श्यामजी कृष्ण वर्मा (जन्म: 4 अक्टूबर, 1857)

October 04, 2017

श्यामजी कृष्ण वर्मा (अंग्रेज़ी: Shyamji Krishna Varma, जन्म: 4 अक्टूबर, 1857 - मृत्यु: 31 मार्च, 1930) भारत के उन अमर सपूतों में हैं जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत की आज़ादी के लिए लगा दिया। ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों से त्रस्त होकर भारत से इंग्लैण्ड चले गये श्यामजी कृष्ण वर्मा ने अपना सारा जीवन भारत की स्वतन्त्रता के लिए माहौल बनाने में और नवयुवकों को प्रेरित करने में लगाया। स्वामी दयानंद सरस्वती के सान्निध्य में रहकर मुखर हुए संस्कृत व वेदशास्त्रों के मूर्धन्य विद्वान के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त श्यामजी कृष्ण वर्मा 1885 में तत्कालीन रतलाम राज्य के 1889 तक दीवान पद पर आसीन रहे।


जीवन परिचय
श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म 4 अक्टूबर, 1857 को गुजरात के मांडवी गांव में हुआ था। श्यामजी कृष्ण वर्मा ने सन् 1888 में अजमेर में वकालत के दौरान स्वराज के लिए काम करना शुरू कर दिया था। मध्य प्रदेश में रतलाम और गुजरात में जूनागढ़ में दीवान रहकर उन्होंने जनहित के काम किए। सन् 1897 में वे पुनः इंग्लैंड गए। 1905 में लॉर्ड कर्ज़न की ज़्यादतियों के विरुद्ध संघर्षरत रहे। इसी वर्ष इंग्लैंड से मासिक 'द इंडियन सोशिओलॉजिस्ट' प्रकाशित किया, जिसका प्रकाशन बाद में जिनेवा में भी किया गया। इंग्लैंड में रहकर उन्होंने इंडिया हाउस की स्थापना की। भारत लौटने के बाद 1905 में उन्होंने क्रांतिकारी छात्रों को लेकर इंडियन होमरूल सोसायटी की स्थापना की। श्यामजी कृष्ण वर्मा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रेरित थे। 1918 के बर्लिन और इंग्लैंड में हुए विद्या सम्मेलनों में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया था। क्रांतिकारी गतिविधियों के माध्यम से आज़ादी के संकल्प को गतिशील करने वाले श्यामजी कृष्ण वर्मा पहले भारतीय थे, जिन्हें ऑक्सफोर्ड से एम.ए. और बैरिस्टर की उपाधियां मिलीं थीं। पुणे में दिए गए उनके संस्कृत के भाषण से प्रभावित होकर मोनियर विलियम्स ने वर्माजी को ऑक्सफोर्ड में संस्कृत का सहायक प्रोफेसर बना दिया था। सात समंदर पार से अंग्रेज़ों की धरती से ही भारत मुक्ति की बात करना सामान्य नहीं था, उनकी देश भक्ति की तीव्रता थी ही, स्वतंत्रता के प्रति आस्था इतनी दृढ़ थी कि पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा ने अपनी मृत्यु से पहले ही यह इच्छा व्यक्त की थी कि उनकी मृत्यु के बाद अस्थियां स्वतंत्र भारत की धरती पर ले जाई जाए। भारतीय स्वतंत्रता के 17 वर्ष पहले दिनांक 31 मार्च 1930 को उनकी मृत्यु जिनेवा में हुई, उनकी मृत्यु के 73 वर्ष बाद स्वतंत्र भारत के 56 वर्ष बाद 2003 में भारत माता के सपूत की अस्थियां गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर देश की धरती पर लाने की सफलता मिली।क्रांतिकारी शहीद मदनलाल ढींगरा इनके शिष्यों में से एक थे। उनकी शहादत पर उन्होंने छात्रवृत्ति भी शुरू की थी। वीर सावरकर ने उनके मार्गदर्शन में लेखन कार्य किया था। 31 मार्च, 1933 को जेनेवा के अस्पताल में इनका निधन हुआ।


श्यामजी कृष्ण वर्मा आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से 1883 ई.में बी.ए. की डिग्री प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय होने के अतिरिक्त अंग्रेज़ी राज्य को हटाने के लिए विदेशों में भारतीय नवयुवकों को प्रेरणा देने वाले, क्रांतिकारियों का संगठन करने वाले पहले हिन्दुस्तानी थे। पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा को देशभक्ति का पहला पाठ पढ़ाने वाले आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती थे। 1875 ई. में जब स्वामी दयानंद जी ने बम्बई (अब मुंबई‌) में आर्य समाज की स्थापना की तो श्यामजी कृष्ण वर्मा उसके पहले सदस्य बनने वालों में से थे। स्वामी जी के चरणों में बैठ कर इन्होंने संस्कृत ग्रंथों का स्वाध्याय किया। वे महर्षि दयानंद द्वारा स्थापित परोपकारिणी सभा के भी सदस्य थे। बम्बई से छपने वाले महर्षि दयानंद के वेदभाष्य के प्रबंधक भी रहे। 1885 ई. में संस्कृत की उच्चतम डिग्री के साथ बैरिस्टरी की परिक्षा पास करके भारत लौटे। इंग्लैण्ड में स्वाधीनता आन्दोलन के प्रयासों को सबल बनाने की दृष्टि से श्यामजी कृष्ण वर्मा जी ने अंग्रेज़ी में जनवरी 1905 ई. से 'इन्डियन सोशियोलोजिस्ट' नामक मासिक पत्र निकाला। 18 फ़रवरी, 1905 ई. को उन्होंने इंग्लैण्ड में ही 'इन्डियन होमरूल सोसायटी ' की स्थापना की और घोषणा की कि हमारा उद्देश्य "भारतीयों के लिए भारतीयों के द्वारा भारतीयों की सरकार स्थापित करना है" घोषणा को क्रियात्मक रूप देने के लिए लन्दन में 'इण्डिया हाउस' की स्थापना की ,जो कि इंग्लैण्ड में भारतीय राजनीतिक गतिविधियों तथा कार्यकलापों का सबसे बड़ा केंद्र रहा।


पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा भारत की स्वतंत्रता पाने का प्रमुख साधन सरकार से असहयोग करना समझते थे। आपकी मान्यता रही और कहा भी करते थे कि यदि भारतीय अंग्रेज़ों को सहयोग देना बंद कर दें तो अंग्रेज़ी शासन एक ही रात में धराशायी हो सकता है। शांतिपूर्ण उपायों के समर्थक होते हुए भी श्यामजी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए हिंसापूर्ण उपायों का परित्याग करने के पक्ष में नहीं थे। उनका यह दावा था कि भारतीय जनता की लूट और हत्या करने के लिए सबसे अधिक संगठित गिरोह अंग्रेज़ों का ही है। जब तक अंग्रेज़ स्वतंत्रता के लिए आन्दोलन करने की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं तब तक हिंसक उपायों की आवश्यकता नहीं है, किन्तु जब सरकार प्रेस और भाषण की स्वतंत्रता पर पाबंदियां लगाती है, भीषण दमन के उपायों का प्रयोग करती है तो भारतीय देशभक्तों को अधिकार है कि वे स्वतंत्रता पाने के लिए सभी प्रकार के सभी आवश्यक साधनों का प्रयोग करें। उनका मानना था कि हमारी कार्यवाही का प्रमुख साधन रक्तरंजित नहीं है, किन्तु बहिष्कार का उपाय है। जिस दिन अंग्रेज़ भारत में अपने नौकर नहीं रख सकेंगे, पुलिस और सेना में जवानों की भर्ती करने में असमर्थ हो जायेंगे, उस दिन भारत में ब्रिटिश शासन अतीत की वास्तु हो जाएगा। इन्होंने अपनी मासिक पत्रिका इन्डियन सोशियोलोजिस्ट के प्रथम अंक में ही लिखा था कि अत्याचारी शासक का प्रतिरोध करना न केवल न्यायोचित है अपितु आवश्यक भी है और अंत में इस बात पर भी बल दिया कि अत्याचारी, दमनकारी शासन का तख्ता पलटने के लिए पराधीन जाति को सशस्त्र संघर्ष का मार्ग अपनाना चाहिए।


रतलाम में श्यामजी कृष्ण वर्मा सृजन पीठ की स्थापना भी की जा चुकी है। श्यामजी कृष्ण वर्मा की जन्मस्थली माण्डवी गुजरात क्रांति तीर्थ के रूप में विकसित किया जा रहा है। जहां स्वाधीनता संग्राम सैनानियों की प्रतिमाएं व 21 हजार वृक्षों का क्रांतिवन आकार ले रहा है। रतलाम में ही स्वतंत्रता संग्राम सैनानियों के परिचय गाथा की गैलरी प्रस्तावित है, ताकि भारतीय स्वतंत्रता के आधारभूत मूल तत्वों का स्मरण एवं उनके संबंधित शोध कार्य की ओर आगे बढ़ सके, लेकिन इसके लिए रतलाम ज़िला प्रशासन एवं मध्यप्रदेश शासन की मुखरता भी अपेक्षित है।


Shyamji Krishna Varma (4 October, 1857 – 30 March, 1930) was an Indian revolutionary fighter, lawyer and journalist who founded the Indian Home Rule Society, India House and The Indian Sociologist in London. A graduate of Balliol College, Krishna Varma was a noted scholar in Sanskrit and other Indian languages. He pursued a brief legal career in India and served as the Divan of a number of Indian princely states in India. He had, however, differences with Crown authority, was dismissed following a supposed conspiracy of local British officials at Junagadh and chose to return to England. An admirer of Dayanand Saraswati's approach of cultural nationalism, and of Herbert Spencer, Krishna Varma believed in Spencer's dictum: "Resistance to aggression is not simply justified, but imperative".


In 1905 he founded the India House and The Indian Sociologist, which rapidly developed as an organised meeting point for radical nationalists among Indian students in Britain at the time and one of the most prominent centres for revolutionary Indian nationalism outside India. Most famous among the members of this organisation was Veer Savarkar. Krishna Varma moved to Paris in 1907, avoiding prosecution.


Shyamji Krishna Varma was born on 4 October 1857 in Mandvi, Cutch State (now Kutch, Gujarat) as Shamji, the son of Karsan Bhanushali (Karsan Nakhua; Nakhua is the surname while Bhanushali is the community name), a labourer for cotton press company, and Gomatibai, who died when Shyamji was only 11 years old. He was raised by his grandmother. His ancestors belonged to Bhachunda (23°12'3"N 69°0'4"E), a village now in Abdasa taluka of Kutch district. They migrated to Mandvi in search of employment and because of family disputes. After completing secondary education in Bhuj he went to Mumbai for further education at Wilson High School. While in Mumbai, he learned Sanskrit.


In 1875, Shyamji got married to Bhanumati, a daughter of a wealthy businessman of the Bhatia community and sister of his school friend Ramdas. Then he got in touch with the nationalist Swami Dayananda Saraswati, a radical reformer and an exponent of the Vedas, who had founded the Arya Samaj. He became his disciple and was soon conducting lectures on Vedic philosophy and religion. In 1877, a public speaking tour secured him a great public recognition. He became the first non-Brahmin to receive the prestigious title of Pandit by the Pandits of Kashi in 1877.He came to the attention of Monier Williams, an Oxford professor of Sanskrit who offered Shyamji a job as his assistant.


Later in 1905, Shyamji attended the United Congress of Democrats held at Holborn Town Hall as a delegate of the India Home Rule Society. His resolution on India received an enthusiastic ovation from the entire conference. Shyamji’s activities in England aroused the concern of the British government: He was disbarred from Inner Temple and removed from the membership list on 30 April 1909 for writing anti-British articles in The Indian Sociologist. Most of the British press were anti–Shyamji and carried outrageous allegations against him and his newspaper. He defended them boldly. The Times referred to him as the "Notorious Krishnavarma". Many newspapers criticised the British progressives who supported Shyamji and his view. His movements were closely watched by British Secret Services, so he decided to shift his headquarters to Paris, leaving India House in charge of Vir Savarkar. Shyamji left Britain secretly before the government tried to arrest him.



He published two more issues of Indian Sociologist in August and September 1922, before ill health prevented him continuing. He died in hospital at 11:30pm on 30 March 1930 leaving his wife, Bhanumati Krishnavarma.


News of his death was suppressed by the British government in India. Nevertheless, tributes were paid to him by Bhagat Singh and other inmates in Lahore Jail where they were undergoing a long-term drawn-out trial. Maratha, an English daily newspaper started by Bal Gangadhar Tilak paid tribute to him.


He had made prepaid arrangements with the local government of Geneva and St Georges cemetery to preserve his and his wife’s ashes at the cemetery for 100 years and to send their urns to India whenever it became independent during that period. Requested by Paris-based scholar Dr Prithwindra Mukherjee, the then Prime Minister Indira Gandhi agreed to repatriate the ashes. Finally on 22 August 2003, the urns of ashes of Shyamji and his wife Bhanumati were handed over to then Chief Minister of Gujarat State Narendra Modi by the Ville de Genève and the Swiss government 55 years after Indian Independence. They were brought to Mumbai and after a long procession throughout Gujarat, they reached Mandvi, his birthplace. A memorial called Kranti Teerth dedicated to him was built and inaugurated in 2010 near Mandvi. Spread over 52 acres, the memorial complex houses a replica of India House building at Highgate along with statues of Shyamji Krishna Varma and his wife. Urns containing Krishna Verma's ashes, those of his wife, and a gallery dedicated to earlier activists of Indian independence movement is housed within the memorial. Krishna Verma was disbarred from the Inner Temple in 1909. This decision was revisited in 2015, and a unanimous decision taken to posthumously reinstated him.


In the 1970s, a new town developed in his native state of Kutch, was named after him as Shyamji Krishna Varmanagar in his memory and honor. India Post released postal stamps and first day cover commemorating him. Kuchchh University was renamed after him.