निर्मल वर्मा (मृत्यु: 25 अक्तूबर 2005)

October 25, 2017

निर्मल वर्मा (जन्म: 3 अप्रॅल 1929 - मृत्यु: 25 अक्तूबर 2005) हिन्दी के आधुनिक साहित्यकारों में से एक थे। हिन्दी साहित्य में नई कहानी आंदोलन के प्रमुख ध्वजवाहक निर्मल वर्मा का कहानी में आधुनिकता का बोध लाने वाले कहानीकारों में अग्रणी स्थान है।


जीवन परिचय
निर्मल वर्मा का जन्म तीन अप्रॅल 1929 को शिमला में हुआ था। ब्रिटिश भारत सरकार के रक्षा विभाग में एक उच्च पदाधिकारी श्री नंद कुमार वर्मा के घर जन्म लेने वाले आठ भाई बहनों में से पांचवें निर्मल वर्मा की संवेदनात्मक बुनावट पर हिमांचल की पहाड़ी छायाएं दूर तक पहचानी जा सकती हैं। उन्होंने कम लिखा है परंतु जितना लिखा है उतने से ही वे बहुत ख्याति पाने में सफल हुए हैं। उन्होंने कहानी की प्रचलित कला में तो संशोधन किया ही, प्रत्यक्ष यथार्थ को भेदकर उसके भीतर पहुंचने का भी प्रयत्न किया है। हिन्दी के महान साहित्यकारों में से अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसे कुछ ही साहित्यकार ऐसे रहे हैं जिन्होंने अपने प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर भारतीय और पश्चिम की संस्कृतियों के अंतर्द्वन्द्व पर गहनता एवं व्यापकता से विचार किया।[1] दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से इतिहास में एम.ए. करने के बाद उन्होंने कुछ दिन तक अध्यापन किया। 1959 से 1972 के बीच उन्हें यूरोप प्रवास का अवसर मिला। वह प्राग विश्वविद्यालय के प्राच्य विद्या संस्थान में सात साल तक रहे। उनकी कहानी ‘माया दर्पण’ पर 1973 में फ़िल्म बनी जिसे सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फ़िल्म का पुरस्कार मिला।


वे इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ़ एडवांस स्टडीज़ (शिमला) के फेलो (1973), निराला सृजनपीठ भोपाल (1981-83) और यशपाल सृजनपीठ (शिमला) के अध्यक्ष रहे। 1988 में इंग्लैंड के प्रकाशक रीडर्स इंटरनेशनल द्वारा उनकी कहानियों का संग्रह 'द वर्ल्ड एल्सव्हेयर' प्रकाशित हुआ। इसी समय बीबीसी द्वार उन पर एक डाक्यूमेंट्री फ़िल्म भी प्रसारित हुई।


‘रात का रिपोर्टर’, ‘एक चिथड़ा सुख’, ‘लाल टीन की छत’ और ‘वे दिन’ निर्मल वर्मा के चर्चित उपन्यास है। उनका अंतिम उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ 1990 में प्रकाशित हुआ। उनकी सौ से अधिक कहानियाँ कई कहानी संग्रहों में प्रकाशित हुई। 1958 में ‘परिंदे’ कहानी से प्रसिद्धी पाने वाले निर्मल वर्मा ने ‘धुंध से उठती धुन’ और ‘चीड़ों पर चाँदनी’ यात्रा वृतांत भी लिखे, जिसने उनकी लेखन विधा को नये मायने दिए।


निर्मल वर्मा ने अनेक कहानियाँ, उपन्यास, यात्रा वृतांत, संस्मरण आदि लिखे हैं। उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं:


उपन्यास
वे दिन (1964)
लाल टीन की छत (1974)
एक चिथड़ा सुख (1979)
रात का रिपोर्टर (1989)
अंतिम अरण्य (2000)
कहानी संग्रह
परिंदे (1959)
जलती झाड़ी (1965)
पिछली गर्मियों में (1968)
बीच बहस में (1973)
मेरी प्रिय कहानियाँ (1973)
प्रतिनिधि कहानियाँ (1988)
कव्वे और काला पानी (1983)
सूखा तथा अन्य कहानियाँ (1995)
संपूर्ण कहानियाँ (2005)
यात्रा-संस्मरण व डायरी
चीड़ों पर चाँदनी (1963)
हर बारिश में (1970)
धुँध से उठती धुन (1977)
निबंध
शब्द और स्मृति (1976)
कला का जोखिम (1981)
ढलान से उतरते हुए (1985)
भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के क्षेत्र (1991)
इतिहास स्मृति आकांक्षा (1991)
शताब्दी के ढलते वर्षों में (1995)
अन्त और आरम्भ (2001)
नाटक
तीन एकान्त (1976)
संचयन
दूसरी दुनिया (1978)
परिवर्द्धित नया संस्करण (2005)
अनुवाद
कुप्रिन की कहानियाँ (1955)
रोमियो जूलियट और अँधेरा (1962)
झोंपड़ीवाले (1966)
बाहर और परे (1967)
बचपन (1970)
आर यू आर (1972)



योगदान
प्रेमचंद और उनके समकक्ष साहित्यकारों जैसे भगवतीचरण वर्मा, फणीश्वरनाथ रेणु आदि के बाद साहित्यिक परिदृश्य एकदम से बदल गया। विशेषकर साठ-सत्तर के दशक के दौरान और उसके बाद बहुत कम लेखक हुए जिन्हें कला की दृष्टि से हिन्दी साहित्य में अभूतपूर्व योगदान के लिये याद किया जायेगा। संख्या में गुणवत्ता के सापेक्ष आनुपातिक वृद्धि ही हुई। इसके कारणों में ये प्रमुख रहे। हिन्दी का सरकारीकरण, नये वादों-विवादों का उदय, उपभोक्तावाद का वर्चस्व आदि। उनके जैसे साहित्यकार से उनके समकालीन और बाद के साहित्यकार जितना कुछ सीख सकते थे और अपने योगदान में अभिवृद्धि कर सकते थे उतना वे नहीं कर पाये। उन्हें जितना मान दिया गया उतना ही उनका अनदेखा भी हुआ। जितनी चर्चा उनकी कृतियों पर होनी चाहिये थी शायद वह हुई ही नहीं। वे उन चुने हुए व्यक्तियों में थे जिन्होंने साहित्य और कला की निष्काम साधना की और जीवनपर्यन्त अपने मूल्यों का निर्वाह किया।


सम्मान और पुरस्कार
1999 में साहित्य में देश का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया।
2002 में भारत सरकार की ओर से साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पद्म भूषण दिया गया[2]।
निर्मल वर्मा को मूर्तिदेवी पुरस्कार (1995)
साहित्य अकादमी पुरस्कार (1984)
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
निधन
निर्मल वर्मा का निधन 25 अक्टूबर 2005 को नई दिल्ली में हुआ।


Nirmal Verma (3 April 1929 – 25 October 2005) was a Hindi writer, novelist, activist and translator. He is credited as being one of the pioneers of the 'Nayi Kahani' (New Story) literary movement of Hindi literature, wherein his first collection of stories, Parinde (Birds) is considered its first signature.


In his career spanning five decades and various forms of literature, like story, travelogue and essays, he penned five novels, eight short-story collections and nine books of non-fiction, including essays and travelogues.
Nirmal Verma was born on 3 April 1929 in Shimla, where his father worked as an officer in the Civil and Services Department of the British Indian Government. He was the seventh child among his eight siblings. One of his brothers is one of India's greatest artists Ram Kumar.


He wrote his first story for a students' magazine in the early 1950s. He completed Masters of Arts in History from St. Stephen's College, Delhi University. Thereafter he started teaching in Delhi and writing for various literary magazines.


“ "For a writer to desire spiritual security is as fatal as an aspiration to material pleasure. For a writer, every place of refuge is a pitfall; you fall once, and the clear sky of creativity is lost forever."
- Dhund se Uthati Dhun  ”
His activism streak was visible even during his student days; in 1947–48, he regularly attended Mahatma Gandhiji's morning prayer meetings in Delhi, even though he was a card holding member of Communist Party of India, which he resigned in 1956, after Soviet invasion of Hungary. The very activism was soon to be reflected in his stories, which added a whole new dimension to the Indian literary scene.


He stayed in Prague for 10 years, where he was invited by Oriental Institute to initiate a program of translation of modern Czech writers like Karel Capek, Milan Kundera, and Bohumil Hrabal, to Hindi; he also learnt the Czech language, and translated nine world classics to Hindi, before returning home in 1968, as the result of Prague Spring.


During his stay in Prague he travelled widely across Europe, and the result was seven travelogues, including Cheeron Par Chandni (1962), Har Barish Mein (1970) and Dhund Se Uthti Dhun and his first novel, based on his student days in Prague, titled, "Ve Din" (Those Days) (1964). On his return from Prague, he was disillusioned by Communism and later became highly vocal against Indian Emergency, and an advocate for the Tibetan independence movement. His subsequent writing reflected his concerted relooking of Indian traditions, which he found to be innately modern, compared with external modernity reflected in the western viewpoints and cultural milieu, which were being imposed on Indian ethos, all around, so much so that later his views were confused as pro-Hindutva as well.


From 1980–83, Verma served as chairman of Nirala creative writing chair in Bharat Bhavan, Bhopal. In 1988–90 he was director of Yashpal Creative Writing Chair in Shimla.A film based on his story, Maya Darpan (1972), directed by Kumar Shahani, won theFilmfare Critics Award for Best Film.


In his popular novel A Torn Happiness, August Strindberg looms large over the heads of many characters.


He died on 25 October 2005 in New Delhi.