शिवराम कारंत (जन्म- 10 अक्टूबर, 1902)

October 10, 2017

कोटा शिवराम कारंत (अंग्रेज़ी: Kota Shivaram Karanth, जन्म- 10 अक्टूबर, 1902, कोटा, कर्नाटक; मृत्यु- 9 दिसम्बर, 1997, उडुपी) कन्नड़ भाषा के विख्यात साहित्यकार थे। अपने कला विषयक ज्ञान के बल पर उन्होंने यक्षगान के अंतरंग में प्रवेश करने का साहस किया। कला विषयक क्षेत्र में शिवराम कारंत का योगदान महत्त्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने अपनी पैनी दृष्टि से बहुत पहले ही भांप लिया था कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में क्या कमी और दोष हैं और फिर अवसर आते ही अपने विचार को व्यावहारिक रूप देने के लिए वह स्वयं पाठ्य पुस्तकें लिखने, शब्दकोशों तथा विश्वकोशों को तैयार करने में जी जान से जुट पड़े थे।


व्यक्तिगत जीवन
कोटा शिवराम कारंत के मन में बचपन से ही प्रकृति के प्रति बहुत आकर्षण था। स्कूल की पढ़ाई ने उन्हें कभी नहीं बांधा। यही कारण था कि 1922 में गांधीजी की पुकार कान में पड़ते ही वह कॉलेज छोड़कर रचनात्मक कार्यक्रम में लग गए। कुछ ही समय के भीतर उन्हें लगा समाज को सुधारने से पहले लोगों की प्रकृति और सारी स्थिति को समझ लेना बहुत आवश्यक है, अत: वहीं से वह एक स्वतंत्र पथ का निर्माण करने में जुट पड़े उन्होंने अपनी पैनी दृष्टि से बहुत पहले ही भांप लिया था कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में क्या कमी और दोष हैं और फिर अवसर आते ही अपने विचार को व्यावहारिक रूप देने के लिए वह स्वयं पाठ्य पुस्तकें लिखने, शब्दकोशों तथा विश्वकोशों को तैयार करने में जी जान से जुट पड़े। शुरुआत उन्होंने कर्नाटक कला से की और फिर वह संपूर्ण विश्वव्यापी कला तक पहुँच गए।


अपने कला विषयक ज्ञान के बल पर शिवराम कारंत ने यक्षगान के अंतरंग में प्रवेश करने का साहस किया। कला विषयक क्षेत्र में उनका योगदान महत्त्वपूर्ण माना जाता है। शिवराम कारंत ने अपना ध्यान मानव और उसकी परिस्थिति को देखने पर केंद्रित किया। उनके कई उपन्यास एक के बाद एक प्रकाशित हुए। इससे स्पष्ट होता है कि चारों ओर के वास्तविक जीवन को उन्होंने बहुत सूक्ष्मता के साथ परखा था। सबसे अधिक वह इससे प्रभावित हुए कि बड़ी दु:खद घटनाओं के बीच भी मनुष्य की सहज जीने की इच्छा बनी रहती है।


मूकज्जिय कनसुगलु  में शिवराम कारंत ने अन्वेषण की एक बिल्कुल नई और विराट यात्रा की है। उनका उद्देश्य (हिन्दी अनुवाद मूकज्जी) पुस्तक के माध्यम से प्रागैतिहासिक काल से लेकर वर्तमान काल तक की मानव सभ्यता का परिचय देना था। उन्होंने एक ऐसी विधवा वृद्धा की कल्पना की, जिसकी कुछ अधिमानसिक संवेदनाएँ जाग्रत थी। वह इस कृति द्वारा यह प्रमाणित करना चाहते थे कि मनुष्य की ईश्वर संबंधी धारणा इतिहास में निरंतर बदलती आई है और सेक्स जैसी जैविक प्रवृत्तियाँ जीवन का इतना अनिवार्य अंग है कि वैराग्य धारण के नाम उनकी वर्जना सर्वथा अनुचित है। यह वृद्धा देश के प्राचीन मूल्यों के प्रतिनिधि - रूप पीपल के पेड़ तले बैठ कर अपने पौत्र को, अर्थात् हम सभी को सुदूर अतीत का दर्शन कराती है और इस प्रत्येक प्रसंग में उनका बल एक ही बात पर होता कि हम जीवन को, जैसा वह था और जैसा अब है एक साथ लेते हुए संपूर्ण रूप में देखें। आदि से अंत तक इस उपन्यास में काल के सौ छोरों को एक साथ लेकर कांरत ने अपना वक्तव्य वृद्धा मूकज्जी के माध्यम से प्रस्तुत किया है।


शिवराम कारंत के उपन्यास चोमाना दुडि पर इसी नाम से फ़िल्म भी बन चुकी है। जिसे 1976 का सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का 'राष्ट्रीय पुरस्कार' भी मिल चुका है।



शिवराम कारंत की प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार है:-


नाटक
कर्णार्जुन (1927)
नारद गर्वभंग (1932)
नवीन नाटकगलु (1946)
मंगलारति (1956)
कीचक सैरंध्री (1970)
कहानी
हसिवु (1931)
हावु (1931)
गद्य-ज्ञान (1932)
मैगल्लन दिनचरियिंद (1951)
आत्मकथा
हुच्चु मनस्सिन हत्तु मुखगलु
यात्रा-वृतांत
चित्रमय दक्षिण कन्नड़ (1934)
कला विषयक
भारतीय चित्रकले (1930)
यक्षगान (1971)
चालुक्य वास्तुशिल्प (1969)
भारतीय वास्तुशिल्प (1975)
कला प्रपंच (1978)
उपन्यास
देवदूतरु (1928)
सरसम्मन समाधि (1937)
मुगिद युद्ध(1945)
कुडियर कूसु (1951)
गोंडारण्य (1954)
जगदोद्धारना (1960)
उक्किदा नोरे (1970)
केवल मनुष्यरु (1971)
मृजन्म (1974)
मूकज्जी (1979)
निबंध
ज्ञान
चिक्कदोड्डवरू
हल्लिय हत्तु समस्तरु
विश्व कोश, शब्दकोश व ज्ञान विषयक
बाल प्रपंच (1936)
सिरिगन्नड अर्थकोश (1941)
विज्ञान प्रपंच (1956)
विचित्र खगोल(1965)



सम्मान और पुरस्कार
शिवराम कारंत को 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया गया था, किंतु उन्होंने आपात काल के दौरान इसे लौटा दिया। वर्ष 1959 में उन्हें 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। इसके बाद वर्ष 1977 में 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से भी उनका सम्मान किया गया था।


Kota Shivaram Karanth (10 October 1902 – 9 December 1997) was a Kannada writer, social activist, environmentalist, polymath, Yakshagana artist, film maker and thinker. Ramachandra Guha called him the "Rabindranath Tagore of Modern India, who has been one of the finest novelists-activists since independence". He was the third writer to be decorated with the Jnanpith Award for Kannada, the highest literary honor conferred in India.


Shivaram Karanth was born on 10 October 1902, in Kota near Udupi in the Udupi district of Karnataka to a Kannada speaking family. The fifth child of his parents Shesha Karantha and Lakshmamma, he completed his primary education in Kundapura and Mangalore. Shivaram Karanth was influenced by Gandhi's principles and took part in Indian Independence movement when he was in college. He did not complete his education and went to participate in the Non-co-operation movement and canvassed for khadi and swadeshi for five years up to 1927. By that time Karanth had already started writing fiction novels and plays.


Karanth was an intellectual and environmentalist who made notable contribution to the art and culture of Karnataka. He is considered one of the most influential novelists in the Kannada language. His novels Marali Mannige, Bettada Jeeva, Alida Mele, Mookajjiya Kanasugalu, Mai Managala Suliyalli, Ade OOru Ade Mara, Shaneeshwarana Neralinalli, Kudiyara Koosu, Svapnada Hole, Sarsammana Samadhi, and Chomana Dudi are widely read and have received critical acclaim. He wrote two books on Karnataka's ancient stage dance-drama Yakshagana (1957 and 1975).


He was involved in experiments in the technique of printing for some years in the 1930s and 1940s and printed his own novels, but incurred financial losses. He was also a painter and was deeply concerned with the issue of nuclear energy and its impact on the environment. At the age of 90, he wrote a book on birds (published during 2002 by Manohara Grantha Mala, Dharwad).


He wrote, apart from his forty seven novels, thirty one plays, four short story collections, six books of essays and sketches, thirteen books on art, two volumes of poems, nine encyclopedias, and over one hundred articles on various issues.


Literary and National honors
Jnanpith Award – 1978
Sahitya Akademi Fellowship (1985)
Sangeet Natak Akademi Fellowship (1973)
Padma Bhushan (He returned his Padma Bhushan honour in protest against the Emergency imposed in India)
Sahitya Academy award – 1959
Karnataka state Sahitya Akademi Award
Sangeet Natak Award
Pampa Award
Swedish Academy award
Tulsi Samman (1990)
Dadabhai Nauroji Award (1990)
Honrary Doctrate from Mysore University, Meerut University, Karnatak University and others.


Film awards
National Film Award – (Posthumously)
National Film Award – Special Jury Award / Special Mention Writer – Bettada Jeeva – K. Shivaram Karanth – 2011