अमिताभ बच्चन (जन्म: 11 अक्टूबर, 1942)

October 11, 2017

अमिताभ बच्चन (अंग्रेज़ी:Amitabh Bachchan, जन्म: 11 अक्टूबर, 1942 इलाहाबाद) भारतीय सिनेमा के महान सितारे, जो चार दशक से भी अधिक समय से हिन्दी फ़िल्म उद्योग पर छाये हुए हैं। अमिताभ बच्चन सहस्त्राब्दी के महानायक कहे जाते हैं। अभिनय के अतिरिक्त अमिताभ बच्चन पार्श्वगायक, फ़िल्म निर्माता और टी.वी. प्रस्तुतकर्ता और भारतीय संसद के एक निर्वाचित सदस्य के रूप में भी जाने जाते हैं। अमिताभ 1970 के दशक में बॉलीवुड सिनेमा के एंग्री यंग मैन कहलाए और भारतीय फ़िल्म इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण शख़्सियत बन गए। 40 साल बाद भी आज बॉलीवुड में उनके क़द के सामने कोई नहीं है। आज भी वे बॉलीवुड के सबसे व्यस्त अभिनेताओं में गिने जाते है। प्रारम्भ में जिस आवाज़ के कारण निर्देशकों ने अमिताभ को अपनी फ़िल्मों से लेने को मना कर दिया था, वही आवाज़ आगे चलकर उनकी विशिष्टता बन गयी।


जीवन परिचय
अमिताभ बच्चन का जन्म 11 अक्टूबर, 1942 को इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश राज्य में हुआ था। हिन्दी काव्य में 'हालावाद के प्रवर्तक' और अमिताभ के पिता हरिवंशराय और उनका परिवार अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति का था और उनके घर में रामचरित मानस तथा श्रीमद् भगवत् गीता का नियमित पाठ होता था। संस्कारवश स्वयं अमिताभ भी गीता - रामायण का नियमित पारायण करते हैं।


अमिताभ की माता श्रीमती तेजी बच्चन जन्म से सिख थीं, लेकिन वे भी हनुमानजी की अनन्य भक्त थीं। कवि बच्चन से 'तेजी सूरी' का विवाह जनवरी 1942 में ही हुआ था और उसी साल उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हो गई। तेजी से कवि बच्चन का दूसरा विवाह हुआ था। अमिताभ, हरिवंश राय बच्चन के दो बेटों में सबसे बड़े हैं। उनके दूसरे बेटे का नाम अजिताभ है। इनकी माता की थिएटर में गहरी रुचि थी और उन्हें फ़िल्म में भी रोल की पेशकश की गई थी, किंतु उन्होंने गृहणी बनना ही पसंद किया। अमिताभ के कैरियर के चुनाव में इनकी माता का भी योगदान है, क्योंकि वह हमेशा इस बात पर भी ज़ोर देती थी कि उन्हें 'सेंटर स्टेज' को अपना कैरियर बनाना चाहिए। बच्चन के पिता का देहांत 2003 में हो गया था। उनकी माता का निधन 21 दिसंबर, 2007 को हुआ था।


सन 1942 की जिन सर्दियों में अमिताभ बच्चन का जन्म हुआ, बच्चन दंपति इलाहाबाद में 'बैंक रोड' पर मकान नंबर 9 में रहता था। कविवर सुमित्रानंदन पंत भी सर्दियों में अल्मोड़ा छोड़कर इलाहाबाद आ जाते थे। वे बच्चन जी के घर के निकट रहते थे। नर्सिंग होम में पंत जी ने नवजात शिशु की तरफ़ इशारा करते हुए कवि बच्चन से कहा था- "देखो तो कितना शांत दिखाई दे रहा है, मानो ध्यानस्थ अमिताभ।" तभी बच्चन दंपति ने अपने पुत्र का नाम 'अमिताभ' रख दिया था।


अमिताभ बच्चन के जन्म पर उनके पिता प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन ने एक कविता लिखी जो इस प्रकार है-


फुल्ल कमल,
गोद नवल,
मोद नवल,
गेहूं में विनोद नवल।
बाल नवल,
लाल नवल,
दीपक में ज्वाल नवल।
दूध नवल,
पूत नवल,
वंश में विभूति नवल।
नवल दृश्य,
नवल दृष्टि,
जीवन का नव भविष्य,
जीवन की नवल सृष्टि
इंकलाब राय


बच्चन जी के एक प्राध्यापक मित्र 'अमरनाथ झा' ने सुझाव दिया था कि भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि में जन्मे बालक का नाम 'इंकलाब राय' रखना बेहतर होगा, इससे परिवार के नामकरण शैली की परंपरा भी क़ायम रहेगी। झा ने इसी तरह बच्चन जी के दूसरे पुत्र अजिताभ का नाम देश की आज़ादी के वर्ष 1947 को देखते हुए 'आज़ाद राय' रखने का सुझाव दिया था। लेकिन पंत जी ने कहा था- "अमिताभ के भाई का नाम तो 'अजिताभ' ही हो सकता है।" कालांतर में माता-पिता के लिए अमिताभ सिर्फ़ 'अमित' रह गया और उनकी माता उन्हें 'मुन्ना' कहकर पुकारती थीं। तेजी जी की बहन 'गोविंद' ने अजिताभ का घरेलू नाम 'बंटी' रखा।


ढाई साल की उम्र में अमिताभ लाहौर रेलवे स्टेशन पर अपने माता-पिता से बिछड़कर ओवरब्रिज पर पहुँच गए थे, जब वे अपने नाना के घर मीरपुर जा रहे थे। बच्चन दंपति ने पहली बार अपने बेटे को सीख दी थी कि माता-पिता को बताए बगैर बच्चों को कहीं नहीं जाना चाहिए। इस बिछोह के समय तेजी टिकट लेने गई थीं और अमित पिता का हाथ छूट जाने से भीड़ में खो गए थे। मीरपुर में अपने नाना खजानसिंह के लंबे केश देखकर अमित को पहली बार आश्चर्य हुआ था कि ये औरतों जैसे लंबे बाल क्यों रखते हैं। लेकिन तेजी ने अपने बच्चों को सिख बनाए रखने की कोई चेष्टा नहीं की। श्रीवास्तव परंपरा के अनुसार अमित का चौल-कर्म (मुंडन संस्कार) विंध्य पर्वत पर देवी की प्रतिमा के आगे बकरे की बलि के साथ होना चाहिए था, मगर बच्चन जी ने ऐसा कुछ नहीं किया। दुर्योग देखिए कि बालक अमित के मुंडन के दिन ही एक सांड उनके द्वार पर आया और अमित को पटकनी देकर चला गया। अमित रोया नहीं, जबकि उसके सिर में गहरा जख्म हुआ था और कुछ टाँके भी लगे थे। वे इतना ज़रूर कहते हैं कि यह भिड़ंत उनकी उस सहनशक्ति का 'ट्रायल रन' थी, जिसे उन्होंने अपनी आगे की ज़िदगी में विकसित किया।


अमिताभ बच्चन का विवाह 3 जून, 1973 को बंगाली संस्कार के अनुसार अभिनेत्री जया भादुड़ी से हुआ। अभिनेत्री के रूप में जया की भी अपनी विशिष्ट उपलब्धियाँ रही हैं और वे फ़िल्म क्षेत्र की आदरणीय अभिनेत्रियों में गिनी जाती हैं। आज के अनेक युवा कलाकारों के लिए वे मातृवत स्नेह का झरना हैं। रचनात्मकता को बढ़ावा देना उनका स्वभाव तथा जीवन का ध्येय है। अभिनय से उन्हें दिली-लगाव है। वे कई वर्षों तक 'चिल्ड्रन्स फ़िल्म सोसायटी' की अध्यक्ष रह चुकी हैं। रमेश तलवार के नाटक 'माँ रिटायर होती है' के माध्यम से रंगकर्म की दुनिया में उन्होंने अपनी सनसनीखेज वापसी दर्ज की थी। सत्तर के दशक में उन्होंने फ़िल्म 'कोरा काग़ज़' (1975) और 'नौकर' (1980) में अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त किए थे। जया और अमिताभ का परिचय ऋषिकेश मुखर्जी ने अपनी फ़िल्म 'गुड्डी' के सेट पर कराया था।


अमिताभ बच्चन और जया भादुडी की दो संतान हैं, श्वेता बच्चन नंदा और अभिषेक बच्चन। अभिषेक बच्चन भी एक अभिनेता हैं, जिनका विवाह प्रसिद्ध अभिनेत्री ऐश्वर्या राय से हुआ है। अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय बच्चन की बेटी आराध्या हैं। बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन इनके दादा व जया बच्चन इनकी दादी हैं। बच्चन परिवार की इस 'नन्ही परी' का जन्म मुंबई के अंधेरी मे स्थित सेवेन हिल्स अस्पताल में 17 नवंबर, 2011 को हुआ।


अमिताभ बच्चन ने दो बार एम. ए. की उपाधि ग्रहण की है। इन्होंने इलाहाबाद के ज्ञान प्रबोधिनी और बॉयज़ हाई स्कूल (बी.एच.एस.) तथा उसके बाद नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में पढाई की, जहाँ कला संकाय में प्रवेश दिलाया गया। उसके बाद अध्ययन करने के लिए ये दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज चले गए जहाँ इन्होंने विज्ञान स्नातक की उपाधि प्राप्त की। अपनी आयु के 20 के दशक में बच्चन ने अभिनय में अपना कैरियर आजमाने के लिए कोलकता की एक शिपिंग फर्म 'बर्ड एंड कंपनी' में किराया ब्रोकर की नौकरी छोड़ दी।


मुंबई जाने से पहले अमिताभ बच्चन ने 1963 और 1968 के बीच साढ़े पाँच साल कलकत्ता, वर्तमान कोलकाता में व्यतीत किये। इस बीच उन्होंने दो प्राइवेट कंपनियों में एक़्ज़ीक्यूटिव के रूप में काम किया। नौकरी वे दिल लगाकर करते थे, लेकिन साथ ही थिएटर, सिनेमा का शौक़ भी चलता रहता। अमिताभ का कलकत्ता निवास नियति ने शायद उनकी अभिनय प्रतिभा निखारने के लिए ही रचा था, क्योंकि वहाँ अमिताभ ने रंगकर्म में सक्रिय भागीदारी की। साथ ही वे खेलों का शौक़ भी पूरा करते रहे। कोयले का व्यवसाय करने वाली 'बर्ड एंड हिल्जर्स' कंपनी में उनका पहला वेतन पाँच सौ रुपए माह था, जबकि दूसरी कंपनी 'ब्लैकर्स' में उनका अंतिम वेतन 1680 रुपए मात्र था।


अमिताभ पहली बार 1954 में माता-पिता के साथ कलकत्ता आए थे। तब वे 12 साल के थे। तब उन्होंने भरी बरसात में एक 'फुटबॉल मैच' देखा था और वे इस शहर पर मुग्ध हो गए थे। अपना कर्म-जीवन शुरू करने के लिए 1963 में जब वे फिर इस शहर में आए तो यह नगर बहुत बदला-बदला था। भागमभाग और चकाचौंध बढ़ गई थी। शुरू में कुछ दिन वह अपने पिता के मित्र के घर टालीगंज में ठहरे और नौकरी मिलने के बाद कार्यस्थल के आसपास ही पेइंगगेस्ट या दोस्तों के साथ किराए के मकान में रहने लगे। शेरवुड में उन्होंने स्वतंत्रता की साँस ली थी, तो कलकत्ता में वे अपने पैरों पर खड़ा होने आए थे। इस बीच डेढ़ साल दोनों भाई साथ भी रहे। दोनों का रहन-सहन उच्च स्तरीय था। दोनों भाइयों के सम्बंध मित्रवत थे। अजिताभ अपने 'दादा' की अभिनय प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे। दोनों 'मुम्बइया मसाला सिनेमा' के कटु आलोचक थे। अमिताभ के थिएटर के शौक़ के अजिताभ साक्षी थे और साथ ही दादा के भावी कैरियर के सपने भी बुन रहे थे। अभिनेता बनने के आकांक्षी अमिताभ बच्चन का पहला फ़ोटो एलबम अजिताभ ने ही तैयार किया था और स्वयं उन्होंने ही अमिताभ की तस्वीरें खींची थीं।


साठ के दशक में गैर-सरकारी कंपनियों में काम करने वाले कुछ नौजवानों ने, जो स्वयं को 'बॉक्सवाला' कहते थे, एक नाटक मंडली क़ायम की- 'द ऍमेचर्स।' अधिकारी-वर्ग के इन नौजवानों की विदेशी नाटकों में दिलचस्पी थी। उस समय कलकत्ता में 'द ड्रामेटिक क्लब' नामक एक अन्य नाटक मंडली भी अंग्रेज़ी नाटक खेलती थी, लेकिन उसमें किसी भारतीय का प्रवेश-निषिद्ध था। 'द ऍमेचर्स क्लब' इसी का प्रतिकार था। दिसंबर 1960 में जन्मी इस नाटक मंडली के काम की शुरुआत धीमी रही, लेकिन अगले वर्ष इसके दो नाटकों ने तहलका मचा दिया।


ऍमेचर्स के संस्थापक सदस्यों में डिक रॉजर्स, दिलीप सरकार, जगबीर मलिक, विमल और कमल भगत जैसे आठ - नौ लोग ही थे। 1962-63 में यह आँकड़ा साठ के क़रीब पहुँच गया। अगले 3-4 वर्षों में सदस्य संख्या सौ तक हो गई। अमिताभ और उनके मित्र 'विजय कृष्ण' 1965 में ऍमेचर्स में दाख़िल हुए। उस समय अमिताभ 'बर्ड' की नौकरी छोड़कर 'ब्लैकर्स' में पहुँच चुके थे। विजय कृष्ण 'इंडिया स्टीमशिप' में थे। कुछ ही दिनों बाद किशोर भिमानी भी इस संस्था में दाख़िल हुए और दो वर्ष बाद 1967 में उन्होंने 'द क्वीन एंड द रिबेल' नाटक का निर्देशन किया। अमिताभ ने इस नाटक के स्टेज मैनेजर की ज़िम्मेदारी निभाई थी।


हीरो बनने की धुन में इतनी अच्छी नौकरी छोड़ने के अमिताभ के निर्णय को उनके दोस्तों ने उस समय उचित नहीं माना था। अमिताभ के लिए यह किस्मत दाँव पर लगाने का सबसे अच्छा अवसर था। माता-पिता की तरफ से वह निश्चिंत हो चुके थे। केंद्र में श्रीमती गाँधी का शासन था और उनके पिता डॉ. बच्चन राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हो गए थे। भाई बंटी (अजिताभ) डेढ़ साल कलकत्ता में उनके साथ रह चुके थे और 'शॉ वॉलेस' की नौकरी करते हुए वे कलकत्ता से मद्रास और फिर मुंबई पहुँच चुके थे। मुंबई में नर्गिस और सुनील दत्त का सहारा भी था, जो उनके पारिवारिक मित्र थे।


हिन्दी के प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन के पुत्र अमिताभ बच्चन ने अपने अभिनय की शुरुआत 'ख़्वाजा अहमद अब्बास' द्वारा निर्देशित फ़िल्म सात हिंदुस्तानी (1969) से की थी।


अजिताभ ने अमिताभ की कुछ तस्वीरें निकाली थीं, उन्हें ख़्वाजा अहमद अब्बास के पास भिजवा दिया गया था। उन दिनों वे 'सात हिन्दुस्तानी' फ़िल्म बनाने की तैयारी कर रहे थे। इन सात में एक मुस्लिम युवक का रोल अमिताभ को प्राप्त हुआ। इस चुनाव के वक्त अब्बास साहब को यह नहीं मालूम था कि अमिताभ कवि बच्चन के पुत्र हैं। उन्होंने उनसे अपने नाम का अर्थ पूछा था। तब उन्होंने कहा था, 'अमिताभ का अर्थ है सूर्य, और यह गौतम बुद्ध का भी एक नाम है।' अब्बास साहब ने अमिताभ से साफ़ कह दिया था कि वे इस फ़िल्म के मेहनताने के रूप में पाँच हज़ार रुपए से अधिक नहीं दे सकेंगे। इसके बाद जब अनुबंध पर लिखा-पढ़ी का समय आया और अमिताभ के पिता का नाम पूछा गया तो कवि बच्चन के सुपुत्र होने के कारण अब्बास साहब ने साफ़ कह दिया था कि वह उनके पिता से आज्ञा लेकर ही उन्हें काम देंगे। अमिताभ को कोई आपत्ति नहीं थी। अंततः उन्हें चुन लिया गया। 1969 में जब अमिताभ की यह पहली फ़िल्म दिल्ली के 'शीला सिनेमा' में रिलीज़ हुई, तब अमिताभ ने पहले दिन अपने माता-पिता के साथ इसे देखा। उस समय अमिताभ जैसलमेर में सुनील दत्त की फ़िल्म 'रेशमा और शेरा' की शूटिंग से छुट्टी लेकर सिर्फ इस फ़िल्म को देखने दिल्ली आए थे। उस दिन वे अपने पिता के ही कपड़े कुर्ता, पाजामा, शॉल पहनकर सिनेमा देखने गए थे, क्योंकि उनका सामान जैसलमेर और मुंबई में था। इसी शीला सिनेमा में कॉलेज से भागकर उन्होंने कई फ़िल्में देखी थीं। उस दिन वे खुद की फ़िल्म देख रहे थे।


अब्बास साहब अपने ढंग के निराले फ़िल्मकार थे। उन्होंने कभी कमर्शियल सिनेमा नहीं बनाया। उनकी फ़िल्मों में कोई न कोई सीख अवश्य होती थी। यह फ़िल्म चली नहीं, लेकिन प्रदर्शित हुई, यही बड़ी बात थी। रिलीज होने से पहले मीना कुमारी ने इस फ़िल्म को देखा था। अब्बास साहब मीना कुमारी का बहुत आदर करते थे। वे अपनी हर फ़िल्म के ट्रायल शो में उन्हें ज़रूर बुलाते थे। वे उनकी सर्वप्रथम टीकाकार थीं। ट्रायल शो में मीना कुमारी ने अमिताभ के काम की तारीफ़ की थी, तब अमिताभ लजा गए थे।


संघर्ष के दिनों में अमिताभ को मॉडलिंग के ऑफ़र मिल रहे थे, लेकिन इस काम में उनकी कोई रुचि नहीं थी। जलाल आगा ने एक विज्ञापन कंपनी खोल रखी थी, जो 'विविध भारती' के लिए विज्ञापन बनाती थी। जलाल, अमिताभ को वर्ली के एक छोटे से रेकॉर्डिंग सेंटर में ले जाते थे और एक-दो मिनट के विज्ञापनों में वे अमिताभ की आवाज़ का उपयोग किया करते थे। प्रति प्रोग्राम पचास रुपए मिल जाते थे। उस दौर में इतनी-सी रकम भी पर्याप्त होती थी, क्योंकि काफ़ी सस्ता जमाना था। वर्ली की सिटी बेकरी में आधी रात के समय टूटे-फूटे बिस्कुट आधे दाम में मिल जाते थे। अमिताभ ने इस तरह कई बार रात भर खुले रहने वाले कैम्पस कॉर्नर के रेस्तराओं में टोस्ट खाकर दिन गुजारे और सुबह फिर काम की खोज शुरू की। फिर ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म 'आनंद' (1970) की व्यावसायिक सफलता के बाद ही लोगों का ध्यान इस शर्मीले लंबे युवक पर गया, जो जल्द ही अपने आप में एक उद्योग बनने वाला था। हालांकि उनकी कई शुरुआती फ़िल्मों में उन्हें विचारों में डूबे अकेले व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया, लेकिन 'एंग्री यंग मैन' के रूप में उनकी फ़िल्मी छवि 1970 के दशक के मध्य में बनी ज़ंजीर, दीवार और शोले के माध्यम से स्थापित हुई।



अमिताभ बच्चन का फ़िल्मी सफ़र
वर्ष फ़िल्म
1969 सात हिन्दुस्तानी
भुवन शोम (केवल आवाज़)
1970 आनन्द
1971 रेशमा और शेरा
संजोग
परवाना
गुड्डी
प्यार की कहानी
1972 बावर्ची
जबान
पिया का घर
बंसी बिरजू
एक नज़र
रास्ते का पत्थर
बॉम्बे टू गोआ
1973 नमक हराम
गहरी चाल
बंधे हाथ
बड़ा कबूतर (अतिथि भूमिका)
सौदागर
अभिमान
ज़ंजीर
1974 कसौटी
कुँवारा बाप (अतिथि भूमिका)
दोस्त (अतिथि भूमिका)
रोटी कपड़ा और मकान
बेनाम
मज़बूर
1975 ज़मीर
चुपके चुपके
फ़रार
दीवार
मिली
शोले
1976 बलिका वधू
हेरा फेरी
छोटी सी बात
दो अनजाने
अदालत
कभी कभी
1977 ईमान धर्म
परवरिश
चरनदास
ख़ून पसीना
शतरंज के खिला़ड़ी (अतिथि भूमिका)
आलाप
अमर अकबर एंथनी
1978 बेशरम
क़स्मे वादे
मुकद्दर का सिकन्दर
गंगा की सौगन्ध
त्रिशूल
डॉन
1979 गोल माल (अतिथि भूमिका)
एहसास
काला पत्थर
जुर्माना
सुहाग
मिस्टर नटवरलाल
द ग्रेट गैम्बलर
मंज़िल
1980 दो और दो पाँच
दोस्ताना
राम बलराम
शान
1981 चश्मेबद्दूर (अतिथि भूमिका)
विलायती बाबू (अतिथि भूमिका)
कालिया
कमांडर (अतिथि भूमिका)
बरसात की एक रात
याराना
नसीब
लावारिस
सिलसिला
1982 नमक हलाल
शक्ति
खुद्दार
सत्ते पे सत्ता
बेमिसाल
देश प्रेमी
1983 फ़िल्म ही फ़िल्म (विशेष भूमिका)
महान
पु्कार
नास्तिक
कुली
अंधा क़ानून
1984 पेट प्यार और पाप
शराबी
इंकलाब
1985 नया बकरा
मर्द
अमीर आदमी ग़रीब आदमी
1986 आख़िरी रास्ता
1987 जलवा
1988 सूरमा भोपाली (अतिथि भूमिका)
कौन जीता कौन हारा (अतिथि भूमिका)
गंगा जमुना सरस्वती
हीरो हीरालाल
शहँशाह
1989 मैं आज़ाद हूँ
तूफ़ान
जादूगर
बंटवारा (केवल आवाज़)
1990 क्रोध (विशेष भूमिका)
अग्निपथ
आज का अर्जुन
1991 अज़ूबा
इन्द्रजीत
हम
अकेला
1992 ख़ुदागवाह
1994 इंसानियत
1995 तेरे मेरे सपने (केवल आवाज़)
1997 मृत्युदाता
1998 मेज़र साब
बड़े मियाँ छोटे मियाँ
1999 हिन्दुस्तान की कसम
लाल बादशाह
सूर्यवंशम
कोहराम
हेलो ब्रदर (केवल आवाज़)
बीवी नं-1 (स्वयं)
2000 मोहब्बतें
2001 एक रिश्ता
अक्स
कभी खुशी कभी ग़म
2002 काँटे
लगान (केवल आवाज़)
हम किसी से कम नहीं
आँखें
अग्निवर्षा (विशेष भूमिका)
2003 बूम
फंटूश (केवल आवाज़)
मुंबई से आया मेरा दोस्त (केवल आवाज़)
खुशी (केवल आवाज़)
अरमान
बाग़बान
2004 वीर - ज़ारा
क्यूँ ! हो गया ना
एतबार
दीवार
हम कौन हैं?
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों
लक्ष्य
ख़ाकी
देव
रुद्राक्ष (केवल आवाज़)
इंसाफ (केवल आवाज़)
2005 पहेली
ब्लैक
वक़्त
रामजी लंदनवाले (स्वयं)
सरकार
दिल जो भी कहे
एक अजनबी
विरुद्ध
बंटी और बबली
अमृतधारे (स्वयं)
परिणीता (केवल आवाज़)
2006 फैमिली
डरना ज़रूरी है
बाबुल
कभी अलविदा ना कहना
2007 ओम शाँति ओम (स्वयं)
झूम बराबर झूम
शूट आउट एट लोखंडवाला
नि:शब्द
राम गोपाल वर्मा की आग
चीनी कम
एकलव्य
2008 जोधा अकबर (केवल आवाज़)
सरकार राज
भूतनाथ
गॉड तुस्सी ग्रेट हो
द लास्ट लियर (अंग्रेज़ी)
यार मेरे ज़िन्दगी
2009 दिल्ली 6 (अतिथि भूमिका)
जॉनी मस्ताना
अलादीन
पा
2010 रन
तीन पत्ती
कंधार
2011 बुड्ढ़ा होगा तेरा बाप
आरक्षण
2012 डिपार्टमेंट
2013 द ग्रेट गेट्सबाय
सत्याग्रह
महाभारत 3D (भीष्म की आवाज़)
2014 भूतनाथ रिटर्न्स
2015 षमिताभ



अमिताभ की श्रेष्ठ फ़िल्में हैं- आनंद, ज़ंजीर, अभिमान, दीवार, शोले, त्रिशूल, मुकद्दर का सिकंदर, कुली, सिलसिला, अमर अकबर एंथनी, काला पत्थर, अग्निपथ, बाग़बान, ब्लैक और पा, जिनकी सफलता का श्रेय अमिताभ बच्चन को जाता है, हालांकि हल्की-फुल्की हास्य फ़िल्में 'चुपके-चुपके' (1976) और रोमांस आधारित 'कभी-कभी' (1976) जैसी फ़िल्में अमिताभ बच्चन की बहुमुखी प्रतिभा की परिचायक हैं। 1980 के दशक के अंतिम वर्षों तक बच्चन का जादू सिर चढ़कर बोलता रहा, जिसका लाभ उन्हें अपने संक्षिप्त राजनीतिक जीवन में भी मिला, लेकिन शहंशाह (1988) के बाद उनकी लोकप्रियता में तेज़ी से गिरावट आई। फिर भी 1990 के दशक के आरम्भिक वर्षों में उनकी तीन महत्त्वपूर्ण फ़िल्में- अग्निपथ, हम और ख़ुदागवाह सफल हुई। अग्निपथ के लिए अमिताभ को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।


राजनीति अमिताभ को पसंद नहीं आई। अभिनय का यह खिलाड़ी राजनीति के मैदान में सफल नहीं हो पाया और उन्होंने राजनीति को जल्द ही अलविदा कह दिया। अपने दोस्त राजीव गाँधी के कहने पर अमिताभ ने राजनीति में प्रवेश किया था। उस समय राजीव को अपने लोगों की जरूरत थी और अमिताभ ने दोस्त होने का अपना कर्तव्य पूरा किया। उन्होंने अपने नगर इलाहाबाद से चुनाव लड़ा। चुनाव में उनके प्रतिद्वंदी एच.एन. बहुगुणा थे। अमिताभ ने बहुगुणा को भारी अंतर से हराया। राजनीति में आने वाला समय अमिताभ के लिए कठिनाई भरा साबित हुआ। ‘बोफोर्स कांड’ में अमिताभ और उनके भाई पर आरोप लगाये गये। अमिताभ ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उन्हें इतने कटु अनुभव होंगे। अमिताभ तुरंत समझ गये कि राजनीति उनके बस की बात नहीं है। वह इस खेल के दाँव-पेंच से अनभिज्ञ थे। तीन वर्ष बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया और फिर राजनीति से सन्न्यास ले लिया।


इंटरनेट पर हुए एक सर्वेक्षण में सहस्त्राब्दी का 'सर्वाधिक लोकप्रिय एशियाई व्यक्ति' चुने जाने के बाद लंदन के विख्यात संग्रहालय, मैडम तुसाद के 'वैक्स म्यूज़ियम' में उनका मोम प्रतिरूप रखा गया।


आवाज़ की विशेषता
अमिताभ बच्चन सिर्फ़ अपने अभिनय के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी दमदार और बेहतरीन आवाज़ के लिए भी जाने जाते हैं। उनकी आवाज़ से सम्बन्धित कुछ घटनाएँ इस प्रकार हैं-


एक खबर के अनुसार विदेश में रहने वाली गंभीर रूप से बीमार एक भारतीय युवती ने अपने जीवन के अंतिम समय में अपने लिए अमिताभ बच्चन की आवाज़ में कुछ पंक्तियों की माँग की थी। युवती की अंतिम इच्छा को जानकर अमिताभ बच्चन ने सुबह जल्दी उठकर ख़ाली पेट अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करवाई, जिसमें उन्होंने उस युवती के लिए कुछ कविताएँ और कुछ प्रेरक प्रसंग सुनाए। यह सीडी उस युवती को भिजवाई गई। तब उसने अमिताभ को विशेष रूप से धन्यवाद किया। वह युवती तो नहीं बच पाई, लेकिन इससे यह बात सिद्ध हो जाती है कि वाकई अमिताभ की आवाज़ में दम है।
यह भी आश्चर्यजनक है कि पुरस्कार से सम्मानित फ़िल्म 'मार्च ऑफ़ द पेंग्विंस' को अमेरिका में रिलीज करने के लिए हॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता मोर्गन फ़्रीमे को अंग्रेज़ी में डबिंग करने की आवश्यकता महसूस हुई, तो हिन्दी और अंग्रेज़ी रूपातंरण में अमिताभ बच्चन के अलावा एक और व्यक्ति की आवाज़ इस्तेमाल में लाई गई। जब फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक ने दोनों की आवाज़ को एकाग्रता के साथ सुना, तो यह दुविधा उत्पन्न हो गई कि किसकी आवाज़ को अंग्रेज़ी संस्करण में लिया जाए? अंतत: निर्माता-निर्देशक ने यह तय किया कि इन आवाज़ों को अमेरिका, इंग्लैण्ड के फ़िल्म समीक्षकों के पास भेज दिया जाए, ताकि वे अपना मत दे सकें। यहाँ भी काफ़ी मशक्कत उठानी पड़ी। कंठ का प्रभाव और स्क्रिप्ट से जुड़े तमाम भावों को पूरे आरोह-अवरोह के साथ तालमेल में अमिताभ की आवाज़ को श्रेष्ठ माना गया।
संगीत के जानकार वर्षों से यह अच्छी तरह से जानते हैं कि अमिताभ की आवाज़ में एक कशिश जन्म से है। अमिताभ के अभिनय में से पचास प्रतिशत अंक तो उनकी आवाज़ को देना ही पडेग़ा। सन 1983 में जब 'कुली' फ़िल्म की शूटिंग के दौरान वे चोटग्रस्त हुए थे, तब उनके गले में एक छेद कर नली डाली गई थी। उसके बाद उनकी आवाज़ में मामूली बदलाव आया था, लेकिन आवाज़ की गंभीरता में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। आज भी उनकी आवाज़ के ऐसे दीवाने मिल जाएँगे, जो उन्हें सुनने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।


फ़िल्म 'जंजीर' के सेट पर जब अमिताभ बच्चन और प्राण परस्पर सामने आए, तब प्राण ने निर्देशक प्रकाश मेहरा से कहा- "प्रकाश, यह लड़का अपनी आवाज़ और बेधती हुई आँखों से आधा मैदान मार लेता है। यही आवाज़ जब हरिवंशराय बच्चन की 'मधुशाला' स्वरबद्ध करती है, तब लगता है कि वास्तव में 'मधुशाला' को मधुर कंठ मिल गया। अब यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि आज अमिताभ निर्जीव शब्दों में भी जान फूँक सकते हैं। इसका रहस्य बच्चन परिवार के साहित्य भरे वातावरण में खोजा जा सकता है, जहाँ अमिताभ का बचपन बीता और वे तमाम कवियों को सस्वर कविता पाठ करते हुए सुनते रहे। उसी वातावरण ने उनकी आवाज़ को तराशा और आज उस आवाज़ की गूँज सात समुंदर पार से भी सुनाई देती है।

अमिताभ बच्चन को भारत सरकार ने पद्मश्री और पद्म भूषण (2000) और पद्म विभूषण (2015) से सम्मानित किया है। अमिताभ बच्चन को अब तक चार बार 'राष्ट्रीय पुरस्कार' मिल चुका है। इनमें फ़िलहाल उन्हें फ़िल्म 'पा' में उनके अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला है। अमिताभ बच्चन ने यह पुरस्कार तीसरी बार जीता है। इससे पहले उनको यह पुरस्कार फ़िल्म 'अग्निपथ' और 'ब्लैक' के लिए मिल चुका है। इसके अलावा वह 'सात हिन्दुस्तानी' के लिए सर्वश्रेष्ठ नवोदित कलाकार का 'राष्ट्रीय पुरस्कार' प्राप्त कर चुके हैं।

अमिताभ बच्चन बहुतों के आदर्श हैं, लेकिन उनके आदर्श अभिनय सम्राट दिलीप कुमार हैं। अपने ब्लॉग पर वर्ष 2011 में अमिताभ ने लिखा, '11 दिसम्बर को वह 89 साल के हो जाएंगे। जन्म के लिहाज़ से वह मुझसे 20 साल बड़े होंगे। लेकिन पेशे में मुझसे 2000 साल आगे हैं। वह मेरे आदर्श हैं और तब से हैं, जबसे मैने उनका काम पहली बार देखा।'


अमिताभ बच्चन ने अनेक यादगार फ़िल्मों में काम किया है। उनकी श्रेष्ठ फ़िल्में हैं- आनंद, ज़ंजीर, अभिमान, दीवार, शोले, त्रिशूल, मुकद्दर का सिकंदर, कुली, सिलसिला, अमर अकबर एंथनी, काला पत्थर, अग्निपथ, बाग़बान, ब्लैक, पा आदि


स्वेच्छा से फ़िल्मों से अलग रहने के बाद बच्चन ने 'मृत्युदाता' (1997) के माध्यम से वापसी का प्रयास किया, लेकिन यह फ़िल्म तथा अन्य कई उत्तरवर्ती फ़िल्में इस दिशा में कमज़ोर कोशिश साबित हुईं। इसमें बहुचर्चित फ़िल्म 'मेजर साब' (1998) भी शामिल है, जो बॉक्स ऑफ़िस पर उनके गौरव को पुनर्स्थापित करने में नाकाम रही।


अमिताभ ने 1996 में 'एबीसीएल कम्पनी' की स्थापना की। किंतु कई कारणों से उनकी होम प्रोडक्शन कंपनी एबीसीएल (अमिताभ बच्चन कॉर्पोरेशन लिमिटेड) ठीक से कार्य नहीं कर पायी और अमिताभ पर आर्थिक संकट छाने लगा। तेरे मेरे सपने, मृत्युदाता और मेजर साब जैसी फ़िल्मों ने एबीसीएल को नुकसान पहुँचाया। एबीसीएल 1997 में बंगलौर में आयोजित 1996 की मिस वर्ल्ड सौंदर्य प्रतियोगिता का प्रमुख प्रायोजक था और इसके ख़राब प्रबंधन के कारण इसे करोड़ों रूपए का नुकसान उठाना पड़ा था। साल 2000 में 'कौन बनेगा करोड़पति' में अपने आप को एक सफल एंकर के रूप में प्रस्तुत किया। बच्चन ने के.बी.सी. का आयोजन नवंबर 2005 तक किया और इसकी सफलता ने फ़िल्म की लोकप्रियता के प्रति इनके द्वार फिर से खोल दिए। 2010 और 2011 में भी के.बी.सी. में एंकर की भूमिका अमिताभ ने ही निभाई। फ़िल्म 'मोहब्बतें' और 'कौन बनेगा करोड़पति' के बाद वह फिर चर्चा के केंद्र में आ गए।


अमिताभ बच्चन ने छोटे परदे पर उस समय प्रवेश किया, जब उनके फ़िल्मी कैरियर में कोई हलचल नहीं हो रही थी। सन् 2000 में उन्हें 'कौन बनेगा करोड़पति' शो के संचालन का ऑफर मिला। उन्होंने अपने दोस्तों और परिवार से सलाह ली। अमिताभ ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और करोड़ों लोगों के घर में टी.वी. सेट के ज़रिये वे रोज़ाना प्रस्तुत होने लगे। अमिताभ के प्रशंसकों ने इस कार्यक्रम को हाथों-हाथ लिया। इस कार्यक्रम की लोकप्रियता के पीछे अमिताभ का हाथ था। अपनी विनम्रता, ज्ञान, भाषा और बात करने के अंदाज से मानो उन्होंने लोगों को सम्मोहित कर दिया। एक आम आदमी से भी वे इस तरह पेश आते थे, मानो वह 'महानायक' हो। महिलाओं से बात करते समय उनका शिष्टाचार देखते बनता था। इस कार्यक्रम ने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। 2005 में अमिताभ ने इस शो का द्वितीय संस्करण 'कौन बनेगा करोड़पति द्वितीय' दो करोड़ की इनामी राशि के साथ पेश किया। 'कौन बनेगा करोड़पति 3' की प्रस्तुति 'शाहरुख ख़ान' ने की थी। अमिताभ ने 'कौन बनेगा करोड़पति' को करके छोटे और बड़े पर्दे की दूरी मिटाने में अहम योगदान दिया।


1982 में आई उनकी फ़िल्म 'कुली' में एक स्टंट करते हुए उन्हें चोट लग गई थी। इस स्टंट में उन्हें टेबल के ऊपर से ज़मीन पर कूदना था। वह टेबल की तरफ कूदे और ग़लती से टेबल के कोने से जा टकराए जिसकी वजह से उन्हें गंभीर चोट लग गई। उन्हें फ़िल्म बीच में ही छोड़कर अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। उस समय अमिताभ के प्रशंसक अस्पताल के बाहर घंटों उनके जल्दी स्वस्थ होने की दुआएं देने के लिए, लोगों का हुजूम लग रहता था। 1983 में फ़िल्म जब रिलीज हुई तो एक 'ब्लॉकबस्टर' साबित हुई। अमिताभ की बीमारी की वजह से फ़िल्म का अंत भी बदल दिया गया था।


नवंबर 2005 में, अमिताभ बच्चन को एक बार फिर 'लीलावती अस्पताल' के आई.सी.यू. (ICU) में छोटी आँत की सर्जरी लिए भर्ती किया गया। उनके पेट में दर्द की शिकायत के कुछ दिन बाद ही ऐसा हुआ। इस अवधि के दौरान और ठीक होने के बाद उसकी ज़्यादातर परियोजनाओं को रोक दिया गया, जिसमें 'कौन बनेगा करोड़पति' का संचालन करने की प्रक्रिया भी शामिल थी। अमिताभ मार्च 2006 में काम करने के लिए वापस लौट आए।


अपने लंबे करियर में अमिताभ बच्चन परदे पर कई नायिकाओं के नायक बने हैं। 'नूतन', 'माला सिन्हा' जैसी सीनियर नायिकाओं के भी वे नायक रहे हैं, तो दूसरी ओर 'मनीषा कोइराला' और 'शिल्पा शेट्टी' जैसी कम उम्र की नायिकाओं के साथ भी उन्होंने फ़िल्में की हैं। कुमुद छुगानी (बंधे हाथ), लक्ष्मी छाया (रास्ते का पत्थर), सुमिता सान्याल (आनंद) जैसी गुमनाम नायिकाओं के साथ भी उन्होंने काम किया। कुछ नायिकाओं के साथ उनकी जोड़ी खूब सराही गई।


Amitabh Bachchan ( born 11 October 1942) is an Indian film actor, producer, television host, and former politician. He first gained popularity in the early 1970s for films such as Zanjeer, Deewaar, and Sholay, and was dubbed India's "angry young man" for his on-screen roles in Bollywood. Referred to as the Shahenshah of Bollywood, Star of the Millennium, or Big B, he has since appeared in over 190 Indian films in a career spanning almost five decades. Bachchan is widely regarded as one of the greatest and most influential actors in the history of Indian cinema as well as world cinema.So total was his dominance on the Indian movie scene in the 1970s and 1980s that the French director François Truffaut called him a "one-man industry."


Bachchan has won numerous accolades in his career, including four National Film Awards as Best Actor and many awards at international film festivals and award ceremonies. He has won fifteen Filmfare Awards and is the most nominated performer in any major acting category at Filmfare, with 41 nominations overall. In addition to acting, Bachchan has worked as a playback singer, film producer and television presenter. He has hosted several seasons of the game show, Kaun Banega Crorepati, India's version of the game show franchise, Who Wants to Be a Millionaire?. He also had a stint in politics in the 1980s.


The Government of India honoured him with the Padma Shri in 1984, the Padma Bhushan in 2001 and the Padma Vibhushan in 2015 for his contributions to the arts. The Government of France honoured him with its highest civilian honour, Knight of the Legion of Honour, in 2007 for his exceptional career in the world of cinema and beyond. Bachchan also made an appearance in a Hollywood film, Baz Luhrmann's The Great Gatsby (2013), in which he played a non-Indian Jewish character, Meyer Wolfsheim.


Bachchan was born in Allahabad, Uttar Pradesh, in north central India.His ancestors on his father's side hailed from a village called Babupatti, in the Raniganj tehsil, in the Pratapgarh district, in the present-day state of Uttar Pradesh, in India. His father Harivansh Rai Bachchan, was a well-known Awadhi dialect-Hindi poet and a Hindu, while his mother, Teji Bachchan, was Sikh.Bachchan was initially named Inquilaab, inspired by the phrase Inquilab Zindabad popularly used during the Indian independence struggle. In English, Inquilab Zindabad means "Long live the revolution." However, at the suggestion of fellow poet Sumitranandan Pant, Harivansh Rai changed the boy's name to Amitabh, which, according to a Times of India article, means "the light that will never die." Although his surname was Shrivastava, Amitabh's father had adopted the pen name Bachchan ("child-like" in colloquial Hindi), under which he published all of his works. It is with this last name that Amitabh debuted in films and for all other practical purposes, Bachchan has become the surname for all of his immediate family. Bachchan's father died in 2003, and his mother in 2007.


Bachchan is an alumnus of Sherwood College, Nainital. He later attended Kirori Mal College, University of Delhi.He has a younger brother, Ajitabh. His mother had a keen interest in theatre and was offered a feature film role, but she preferred her domestic duties. Teji had some influence in Amitabh Bachchan's choice of career because she always insisted that he should "take the centre stage."


बच्चन ने जिस अभिनेता पर सबसे अधिक प्रभाव डाला, वह दिलीप कुमार थे। विशेष रूप से, बच्चन कहते हैं कि उन्होंने कुमार की गूंगा जुमना (1961) से अभिनय के बारे में अधिक सीखा, जितना उन्होंने किसी अन्य फिल्म से किया।

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