बेगम अख़्तर (जन्म: 7 अक्तूबर, 1914)

October 07, 2017

बेगम अख़्तर (अंग्रेज़ी: Begum Akhtar, जन्म: 7 अक्तूबर, 1914 - मृत्यु: 30 अक्टूबर, 1974) भारत की प्रसिद्ध ग़ज़ल और ठुमरी गायिका थीं जिन्हें कला के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन 1968 में पद्म श्री और सन 1975 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। बेगम अख़्तर को मल्लिका-ए-ग़ज़ल भी कहा जाता है।


जीवन परिचय
उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद में 7 अक्टूबर 1914 में जन्मी बेगम अख़्तर का बचपन के दिनों से ही संगीत की ओर रुझान था। वह पार्श्वगायिका बनना चाहती थी। उनके परिवार वाले उनकी इस इच्छा के सख्त ख़िलाफ़ थे लेकिन उनके चाचा ने बेगम अख़्तर के संगीत के प्रति लगाव को पहचान लिया और उन्हें इस राह पर आगे बढने के लिये प्रेरित किया। बेगम अख़्तर ने फ़ैज़ाबाद में सारंगी के उस्ताद इमान ख़ाँ और अता मोहम्मद खान से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली। इसके अलावा उन्होंने मोहम्मद खान, अब्दुल वहीद खान से भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखा।अपनी जादुई आवाज से श्रोताओं के दिलों के तार झंकृत करने वाली यह महान गायिका 30 अक्तूबर 1974 को इस दुनिया को अलविदा कह गई। बेगम अख़्तर की तमन्ना आखिरी समय तक गाते रहने की थी जो पूरी भी हुई। मृत्यु से आठ दिन पहले उन्होंने मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी की यह ग़ज़ल रिकार्ड की थी


बचपन के दिनों में उस्ताद मोहम्मद खान और बेगम अख़्तर के बीच ऐसी घटना हुई कि बेगम अख़्तर ने गाना सीखने से मना कर दिया। उन दिनों बेगम अख़्तर सही सुर नहीं लगा पाती थीं। उनके गुरु ने उन्हें इसके बारे में कई बार सिखाया और जब वह नहीं सीख पाई तो उन्हें डांट दिया। इसके बाद बेगम अख़्तर रोने लगी और कहा हमसे नहीं बनता नानाजी, मैं गाना नहीं सीखूंगी। तब उनके उस्ताद ने कहा बस इतने में हार मान ली तुमने, नहीं बिट्टो ऐसे हिम्मत नहीं हारते, मेरी बहादुर बिटिया चलो एक बार फिर से सुर लगाने में जुट जाओ। उनकी यह बात सुनकर बेगम अख़्तर ने फिर से रियाज़ शुरू किया और सही सुर लगाये। तीस के दशक में बेगम अख़्तर पारसी थियेटर से जुड़ गईं। नाटकों में काम करने के कारण उनका रियाज़ छूट गया जिससे उनके गुरु मोहम्मद अता खान काफ़ी नाराज हुये और कहा जब तक तुम नाटक में काम करना नहीं छोड़ती मैं तुम्हें गाना नहीं सिखाऊंगा। उनकी इस बात पर बेगम अख़्तर ने कहा आप सिर्फ एक बार मेरा नाटक देखने आ जाएँ उसके बाद आप जो कहेंगे, मैं करूंगी। उस रात मोहम्मद अता खान बेगम अख़्तर के नाटक तुर्की हूर देखने गये। जब बेगम अख़्तर ने उस नाटक का गाना 'चल री मोरी नैय्या' गाया तो उनकी आंखों में आंसू आ गये और नाटक समाप्त होने के बाद बेगम अख़्तर से उन्होंने कहा बिटिया तू सच्ची अदाकारा है जब तक चाहो नाटक में काम करो।


नाटकों में मिली शोहरत के बाद बेगम अख़्तर को कलकत्ता की ईस्ट इंडिया कंपनी में अभिनय करने का मौका मिला। बतौर अभिनेत्री बेगम अख़्तर ने 'एक दिन का बादशाह' से अपने सिने कैरियर की शुरूआत की लेकिन इस फ़िल्म की असफलता के कारण अभिनेत्री के रुप में वह कुछ ख़ास पहचान नहीं बना पाई। वर्ष 1933 में ईस्ट इंडिया के बैनर तले बनी फ़िल्म 'नल दमयंती' की सफलता के बाद बेगम अख़्तर बतौर अभिनेत्री अपनी कुछ पहचान बनाने में सफल रही। इस बीच बेगम अख़्तर ने अमीना, मुमताज बेगम (1934), जवानी का नशा (1935), नसीब का चक्कर जैसी फ़िल्मों मे अपने अभिनय का जौहर दिखाया। कुछ समय के बाद वह लखनऊ चली गई जहां उनकी मुलाकात महान निर्माता -निर्देशक महबूब खान से हुई जो बेगम अख़्तर की प्रतिभा से काफ़ी प्रभावित हुये और उन्हें मुंबई आने का न्योता दिया। वर्ष 1942 में महबूब खान की फ़िल्म 'रोटी' में बेगम अख़्तर ने अभिनय करने के साथ ही गाने भी गाये। उस फ़िल्म के लिए बेगम अख़्तर ने छह गाने रिकार्ड कराये थे लेकिन फ़िल्म निर्माण के दौरान संगीतकार अनिल विश्वास और महबूब खान के आपसी अनबन के बाद रिकार्ड किये गये तीन गानों को फ़िल्म से हटा दिया गया। बाद में उनके इन्हीं गानों को ग्रामोफोन डिस्क ने जारी किया गया। कुछ दिनों के बाद बेगम अख़्तर को मुंबई की चकाचौंध कुछ अजीब सी लगने लगी और वह लखनऊ वापस चली गईं।


प्रसिद्ध फ़िल्में


अमीना (1934)
मुमताज बेगम (1934)
रूप कुमारी (1934)
जवानी का नशा (1935)
नसीब का चक्कर (1936)
अनारबाला (1940)
रोटी (1942)
दानापानी (1953)
एहसान (1954)
जलसा घर (1958)



1945 में जब उनकी शौहरत अपनी चरम सीमा पर थी तब उन्हें शायद सच्चा प्यार मिला और उन्हों ने इश्तिआक अहमद अब्बासी, जो पेशे से वकील थे, से निकाह कर लिया और अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी से बेगम अख़्तर बन गयीं। गायकी छोड़ दी और पर्दानशीं हो गयीं। बहुत से लोगों ने उनके गायकी छोड़ देने पर छींटाकशी की, "सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली" लेकिन उन्होंने अपना घर ऐसे बसाया मानों यही उनकी इबादत हो। पांच साल तक उन्होंने बाहर की दुनिया में झांक कर भी न देखा। लेकिन जो तकदीर वो लिखा कर लायी थीं उससे कैसे लड़ सकती थीं। वो बीमार रहने लगीं और डाक्टरों ने बताया कि उनकी बीमारी की एक ही वजह है कि वो अपने पहले प्यार, यानी कि गायकी से दूर हैं। उनके शौहर की शह पर 1949 में वो एक बार फ़िर अपने पहले प्यार की तरफ़ लौट पड़ीं और ऑल इंडिया रेडियो की लखनऊ शाखा से जुड़ गयीं और मरते दम तक जुड़ी रहीं। उन्होंने न सिर्फ़ संगीत की दुनिया में वापस कदम रखा बल्कि हिन्दी फ़िल्मों में भी गायकी के साथ साथ अभिनय के क्षेत्र में भी अपना परचम फ़हराया।


रेडियो में गाना शुरू हुआ तो संगीत सम्मेलन में जाने लगीं और इसी बीच फ़िल्मों में भी वापसी हुई। महान संगीतकार मदन मोहन के कहने पर बेगम अख़्तर ने 1953 में प्रदर्शित फ़िल्म 'दानापानी' के गीत 'ऐ इश्क मुझे और कुछ याद नही' और 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म 'एहसान' के गीत 'हमें दिल में बसा भी लो' गाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। पचास के दशक में बेगम अख़्तर ने फ़िल्मों मे काम करना कुछ कम कर दिया। वर्ष 1958 में सत्यजीत राय द्वारा निर्मित फ़िल्म 'जलसा घर' बेगम अख़्तर के सिने कैरियर की अंतिम फ़िल्म साबित हुई। इस फ़िल्म में उन्होंने एक गायिका की भूमिका निभाकर उसे जीवंत कर दिया था। इस दौरान वह रंगमंच से भी जुड़ी रही और अभिनय करती रही।


सम्मान और पुरस्कार
सन 1968 में पद्म श्री
वर्ष 1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
सन 1975 में पद्म भूषण


Akhtari Bai Faizabadi, also known as Begum Akhtar (7 October 1914 – 30 October 1974), was a well known Indian singer of Ghazal, Dadra, and Thumri genres of Hindustani classical music.


She received the Sangeet Natak Akademi Award for vocal music, and was awarded Padma Shri and later, Padma Bhushan, posthumously by Govt. of India. She was given the title of Mallika-e-Ghazal (Queen of Ghazals)
Her father, Asghar Hussain, was a young lawyer who fell in love with her mother Mushtari and made her his second wife. He subsequently disowned her and his twin daughters Zohra and Bibbi (Akhtar).
Akhtar was barely seven when she was captivated by the music of Chandra Bai, an artist attached to a touring theatre group. However at her uncle's insistence she was sent to train under Ustad Imdad Khan, the great sarangi exponent from Patna, and later under Ata Mohammed Khan of Patiala. Later, she travelled to Calcutta with her mother and learnt music from classical stalwarts like Mohammad Khan, Abdul Waheed Khan of Lahore, and finally she became the disciple of Ustad Jhande Khan.


Her first public performance was at the age of fifteen. The famous poet Sarojini Naidu appreciated her singing during a concert which was organised in the aid of victims of the 1934 Nepal–Bihar earthquake. This encouraged her to continue singing ghazals with more enthusiasm. She cut her first disc for the Megaphone Record Company, at that time. A number of gramophone records were released carrying her ghazals, dadras, thumris, etc. She was amongst the early female singers to give public concert, and break away from singing in mehfils or private gatherings, and in time came to be known as Mallika-e-Ghazal (Queen of Ghazal).


Begum Akhtar's good looks and sensitive voice made her an ideal candidate for a film career in her early years. When she heard great musicians like Gauhar Jaan and Malak Jan, however, she decided to forsake the glamour of the film world for a career in Indian classical music. Her supreme artistry in light classical music had its moorings in the tradition of pure classicism. She chose her repertoire in primarily classical modes: a variety of raags, ranging from simple to complex. After the advent of talkie era in India, Begum Akhtar acted in a few Hindi movies in the 1930s. East India Film Company of Calcutta approached her to act in "King for a Day" (alias Ek Din Ka Badshah) and Nal Damayanti in 1933.


Like others of that era, she sang her songs herself in all her films. She continued acting in the following years. Subsequently, Begum Akhtar moved back to Lucknow where she was approached by the famous producer-director Mehboob Khan, to act in Roti which was released in 1942 and whose music was composed by the maestro Anil Biswas. "Roti" contained six of her ghazals but unfortunately due to some trouble with the producer, Mehboob Khan subsequently deleted three or four ghazals from the film. All the ghazals are available on Megaphone gramophone records. Begum Akhtar, meanwhile, left Bombay and returned to Lucknow.


In 1945, Akhtari Bai married a Lucknow-based barrister, Ishtiaq Ahmed Abbasi, and became known as Begum Akhtar. However, after marriage, due to her husband's restrictions, she could not sing for almost five years and subsequently, fell ill. That is when her return to music was prescribed as a befitting remedy, and in 1949 she returned to the recording studios. She sang three ghazals and a dadra at Lucknow All India Radio station. She wept afterwards and returned to singing in concerts, which she continued to do unto death. She sang publicly in Lucknow, in a women's only concert in aid of the war, which was held in 1962.


Her voice matured with time, acquiring richness and depth. She sang ghazals and other light classical pieces, in her inimitable style. She has nearly four hundred songs to her credit. She was a regular performer on All India Radio. She usually composed her own ghazals and most of her compositions were raag based. She sang the timeless Bengali classical song "Jochona Koreche Aari" (জোছনা করেছে আড়ি).


During her last concert in Balaramapuram near Thiruvananthapuram, she raised the pitch of her voice as she felt that her singing had not been as good as she had wanted it to be and felt unwell. The stress she put herself under resulted in her falling ill and she was rushed to the hospital.


She died on 30 October 1974 in the arms of Nilam Gamadia, her friend, who invited her to Ahmedabad, which became her final performance.


Her tomb was a mango orchard within her home, ‘Pasanda Bagh’ in Thakurganj area, of Lucknow. She was buried alongside her mother, Mushtari Sahiba. However, over the years, much of the garden has been lost to the growing city, and the tomb has fallen into disrepair. The marble graves enclosed in a red brick enclosure, were restored in 2012, along with their pietra dura style marble inlay. Attempts are on to convert her home built in 1936 in China bazaar, Lucknow into a museum.


Her disciples include Shanti Hiranand, who later received Padma Shri and wrote, a biography Begum Akhtar: The Story of My Ammi (2005). Art critic S. Kalidas directed a documentary on her titled Hai Akhtari.