मुराद बख़्श (जन्म- 9 अक्टूबर 1624 ई.)

October 09, 2017

मुराद बख़्श, शाहजहाँ और मुमताज़ महल (नूरजहाँ) का सबसे छोटा पुत्र था। उसका  जन्म- 9 अक्टूबर 1624 ई. में हुआ। वह युवावस्था प्राप्त करने पर अत्यन्त ही वीर, साहसी और युद्ध-प्रिय युवक सिद्ध हुआ। उसने कांगड़ा घाटी में एक विद्रोह को दबाया और बल्ख पर अधिकार कर लिया। हालाँकि बाद में उसे वहाँ से लौट आना पड़ा। 1657 ई. में जब शाहजहाँ अस्वस्थ हुआ, उस समय मुराद गुजरात का प्रान्तीय शासक था। वह दुस्साहसी और अधीर प्रवृत्ति का युवक था। अपने सबसे बड़े भाई दारा शिकोह को उत्तराधिकार से वंचित रखने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ होकर सूरत को लूटा और अपने को सम्राट घोषित कर दिया। उसने अपने नाम से सिक्के भी ढलवाये। किन्तु शीघ्र ही बड़े भाई औरंगज़ेब के समझाने पर उसने इस आधार पर औरंगज़ेब का साथ दिया कि साम्राज्य का विभाजन औरंगज़ेब व उसके मध्य में किया जायेगा।


शाहजहाँ के चार पुत्र थे और जब शाहजहाँ 1657 ई. में अस्वस्थ हुआ, उस समय चारों बालिग थे। दारा शिकोह की आयु 43 वर्ष की थी; शाहशुजा की आयु 41 वर्ष, औरंगज़ेब की आयु 39 वर्ष तथा मुराद की आयु 33 वर्ष की थी। शाहजहाँ की दो पुत्रियाँ भी थी-जहाँआरा और रोशनआरा। जहाँआरा, दारा शिकोह का पक्ष लेती थी तथा रौशनारा औरंगज़ेब के दल में मिल गई थी। सभी भाइयों को प्रान्तों के शासकों तथा सैनाओं के सेनापतियों के रूप में ग़ैर सैनिक तथा सैनिक मामलों का काफ़ी अनुभव प्राप्त हो चुका था। परन्तु उनमें वैयक्तिक गुणों एवं योग्यता को लेकर भेद था। सबसे बड़े पुत्र दारा शिकोह पर शाहजहाँ विश्वास करता था और उसे ही अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था।आगरा से औरंगज़ेब 13 जून, 1658 ई. को दिल्ली की ओर रवाना हुआ। परन्तु रास्ते में वह मथुरा के निकट रूपनगर में अपने भाई मुराद के, जो अब तक अपनी भाई की योजना को अच्छी तरह से समझ चुका था और उससे नफ़रत करने लगा था, विरोध को कुचलने के लिए ठहर गया। खुले मैदान में उसका सामना करने के बदले औरंगज़ेब ने उसे एक जाल में फँसा लिया। पहले उस हतभाग्य शाहज़ादे को सलीमगढ़ के दुर्ग में बन्दी बनाकर रखा गया। जनवरी, 1659 ई. में उसे वहाँ से ग्वालियर के क़िले में ले जाया गया। 4 दिसम्बर, 1661 ई. को दीवानअली नकी की हत्या करने के अभियोग में उसे फाँसी पर लटका दिया गया।


दारा शिकोह सब दर्शनों के सार का संग्रह करने वाला विचार रखता था। वह उदार स्वभाव तथा पंण्डितोचित प्रवृत्तियों का था। वह अन्य धर्मावलम्बियों के साथ मिलता था। उसने वेद, तालमुद एवं बाइबिल के सिद्धान्तों तथा सूफ़ी लेखकों की पुस्तकों का अध्ययन किया था। उसके इन सब कार्यों से सहधर्मी कट्टर सदस्यों का नाराज़ हो जाना स्वाभाविक ही था तथा वे सब इसके विरुद्ध हो गए। दूसरा भाई शाहशुजा, जो उस समय बंगाल का सूबेदार था, एक बुद्धिमान तथा वीर सैनिक था। पर वह अत्यन्त आरामतलब होने के कारण दुर्बल, आलसी, असावधान और निरन्तर चेष्टा, चौकस, सावधानी तथा दूसरे से मिलकर काम करने के अयोग्य बन गया था। तीसरा भाई औरंगज़ेब अत्यन्त योग्य था। वह असाधारण उद्योग और गहन कूटनीति तथा सैनिक गुणों से सम्पन्न था। उसमें शासन करने की असंदिग्ध क्षमता थी। मुराद, जो इस समय गुजरात का सूबेदार था, निस्संदेह स्पष्ट वक्ता, उदार एवं वीर था, परन्तु वह भारी पियक्कड़ था। अत: वह नेतृत्व के लिए आवश्यक गुणों का विकास नहीं कर पाया।


जब शाहजहाँ भंयकर रूप से बीमार पड़ा, तब चारों भाइयों में से केवल दारा शिकोह ही शाहजहाँ के पास आगरा में उपस्थित था। तीनों परस्थित भाइयों को संदेह हुआ कि उनका पिता वास्तव में मर चुका है तथा दारा ने इस समाचार को दबा दिया है। शुजा ने बंगाल की तत्कालीन राजधानी राजमहल में अपने को बादशाह घोषित कर लिया तथा साम्राज्य की राजधानी की ओर सेना लेकर बढ़ा। परन्तु बनारस के निकट पहुँचने पर वह दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह के अधीन अपने विरुद्ध भेजी गई एक सेना के द्वारा हरा दिया गया। वह बंगाल लौट जाने को विवश हुआ। मुराद ने भी अहमदाबाद में अपना राज्याभिषेक 5 दिसम्बर, 1657 ई. को किया। उसने मालवा में औरंगज़ेब से मिलकर एक सन्धि कर ली। उन्होंने साम्राज्य का विभाजन करने का इक़रारनामा किया, जो अल्लाह एवं पैगम्बर के नाम पर स्वीकृत किया गया। इस इक़रारनामें की शर्तें इस प्रकार से थीं-


लूट के माल की एक तिहाई मुदार बख़्श को तथा दो तिहाई औरंगज़ेब को मिलेगी।
साम्राज्य की विजय के बाद पंजाब, अफ़ग़ानिस्तान, काश्मीर एवं सिंध मुराद को मिलेंगे, जो वहाँ बादशाहत का झण्डा गाड़ेगा, सिक्के चलाएगा तथा बादशाह के रूप में अपना नाम घोषित करेगा।

औरुगज़ेब तथा मुराद की मिलीजुली फ़ौज उत्तर की ओर बढ़ी तथा धरमट पहुँची, जो उज्जैन से चौदह मील दक्षिण-पश्चिम में है। बादशाह ने उनका बढ़ना रोकने के लिए जोधपुर के राजा जसवन्त सिंह तथा कासिम ख़ाँ को भेजा। 15 अप्रैल, 1657 ई. को धरमट में विरोधी सेनाओं की मुठभेड़ हुई, जहाँ शाही दल असाधारण रूप से पराजित हुआ। विजयी शाहज़ादों ने एक अपेक्षित छिछले भाग से होकर चम्बल को पार किया तथा सामूगढ़ के मैदान में पहुँचे, जो आगरे के दुर्ग से आठ मील दूर है।


29 मई को युद्ध आरम्भ हुआ। इसमें प्रचण्डता के साथ संघर्ष हुआ। दोनों ही दल वीरता के साथ लड़े। मुराद के चेहरे पर तीन घाव लगे। दारा शिकोह की ओर से युद्ध करने वाले राजपूत अपनी जाति की परम्परा के सच्चे थे। उन्होंने अपने वीर युवक नेता, रामवीर सिंह के नेतृत्व में वीरतापूर्वक मुराद की टुकड़ी पर निराशाजनित वीरता के साथ आक्रमण किया। उनका एक-एक आदमी मर मिटा। दारा शिकोह दुर्भाग्य से अपने हाथी के एक तीर से बुरी तरह से घायल हो जाने के कारण उस पर से उतरकर एक घोड़े पर चढ़ गया। 'स्मिथ' कहता है कि ,"इसी कार्य ने युद्ध का निर्ण कर दिया।" अपने स्वामी के हाथी का हौदा ख़ाली देखकर बची हुई फ़ौज उसे मरा समझकर अत्यन्त घबराहट के साथ मैदान से तितर-बितर हो गई। निराशा से भरा हुआ दारा, अपने पड़ाव और बन्दूक़ों को अपने शत्रुओं द्वारा अधिकृत होने के लिए छोड़कर, आगरा की ओर भाग गया। वहाँ वह अकथनीय रूप से दीन अवस्था में पहुँचा। दारा शिकोह की हार वास्तव में उसके सेनापतियों की युद्ध कौशल सम्बन्धी कुछ भूलों तथा उसकी तोपों की दुर्बल अवस्था के कारण हुई, न कि सम्पूर्णत: उसकी सेना के दाहिने अंग के अधिकारी ख़लीलुल्लाह के कपटपूर्ण परामर्श के कारण, जैसा की कुछ वृत्तान्त हमें विश्वास दिलाते हैं।


मुराद को गिरफ़्तार कर लेने के बाद ही औरंगज़ेब दिल्ली जा चुका था, जहाँ 21 जुलाई, 1658 ई. को वह बादशाह के रूप में राजसिंहासन पर बैठा।


Muhammad Murad Bakhsh (9 October 1624 – 14 December 1661) was a Mughal prince as the youngest son of Mughal Emperor Shah Jahan and Empress Mumtaz Mahal.He was the Subedar of Balkh until he was replaced by his elder brother Aurangzeb in the year 1647.


Muhammad Murad Bakhsh was born on 9 October 1624, at the Rohtasgarh Fort in Bihar, as the youngest son of Emperor Shah Jahan and his beloved wife Mumtaz Mahal. Murad's siblings included his two politically powerful sisters, the princesses: Jahanara Begum and Roshanara Begum as well as the heir-apparent to his father, his eldest brother, Crown Prince Dara Shikoh and the future Mughal Emperor Aurangzeb.


In 1638, Murad Bakhsh, at the age of fourteen years married the Safavid princess, Sakina Banu Begum, a daughter of Shah Nawaz Khan Safavi. She was the younger sister of his elder sister-in-law, Dilras Banu Begum, who was Aurangzeb's wife.



In 1638, Murad Bakhsh, at the age of fourteen years married the Safavid princess, Sakina Banu Begum, a daughter of Shah Nawaz Khan Safavi. She was the younger sister of his elder sister-in-law, Dilras Banu Begum, who was Aurangzeb's wife.


He was appointed to Subadar of Multan (1642), of Balkh (16 February 1646 to 9 August 1646), of Kashmir (20 August 1647 to July 1648), of Deccan (25 July 1648 to 14 September 1649), and Kabul (23 January 1650 to 1654), of Gujarat (March 1654), and Malwa.


Courtiers
Raja Aman Khan Bahadur – Died in 1661 Mewat
Darar Khan – Died 1673 Mewat
Muhammad Rustam Shaikh – Died 1648 at Deccan.
Muhammad Allahauddin Shaikh – Died 1655 He was brother of Rustam Shaikh
Miah Khan – Died 1653 at Deccan.
Rajkumar Hariram Singh – 1622–1678(56) The Deputy of Murad Baksh from 1646-1651. He was second son of Raja Gaj Singh of Nagpur and Brother of Raja Amar Singh of Nagpur
Rajkumar Veer Singh – 1636–1680(44) Eldest son of Amar Singh of Nagpur.
On 30 November 1657, he proclaimed himself emperor at Ahmedabad, after reports that his father was ill. During the same year he received the Ottoman ambassador Manzada Husain Agha, who arrived in the port of Surat and was on his way to meet Shah Jahan in Agra. Manzada Husain Agha mentions his disappointment regarding the wars between Shah Jahan's sons.


Murad Bakhsh joined hands with Aurangzeb to defeat Dara Shikhoh, the eldest son of Shah Jahan. In fact it was the ferocious charge led by Murad Bakhsh and his Sowars that eventually turned the outcome of the battle in favor of Aurangzeb during the Battle of Samugarh.


On 7 July 1658, while he was in a tent with his brother Aurangzeb, he was intoxicated and was secretly sent to the prison and transferred to Gwalior Fort from January 1659.


He faced a trial that sentenced him to death for having murdered former Diwan clerk named Ali Naqi, in 1661. Aurangzeb then replaced Murad Bakhsh as the Subedar of Gujarat and placed Inayat Khan as the new Mughal commander of Surat.


Military promotions
1642 – 5,000
1646 – 9,000
1648 – 11,000
1656 – 30,000
1658 – 33,000
On 14 December 1661, after three years in prison, he was executed at Gwalior Fort. With the last of his brothers now dead, Aurangzeb was the undisputed emperor of the Mughal Empire.