मजरूह सुल्तानपुरी (जन्म- 1 अक्टूबर, 1919)

October 01, 2017

मजरूह सुल्तानपुरी (अंग्रेज़ी: Majrooh Sultanpuri; जन्म- 1 अक्टूबर, 1919, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 24 मई, 2000, मुम्बई) भारतीय हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध शायर और गीतकार थे। इनका पूरा नाम 'असरार उल हसन ख़ान' था। इनके लिखे हुए कलाम में ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से रूबरू कराने की ज़बरदस्त क्षमता थी। मजरूह की कलम की स्याही नज्मों के रूप में एक ऐसी गाथा के रूप में चारों ओर फैली, जिसने उर्दू शायरी को महज मोहब्बत के सब्जबाग़ों से निकालकर दुनिया के दीगर स्याह सफ़ेद पहलुओं से भी जोड़ा। इसके साथ ही उन्होंने रूमानियत को भी नया रंग और ताजगी प्रदान करने की पूरी कोशिश की, जिसमें वह काफ़ी हद तक सफल भी हुए। मजरूह सुल्तानपुरी ने चार दशक से भी ज़्यादा अपने लंबे सिने कैरियर में क़रीब 300 फ़िल्मों के लिए लगभग 4000 गीतों की रचना की है।


जन्म तथा शिक्षा
मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर शहर में अक्टूबर, 1919 को हुआ था। उनके पिता एक पुलिस उप-निरीक्षक थे। पिता मजरूह सुल्तानपुरी को ऊंची से ऊंची तालीम देना चाहते थे। मजरूह ने लखनऊ के "तकमील उल तीब कॉलेज' से यूनानी पद्धति की मेडिकल की परीक्षा उर्तीण की थी। इसके बाद में वे एक हकीम के रूप में काम करने लगे थे। बचपन के दिनों से ही मजरूह सुल्तानपुरी को शेरो-शायरी करने का काफ़ी शौक़ था और वे अक्सर सुल्तानपुर में हो रहे मुशायरों में हिस्सा लिया करते थे। इस दौरान उन्हें काफ़ी नाम और शोहरत भी मिली। उन्होंने अपनी मेडिकल की प्रैक्टिस बीच में ही छोड़ दी और अपना सारा ध्यान शेरो-शायरी की ओर लगाना शुरू कर दिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात मशहूर शायर 'जिगर मुरादाबादी' से हुई। मजरूह सुल्तानपुरी ने अपने चार दशक से भी अधिक लंबे सिने कैरियर में लगभग 300 फ़िल्मों के लिए 4000 गीतों की रचना की। अपने रचित गीतों से श्रोताओं को भावविभोर करने वाले इस महान शायर और गीतकार ने 24 मई, 2000 को इस दुनिया को अलविदा दिया।


वर्ष 1945 में 'सब्बो सिद्धकी इंस्टीट्यूट' द्वारा संचालित एक मुशायरे में हिस्सा लेने के लिए मजरूह सुल्तानपुरी मुम्बई (भूतपूर्त बम्बई) आए। मुशायरे के कार्यक्रम में उनकी शायरी सुनकर मशहूर निर्माता ए.आर. कारदार उनसे काफ़ी प्रभावित हुए और उन्होंने मजरूह सुल्तानपुरी से अपनी फ़िल्म के लिए गीत लिखने की पेशकश की। मजरूह ने कारदार साहब की इस पेशकश को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि फ़िल्मों के लिए गीत लिखना वे अच्छी बात नहीं समझते थे।


'जिगर मुरादाबादी' ने मजरूह सुल्तानपुरी को तब सलाह दी कि फ़िल्मों के लिए गीत लिखना कोई बुरी बात नहीं है। गीत लिखने से मिलने वाली धन राशि में से कुछ पैसे वे अपने परिवार के खर्च के लिए भेज सकते हैं। जिगर मुरादाबादी की सलाह पर मजरूह सुल्तानपुरी फ़िल्म में गीत लिखने के लिए राजी हो गए। संगीतकार नौशाद ने मजरूह सुल्तानपुरी को एक धुन सुनाई और उनसे उस धुन पर एक गीत लिखने को कहा। मजरूह ने उस धुन पर 'गेसू बिखराए, बादल आए झूम के' गीत की रचना की। मजरूह के गीत लिखने के अंदाज से नौशाद काफ़ी प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें अपनी नई फ़िल्म 'शाहजहाँ' के लिए गीत लिखने की पेशकश कर दी। मजरूह ने वर्ष 1946 में आई फ़िल्म शाहजहाँ के लिए गीत 'जब दिल ही टूट गया' लिखा, जो बेहद लोकप्रिय हुआ। इसके बाद मजरूह सुल्तानपुरी और संगीतकार नौशाद की सुपरहिट जोड़ी ने 'अंदाज', 'साथी', 'पाकीजा', 'तांगेवाला', 'धरमकांटा' और 'गुड्डू' जैसी फ़िल्मों में एक साथ काम किया। फ़िल्म 'शाहजहाँ' के बाद महबूब ख़ान की 'अंदाज' और एस. फाजिल की 'मेहन्दी' जैसी फ़िल्मों में अपने रचित गीतों की सफलता के बाद मजरूह सुल्तानपुरी बतौर गीतकार फ़िल्म जगत में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए।


अपनी वामपंथी विचार धारा के कारण मजरूह सुल्तानपुरी को कई बार कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा। कम्युनिस्ट विचारों के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। मजरूह सुल्तानपुरी को सरकार ने सलाह दी कि अगर वे माफ़ी मांग लेते हैं, तो उन्हें जेल से आज़ाद कर दिया जाएगा, लेकिन मजरूह सुल्तानपुरी इस बात के लिए राजी नहीं हुए और उन्हें दो वर्ष के लिए जेल भेज दिया गया। जेल में रहने के कारण मजरूह सुल्तानपुरी के परिवार की माली हालत काफ़ी ख़राब हो गई।


जिस समय मजरूह जेल में अपने दिन काट रहे थे, राजकपूर ने उनकी सहायता करनी चाही, लेकिन मजरूह सुल्तानपुरी ने उनकी सहायता लेने से इंकार कर दिया। इसके बाद राजकपूर ने उनसे एक गीत लिखने की पेशकश की। मजरूह सुल्तानपुरी ने जेल में ही 'एक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल' गीत की रचना की, जिसके एवज में राजकपूर ने उन्हें एक हज़ार रुपये दिए। लगभग दो वर्ष तक जेल में रहने के बाद मजरूह सुल्तानपुरी ने एक बार फिर से नए जोश के साथ काम करना शुरू कर दिया। वर्ष 1953 मे प्रदर्शित फ़िल्म 'फुटपाथ' और 'आरपार' में अपने रचित गीतों की कामयाबी के बाद मजरूह सुल्तानपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री में पुन: अपनी खोई हुई पहचान बनाने में सफल हो गए।


मजरूह सुल्तानपुरी के सिने कैरियर में उनकी जोड़ी संगीतकार एस.डी. बर्मन के साथ भी खूब जमी। एस.डी. बर्मन और मजरूह सुल्तानपुरी की जोड़ी वाली फ़िल्मों में 'पेइंग गेस्ट', 'नौ दो ग्यारह', 'सोलवां साल', 'काला पानी', 'चलती का नाम गाड़ी', 'सुजाता', 'बंबई का बाबू', 'बात एक रात की', 'तीन देवियां', 'ज्वैलथीफ़' और 'अभिमान' जैसी सुपरहिट फ़िल्में शामिल हैं। मजरूह सुल्तानपुरी के महत्त्वपूर्ण योगदान को देखते हुए वर्ष 1993 में उन्हें फ़िल्म जगत के सर्वोच्च सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से नवाजा गया। इसके अलावा वर्ष 1964 मे प्रदर्शित फ़िल्म 'दोस्ती' में अपने रचित गीत 'चाहूँगा मैं तुझे सांझ सवेरे' के लिए वह सर्वश्रेष्ठ गीतकार के 'फ़िल्म फ़ेयर' पुरस्कार से भी सम्मानित किए गए।


जाने-माने निर्माता-निर्देशक नासिर हुसैन की फ़िल्मों के लिए मजरूह सुल्तान पुरी ने सदाबहार गीत लिखकर उनकी फ़िल्मों को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मजरूह सुल्तानपुरी ने सबसे पहले नासिर हुसैन की फ़िल्म 'पेइंग गेस्ट' के लिए सुपरहिट गीत लिखा। उनके सदाबहार गीतों के कारण ही नासिर हुसैन की अधिकतर फ़िल्में आज भी याद की जाती हैं। इन फ़िल्मों में ख़ासकर 'फिर तीसरी मंजिल', 'बहारों के सपने', 'प्यार का मौसम', 'कारवाँ', 'यादों की बारात', 'हम किसी से कम नहीं' और 'जमाने को दिखाना है' जैसी कई सुपरहिट फ़िल्में शामिल हैं।


Majrooh Sultanpuri (1 October 1919 − 24 May 2000) was an Indian Urdu poet, known for his work as an Urdu poet, and as a lyricist and songwriter in the Hindi language Bollywood film industry. He was one of the dominating musical forces in Indian cinema in the 1950s and early 1960s and was an important figure in the Progressive Writers' Movement. He is considered one of the finest avant-garde Urdu poets of 20th century literature.


In his career spanning six decades, he worked with music directors, from Naushad, Madan Mohan, S.D.Burman, Roshan, Ravi, Shankar-Jaikishan, O.P.Nayyar, Usha Khanna, Laxmikant Pyarelal, Anu Malik, R.D.Burman, Rajesh Roshan, Anand-Milind and Jatin-Lalit, to Leslie Lezz Lewis and A.R.Rahman. He won the Filmfare Best Lyricist Award in 1965 for "Chahunga Main Tujhe" in film Dosti, and the highest award in Indian cinema, the Dadasaheb Phalke Award for lifetime achievement in 1993. In the 1980s and 1990s, most of his work was with Anand-Milind, their most notable collaborations being Qayamat Se Qayamat Tak, Lal Dupatta Malmal Ka, Love, Kurbaan and Dahek.


He also wrote timeless classics with Jatin-Lalit for films like Jo Jeeta Wohi Sikander (including the song Pehla Nasha) and Yaara Dildara (including the song Bin Tere Sanam), which are still heard to this day on the airwaves.Majrooh Sultanpuri was born as Asrar ul Hassan Khan in a Tarin Pashtun family, in Sultanpur, Uttar Pradesh, where his father was posted in the Police Department in either 1919 or 1920. His father, though, a police officer, was not too keen on his son receiving English education and Majrooh was therefore sent for traditional 'Madrasa education' which led to his obtaining the qualification first of Dars-e-Nizami - a seven-year course which concentrated on religious affairs along with proficiency in Arabic and Persian- and then the certificate of Alim. He thereafter joined Lucknow's Takmeel-ut-Tib College of Unani.


He was a struggling Hakim when he happened to recite one of his ghazals at a mushaira in Sultanpur. The ghazal was a hit with the audience and Majrooh decided to drop his fledgling medical practice and began writing poetry seriously. Soon he was a 'regular' at mushairas and a "shagird" i.e. disciple of the then top name in Urdu Mushairas viz Jigar Moradabadi. While Majrooh is popular as a film lyricist and is widely known in that capacity, be it known that he also created one of the best-known verses of Urdu poetry, Main akela hee chala tha janibe manzil magar, log saath aate gaye aur carvan banta gaya! (I set off alone towards the destination but people joined in and soon it became a caravan!


In 1945, Majrooh visited Bombay to attend a mushaira at the Saboo Siddique Institute. Here his ghazals and poetry were highly appreciated by the audience. One of the impressed listeners was film producer A.R. KardarHe contacted Jigar Moradabadi who helped him to meet Majrooh. However, Majrooh refused to write for films because he didn't think very highly of them. But Jigar Muradabadi persuaded him, saying that films would pay well and would help Majrooh to support his family. Kardar then took him to music composer Naushad who put the young writer to test. He gave Majrooh a tune and asked him to write something in the same metre, and Majrooh wrote Jab Usne Gesu Bikhraye, Badal Aaye Jhoom Ke.... Naushad liked what he wrote and Majrooh was signed on as the lyricist of the film Shah Jehan (1946).[9] The songs of the film became so immensely popular that K.L. Saigal wanted Jab Dil Hi Toot Gaya to be played at his funeral. But before he could react to the large-scale appeal created by these lines, he fell ill. The harsh Bombay weather made him leave the city and return to his hometown in the North.


Shah Jehan was followed by S. Fazil's Mehndi, Mehboob's Andaaz (1949), and Shahid Latif's Aarzoo. Just as Majrooh was establishing himself as a lyricist and songwriter of repute, his leftist leanings got him into trouble. The government wasn't amused by his anti-establishment poems and he was jailed in 1949 along with other leftists like Balraj Sahni. Majrooh was asked to apologise, but he refused and was sentenced to two years in prison. While he was in prison, his eldest daughter was born. During this time his family experienced considerable financial difficulties. Raj Kapoor commissioned a song ("Dunia Banane Wale") from Majrooh for which he paid him Rs. 1000.


Majrooh's political beliefs were further manifested when his second daughter married the son of the Urdu writer and socialist Zoe Ansari. Toward the end both Majrooh and Zoe Ansari were disenchanted with the direction socialism had taken in the Soviet Union and China. Their desire to better the lives of the masses found an outlet in their writings.


Majrooh went on to write lyrics for popular films throughout the 1956s. Along with Faiz Ahmed Faiz, Majrooh was considered the most notable ghazal writer.Majrooh won his only Filmfare Best Lyricist Award for the song "Chahunga Mein Tujhe Saanj Savere" from Dosti.He was also awarded the Dadasaheb Phalke Award in 1993. He was the first lyricist to win the prestigious award named after Dadasaheb Phalke.Majrooh Sultanpuri had a severe attack of pneumonia and died in Bombay on 24 May 2000. He was aged 80 at the time of his death.




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