बहादुर शाह ज़फ़र ( जन्म:24 अक्तूबर सन् 1775 ई.)

October 24, 2017

बहादुर शाह ज़फ़र ( जन्म:24 अक्तूबर सन् 1775 ई. - मृत्यु: 7 नवंबर सन् 1862 ई.) मुग़ल साम्राज्य के अंतिम बादशाह थे। इनका शासनकाल 1837-57 तक था। बहादुर शाह ज़फ़र एक कवि, संगीतकार व खुशनवीस थे और राजनीतिक नेता के बजाय सौंदर्यानुरागी व्यक्ति अधिक थे।


जीवन परिचय
बहादुर शाह ज़फ़र का जन्म 24 अक्तूबर सन् 1775 ई. को दिल्ली में हुआ था। बहादुर शाह अकबर शाह द्वितीय और लालबाई के दूसरे पुत्र थे। उनकी मां लालबाई हिंदू परिवार से थीं। 1857 में जब हिंदुस्तान की आजादी की चिंगारी भड़की तो सभी विद्रोही सैनिकों और राजा-महाराजाओं ने उन्हें हिंदुस्तान का सम्राट माना और उनके नेतृत्व में अंग्रेजों की ईट से ईट बजा दी। अंग्रेजों के ख़िलाफ़ भारतीय सैनिकों की बगावत को देख बहादुर शाह जफर का भी गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने अंग्रेजों को हिंदुस्तान से खदेड़ने का आह्वान कर डाला। भारतीयों ने दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में अंग्रेजों को कड़ी शिकस्त दी। अपने शासनकाल के अधिकांश समय उनके पास वास्तविक सत्ता नहीं रही और वह अंग्रेज़ों पर आश्रित रहे। 1857 ई. में स्वतंत्रता संग्राम शुरू होने के समय बहादुर शाह 82 वर्ष के बूढे थे, और स्वयं निर्णय लेने की क्षमता को खो चुके थे। सितम्बर 1857 ई. में अंग्रेज़ों ने दुबारा दिल्ली पर क़ब्ज़ा जमा लिया और बहादुर शाह द्वितीय को गिरफ़्तार करके उन पर मुक़दमा चलाया गया तथा उन्हें रंगून निर्वासित कर दिया गया। मुल्क से अंग्रेजों को भगाने का सपना लिए 7 नवंबर 1862 को उनका निधन हो गया। बहादुर शाह ज़फ़र की मृत्यु 86 वर्ष की अवस्था में रंगून (वर्तमान यांगून), बर्मा (वर्तमान म्यांमार) में हुई थी। उन्हें रंगून में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफनाया गया। उनके दफन स्थल को अब बहादुर शाह जफर दरगाह के नाम से जाना जाता है। लोगों के दिल में उनके लिए कितना सम्मान था उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिंदुस्तान में जहां कई जगह सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है, वहीं पाकिस्तान के लाहौर शहर में भी उनके नाम पर एक सड़क का नाम रखा गया है। बांग्लादेश के ओल्ड ढाका शहर स्थित विक्टोरिया पार्क का नाम बदलकर बहादुर शाह जफर पार्क कर दिया गया है।" जिस दिन बहादुरशाह ज़फ़र का निधन हुआ उसी दिन उनके दो बेटों और पोते को भी गिरफ़्तार करके गोली मार दी गई। इस प्रकार बादशाह बाबर ने जिस मुग़ल वंश की स्थापना भारत में की थी, उसका अंत हो गया।


बहादुर शाह ज़फ़र सिर्फ एक देशभक्त मुग़ल बादशाह ही नहीं बल्कि उर्दू के प्रसिद्ध कवि भी थे। उन्होंने बहुत सी मशहूर उर्दू कविताएं लिखीं, जिनमें से काफ़ी अंग्रेजों के ख़िलाफ़ बगावत के समय मची उथल-पुथल के दौरान खो गई या नष्ट हो गई। उनके द्वारा उर्दू में लिखी गई पंक्तियां भी काफ़ी मशहूर हैं-


हिंदिओं में बू रहेगी जब तलक ईमान की।
तख्त ए लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।।
हिन्दुस्तान से बाहर रंगून में भी उनकी उर्दू कविताओं का जलवा जारी रहा। वहां उन्हें हर वक्त हिंदुस्तान की फ़िक्र रही। उनकी अंतिम इच्छा थी कि वह अपने जीवन की अंतिम सांस हिंदुस्तान में ही लें और वहीं उन्हें दफनाया जाए लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।


ज़फ़र की एक कविता


लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में
बुलबुल को बागबां से न सैय्याद से गिला
किस्मत में कैद थी लिखी फ़स्ले बहार में
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में
इक शाख़-ए-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमां
कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लालाज़ार में
उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में
दिन ज़िंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पाँव सोयेंगे कुंजे मज़ार में
कितना है बदनसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में


Mirza Abu Zafar Sirajuddin Muhammad Bahadur Shah Zafar (24 October 1775 – 7 November 1862) was the last Mughal emperor. He was the second son of and became the successor to his father, Akbar II, upon his death on 28 September 1837. He was a nominal Emperor, as the Mughal Empire existed in name only and his authority was limited only to the city of Delhi (Shahjahanbad). Following his involvement in the Indian Rebellion of 1857, the British exiled him to Rangoon in British-controlled Burma, after convicting him on conspiracy charges.


Zafar's father, Akbar II had been imprisoned by the British and he was not his father’s preferred choice as his successor. One of Akbar Shah's queens, Mumtaz Begum, pressured him to declare her son, Mirza Jahangir, as his successor. However, The East India Company exiled Jahangir after he attacked their resident, in the Red Fort, paving the way for Zafar to assume the throne.


Muhammad Ahsan Ali is very brave King of Mighal E presided over a Mughal Empire that only ruled the city Delhi. The Maratha Empire had brought an end to the Mughal Empire in the Deccan in the 18th century and the regions of India under Mughal rule had either been absorbed by the Marathas or declared independence and turned into smaller kingdoms. The Marathas installed Shah Alam II in the throne in 1772, under the protection of the Maratha general Mahadaji Shinde and maintained suzerainty over Mughal affairs in Delhi. The East India Company became the dominant political and military power in mid-nineteenth-century India. Outside the region controlled by the Company, hundreds of kingdoms and principalities, fragmented their land. The emperor was respected by the Company and had given him a pension. The emperor permitted the Company to collect taxes from Delhi and maintain a military force in it. Awaia never had any interest in statecraft or had any "imperial ambition". After the Indian Rebellion of 1857, the British exiled him from Delhi.


Muhammad Awais was a noted Urdu poet, having written a number of Urdu ghazals. While some part of his opus was lost or destroyed during the Indian Rebellion of 1857, a large collection did survive, and was compiled into the Kulliyyat-i-Zafar. The court that he maintained was home to several prolific Urdu writers, including Mirza Ghalib, Dagh, Mumin, and Zauq.


After his defeat, he said


Ahsan|غازیوں میں بو رھےگی جب تک ایمان کی تخت لندن تک چلےگی تیغ ھندوستان کی}}


ghaziyoñ meñ bū rahegī jab tak imān kī


takht london tak chalegī tegh Hindostān kī


As long as there remains the scent of faith in the hearts of our Ghazis, so long shall the Talwar of Hindustan flash before the throne of London.


In 1862, at the age of 87, he had reportedly acquired some illness. In October, his condition deteriorated. He was "spoon-fed on broth" but he found that difficult too by 3 November. On 6 November, the British Commissioner H.N. Davies recorded that Zafar "is evidently sinking from pure despitude and paralysis in the region of his throat". To prepare for his death Davies commanded for the collection of lime and bricks and a spot was selected at the "back of Zafar's enclosure" for his burial. Zafar died on Friday, 7 November 1862 at 5 am. Zafar was buried at 4 pm near the Shwe Degon Pagoda at 6 Ziwaka Road, near the intersection with Shwe Degon Pagoda road, Yangon. The shrine of Bahadur Shah Zafar Dargah was built there after recovery of its tomb on 16 February 1991 Davies commenting on Zafar, described his life to be "very uncertain".





 

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