चन्दन सिंह गढ़वाली (मृत्यु: 1 अक्टूबर, 1979)

October 01, 2017

चन्दन सिंह गढ़वाली (अंग्रेज़ी: Chandan Singh Garhwali, जन्म: 1891 ई. - मृत्यु: 1 अक्टूबर, 1979) भारत के क्रांतिकारियों में से एक थे। चन्दन सिंह 'गढ़वाल रेजीमेंट' के प्रमुख थे। 'सविनय अवज्ञा आन्दोलन' के दौरान जब उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त में अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ाँ के नेतृत्व में ब्रिटिश विरोधी संघर्ष ज़ोरों पर था, तो उसके दमन हेतु ब्रिटिश सरकार ने चन्दन सिंह की 'गढ़वाल रेजीमेंट' को नियुक्त किया। आन्दोलन के दौरान जब अंग्रेज़ अधिकारियों ने अहिंसक प्रदर्शन कर रहे आन्दोलनकारियों पर गोलियाँ चलाने की आज्ञा दी, तब चन्दन सिंह ने गोली चलाने से इंकार कर दिया। इस पर उन्हें पदच्युत करके दण्डित किया गया।


जन्म तथा शिक्षा
चन्दन सिंह का जन्म उत्तराखण्ड के पौड़ी गढ़वाल ज़िले में पट्टी चौथन के गाँव रोनशेहरा में सन 1891 में हुआ था। इनके घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। ग़रीबी के कारण वे प्राथमिक स्तर से अधिक शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाये थे। सन 1914 में चन्दन सिंह लैंसडाउन में स्थित गढ़वाली रेजीमेन्ट केन्द्र में भर्ती हो गए। भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात चन्दन सिंह कम्युनिस्ट बन गये। उन्हें 1948 में जेल हुई। अपनी रिहाई के पश्चात उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन आम जनता की सेवा में बिता दिया। वे 1 अक्टूबर, 1979 को 88 वर्ष की अवस्था में इस दुनिया से चले गये।


चन्दन सिंह ने मेसोपोटामिया और फ्राँस में कार्यवाही देखी। उन्होंने 1921 तक उत्तर पश्चिमी प्रान्त की देख-रेख की। चन्दन सिंह में राष्ट्रीय भावना भी कूट-कूट कर भरी थी। उनकी इस देश भक्ति का प्रमाण 1930 के 'नमक सत्याग्रह आन्दोलन' में देखने को मिला। चन्दन सिंह की बटालियन '218वीं रॉयल गढ़वाल राइफल्स' पेशावर पर तैनात कर दी गयी थी। 23 अप्रैल को कैप्टन रिकेट अपने 72 सैनिकों के साथ पेशावर के क़िस्सा ख़ान क्षेत्र तक फैल गये। निहत्थे पठानों की दुकानों को घेर लिया गया। कैप्टेन रिकेट ने भीड़ को तितर-बितर करने का आदेश दिया और बाज़ार ख़ाली करा दिया। लेकिन उसके इस आदेश पर अमल नहीं किया गया।


कैप्टन रिकेट ने गढ़वालियों पर गोली चलाने का आदेश दिया। चन्दन सिंह ने रिकेट के इस आदेश पर दख़ल दिया और चिल्लाकर कहा कि- "गढ़वाली गोली नहीं चलाएँगें"। गढ़वालियों ने चन्दन सिंह के आदेश का पालन किया, जिस पर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। चन्दन सिंह को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई। सज़ा पूरी करने के बाद चन्दन सिंह को 1941 में रिहा कर दिया गया उन्होंने 1942 के 'भारत छोड़ो आन्दोलन' में हिस्सा लिया। आन्दोलन में सक्रियता के कारण उन्हें गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया।


पेशावर काण्ड के नायक चन्द्र सिंह गढ़वाली लम्बी क़ैद काटने के बाद गांधी जी के आश्रम में रहने गए . साथ में भार्या भी थी , जो शादी के बाद कभी भी पति के संसर्ग का लाभ न ले सकी थी . गांधी के आश्रम में ग्यारह व्रतों में से ब्रह्मचर्य का प्रमुख स्थान था . वह स्वयं भी पैंतीस साल की वय में ब्रह्मचर्य का संकल्प ले चुके थे , और अपनी पत्नी को बा ( माँ) कह कर पुकारते थे . विवाहित आश्रम वासी भी वहां भाई - बहन की तरह रहते थे . प्रयोग धर्मी महात्मा की यह अजब सनक थी . वह अपने मंझले पुत्र मणि लाल को ब्रह्मचर्य खंडन के अपराध में पैंतीस साल तक अविवाहित रहने की कड़ी सज़ा दे चुके थे . गढ़वाली दम्पति को आश्रम का नियम समझा दिया गया . भागीरथी देवी को कोठरी में सुलाया गया और चन्द्र सिंह की खटिया बाहर पेड़ के नीचे लगा दी गयी . करना परमात्मा का ऐसा हुआ की रात में बारिश आई और गढ़वाली को अपनी खटिया बरामदे में ले जानी पड़ी . लेकिन जगद्नियन्ता को कुछ और ही मंज़ूर था . बारिश तिरछी होने लगी और बौछारों ने बरामदे को भी चपेट में ले लिया . खटिया भीतर ही ले जानी पड़ी . एक विवाहित ब्रह्मचारिणी यह सब देख रही थी . उसके पति के रात के पहरे की ड्यूटी थी और वह अकेले रह कर हलकान होती रहती थी . उसने गांधी जी तक शिकायत पंहुचायी . प्रकोप की आशंका से सब थर थर कामने लगे . ऋषि का क्रोध अनशन की परिणति तक पंहुचता था . महात्मा ने ब्रह्मचारिणी को लताड़ा - तू रात के दो बजे इनकी कोठरी में क्यों झाँक रही थी ? साथ ही फैसला सुनाया की अब से चन्द्र सिंह दम्पति एक साथ , एक ही कोठरी में , एक ही खाट पर रहेंगे . उन्होंने स्वयं पर विजय प्राप्त की , जो सर्वाधिक दुर्लभ है .


 

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