साहिर लुधियानवी (मृत्यु: 25 अक्तूबर, 1980 मुम्बई)

October 25, 2017

साहिर लुधियानवी  (जन्म: 8 मार्च, 1921 लुधियाना - मृत्यु: 25 अक्तूबर, 1980 मुम्बई) भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध गीतकार और कवि थे। साहिर ने जब लिखना शुरू किया तब इक़बाल, फ़ैज़, फ़िराक आदि शायर अपनी बुलंदी पर थे, पर उन्होंने अपना जो विशेष लहज़ा और रुख़ अपनाया, उससे न सिर्फ उन्होंने अपनी अलग जगह बना ली बल्कि वे भी शायरी की दुनिया पर छा गये। साहिर ने लिखा -


जीवन परिचय
अब्दुलहयी ‘साहिर’ 1921 ई. में लुधियाना, पंजाब के एक जागीरदार घराने में पैदा हुए। उनकी माँ के अतिरिक्त उनके वालिद की कई पत्नियाँ और भी थीं। किन्तु एकमात्र सन्तान होने के कारण उसका पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार में हुआ। पति से तंग आकर उसकी माता पति से अलग हो गई और चूँकि ‘साहिर’ ने कचहरी में पिता पर माता को प्रधानता दी थी, इसलिए उसके बाद पिता से और उसकी जागीर से उनका कोई सम्बन्ध न रहा और इसके साथ ही जीवन की कठिनाइयों और निराशाओं का दौर शुरू हो गया। साहिर ने विवाह नहीं किया। उनकी ज़िंदगी बेहद तन्हा रही। पहले अमृता प्रीतम के साथ प्यार की असफलता और इसके बाद गायिका और अभिनेत्री सुधा मल्होत्रा के साथ भी एक असफल प्रेम से ज़मीन पर सितारों को बिछाने की हसरत अधूरी रह गई। अंतत: 25 अक्टूबर, 1980 को दिल का दौरा पड़ने से साहिर लुधियानवी का निधन हो गया।


साहिर की शिक्षा लुधियाना के 'खालसा हाई स्कूल' में हुई। सन् 1939 में जब वे 'गवर्नमेंट कॉलेज' के विद्यार्थी थे अमृता प्रीतम से उनका प्रेम हुआ जो कि असफल रहा। कॉलेज़ के दिनों में वे अपने शेर और शायरी के लिए प्रख्यात हो गए थे और अमृता इनकी प्रशंसक थीं। अमृता के परिवार वालों को आपत्ति थी क्योंकि साहिर मुस्लिम थे। बाद में अमृता के पिता के कहने पर उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया। जीविका चलाने के लिये उन्होंने तरह तरह की छोटी-मोटी नौकरियाँ कीं।


कॉलेज से निकाले जाने के बाद साहिर ने अपनी पहली किताब पर काम शुरू कर दिया। 1943 में उन्होंने ‘तल्ख़ियां’ नाम से अपनी पहली शायरी की किताब प्रकाशित करवाई। ‘तल्ख़ियां’ से साहिर को एक नई पहचान मिली। इसके बाद साहिर ‘अदब़-ए-लतीफ़’, ‘शाहकार’ और ‘सवेरा’ के संपादक बने। साहिर 'प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन' से भी जुड़े रहे थे। ‘सवेरा’ में छपे कुछ लेख से पाकिस्तान सरकार नाराज़ हो गई और साहिर के ख़िलाफ़ वारंट जारी कर दिया दिया। 1949 में साहिर दिल्ली चले आए। कुछ दिन दिल्ली में बिताने के बाद साहिर मुंबई में आ बसे।


1948 में फ़िल्म 'आज़ादी की राह पर' से फ़िल्मों में उन्होंने कार्य करना प्रारम्भ किया। यह फ़िल्म असफल रही। साहिर को 1951 में आई फ़िल्म "नौजवान" के गीत "ठंडी हवाएं लहरा के आए ..." से प्रसिद्धी मिली। इस फ़िल्म के संगीतकार एस डी बर्मन थे। गुरुदत्त के निर्देशन की पहली फ़िल्म "बाज़ी" ने उन्हें प्रतिष्ठित किया। इस फ़िल्म में भी संगीत बर्मन साहब का था, इस फ़िल्म के सभी गीत मशहूर हुए। साहिर ने सबसे अधिक काम संगीतकार एन दत्ता के साथ किया। दत्ता साहब साहिर के जबरदस्त प्रशंसक थे। 1955 में आई 'मिलाप' के बाद 'मेरिन ड्राइव', 'लाईट हाउस', 'भाई बहन',' साधना', 'धूल का फूल', 'धरम पुत्र' और 'दिल्ली का दादा' जैसी फ़िल्मों में गीत लिखे।


गीतकार के रूप में उनकी पहली फ़िल्म थी 'बाज़ी', जिसका गीत तक़दीर से बिगड़ी हुई तदबीर बना ले...बेहद लोकप्रिय हुआ। उन्होंने 'हमराज', 'वक़्त', 'धूल का फूल', 'दाग़', 'बहू बेग़म', 'आदमी और इंसान', 'धुंध', 'प्यासा' सहित अनेक फ़िल्मों में यादग़ार गीत लिखे। साहिर जी ने शादी नहीं की, पर प्यार के एहसास को उन्होंने अपने नग़मों में कुछ इस तरह पेश किया कि लोग झूम उठते। निराशा, दर्द, कुंठा, विसंगतियों और तल्ख़ियों के बीच प्रेम, समर्पण, रूमानियत से भरी शायरी करने वाले साहिर लुधियानवी के लिखे नग़में दिल को छू जाते हैं। लिखे जाने के 50 साल बाद भी उनके गीत उतने ही जवाँ हैं, जितने की पहले थे।


शायरी में संदेश
समाज के खोखलेपन को अपनी कड़वी शायरी के मार्फ़त लाने वाले इस विद्रोही शायर ने लिखा-
ज़िन्दगी सिर्फ मोहब्बत ही नहीं कुछ और भी है
भूख और प्यास की मारी इस दुनिया में
इश्क़ ही एक हक़ीकत नहीं कुछ और भी है.......
इन सब के बीच संघर्ष के लिए प्रेरित करता गीत,
ज़िन्दगी भीख में नहीं मिलती
ज़िन्दगी बढ़ के छीनी जाती है
अपना हक़ संगदिल ज़माने में
छीन पाओ की कोई बात बने......
बेटी के विदाई पर एक पिता के दर्द और दिल से दिए आशीर्वाद को उन्होंने कुछ इस तरह से बयान किया,
बाबुल की दुआएँ लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले......(नीलकमल)
समाज में आपसी भाईचारे और इंसानियत का संदेश उन्होंने अपने गीत में इस तरह पिरोया,
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा......(धूल का फूल)


साहिर की लोकप्रियता काफ़ी थी और वे अपने गीत के लिए लता मंगेशकर को मिलने वाले पारिश्रमिक से एक रुपया अधिक लेते थे। इसके साथ ही 'ऑल इंडिया रेडियो' पर होने वाली घोषणाओं में गीतकारों का नाम भी दिए जाने की मांग साहिर ने की, जिसे पूरा किया गया। इससे पहले किसी गाने की सफलता का पूरा श्रेय संगीतकार और गायक को ही मिलता था। हिन्दी (बॉलीवुड) फ़िल्मों के लिए लिखे उनके गानों में भी उनका व्यक्तित्व झलकता है। उनके गीतों में संजीदगी कुछ इस क़दर झलकती है जैसे ये उनके जीवन से जुड़ी हों। उनका नाम जीवन के विषाद, प्रेम में आत्मिकता की जग़ह भौतिकता तथा सियासी खेलों की वहशत के गीतकार और शायरों में शुमार है। साहिर वे पहले गीतकार थे जिन्हें अपने गानों के लिए रॉयल्टी मिलती थी।


फ़िल्म ताजमहल के बाद कभी कभी फ़िल्म के लिए उन्हें उनका दूसरा फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला। साहिर जी को अनेक पुरस्कार मिले, पद्म श्री से उन्हें सम्मानित किया गया, पर उनकी असली पूंजी तो प्रशंसकों का प्यार था। अपने देश भारत से वह बेहद प्यार करते थे।


Sahir Ludhianvi is the pen name of Abdul Hayee (8 March 1921 – 25 October 1980) who is popularly known as Sahir, was an Indian poet and film lyricist who wrote in the Hindi and Urdu languages. His work influenced Indian cinema, in particular Bollywood film.Sahir won a Filmfare Award for Best Lyricist for Taj Mahal (1963). He won a second Filmfare Award for Best Lyricist for his work on Kabhie Kabhie (1976) and he was awarded the Padma Shri in 1971. On 8 March 2013, the ninety-second anniversary of Sahir's birth, a commemorative stamp was issued in his honour.


On 8 March 1921, in a red sandstone haveli in Karimpura, Ludhiana, Punjab, India, Sahir was born to a Muslim family. His mother, Sardar Begum, left her estranged husband thus forfeiting any claim to financial assets from the marriage. In 1934, Sahir's father remarried and sued (acrimoniously and unsuccessfully) for custody of his son. Sardar Begum required protection from Sahir's father and suffered financial deprivation.Sahir's place of birth is marked with a small plaque on the building's arched entrance.


Sahir was educated at the Khalsa High School in Ludhiana. He then enrolled at the Government College, Ludhiana.The auditorium there is named after him. As a college student, Sahir was popular for his ghazals and nazms (poetry in Urdu) and empassioned speeches.


In 1943, Sahir settled in Lahore. There, he completed Talkhiyaan (Bitterness) (1945), his first published work in Urdu. Sahir edited Urdu magazines such as Adab-e-Lateef, Shahkaar, Prithlari, and Savera and became a member of the Progressive Writers' Association. However, when he made controversial statements promoting communism, a warrant for his arrest was issued by the Government of Pakistan. In 1949, after partition, Sahir fled from Lahore to Delhi.  After eight weeks, Sahir moved to Bombay.He later lived in Andheri, a suburb of Mumbai. There, his neighbours included Gulzar, a poet and lyricist and Krishan Chander, an Urdu litterateur. In the 1970s, Sahir built a bungalow which he called Parchaiyaan (Shadows), after one of his works, and lived there till his death.


Sahir's work as a lyricist in the film industry gave him financial stability beyond his earnings as a poet. He made his debut with four songs performed in the film Azadi Ki Raah Par (1949). One of the songs was Badal Rahi Hai Zindagi. Both the film and its songs went unnoticed. However, after Naujawaan (1951), with music by S.D. Burman, Sahir gained recognition. Sahir's major success was Baazi (1951). Again, the composer was Burman. Sahir was then considered part of Guru Dutt's team. The last film Sahir made with Burman was Pyaasa. In Pyaasa, Guru Dutt played a poet named Vijay. After Pyaasa, Sahir and Burman went separate ways due to artistic and contractual differences.


Sahir did work with other composers including Ravi, Roshan, Khayyam and Datta Naik. Naik, a Goan, admired Sahir's poetry and their collaboration produced the score for Milaap (1955). Sahir also worked with music director Laxmikant-Pyarelal in the films like "Man Ki Aankhe", "Izzat", "Dustan" and Yash Chopra's "Daag" all have fabulous songs. From about 1950 until his death, Sahir collaborated with Baldev Raj Chopra (1914 - 2008), a film producer and director. Sahir's last work for Chopra was for Insaaf Ka Tarazu. Yash Chopra, an independent director and producer, also engaged Sahir.


In 1958, Sahir wrote the lyrics for Ramesh Saigal's film Phir Subah Hogi, which was based on Fyodor Dostoevsky's novel Crime and Punishment. The male lead was played by Raj Kapoor. It was presumed that Shankar-Jaikishan would be the composer but Sahir demanded a composer with a more intimate knowledge of the novel. Khayyam composed the film score. The song Woh Subah Kabhi Toh Aayegi with its minimal background music remains popular. Khayyam collaborated with Sahir in many films including Kabhie Kabhie and Trishul.


Sahir was a controversial figure in that he was artistically temperamental. He insisted that the film score should be composed for his lyrics and not the other way around. He also insisted on being paid one rupee more than Lata Mangeshkar and this created a rift between them. Sahir promoted his girlfriend, Sudha Malhotra's singing career.He also insisted that All India Radio credit lyricists.