इस्मत चुग़ताई (मृत्यु: 24 अक्टूबर, 1991)

October 24, 2017

इस्मत चुग़ताई  जन्म: 15 अगस्त, 1915 - मृत्यु: 24 अक्टूबर, 1991) का नाम भारतीय साहित्य में एक चर्चित और सशक्त कहानीकार के रूप में विख्यात हैं। उन्होंने महिलाओं से जुड़े मुद्दों को अपनी रचनाओं में बेबाकी से उठाया और पुरुष प्रधान समाज में उन मुद्दों को चुटीले और संजीदा ढंग से पेश करने का जोखिम भी उठाया। आलोचकों के अनुसार इस्मत चुग़ताई ने शहरी जीवन में महिलाओं के मुद्दे पर सरल, प्रभावी और मुहावरेदार भाषा में ठीक उसी प्रकार से लेखन कार्य किया है, जिस प्रकार से प्रेमचंद ने देहात के पात्रों को बखूबी से उतारा है। इस्मत के अफ़सानों में औरत अपने अस्तित्व की लड़ाई से जुड़े मुद्दे उठाती है।


जीवन परिचय
इस्मत चुग़ताई का जन्म 15 अगस्त, 1915 को बदायूँ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका बचपन अधिकांशत: जोधपुर में व्यतीत हुआ, जहाँ उनके पिता एक सिविल सेवक थे। इनके पिता की दस संतानें थीं- छ: पुत्र और चार पुत्रियाँ। इनमें इस्मत चुग़ताई उनकी नौवीं संतान थीं। जब चुग़ताई युवावस्था को प्राप्त कर रही थीं, तभी इनकी बहनों का विवाह हो चुका था। इनके जीवन का वह समय काफ़ी महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ, जो इन्होंने अपने भाइयों के साथ व्यतीत किया। इनके भाई मिर्ज़ा आजिम बेग़ चुग़ताई पहले से ही एक जाने-माने लेखक थे। इस प्रकार इस्मत चुग़ताई को किशोरावस्था में ही भाई के साथ-साथ एक गुरु भी मिल गया था। इस्मत चुग़ताई का निधन 24 अक्टूबर, 1991 में मुंबई (महाराष्ट्र) में हुआ।


अपनी शिक्षा पूर्ण करने के साथ ही इस्मत चुग़ताई लेखन क्षेत्र में आ गई थीं। उन्होंने अपनी कहानियों में स्त्री चरित्रों को बेहद संजीदगी से उभारा और इसी कारण उनके पात्र ज़िंदगी के बेहद क़रीब नजर आते हैं। इस्मत चुग़ताई ने ठेठ मुहावरेदार गंगा-जमुनी भाषा का इस्तेमाल किया, जिसे हिन्दी-उर्दू की सीमाओं में क़ैद नहीं किया जा सकता। उनका भाषा प्रवाह अद्भुत था। इसने उनकी रचनाओं को लोकप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।


इस्मत चुग़ताई अपनी 'लिहाफ' कहानी के कारण ख़ासी मशहूर हुईं। 1941 में लिखी गई इस कहानी में उन्होंने महिलाओं के बीच समलैंगिकता के मुद्दे को उठाया था। उस दौर में किसी महिला के लिए यह कहानी लिखना एक दुस्साहस का काम था। इस्मत को इस दुस्साहस की कीमत चुकानी पड़ी, क्योंकि उन पर अश्लीलता का मामला चला, हालाँकि यह मामला बाद में वापस ले लिया गया। आलोचकों के अनुसार उनकी कहानियों में समाज के विभिन्न पात्रों का आईना दिखाया गया है। इस्मत ने महिलाओं को असली जुबान के साथ अदब में पेश किया। उर्दू जगत में इस्मत के बाद सिर्फ सआदत हसन मंटो ही ऐसे कहानीकार थे, जिन्होंने औरतों के मुद्दों पर बेबाकी से लिखा। इस्मत का कैनवास काफ़ी व्यापक था, जिसमें अनुभव के रंग उकेरे गए थे। ऐसा माना जाता है कि 'टेढ़ी लकीर' उपन्यास में इस्मत ने अपने जीवन को ही मुख्य प्लाट बनाकर एक महिला के जीवन में आने वाली समस्याओं को पेश किया।


'फ़ायर' और 'मृत्युदंड' जैसी फ़िल्मों के किरदार तो परदे पर नज़र आते हैं, लेकिन इस्मत ने उन्हें कहीं पहले गढ़कर अपने उपन्यासों में पेश कर दिया था। समलैंगिक रिश्तों पर नहीं, उसके कारणों पर उर्दू जगत में पहली बार इस्मत ने ही लिखा। यूँ तो उन्होंने 'जिद्दी', 'लिहाफ', 'सौदाई', 'मासूमा', 'एक क़तरा खून' जैसे कितने ही उपन्यास लिखे, किंतु सबसे ज़्यादा मशहूर और जिसका विरोध हुआ, वह 'टेढ़ी लकीर' है। 1944 का उपन्यास 'टेढ़ी लकीर' ऐसे परिवारों पर व्यंग्य है जो अपने बच्चों की परवरिश में कोताही बरतते हैं और नतीजे में उनके बच्चे प्यार को तरसते, अकेलेपन को झेलते एक ऐसी दुनिया में चले जाते हैं, जहाँ जिस्म की ख्वाहिश ही सब कुछ होती है। इस्मत चुग़ताई ने 'टेढ़ी लकीर' के ज़रिये समलैंगिक रिश्तों को एक रोग साबित करके उसके कारणों पर नज़र डालने पर मजबूर किया। लेकिन तब के लोगों ने उनकी बातों को लेकर उनका विरोध किया, जबकि सच्चाई यह थी कि उन्होंने अपने किरदार के ज़रिये यह बताया कि एक बच्चे का अकेलापन, प्यार से महरूम और उसको नज़रअंदाज़ करना किस तरह एक बीमारी का रूप ले लेता है। उन्होंने इसे बीमारी बताकर नफरत के बदले प्यार, अपनापन निभाने की सीख 'टेढ़ी लकीर' के माध्यम से दी।


इस्मत चुग़ताई ने 'कागजी हैं पैरहन' नाम से एक आत्मकथा भी लिखी थी। उनकी अन्य रचनाएँ इस प्रकार हैं-


उपन्यास कहानी संग्रह
जंगली कबूतर
टेढी लकीर
जिद्दी
एक कतरा ए खून
मासूमा
दिल की दुनिया
बांदी
बहरूप नगर
सैदाई
चोटें
छुईमुई
एक बात
कलियाँ
एक रात
पुरस्कार व सम्मान
'गालिब अवार्ड' (1974) - 'टेढ़ी लकीर' के लिए
'साहित्य अकादमी पुरस्कार'
'इक़बाल सम्मान'
'नेहरू अवार्ड'
'मखदूम अवार्ड'


Ismat Chughtai  (August 21, 1911 – October 24, 1991)1 was an eminent Indian writer in Urdu, known for her indomitable spirit and a fierce feminist ideology. Considered the grand dame of Urdu fiction, Chughtai was one of the Muslim writers who stayed in India after the subcontinent was partitioned. Along with Rashid Jahan, Wajeda Tabassum and Qurratulain Hyder, Ismat's work stands for the birth of a revolutionary feminist politics and aesthetics in twentieth century Urdu literature. She explored feminine sexuality, middle-class gentility, and other evolving conflicts in modern India. Her outspoken and controversial style of writing made her the passionate voice for the unheard, and she has become an inspiration for the younger generation of writers, readers and intellectuals.


She was born in on August 21, 1911 in Badayun, Uttar Pradesh and grew up largely in Jodhpur where her father was a civil servant. She was ninth of ten children (six brothers, four sisters), and since her older sisters got married while Ismat was very young, the better part of her childhood was spent in the company of her brothers, a factor which she admits contributed greatly to the frankness in her nature and writing. Her brother, Mirza Azim Beg Chughtai, already an established writer, when Ismat was still in her teens, was her first teacher and mentor. She had her early education in the Women's College of Aligarh Muslim University.


In 1936, still working on her bachelor's degree in Lucknow, she attended the first meeting of the Progressive Writers' Association . After her BA from Isabella Thoburn College, Ismat secured a BEd (a Bachelor's in Education), thus becoming the first Indian Muslim woman to have earned both degrees.In this period she started writing in secret, due to violent opposition to her education from her Muslim relatives.


Chughtai was a liberal Muslim whose daughter, nephew & niece were married to Hindus. In her own words, Chughtai came from a family of "Hindus, Muslims and Christians who all live peacefully".She said she read not only the Qur’an, but also the Gita and the Bible with openness.


Chughtai's short stories reflect the cultural legacy of the region in which she lived. This is especially notable in her story "Sacred Duty", where she deals with social pressures in India, alluding to specific national, religious and cultural traditions.


She has two daughters, Seema Sawhny (1944-2011) was married to Naveen Sawhny (1937-1987) and they have a son Ashish Sawhny (filmmaker), second daughter Sabrina Lateef (1951- ) is unmarried. 


In 1941, she married screenwriter and film director Shaheed Lateef, who made such films as Ziddi (1948) and Arzoo (1950). They collaborated on many films together, and had two daughters. Lateef died in 1967.


Ismat Chughtai died in Bombay on 24 October 1991. As per her last wishes, she was cremated.


Awards
1974: Ghalib Award (Urdu Drama): Terhi Lakeer
1975: Filmfare Best Story Award: Garam Hawa (with Kaifi Azmi)
1975: 1975 - Government of India State Award
1976: Padma Shri Award
1976 - Uttar Pradesh Government gave her an award.
1977 - Ghalib Award from the Ghalib Institute for the Urdu play Tahai ka Zahr.
1979 - Makhdoom Literary Awards of Andhra Pradesh Urdu Akademi.
1982: Soviet Land Nehru Award
1990 Iqbal Samman (Iqbal Award) from Rajasthan Urdu Akademi for the year 1989
Ismat Chughtai is considered a path-breaker for women writers in the subcontinent, as the many women writing during Ismat's childhood – including, notably, Muhammadi Begum, Sughra Humayun Mirza, Tyaba Bilgrami (to whose novel Anwari Begum Chughtai refers in Terhi Lakeer) and Khatun Akram – were considered too enmeshed in the ideology of slow, conservative and religiously sanctioned changes for women advocated by such male reformers as Mumtaz Ali, Rashidul Khairi and Shaikh Abdullah. However, in Ismat's formative years, Nazar Sajjad Hyder had established herself an independent feminist voice, and the short stories of two very different women, Hijab Imtiaz Ali and the Progressive Dr Rashid Jehan were also a significant early influence on Ismat.


In her career many of her writings including Angarey and Lihaaf were banned in South Asia because their reformist and feminist content offended conservatives (for example, her view that the Niqab, the mask worn by women in Muslim societies, should be discouraged for Muslim women because it is oppressive and feudal). Many of her books have been banned at various times during their publication history.


Filmography
Shikayat (1948)- Dialogue
Ziddi – Story Writer
Arzoo – Screenwriter, Dialogue
Buzdil (1951)
Sheesha (1952)
Fareb(1953) – Co-Director
Darwaza (1954)
Society (1955)
Sone Ki Chidiya (1958) – Screenwriter, producer
Lala Rukh (1958)- Co-Director, Producer
Baharen Phir Bhi Ayengi (1966-7)
Garam Hawa (1973) – Story Writer
Junoon – Dialogue, Actor


 

Know Another Day