गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी (जन्म- 20 अक्टूबर, 1855)

October 20, 2017

गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी (अंग्रेज़ी: Govardhanram Madhavram Tripathi, जन्म- 20 अक्टूबर, 1855; मृत्यु- 1 अप्रैल, 1907) का नाम आधुनिक गुजराती साहित्य में कथाकार, कवि, चिंतक, विवेचक, चरित्र लेखक तथा इतिहासकार इत्यादि अनेक रूपों में मान्य है। उनको सर्वाधिक प्रतिष्ठा द्वितीय उत्थान के सर्वश्रेष्ठ कथाकार के रूप में ही प्राप्त हुई है। जिस प्रकार आधुनिक गुजराती साहित्य की पुरानी पीढ़ी के अग्रणी 'नर्मद' माने जाते हैं, उसी प्रकार उनके बाद की पीढ़ी का नेतृत्व गोवर्धनराम के द्वारा हुआ। संस्कृत साहित्य के गंभीर अनुशीलन तथा रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद आदि विभूतियों के विचारों के प्रभाव से उनके हृदय में प्राचीन भारतीय आर्य संस्कृति के पुनरुत्थान की तीव्र भावना जाग्रत हुई। उनका अधिकांश रचनात्मक साहित्य मूलत: इसी भावना से संबद्ध एवं उद्भूत है।


जन्म तथा शिक्षा
गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी जी का जन्म 20 अक्टूबर, 1855 ई. में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा बंबई (वर्तमान मुम्बई) तथा नडियाद में संपन्न हुई। उन्होंने 1875 ई. में 'एल्फिन्स्टन कॉलेज' से बी.ए. उत्तीर्ण तथा 1883 में वकालत की। शिक्षा समाप्त होते ही उनकी प्रवृति तत्व चिंतन और सामाजिक कल्याण की ओर उन्मुख हुई। गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी का निधन 1 अप्रैल, 1907 ई. को हुआ था।


'सरस्वतीचंद्र' उनकी सर्वप्रमुख साहित्यिक कृति है। कथा के क्षेत्र में इसे गुजराती साहित्य का सर्वोच्च कीर्तिशिखर कहा गया है। आचार्य आनंदशंकर बापूभाई ध्रुव ने इसकी गरिमा और भाव समृद्धि को लक्षित करते हुए इसे 'सरस्वतीचंद्र पुराण' की संज्ञा प्रदान की थी, जो इसकी लोकप्रियता तथा कल्पना बहुलता को देखते हुए सर्वथा उपयुक्त प्रतीत होती है।


'सरस्वतीचंद्र' की कथा चार भागों में समाप्त होती है-


प्रथम भाग में रत्न नगरी के प्रधान विद्याचतुर की सुंदरी कन्या कुमुद और विद्यानुरागी एवं तत्व चिंतक सरस्वतीचंद्र के पारस्परिक आकर्षण की प्रारंभिक मनोदशा का चित्रण है। नायक की यह मान्यता कि 'स्त्री मां पुरुषना पुरुषार्थनी समाप्ति थती नथी' वस्तुत: लेखक के उदात्त दृष्टिकोण की परिचायक है और आगामी भागों की कथा का विकास प्राय: इसी सूत्रवाक्य से प्रतिफलित होता है।


द्वितीय भाग में व्यक्ति और परिवार के संबंधों का चित्रण भारतीय दृष्टिकोण से किया गया है।
तृतीय भाग में कर्मक्षेत्र के विस्तार के साथ प्राच्य और पाश्चात्य संस्कारों का संघर्ष प्रदर्शित है।
चतुर्थ भाग में लोक कल्याण की भावना से उद्भूत 'कल्याणग्राम' की स्थापना की एक आदर्श योजना के साथ कथा समाप्त होती है।


बीच-बीच में साधु सतों के प्रसंगों को समाविष्ट करके तथा नायक की प्रवृत्ति को आद्योपांत वैराग्य एवं पारमार्थिक कल्याण की ओर उन्मुख चित्रित करके लेखक ने अपने सांस्कृतिक दृष्टिकोण को सफलतापूर्वक साहित्यिक अभिव्यक्ति प्रदान की है।


'स्नेहामुद्रा' गोवर्धनराम की ऊर्मिप्रधान भाव गीतियों का, संस्कृतनिष्ठ शैली में लिखित एक विशिष्ठ कविता संग्रह है जो सन 1889 में प्रकाशित हुआ था। इसमें समीक्षकों की मानवीय, आध्यात्मिक एवं प्रकृति परक प्रेम की अनेक प्रतिभा एक समर्थ काव्य विवेचक के रूप में प्रकट हुई है। विल्सन कॉलेज, साहित्य सभा के समक्ष प्रस्तुत अपने गवेषणपूर्ण अंग्रेज़ी व्याख्यानों के माध्यम से गोवर्धनराम जी ने प्राचीन गुजराती साहित्य के इतिहास को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने का प्रथम प्रयास किया। इनका प्रकाशन 'क्लैसिकल पोएट्स ऑफ़ गुजरात ऐंड देयर इनफ्लुएंस ऑन सोयायटी ऐंड मॉरल्स' नाम से हुआ है।


सन 1905 में 'गुजराती साहित्य परिषद' के प्रमुख के रूप में दिये गए अपने भाषण में गोवर्धनराम ने आचार्य आनंदशंकर बापूभाई ध्रुव से प्राप्त सूत्र को पकड़कर नरसी मेहता के काल निर्णय की जो समस्या उठाई, उस पर इतना वादविवाद हुआ कि वह स्वयं ऐतिहासिक महत्व की वस्तु बन गई।


जीवन चरित लेखक के रूप में गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी की क्षमता 'लीलावती जीवनकला' तथा 'नवल ग्रंथावलि (1891 ई.) के उपोदघात से अंकित की जाती है। लीलावती उनकी दिवगंता पुत्री थी और उसके चरित लेखन में तत्वचिंतन एवं धर्मदर्शन को प्रधानता देते हुए उन्होंने सूक्ष्म देह की गतिविधि को प्रस्तुत किया है। नवलराम की जीवन कथा की उपेक्षा इसमें आत्मीयता का तत्व अधिक है। गोवर्धनराम ने अपनी जीवनी के संबंध में भी कुछ 'नोट्स लिख छोड़े थे, जो अब 'स्केच बुक' के नाम से प्रकाशित हो चुके हैं।


Govardhanram Madhavram Tripathi was an Indian Gujarati language novelist of the late 19th and early 20th centuries. He is known for his four volume novel, Saraswatichandra.
Govardhanram Tripathi was born in on 20 October 1855 on the day of the Dashera festival.


He completed his BA degree in 1875 and LLB in 1883. He started working as a lawyer in Mumbai in 1884. At the age of 43, he retired early and settled in his hometown to contribute to Gujarati literature and public service.


Govardhanram Tripathi died in Mumbai on the evening of 4 January 1907.
In 1887, the first volume of Saraswatichandra was published, and was followed by volumes 2, 3 and 4 in 1892, 1898, and 1901, respectively. He was also fluent in English, and wrote 'Scrap Book' in the language.


He also took an active role in the Indian Congress during 1902; and in 1905, he was elected as the first president of Gujarati Sahitya Parishad. He also wrote various articles and essays in the papers 'Vasant' and 'Samalochak', which were later published as books.


List of works by Govardhanram Tripathi:


SnehMudra
Saraswatichandra Volumes 1, 2, 3 and 4
Leelavati Jeevankala
Navalram Nu Kavi Jeevan
Dayaram No Akshardeh
Samalochak
Sadavastu Vichar
Classical Poets of Gujarat
Scrap Book
The period from 1885 to 1915 is called "Govardhan-Yug" or "Govardhan-Era" in Gujarati literature. On 27 April 2016, a commemorative postage stamp was released by Indian Posts to honour Govardhanram Tripathi. The Chief Minister of Gujarat, Anandiben Patel, released the postage stamp in Gandhinagar.