शिरडी साईं बाबा (मृत्यु- 15 अक्टूबर, 1918)

October 15, 2017

शिरडी साईं बाबा (अंग्रेज़ी: Sai Baba of Shirdi, जन्म- 28 सितम्बर, 1836 ; मृत्यु- 15 अक्टूबर, 1918, शिरडी, महाराष्ट्र) एक भारतीय आध्यात्मिक गुरु, योगी और फ़कीर थे। साईं बाबा को कोई चमत्कारी पुरुष तो कोई दैवीय अवतार मानता है, लेकिन कोई भी उन पर यह सवाल नहीं उठाता कि वह हिन्दू थे या मुस्लिम। साईं बाबा ने जाति-पांति तथा धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर एक विशुद्ध संत की तस्‍वीर प्रस्‍तुत की थी। वे सभी जीवात्माओं की पुकार सुनने व उनके कल्‍याण के लिए पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए थे। साईं बाबा समूचे भारत के हिन्दू-मुस्लिम श्रद्धालुओं तथा अमेरिका और कैरेबियन जैसे दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले कुछ समुदायों के भी प्रिय थे।


जीवन परिचय
साईं बाबा का जन्म 28 सितंबर, 1836 ई. में हुआ था। इनके जन्म स्थान, जन्म दिवस और असली नाम के बारे में भी सही-सही जानकारी नहीं है। लेकिन एक अनुमान के अनुसार साईं बाबा का जीवन काल 1838 से 1918 के बीच माना जाता है। फिर भी उनके आरंभिक वर्षों के बारे में रहस्य बना हुआ है। अधिकांश विवरणों के अनुसार बाबा एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे और बाद में एक सूफ़ी फ़क़ीर द्वारा गोद ले लिए गए थे। आगे चलकर उन्होंने स्वयं को एक हिन्दू गुरु का शिष्य बताया। लगभग 1858 में साईं बाबा पश्चिम भारतीय राज्य महाराष्ट्र के एक गाँव शिरडी पहुँचे और फिर आजीवन वहीं रहे। साईं बाबा मुस्लिम टोपी पहनते थे और जीवन में अधिंकाश समय तक वह शिरडी की एक निर्जन मस्जिद में ही रहे, जहाँ कुछ सूफ़ी परंपराओं के पुराने रिवाज़ों के अनुसार वह धूनी रमाते थे। मस्जिद का नाम उन्होंने 'द्वारकामाई' रखा था, जो निश्चित्त रूप से एक हिन्दू नाम था। कहा जाता है कि उन्हें पुराणों, भगवदगीता और हिन्दू दर्शन की विभिन्न शाखाओं का अच्छा ज्ञान था।साईं बाबा अपनी घोषणा के अनुरूप 15 अक्टूबर, 1918 को विजया दशमी के विजय-मुहू‌र्त्त में शारीरिक सीमा का उल्लंघन कर निजधाम प्रस्थान कर गए। इस प्रकार 'विजया दशमी' उनका महासमाधि पर्व बन गया। कहते हैं कि आज भी सच्चे साईं-भक्तों को बाबा की उपस्थिति का अनुभव होता है।


बाबा के नाम की उत्पत्ति 'साईं' शब्द से हुई है, जो मुस्लिमों द्वारा प्रयुक्त फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है- पूज्य व्यक्ति और बाबा पिता के लिए एक हिन्दी शब्द।


साई बाबा एक ऐसे आध्यात्मिक गुरु और फ़कीर थे, जो धर्म की सीमाओं में कभी नहीं बंधे। वास्तविकता तो यह है कि उनके अनुयायियों में हिन्दू और मुस्लिमों की संख्या बराबर थी। श्रद्धा और सबूरी यानी संयम उनके विचार-दर्शन का सार है। उनके अनुसार कोई भी इंसान अपार धैर्य और सच्ची श्रद्धा की भावना रखकर ही ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है। सबका मालिक एक है के उद्घोषक वाक्य से शिरडी के साईं बाबा ने संपूर्ण जगत को सर्वशक्तिमान ईश्वर के स्वरूप का साक्षात्कार कराया। उन्होंने मानवता को सबसे बड़ा धर्म बताया और कई ऐसे चमत्कार किए, जिनसे लोग उन्हें भगवान की उपाधि देने लगे। आज भी साईं बाबा के भक्तों की संख्या को लाखों-करोड़ों में नहीं आंका जा सकता।


कहा जाता है कि सोलह वर्ष की अवस्था में साईं बाबा महाराष्ट्र के अहमदनगर के शिरडी गाँव पहुँचे थे और जीवन पर्यन्त उसी स्थान पर निवास किया। शुरुआत में शिरडी के ग्रामीणों ने पागल बताकर उनकी अवमानना की, लेकिन शताब्दी के अंत तक उनके सम्मोहक उपदेशों और चमत्कारों से आकर्षित होकर हिन्दुओं और मुस्लिमों की एक बड़ी संख्या उनकी अनुयायी बन गई। कुछ लोग मानते थे कि साईं के पास अद्भुत दैवीय शक्तियाँ थीं, जिनके सहारे वे लोगों की मदद किया करते थे। लेकिन खुद कभी साईं ने इस बात को नहीं स्वीकारा। उनके चमत्कार अक्सर मनोकामना पूरी करने वाले रोगियों के इलाज़ से संबंधित होते थे। वे कहा करते थे कि मैं लोगों की प्रेम भावना का ग़ुलाम हूँ। सभी लोगों की मदद करना मेरी मजबूरी है। सच तो यह है कि साईं हमेशा फ़कीर की साधारण वेश-भूषा में ही रहते थे। वे जमीन पर सोते थे और भीख माँग कर अपना गुजारा करते थे। कहते हैं कि उनकी आंखों में एक दिव्य चमक थी, जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती थी। साई बाबा का एक ही लक्ष्य था- "लोगों में ईश्वर के प्रति विश्वास पैदा करना"।



शिरडी साईं बाबा
आरती श्रीसाईं गुरुवर की। परमानंद सदा सुरवर की ॥
जाकी कृपा विपुल सुखकारी। दुख-शोक, संकट, भयहारी ॥
शिरडी में अवतार रचाया। चमत्कार से जग हर्षाया ॥
कितने भक्त शरण में आए। सब सुख-शांति चिरंतन पाए ॥
भाव धरे जो मन में जैसा। पावत अनुभव वो ही वैसा ॥
गुरु की उदी लगावे तन को। समाधान लाभत उस मन को ॥
साईं नाम सदा जो गावे। सो फल जग में शाश्वत पावे ॥
गुरुवासर करि पूजा सेवा। उस पर कृपा करत गुरु देवा ॥
राम, कृष्ण, हनुमान, रूप में। जानत जो श्रद्धा धर मन में ॥
विविध धर्म के सेवक आते। दर्शन कर इच्छित फल पाते ॥
साईं बाबा की जय बोलो। अंतर मन में आनंद घोलो ॥
साईं दास आरती गावे। बसि घर में सुख मंगल पावे ॥


साईं बाबा ने हर जाति और धर्म के लोगों को एकता का पाठ पढ़ाया। उन्होंने सदा ही सभी से एक ही बात कही- सबका मालिक एक।


जाति, धर्म, समुदाय, इत्यादि व्यर्थ बातों में ना पड़कर आपसी मतभेद को दूर कर आपस में प्रेम और सद्भावना से रहना चाहिए, क्योंकि सबका मलिक एक है। यह साईं बाबा की सबसे बड़ी शिक्षा और संदेश है।


साईं बाबा ने यह संदेश भी दिया कि हमेशा श्रद्धा, विश्‍वास और सबूरी (सब्र) के साथ जीवन व्यतीत करना चाहिए।
लोगों में मानवता के प्रति सम्मान का भाव पैदा करने के लिए साईं ने संदेश दिया है कि किसी भी धर्म की अवहेलना नहीं करें। उन्होंने कहा है कि सर्वधर्म सम्मान करते हुए मानवता की सेवा करनी चाहिए, क्योंकि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।


साईं सदैव कहते थे कि जाति, समाज, भेदभाव को भगवान ने नहीं बल्कि इंसान ने बनाया है। ईश्वर की नजर में कोई ऊंचा या नीचा नहीं है। अत: जो कार्य स्वयं ईश्वर को पसंद नहीं है, उसे इंसानों को भी नहीं करना चाहिए, अर्थात जाति, धर्म, समाज से जुड़ी मिथ्या बातों में ना पड़कर प्रेमपूर्वक रहें और गरीबों और लाचार की मदद करें, क्योंकि यही सबसे बड़ी पूजा है।


बाबा जी का यह कहना था कि जो व्यक्ति गरीबों और लाचारों की मदद करता है, ईश्वर स्वंय उसकी मदद करते हैं।
साईं बाबा ने सदैव माता-पिता, बुजुर्गों, गुरुजनों और बड़ों का सम्मान करने की सीख दी। उनका कहना था कि ऐसा करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे हमारे जीवन की मुश्किलें आसान हो जाती हैं।


साईं के सिद्धांतों में दया और विश्वास अंतर्निहित है। उनके अनुसार अगर इन दोनों को अपने जीवन में समाहित किया जाए, तभी भक्ति का अनुराग मिलता है।

साईं बाबा के उपदेश अक्सर विरोधाभासी दृष्टांत के रूप में होते थे और उसमें हिन्दुओं तथा मुस्लिमों को जकड़ने वाली कट्टर औपचारिकता के प्रति तिरस्कार तथा साथ ही ग़रीबों और रोगियों के प्रति सहानुभूति परिलक्षित होती थी। शिरडी एक प्रमुख तीर्थ स्थल है तथा उपासनी बाबा और मेहर बाबा जैसी आध्यात्मिक हस्तियाँ साईं बाबा के उपदेशों को मान्यता देती हैं।


 


आने वाला जीवन तभी शानदार हो सकता है, जब तुम ईश्वर के साथ पूर्ण सद्भाव में जीना सीख जाओगे।
मनुष्य अपने स्वाद की तृप्ति के लिए प्रकृति में उपलब्ध खाद्य पदार्थों में बदलाव चाहता है, जिससे उनमें निहित जीवन के बहुत सार अंत को प्राप्त होते हैं।
तुम्हें एक कमल की तरह होना चाहिए, जो सूर्य के प्रकाश में अपनी पंखुड़ियों को खोल देती है। कीचड़ में जन्म लेने या अपने अन्दर जल की उपस्थिति से अप्रभावित जो इसे जीवित रखता है।
मनुष्य अनुभव के माध्यम से सीखता है, और आध्यात्मिक पथ विभिन्न प्रकार के अनुभवों से भरा है। उसे कई कठिनाइयों और बाधाओं का सामना करना होगा, और वे सारे अनुभव जो उसे प्रोत्साहित करने और सफाई की प्रक्रिया पूरा करने लिए ज़रूरी हैं।
सभी कार्य विचारों के परिणाम होते हैं, इसलिए विचार मायने रखते हैं।
मनुष्य खो गया है और एक जंगल में भटक रहा है, जहाँ वास्तविक मूल्यों का कोई अर्थ नहीं है। वास्तविक मूल्यों का मनुष्य के लिए तभी अर्थ हो सकता है, जब वह आध्यात्मिक पथ पर कदम बढ़ाये। यह एक ऐसा पथ है, जहाँ नकारात्मक भावनाओं का कोई उपयोग नहीं।
तुम्हें अपने दिनों को गीतों में बिताना चाहिए। तुम्हारा संपूर्ण जीवन एक गीत की तरह हो।
यह दुनिया प्यार के प्रवाह से शुद्ध हो। तब आदमी, उथल-पुथल की स्थिति जो उसने अपने जीवन के पिछले तरीकों के द्वारा, उन सभी सामग्री, हितों और सांसारिक महत्वाकांक्षा के साथ बनाया है कि बजाय शांति से रह सके।
ब्रह्मांड की तरफ देखो और ईश्वर की महिमा का मनन करो। सितारों को देखो, उनमें से लाखों, रात को आसमान में चमकते, सब एकता के संदेश के साथ, ईश्वर के स्वभाव के अंग हैं।
आप अपने चारों ओर देखते हो, इससे गुमराह मत हो, या आप जो भी देखते हो, उससे प्रभावित होते हो। आप एक ऐसी दुनिया में रहते हैं, जो गलत रास्ते, झूठे मूल्यों और झूठे आदर्शों से भरा भ्रम का एक खेल का मैदान है। लेकिन आप उस दुनिया का हिस्सा नहीं हो।
एक घर ठोस नींव पर बनाया जाना चाहिए, यदि इसे टिकाऊ बनाना है। यही सिद्धांत आदमी पर लागू भी होता है, अन्यथा वह भी नरम जमीन में वापस धंस जायेगा और भ्रम की दुनिया द्वारा निगल लिया जायेगा।
दुनिया में क्या नया है? कुछ भी नहीं। दुनिया में क्या पुराना है? कुछ भी नहीं। सब कुछ हमेशा रहा है और हमेशा रहेगा।
जीवन एक गीत है, इसे गाओ। जीवन एक खेल है, इसे खेलो। जीवन एक चुनौती है, इसका सामना करो। जीवन एक सपना है, इसे अनुभव करो। जीवन एक यज्ञ है, इसे पेश करो। जीवन प्यार है, इसका आनंद लो।
एक दूसरे से प्रेम करो और उच्च स्तर तक जाने के लिए दूसरों की मदद करो, सिर्फ प्यार देकर। प्रेम संक्रामक और घावों को भरने वाली सबसे बड़ी ऊर्जा है।
वर्तमान में जीना सबसे ज्यादा मायने रखता है, इस क्षण को जियो, हर पल अभी है। यह इस क्षण के तुम्हारे विचार और कर्म हैं, जो तुम्हारे भविष्य को बनाते हैं। तुम अपने अतीत से जो रूपरेखा बनाते हो, वही तुम्हारे भविष्य के मार्ग की रूपरेखा बनाते हैं।



Sai Baba of Shirdi, also known as Shirdi Sai Baba, was an Indian spiritual master who is regarded by his devotees as a saint, a fakir, a satguru and an incarnation (avatar) of Lord Shiva. He is revered by both his Hindu and Muslim devotees during, as well as after his lifetime. Saibaba is now revered as incarnation of Sri Dattatreya, and considered as Saguna Brahma. He is attributed to be the creator, sustainer and destroyer of this universe by his devotees. He is decorated with jewels and all forms of Hindu vedic deities as he is supreme God. 


According to accounts from his life, he preached the importance of realization of the self, and criticized love towards perishable things. His teachings concentrate on a moral code of love, forgiveness, helping others, charity, contentment, inner peace, and devotion to the God and guru. He stressed the importance of surrender to the true Satguru, who, having trod the path to divine consciousness, will lead the disciple through the jungle of spiritual training.


Sai Baba also condemned distinction based on religion or caste. It remains unclear if he was a Muslim or a Hindu. This, however, was of no consequence to Sai Baba. His teaching combined elements of Hinduism and Islam: he gave the Hindu name Dwarakamayi to the mosque in which he lived, practised both Hindu and Muslim rituals, taught using words and figures that drew from both traditions, and took samadhi in Shirdi. One of his well-known epigrams, Allah Malik (God is King) and Sabka Malik Ek (Everyone's Master is One), is associated with both Hinduism and Islam. He is also known to have said Look to me, and I shall look to you.


Sai Baba's date of birth including his birthplace remains unknown and is debatable due to lack of evidence and no definitive information exists to prove it.


Sai Baba's real name remains unknown. The name 'Sai' was given to him by Mhalsapati when he arrived at Shirdi, a town now in the west Indian state of Maharashtra. The word 'Sai' refers to a religious mendicant but can also mean 'God'. In several Indian and Middle Eastern languages the term 'Baba' is an honorific signifying grandfather, father, old man or sir. Thus Sai Baba denotes holy father, saintly father or (venerable) poor old man.


Some of Sai Baba's disciples became famous as spiritual figures and saints, such as Mhalsapati, a priest of the Khandoba temple in Shirdi, and Upasni Maharaj. He was revered by other saints as well, such as Saint Bidkar Maharaj, Saint Gangagir, Saint Janakidas Maharaj, and Sati Godavari Mataji. Sai Baba referred to several saints as 'my brothers', especially the disciples of Swami Samartha of Akkalkot.


Although Sai Baba's origins are unknown, some indications exist that suggest that he was born not far from Shirdi. Historical researches into genealogies in Shirdi give support to the theory that Baba could have been born with the name Haribhau Bhusari. Baba was notorious for giving vague, misleading and contradictory replies to questions concerning his parentage and origins, brusquely stating the information was unimportant. He had reportedly stated to a close follower, Mhalsapati, that he has been born of Brahmin parents in the village of Pathri and had been entrusted into the care of a fakir in his infancy. On another occasion, Baba reportedly said that the fakir's wife had left him in the care of a Hindu guru, Venkusa of Selu, and that he had stayed with Venkusa for 12 years as his disciple.This dichotomy has given rise to two major theories regarding Baba's background, with the majority of writers supporting the Hindu background over the Islamic, while others combine both the theories (that Sai Baba was first brought up by a fakir and then by a guru).


Baba reportedly arrived at the village of Shirdi in the Ahmednagar district of Maharashtra, India, when he was about sixteen years old. Although there is no agreement among biographers about the date of this event, it is generally accepted that Baba stayed in Shirdi for three years, disappeared for a year and returned permanently around 1858, which posits a possible birth year of 1838. He led an ascetic life, sitting motionless under a neem tree and meditating while sitting in an asana. The Sai Satcharita recounts the reaction of the villagers


The people of the village were wonder-struck to see such a young lad practicing hard penance, not minding heat or cold. By day he associated with no one, by night he was afraid of nobody.


His presence attracted the curiosity of the villagers and the religiously-inclined such as Mhalsapati, Appa Jogle and Kashinatha regularly visited him, while others such as the village children considered him mad and threw stones at him.After some time he left the village, and it is unknown where he stayed at that time or what happened to him. However, there are some indications that he met with many saints and fakirs, and worked as a weaver; he claimed to have fought with the army of Rani Lakshmibai of Jhansi during the Indian Rebellion of 1857.


Sai Baba returned to Shirdi in 1858. He appeared at the Khandoba Mandir in Shirdi. The temple priest, Mhalsapati, upon seeing him for the very first time, welcomed him by saying 'Aao, Sai!' ('Come Sai'). From then on, He was known by the name (Sai Baba).


Around this time he adopted his famous style of dressing, consisting of a knee-length one-piece Kafni robe and a cloth cap. Ramgir Bua, a devotee, testified that Sai Baba was dressed like an athlete and sported 'long hair flowing down to the end of his spine' when he arrived in Shirdi, and that he never had his head shaved. It was only after Baba forfeited a wrestling match with one Mohiddin Tamboli that he took up the kafni and cloth cap, articles of typical Sufi clothing. This attire contributed to Baba's identification as a Muslim fakir and was a reason for initial indifference and hostility against him in a predominantly Hindu village.


For four to five years, Baba lived under a neem tree and often wandered for long periods in the jungle around Shirdi. His manner was said to be withdrawn and uncommunicative as he undertook long periods of meditation.He was eventually persuaded to take up residence in an old and dilapidated mosque and lived a solitary life there, surviving by begging for alms, and receiving itinerant Hindu or Muslim visitors. In the mosque he maintained a sacred fire which is referred to as a dhuni, from which he gave sacred ash ('Udi') to his guests before they left. The ash was believed to have healing and apotropaic powers. He performed the function of a local hakim and treated the sick by application of ashes. Sai Baba also delivered spiritual teachings to his visitors, recommending the reading of the Ramayan and Bhagavat Gita for Hindus and Qur'an for Muslims. He insisted on the indispensability of the unbroken remembrance of God's name (dhikr, and often expressed himself in a cryptic manner with the use of parables, symbols and allegories).


Baba is known to have grown, nurtured and cultivated a garden called "Lendi Baug". during his lifetime. The garden was watered daily by Baba himself. Lendi Baug got its name from a well known river which used to previously flow there. The garden was full of trees and flowering plants that included a rose garden where deer and rabbits roamed about. Baba went to Lendi Baug daily and every day he threw some silver coins in the 'Lendi' ('Well'). Baba was also known to test his devotees to see if they hankered after money and gold. Baba used to come here every morning and afternoon entering alone through the west and rest under a Neem tree. Sai Baba also dug a pit, 2 feet deep, under the Neem tree and kept an earthen lamp lit continuously. Lendi Baug also has a well which was dug by Baba and his devotees.


After 1910, Sai Baba's fame began to spread in Mumbai. Numerous people started visiting him, because they regarded him as a saint with the power of performing miracles or even as an avatar. They built his first temple at Bhivpuri, Karjat.


Sai Baba opposed all persecution based on religion or caste. He was an opponent of religious orthodoxy — Christian, Hindu and Muslim.


Sai Baba encouraged his devotees to pray, chant God's name, and read holy scriptures. He told Muslims to study the Qur'an and Hindus to study texts such as the Ramayana, Bhagavad Gita, and Yoga Vasistha.He was impressed by the philosophy of the Bhagavad Gita and encouraged people to follow it in their own lives. He advised his devotees and followers to lead a moral life, help others, love every living being without any discrimination, and develop two important features of character: devotion to the Guru (Sraddha) and waiting cheerfully with patience and love (Saburi). He criticised atheism.


In his teachings, Sai Baba emphasised the importance of performing one's duties without attachment to earthly matters and of being content regardless of the situation. In his personal practice, Sai Baba observed worship procedures belonging to Islam; he shunned any kind of regular rituals but allowed the practice of Salah, chanting of Al-Fatiha, and Qur'an readings at Muslim festival times. Occasionally reciting the Al-Fatiha, Baba enjoyed listening to mawlid and qawwali accompanied with the tabla and sarangi twice daily.


Sai Baba interpreted the religious texts of both Islam and Hinduism. He explained the meaning of the Hindu scriptures in the spirit of Advaita Vedanta. His philosophy also had numerous elements of bhakti. The three main Hindu spiritual paths — Bhakti Yoga, Jnana Yoga, and Karma Yoga — influenced his teachings.


Sai Baba encouraged charity and stressed the importance of sharing. He said


Unless there is some relationship or connection, nobody goes anywhere. If any men or creatures come to you, do not discourteously drive them away, but receive them well and treat them with due respect. Sri Hari (God) will certainly be pleased if you give water to the thirsty, bread to the hungry, clothes to the naked, and your verandah to strangers for sitting and resting. If anybody wants any money from you and you are not inclined to give, do not give, but do not bark at him like a dog."


Sai Baba's disciples and devotees claim that he performed many miracles such as bilocation, levitation, mindreading, materialisation, exorcisms, entering a state of Samādhi at will, lighting lamps with water, removing his limbs or intestines and sticking them back to his body (khandana yoga), curing the incurably sick, appearing beaten when another was beaten, preventing a mosque from falling down on people, and helping his devotees in other miraculous ways. He also gave Darshan (vision) to people in the form of Sri Rama, Krishna, Vithoba, Shiva and many other gods depending on the faith of devotees.


According to his followers, he appeared to them in their dreams and gave them advice. His devotees have documented many stories.


 

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