रफ़ी अहमद क़िदवई (मृत्यु: 24 अक्टूबर, 1954)

October 24, 2017

रफ़ी अहमद क़िदवई  जन्म: 18 फ़रवरी, 1894; मृत्यु: 24 अक्टूबर, 1954) स्वतंत्रता सेनानी और देश के प्रमुख राजनीतिज्ञ थे।


जीवन परिचय
रफ़ी अहमद क़िदवई का जन्म 18 फ़रवरी 1894 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के मसौली नामक स्थान में हुआ था। रफ़ी अहमद क़िदवई के पिता ज़मींदार और सरकारी अधिकारी थे। रफ़ी अहमद क़िदवई का 24 अक्टूबर, 1954 को दिल्ली में हृदय गति रुक जाने से देहान्त हो गया।


रफ़ी अहमद क़िदवई की आरम्भिक शिक्षा बाराबंकी में हुई और अलीगढ़ के ए.एम.ओ. कॉलेज से वे स्नातक बने। क़ानून की शिक्षा पूरी नहीं हो पाई थी कि गांधी जी के आह्वान पर असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित हो गये।


रफ़ी अहमद क़िदवई का विवाह सन्‌ 1918 में हुआ था जिससे उन्हें एक पुत्र हुआ। दुर्भाग्यवश बच्चा सात वर्ष की आयु में ही चल बसा।


ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध प्रचार करने के अभियोग में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और दस महीने जेल में बन्द रहे। उनका पूरा जीवन स्वतंत्रता संग्राम और विभिन्न प्रशासनिक पदों के द्वारा देशसेवा को ही समर्पित रहा।


रफ़ी अहमद क़िदवई की संगठन क्षमता से पंडित मोतीलाल नेहरू विशेष रूप से प्रभावित थे। उन्होंने इन्हें इलाहाबाद बुलाकर अपना निजी सचिव बना लिया।


कांग्रेस के अन्दर जब स्वराज्य पार्टी का गठन हुआ तो क़िदवई उसमें सम्मिलित हो गये। 1926 में वे स्वराज्य पार्टी के टिकट पर केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा के सदस्य निर्वाचित हुए और वहाँ स्वराज्य पार्टी के प्रमुख सचेतक बनाए गये।


1930 में कांग्रेस के निश्चयानुसार उन्होंने भी सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया और नमक सत्याग्रह की समाप्ति के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ अवध के किसानों को संगठित करने में लग गये।


1935 का शासन विधान लागू होते समय रफ़ी अहमद क़िदवई उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। मुस्लिम लीग द्वारा उनके ख़िलाफ़ फैलाए गए वातावरण के कारण उन्हें पहली बार चुनाव में सफलता नहीं मिली और उपचुनाव के द्वारा वे उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य बने।


1937 में पंडित गोविन्द वल्लभ पंत के नेतृत्व में जो पहला मंत्रिमंडल बना, उसमें वे राजस्व मंत्री बनाए गए। ज़मींदारी उन्मूलन का नीति संबंधी निर्णय उन्हीं के समय में हुआ था।


1946 में भी वे पहले राजस्वमंत्री और बाद में उत्तर प्रदेश के गृहमंत्री बने। इसी समय देश का विभाजन हुआ और कुछ संकीर्ण दृष्टि के क्षेत्रों में उनके गृहमंत्री पद पर रहने की आलोचना होने लगी। इस पर नेहरू जी ने उन्हें केन्द्रीय संचार और नागरिक मंत्री के रूप में दिल्ली बुला लिया। संगठन में कुछ और विचार भेद होने के कारण कुछ समय के लिए वे कांग्रेस संगठन और मंत्रिमंडल से अलग होकर 'किसान मज़दूर प्रजापार्टी' के सदस्य बन गए थे। पर नेहरू जी के कांग्रेस अध्यक्ष बनते ही पुन: दल में वापस आ गए। इसके बाद उन्होंने केन्द्र में खाद्य और कृषिमंत्री का पद भार सम्भाला। शासन के सभी पदों पर चाहे प्रदेश हो या केन्द्र उन्होंने अपनी छाप छोड़ी और प्रशासनिक क्षमता के नये मापदंड स्थापित किए।


श्री क़िदवई राष्ट्रवादी, धर्मनिरपेक्ष तथा विश्वसनीय व्यक्ति थे। उनके व्यवहार में कृत्रिमता नहीं थी। प्रतिपक्षी की सहायता करने में भी सदा आगे रहते थे।


Rafi Ahmed Kidwai  (18 February 1894 – 24 October 1954) was a politician, an Indian independence activist and a socialist, sometimes described as an Islamic socialist. He hailed from Barabanki District of United Provinces, now Uttar Pradesh, in north India.


Rafi Ahmed was born in the village of Masauli, in Barabanki district (now in Uttar Pradesh), the eldest son of Imtiaz Ali Kidwai and his wife, Rashid un-Nisa. Imtiaz Ali was an affluent Zamindar (land-owner) who had added to his position in society by entering government service. His wife, Rashid-un-Nisa, dies when Imtiaz was still a child.


Rafi received his early education from a tutor at the home of his uncle, Wilayat Ali, a politically active lawyer, and in the village school. He attended the Government High School, Barabanki, until 1913. He then attended the Mohammadan Anglo-Oriental College, Aligarh, where he graduated with a BA in 1918. He began work towards the degree of LLB, but never completed it. This was because he got swept up by the khilafat and non-cooperation movements of 1920–21 (the first of Mahatma Gandhi’s major all-India movements) and was jailed for his participation.


In 1919, Rafi was married to Majid-un-Nisa, a girl of his own community and similar background and hailing from the same province. The match, which was arranged by their families in the usual Indian way, was harmonious and lasted to the end of their lives. The couple were blessed with only one child, a son who died of an unexplained fever at seven years of age.


Rafi had four younger brothers, namely Shafi Ahmed, Mehfooz Ahmad, Ali Kamil and Hussain Kamil Kidwai. His brother Shafi was married to the communist activist and writer Anis Kidwai, a Rajya Sabha member. They were the grandparents of Ayesha Kidwai, a communist and feminist ideologue active in politics at JNU, and of Seema Mustafa, a journalist. Mehfooz Ahmad's son Fareed Kidwai is a member of the Samajwadi Party and a Minister of State in the Uttar Pradesh government. Rafi's other nephews include Rishad Kamil Kidwai (s/o Mehfooz Ahmed Kidwai), Mumtaz Kamil Kidwai (s/o Ali Kamil Kidwai) and Hasan Javed Kidwai (s/o Husain Kamil Kidwai).


After attending Muhammadan Anglo-Oriental College in Aligarh, Kidwai entered politics through the Khilafat movement. After the passage of the Government of India Act 1935, he held an office for the Indian National Congress.


In 1937, Kidwai became a minister for Revenue and Prisons in Govind Ballabh Pant's cabinet in the United Provinces of Agra and Oudh (UP) under the Provincial Autonomy Scheme. Under his stewardship, UP became the first province to curtail the zamindari system. In April 1946, he became the Home Minister of UP.


Kidwai died on 24 October 1954 aged 60, while still in office as a Minister. He was buried with full state honours in a mosque in his hometown.


 

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