प्रभाशंकर पाटनी (मृत्यु- 16 अक्टूबर,1938)

October 16, 2017

प्रभाशंकर पाटनी (अंग्रेज़ी: Prabhashankar Patni, जन्म- 14 अप्रैल 1862, सौराष्ट्र; मृत्यु- 16 अक्टूबर,1938) गुजरात के प्रमुख सार्वजनिक कार्यकर्त्ता थे। गांधी जी से उनकी निकटता थी। भावनगर में प्रभाशंकर पाटनी ने हरिजन उद्धार, महिला जागरण आदि के रचनात्मक कार्यों को आगे बढ़ाया। प्रभाशंकर पाटनी मुंबई के गवर्नर की एक्जिक्यूटिव के सदस्य और दिल्ली में वाइसराय की एक्जिक्यूटिव के सदस्य थे।


परिचय
प्रभाशंकर पाटनी का जन्म 14 अप्रैल, 1862 ई. को सौराष्ट्र के मोख कस्बे में एक गरीब परिवार में हुआ था। उन्होंने दो वर्ष तक मुंबई के मेडिकल कॉलेज़ में शिक्षा पाई। पाटनी संस्कृत के विद्वान और नरम विचारों के व्यक्ति थे। पर वे राष्ट्रवादी थे। इस बीच 1891 में भावनगर रियासत में पहले प्रभाशंकर राजकुमार के सहयोगी, फिर राजा के निजी सचिव और बाद में दीवान बन गए। गांधी जी से उनकी निकटता थी और भावनगर में उन्होंने हरिजन उद्धार, महिला जागरण आदि के रचनात्मक कार्यों को आगे बढ़ाया।


भावनगर रियासत की सेवा के बाद प्रभाशंकर पाटनी मुंबई के गवर्नर की एक्जिक्यूटिव के सदस्य और दिल्ली में वाइसराय की एक्जिक्यूटिव के सदस्य मनोनीत हुए थे। 1917 में उन्हें भारत मंत्री की कौंसिल के सदस्य के रूप में दो वर्ष के लिए लंदन बुला लिया। भारत वापस आने पर प्रभाशंकर पाटनी भावनगर रियासत के प्रशासक बने। लंदन के द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए वे और गांधी जी एक एक जहाज़ से गए थे। पाटनी ने राष्ट्र संघ में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया। प्रभाशंकर पाटनी की जानकारी में लाहौर पड्यंत्र केस के अभियुक्त सरदार पृथ्वी सिंह बहुत समय तक भावनगर में रहे थे। ब्रिटिश अधिकारी, रियासत के राजा और गांधी जी सभी पाटनी का विश्वास करते थे।


16 अक्टूबर, 1938 को प्रभाशंकर पाटनी का निधन हो गया।


सर प्रभाशंकर दलपतराम पटरानी   (15 अप्रैल 1862 - 16 फरवरी 1938) गुजरात, भारत में भावनगर राज्य के प्रधानमंत्री या दीवान थे। उनका जन्म 1862 में मोरबी में एक नगर ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह अपनी स्पष्टता, कूटनीति और महान चरित्र के लिए जाने जाते थे। वे महात्मा गांधी के करीबी मित्र थे।


प्रभाशंकर ने गुजरात में सातवीं कक्षा की परीक्षा पूरी की और अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए राजकोट की यात्रा की। उन्होंने काठियावाड़ प्रायद्वीप में पहले स्थान पर रहीं और आयुर्वेद डॉक्टर झंडू भट्ट की बेटी से शादी की। एक अवसर पर, एक प्रभाशंकर के ससुराल वालों ने उनकी आर्थिक स्थिति की आलोचना करते हुए घोषणा की कि वे अपने आर्थिक वर्ग के कारण भट्ट परिवार के नाम का उपयोग करने के लायक नहीं थे। फिर प्रभाशंकर ने अपना उपनाम भट्ट से पटरानी में बदल लिया।


प्रभाशंकर ने डॉक्टर बनने के लिए मुंबई के एक मेडिकल कॉलेज में प्रवेश किया। हालाँकि, उनका स्वास्थ्य जल्द ही बिगड़ गया और गुजरात लौटने के लिए उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। कुछ छोटी नौकरियां करने के बाद, उन्होंने राजकुमार कॉलेज, राजकोट में एक ट्यूटरिंग की नौकरी हासिल की। प्रभाशंकर के समय में, भावनगर के राजकुमार भवसिंहजी भी राजकुमार कॉलेज में पढ़ रहे थे और प्रभाशंकर को उनका नामित ट्यूटर नियुक्त किया गया था। उन्होंने अपने प्रवास के दौरान एक बहुत अच्छा रिश्ता साझा किया। प्रभाशंकर ने न केवल अतिरिक्त धन की आवश्यकता होने पर न केवल राजकुमार की आर्थिक मदद की, बल्कि उन्होंने उसका पालन-पोषण भी किया और उसके क्रोध को दूर करने में मदद की। एक बार भवसिंहजी भावनगर राज्य के राजा बन गए, उन्होंने अनुरोध किया कि प्रभाशंकर राज्य के प्रधान मंत्री बनें। हालांकि, प्रभाशंकर ने प्रधानमंत्री को पद से हटाना नहीं चाहा, और इसलिए राजा के सचिव के रूप में राज्य में शामिल हो गए। बाद में वे 1903 में प्रधानमंत्री बने, 1938 में अपनी मृत्यु तक भावनगर राज्य में विभिन्न पदों पर रहे।


प्रभाशंकर ने अच्छी शिक्षा को महत्व दिया और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में अध्ययन करने के लिए छात्रवृत्ति के साथ भावनगर राज्य और अन्य राज्यों के कई छात्रों की मदद की।


भावनगर के दीवान के रूप में, प्रभाशंकर को ब्रिटिश इंपीरियल 1910 न्यू ईयर ऑनर्स सूची में द ऑर्डर ऑफ द इंडियन एम्पायर (CIE) के साथी के रूप में नियुक्त किया गया था, और 1915 के जन्मदिन में नाइट ऑफ द ऑर्डर ऑफ द इंडियन एम्पायर (KCIE) बनाया गया था। सम्मान सूची।


1938 में कार्डियक अरेस्ट के कारण प्रभाशंकर का निधन हो गया।