ठाकुर प्यारेलाल सिंह (मृत्यु- 22 अक्टूबर, 1954)

October 22, 2017

ठाकुर प्यारेलाल सिंह (अंग्रेज़ी: Thakur Pyarelal Singh ; जन्म- 21 दिसम्बर, 1891, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़; मृत्यु- 22 अक्टूबर, 1954) छत्तीसगढ़ में 'श्रमिक आन्दोलन' के सूत्रधार तथा 'सहकारिता आन्दोलन' के प्रणेता थे। सन 1920 में राजनांदगांव में मिल मज़दूरों ने हड़ताल की थी, जो 37 से भी अधिक दिनों तक चली थी और मिल अधिकारियों को मज़दूरों की सभी मांगें मंजूर करनी पड़ी थीं। वह हड़ताल ठाकुर प्यारेलाल के नेतृत्व में हुई थी। ठाकुर प्यारेलाल 1920 में पहली बार महात्मा गाँधी के संपर्क में आए थे। असहयोग आन्दोलन एवं सत्याग्रह आन्दोलन में उन्होंने सक्रिय भाग लिया तथा गिरफ़्तार होकर जेल भी गए। वर्ष 1945 में छत्तीसगढ़ के बुनकरों को संगठित करने के लिए उनके नेतृत्व में 'छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी संघ' की स्थापना हुई थी। प्रवासी छत्तीसगढ़ियों को शोषण एवं अत्याचार से मुक्त कराने की दिशा में वे सदा सक्रिय रहे।


जन्म परिचय
छत्तीसगढ़ में श्रमिक आन्दोलन के सूत्रधार ठाकुर प्यारेलाल सिंह का जन्म 21 दिसम्बर, 1891 ई. को छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव ज़िले के 'दैहान' नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम दीनदयाल सिंह तथा माता का नाम नर्मदा देवी था। 22 अक्टूबर, 1954 को भूटान की यात्रा के समय अस्वस्थ हो जाने कारण ठाकुर प्यारेलाल सिंह का निधन हो गया। छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में सहकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए "ठाकुर प्यारेलाल सिंह सम्मान" स्थापित किया है।


ठाकुर प्यारेलाल की प्रारम्भिक शिक्षा राजनांदगांव तथा रायपुर में हुई। हाईस्कूल के लिए उन्हें रायपुर आना पड़ा था। सन 1909 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। इसके बाद 1913 में उन्होंने नागपुर से बी.ए. पास किया। नागपुर तथा जबलपुर से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी और फिर 1916 में वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वकालत प्रारम्भ कर दी।


बाल्यकाल से ही ठाकुर प्यारेलाल मेधावी, सच्चे स्वदेशप्रेमी तथा राष्ट्रीय विचारधारा से ओत-प्रोत थे। वे सोलह वर्ष की उम्र से ही स्वदेशी कपड़े पहनने लगे थे। उस वक्त वे कुछ क्रांतिकारियों से मिले थे, जो बंगाल के थे। तब से उन्होंने ठान लिया था कि देश सेवा ही उनके जीवन का मकसद होगा। सन 1909 में जब प्यारेलाल सिर्फ़ उन्नीस साल के थे, उसी वक्त राजनांदगांव में सरस्वती वाचनालय की स्थापना की। वहाँ समाचार पत्र पढ़कर लोगों को देश की समस्याओं के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए उत्साहित किया जाता था।


महात्मा गाँधी ने वर्धा में जब नई योजना प्रारंभ करने के लिए विचार विमर्श हेतु बैठक आयोजित की, तब उस बैठक में ठाकुर साहब को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रारंभ से ही उनकी गहरी रुचि थी। 'गीता' के वे प्रकांड विद्वान थे। हिन्दी, अंग्रेज़ी, संस्कृत आदि भाषाओं के साथ-साथ अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी में वे समान अधिकार रखने वाले भाषाशास्त्री भी थे।


सन 1916 में प्यारेलालजी ने दुर्ग में वकालत आरम्भ की थी, पर 1920 में जब 'नागपुर अधिवेशन' में कांग्रेस ने असहयोग आन्दोलन छेड़ने की घोषणा की तो ठाकुर प्यारेलाल ने अपनी वकालत छोड़ दी और ज़िले भर में असहयोग आन्दोलन का प्रचार करने निकल पड़े। असहयोग आन्दोलन के दौरान न जाने कितने ही विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूल छोड़ दिये, कितने वकीलों ने वकालत छोड़ दी। ठाकुर प्यारेलाल जी के भाईयों ने भी स्कूल छोड़ दिया। उन स्कूल छोड़े हुए विद्यार्थियों के लिये ठाकुर प्यारेलाल सोचने लगे कि क्या किया जाये। बाद में उन विद्यार्थियों के लिए राष्ट्रीय स्कूलों की स्थापना की गई। प्यारेलाल जी ने खुद राजनांदगांव में एक माध्यामिक स्कूल की स्थापना की। धमतरी में राष्ट्रीय विद्यालय का दायित्व भी प्यारेलाल जी को सौंपा गया था। उनके पिता दीनदयाल सिंह उन स्कूलों के डिप्यूटी इंस्पेक्टर थे, जो राजनांदगांव, छुईखदान और कवर्धा रियासतों के थे।


ठाकुर प्यारेलाल वकालत छोड़ने के बाद गांव-गांव घूमकर चरखे और खादी का प्रचार करने लगे। प्रचार सिर्फ़ दूसरों के लिए नहीं था। प्रचार तोे अपने-आप के लिए भी था। ऐसा कहते हैं कि उन दिनों प्यारेलाल जी सिर्फ़ एक ही खादी की धोती पहनते थे। उसी को पहनकर स्नान करते, धोती का एक छोर पहने रहते, दूसरा छोर सुखाते, दूसरा छोर सूखाने पर उसे पहन लेते और पहला छोर सुखाते। तीन साल तक प्यारेलाल जी उसी धोती को पहनते रहे।


ठाकुर प्यारेलाल सिंह के नेतृत्व में राजनांदगांव में छात्र आन्दोलन, स्वदेशी आन्दोलन, अत्याचारी दीवान हटाओ आन्दोलन चलते रहे, जिनमें उन्हें सफलता भी मिलती रही। छात्र जीवन में ही वे बंगाल के क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए थे। लोकमान्य तिलक तथा माधवराव सप्रे के संपर्क में भी वे छात्र जीवन में आए थे। देश भक्ति और राष्ट्रीयता की भावना उनके नस-नस में समा गई थी। 1909 ई. में उन्होंने राजनांदगांव में 'सरस्वती पुस्तकालय' की स्थापना की थी, जो आन्दोलनकारियों का अड्डा बना।


राजनांदगांव में वकालत करते हुए ही ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने मिल मज़दूरों को संगठित किया। उनके नेतृत्व में 1919 में मज़दूरों ने देश की सबसे पहली और लम्बी हड़ताल की थी। उन्हें परिणामस्वरूप रियासत से निष्कासित किए जाने की सजा मिली थी। इस घटना से ठाकुर साहब एक श्रमिक नेता के रूप में देश में प्रतिष्ठत हो गए। सन 1920 में वे पहली बार महात्मा गाँधी के संपर्क में आए। असहयोग एवं सत्याग्रह आन्दोलन में उन्होने भाग लिया तथा गिरफ्तार हुए और जेल गए। सन 1924 में उनके नेतृत्व में राजनांदगांव मिल मज़दूरों ने पुनः हड़ताल की। श्रमिकों पर लाठियाँ और गोलियाँ बरसाई गईं, किन्तु हड़ताल जारी रही। ठाकुर साहब को पुनः राजनांदगांव से निष्कासित कर दिया गया। अतः वे रायपुर जाकर बस गए। रायपुर में उन्होने पं. सुंदरलाल शर्मा के साथ जुड़कर 'अछुतोद्धार' के कार्य में सहयोग प्रदान किया।


1930 और 1932 के आन्दोलन में ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने क्रांतिकारी की भूमिका निभाई। उन्होंने हज़ारों की संख्या में किसानों को संगठित कर "पट्टा मत लो, लगान मत पटाओं" आन्दोलन चलाकर ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। दोनों बार उन्हें डेढ़-डेढ़ वर्ष की सजा हुई। उनसे वकालत की सनद ब्रिटिश सरकार ने छींन ली। स्वतंत्रता आन्दोलन में ठाकुर साहब संभवतः अकेले वकील होंगे, जिन्हें आज़ादी की लड़ाई में सक्रीय भूमिका निभाने के कारण उनके जीवन यापन का काम वकालत पेशा जारी रखने के लिए वकालत का सनद नहीं लौटाया गया। अंग्रेज़ हुकुमत की टृष्टि में ठाकुर प्यारेलाल बहुत बड़े विप्लवी थे। इनके कार्यों की सतत निगरानी की जाती थी। सन 1934 ई. में वे 'महाकोशल कांग्रेस कमेटी' के महासचिव निर्वाचित हए थे। खरे मंत्रिमंडल में वे कुछ समय के लिए शिक्षा मंत्री भी रहे।


सन 1936 से 1947 तक वे रायपुर नगरपालिका के तीन बार अध्यक्ष निर्वाचित होते रहे। यह स्वयंमेव एक रिकार्ड है। वे 'छत्तीसगढ़ एजूकेशनल सोसाइटी' के संस्थापक अध्यक्ष थे। 1972 में उन्होंने 'भूमिगत आन्दोलन' का संचालन किया था। सन 1945 में उन्होंने 'छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी संघ' की स्थापना की थी, जिसके प्रारंभिक काल में 3000 सदस्य थे। आज भी यह छत्तीसगढ़ की एक मजबूत सहकारी संस्था है। इसी वर्ष उन्होंने 'छत्तीसगढ़ शोषण विरोधी संघ'की स्थापना की थी। इस संघ के बेनर तले भाटापारा के नगरपालिका चुनाव में स्थानीय सदस्यों ने विजय हासिल कर इस संघ की अपादेयता प्रमाणित की थी।


ठाकुर प्यारेलाल सिंह छत्तीसगढ़ राज्य की अवधारणा के जन्मदाताओं में से थे। 'त्रिपुरी कांग्रेस' के पहले बिलासपुर में एक बैठक हुई थी, जिसमें ठाकुर प्यारेलाल सिंह, पं. सुंदरलाल शर्मा, बैरिस्टर छेदीलाल ने छत्तीसगढ़ को एक अलग राजनैतिक पहचान देने के विषय पर विचार-विमर्श किया था, जिसमें ठाकुर साहब, पं. रामदयाल तिवारी, डॉ. ज्वाला प्रसाद मिश्र, द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र आदि ने बहुत बड़ी संख्या में सम्मिलित होकर छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण विषयक प्रस्ताव पारित किया था। सन 1946 में ठाकुर साहब से पूछा गया था कि आज़ादी के बाद क्या छत्तीसगढ़ अलग प्रदेश बन सकता है, तब उन्होंने कहा था- "जब तक छत्तीसगढ़ की रियासतें शामिल नहीं की जातीं, तब तक भौगोलिक रूप से छत्तीसगढ़ को प्रदेश का दर्जा देना संभव नहीं है। इसी असंभव को संभव बनाने के लिए 1946 में उन्होंने रियासती आन्दोलन की नींव डाली और छत्तीसगढ़ रियासती आन्दोलन के लिए निर्मित संघर्ष समिति के अध्यक्ष के रूप में ठाकुर प्यारे लाल सिंह ने बागडोर संभाली। इस आन्दोलन में न केवल रियासतों के विलीनीकरण के मार्ग को सुगम व प्रशस्त किया, वरन छत्तीसगढ़ को प्रदेश बनने लायक सुनिश्चित भौगोलिक सीमा निर्धारित की। छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन को इन्हीं विलीनीकृत रियासतों सहित सात ज़िलों के आधार पर मजबूती के साथ खड़ा किया।


Thakur Pyarelal Singh born 21 December 1891 in Daihan, was an Indian freedom fighter.He was also conferred with the honorary title of "Tyagmurti", which literally means "epitome of sacrifice".


Thakur Pyarelal Singh was born on 21 December 1891 in Daihan village of Rajnandgaon Tehsil. He belonged to Vaghela(Baghel) Rajput caste.His early rearing was in Rajnandgaon. Enthusiasm to learn and keen interest in studies brought him to Raipur for higher education. He earned the degree of Bachelor of Arts in 1913 from Nagpur winning many accolades. In 1915, he graduated from Law school and began to practice. He was a man with determination and had a zealous approach to live life. He also had keen interest in sports. Gilli Danda (an Indian sport), Chess, Hockey were some of his favourite games but nothing could top his passion for swimming. His entire family including himself had an immense contribution in India's struggle for freedom.His sons Thakur Ramkrishna Singh,Thakur Sachidanand Singh Hari Thakur and Ramnarayan Singh Thakur were a prominent figure in the spheres of Indian freedom movement, contemporary politics,social welfare,literature and journalism of Chhattisgarh.



In 1916, he met the cotton mill workers based in Rajnandgaon. He learnt that the officers were very rude to the workers and that they had to work 12 hours a day. Their plight made Thakur Pyarelal start an organization against the British officers to help the workers. In 1920 Rajnandgaon Mill Workers Strike led under Thakur Pyarelal Singh lasted more than 37 days. This was India's first strike which lasted this long. The strike reduced the working hours. Around this time, upon the announcement of non cooperation movement, he renounced his advocacy and began to spread the word. Many students left public schools during the non-cooperation movement, many lawyers abandoned their practices. National schools were established for such students and based on his unfathomable compassion for children and their upliftment, Pyarelal ji was assigned the responsibility of national schools. Pyarelal Ji had also established Madhyamik School ( Middle school) in Rajnandgaon. His father, Mr Dindayal Singh was Deputy Inspector of Schools which were from principalities of Rajnandgaon, Kawardha and Chuikhadan. In 1923, the Flag Satyagrah Movement was announced by Congress and this movement was led by Thakur Pyarelal ji in various regions of Chhattisgarh (formerly known as Madhya Pradesh). Innumerable satyagrahis from all over the state joined him in generating awareness of the common civilians. In 1924, the Mill Workers Strike happened for the second time in Rajnandgaon under Thakur Pyarelal Singh. This led to outbursts of violence and rage amongst the workers and the British Government. Nothing could hinder the perseverance and valor of Pyarelal Ji and thus the movement led to favourable results yet again. In 1924, Thakur Pyarelal Singh resumed his advocating career while staying in Raipur. In 1930, Congress assigned the responsibility of Boycott movement to Thakur Pyarelal Singh. He used to picket on liquor stores. While he was organizing the movement and was formulating a group of farmers, he was sentenced to imprisonment for a year by the British Government. In 1932 during his vivacious and dutiful speech raising patriotism amongst people at Gandhi chowk led to his imprisonment for two years and he lost his privileges to practice law. Released from prison in 1934, he was elected minister of Mahakoshal Provincial Congress Committee. In 1936 he was elected to the assembly for first time. He was invited by Mahatma Gandhi for discussion on New methods of teaching. In 1937, Pyarelal ji did a commendable job by establishing the first ever college in the State called as Chhattisgarh college. Thakur Pyarelal Singh was regardfully elected as president of Raipur municipal corporation three times. For the first time in 1937, second in 1940 and third in 1944. He was chosen by a lion's share because he had the conviction and confidence of citizens. Under his presidency the state saw an array of advancements some of it includes construction of many primary schools, better hospitals, well constructed roads. Later in the year 1944, Thakur Pyarelal ji encouraged in establishment of Farmers Rice Cooperative Factory in Mahasamund. He has boundless contributions in the progression of many more associations like - Dhani Union, Vishwakarma Association, Coppersmith associations. In 1945 Pyarelal ji planted the foundation of Chhattisgarh Weavers Cooperative societies in all districts of the state. This was one of the major reasons for the upliftment of the families involved in this business.


In 1946, Thakur Pyarelal ji established Congressional parties in all the villages of Chhattishgarh. In 1950, he travelled to north-eastern parts of India with an aim to encourage education among the people. He also started the publication of Rashtra Bandhu with the same purpose.In 1951, Thakur Pyarelal resigned from Congress. He became a member of the All India Kisan Mazdoor Party, a Gandhian organisation, led by chairman Acharya Kripalani.


In 1952, Pyarelal ji was elected as Member of Legislative Assembly from Raipur. Immediately after the election, he joined Bhoodan Movement of Acharya Vinoba Bhave. He traveled on foot to many villages with the motive of serving people. His walk in 1954 proved to be his last. He started with the aim to walk 2,200 miles over three hundred villages in three months,to spread the message of the Bhoodan movement. After experiencing his first heart ache, he still gathered the courage to deliver his speech and later that day experienced a heart attack that led to his death. On 22 October 1954, he was cremated on the banks of the river Kharun.