine of the Heart (1920) 
The Future of Indian Politics 1922
The Life and Teaching of Muhammad (1932) 
Memory and Its Nature (1935) 
Various writings regarding Helena Blavatsky (1889–1910) 
Selection of Pamphlets as follows: 
"Sin and Crime" (1885)
"God's Views on Marriage" (1890)
"A World Without God" (1885)
"Life, Death, and Immortality" (1886)
"Theosophy" (1925?)
"The World and Its God" (1886)
"Atheism and Its Bearing on Morals" (1887)
"On Eternal Torture" (n.d.)
"The Fruits of Christianity" (n.d.)
"The Jesus of the Gospels and the Influence of Christianity" (n.d.)
"The Gospel of Christianity and the Gospel of Freethought" (1883)
"Sins of the Church: Threatenings and Slaughters" (n.d.)
"For the Crown and Against the Nation" (1886)
"Christian Progress" (1890)
"Why I Do Not Believe in God" (1887)
"The Myth of the Resurrection" (1886)
"The Teachings of Christianity" (1887)


 


 

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