डी. आर. बेंद्रे (मृत्यु- 26 अक्टूबर, 1981)

October 26, 2017

दत्तात्रेय रामचन्द्र बेंद्रे ( जन्म- 13 जनवरी, 1896, कर्नाटक; मृत्यु- 26 अक्टूबर, 1981, महाराष्ट्र) कन्नड़ भाषा के प्रसिद्ध कवि थे। उन्होंने कन्नड़ काव्य को सम्माननीय ऊँचाई दिलवाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था। उनका प्रथम कविता संग्रह प्रकाशित होने से पूर्व ही समाज ने उन्हें एक कवि के रूप में अंगीकार कर लिया था। दत्तात्रेय जी के विशिष्ट योगदान को देखते हुए उन्हें 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' (1958) और 'पद्मश्री' (1968) भी प्रदान किया गया था।


जन्म तथा शिक्षा
दत्तात्रेय रामचन्द्र बेंद्रे का जन्म 13 जनवरी, 1896 को धारवाड़, कर्नाटक में हुआ था। उनके बचपन का अधिकांश समय अभावों में व्यतीत हुआ था। जब वे मात्र बारह साल के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया था। इनके पिता और साथ ही दादा भी संस्कृत साहित्य के विद्वान व्यक्ति रहे थे। बेंद्रे ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा धारवाड़ में ही अपने चाचा की मदद से प्राप्त की थी। उन्होंने अपनी हाई स्कूल की परीक्षा सन 1913 में पास की। कन्नड़ भाषा के साथ-साथ अन्य कई भाषाओं के लिए भी अपना योगदान वाले दत्तात्रेय रामचन्द्र बेंद्रे का 26 अक्टूबर, 1981 को महाराष्ट्र में निधन हो गया।


बेंद्रे ने अपने व्यवसायिक जीवन का प्रारम्भ 'विक्टोरिया हाई स्कूल', धारवाड़ से एक अध्यापक के रूप में किया। उन्होंने डी.ए.वी. कॉलेज', शोलापुर में 1944 से 1956 तक एक प्रोफ़ेसर के रूप में भी कार्य किया। इसके बाद वे धारवाड़ में 'ऑल इण्डिया रेडियो' के सलाहकार भी बने।


दत्तात्रेय रामचन्द्र बेंद्रे को उत्तराधिकार में दो संपदाएँ मिली थीं- 'संस्कारिता' और 'विद्याप्रेम'। 'बालकांड' शीर्षक कविता में उन्होंने अपने बाल्यकाल के दिनों की कुछ छवियाँ उकेरी हैं। आस-पास के किसी भी घर में संपन्नता न थी, फिर भी सब ओर एक जीवंतता थी। सभी प्रकृति के हास और रोष के साथ बंधे हुए थे। उसी के ऋतु-रंगों और पर्वों के साथ तालबद्ध थे। सामाजिक या पारिवारिक हर कार्य के साथ गीत जुड़े रहते थे। भक्त व भिखारी, नर्तकिए, स्वांगी और फेरी वाले तक अपने-अपने गीत लिए आते और इन गीतों की रंगारंग भाषा उनकी लयों की विविधता दत्तात्रेय रामचन्द्र के बाल मन पर छा जाती। 1932 में उनका प्रथम कविता संग्रह प्रकाशित होने से पहले ही समाज ने उन्हें अपने कवि के रूप में अंगीकार कर लिया था।


बेंद्रे सर्वाधिक प्रबुद्ध कन्नड़ लेखकों में से एक हैं। प्रांरभ से ही उनके आगे यह समस्या रही कि किस प्रकार लोक समाज से मनोभावों का अपनी निजी बौद्धिक और आध्यात्मिक अनुभूतियों के साथ ताल-मेल बैठाया जाये। चिंतन और भावानुभूति, वस्तुपरक और आत्मपरक विषय, दोनों को अपनी रचनाओं में समायोजित करने के कारण बेंद्रे के काव्य को कुछ आलोचकों ने बौद्धिक काव्य का नाम दिया है। यह सच है कि उनकी कितनी ही कविताएँ बौद्धिक प्रगीत हैं, जबकि अन्य सबके विषय आध्यात्मिक हैं या रहस्यवादी। किंतु बेंद्रे न रोमांसवादी थे और न ही प्रतिबद्धता के कवि। वह एक संपूर्ण कवि थे, जिन्होंने युग के चेतना बिंदु के साथ स्वंय को जोड़ा। वह ऐसे कवि थे, जिन्हें भाषा व अभिव्यक्ति पर इतना अधिकार था कि जटिल विचाक-बोध और अनुभूति को भी प्रत्यक्ष कर दें।


'नाकुतंती', (चार तार) कवि दत्तात्रेय रामचन्द्र बेंद्रे का एक कविता संग्रह है, जिसमें 44 कविताएँ हैं। इनमें से छ: का संबंध समकालीन लेखकों के प्रति उनके अपने नाते और जनतंत्र के वास्तविक अभिप्राय से है। शेष कविताओं में चिंतन और भावनाओं की एक विलक्षण संगति देखने को मिलती है।


'नाकुतंती' कविता में कवि के व्यक्तित्व के चारों पक्षों, मैं, तुम, वह और कल्पनाशील आत्मसत्ता का वर्णन हुआ है। ये चार पक्ष ही कवि के व्यक्तित्व का चौहरा ढांचा है, और चार के इसी मूलभूत तत्व को कवि ने अपनी अनुभूति के सभी आध्यात्मिक और सौंदर्यात्मक क्षेत्रों में पहचाना। कविता की सृजन-प्रक्रिया विषयक छ: सॉनेटों में बेंद्रे ने कविता के चार मूल तत्त्व गिनाए हैं- 'शब्द', 'अर्थ', 'लय' औऱ 'सहृदय'। संग्रह की एक और कविता में प्रभावपूर्ण बिंबों के द्वारा कवि ने वाकशक्ति के चारों रूपों- 'परा', 'पश्यंती', 'मध्यमा' और 'वैखरी' का वर्णन किया है। बेंद्रे की सौंदर्य विषयक परिकल्पना के भी चार पक्ष हैं- इंद्रियगत, कल्पनागत, बुद्घिगत और आदर्श, जो उनकी कविताओं में यथास्थान आए हैं।


प्रमुख कृतियाँ
काव्य रचनाओं के अतिरिक्त दत्तात्रेय रामचन्द्र बेंद्रे ने कई नाटक और गद्य-कृतियाँ भी लिखी हैं-


कविता


कृष्णाकुमारी
हाडु-पाडु
गंगावतरण
हृदय समुद्र
मुगिल मल्लिगे
नाकुतंती
मत्ते श्रावण बंतु



नाटक


हुच्चतगलु
होस संसार
कथा-साहित्य


निराभरण सुंदरी
आलोचना साहित्य


मत्तु विमर्श
साहित्य संशोधन
विचार मंजरी
पुरस्कार
'ज्ञानपीठ पुरस्कार' - 1973)
'पद्मश्री' - 1968
साहित्य अकादमी पुरस्कार' - 1958
केलकर सम्मान - 1965



Dattatreya Ramachandra Bendre (31 January 1896 – 26 October 1981), popularly known as Da. Ra. Bendre, was one of the most notable Kannada poets of the Navodaya Period. He was given the honorific Varakavi ('gifted poet'). Bendre was awarded the Jnanpith Award for Kannada, the highest literary honor conferred in India. He wrote under the pen-name of Ambikatanayadatta (lit, "Datta, Child of Ambika"). He also held the title Karnataka Kula Thilaka ("The ornament of the Karnataka Family") conferred by Udupi Adamaru Math. The Padma Shri was conferred on him by Government of India.


Dattatreya Ramachandra Bendre was born into a Chitpavan Brahmin family in Dharwad, Karnataka. His grandfather was a Dashagranthi ("Master of ten volumes of sacred lore") and scholar in Sanskrit classical literature. Bendre's father, a Sanskrit scholar himself, died when Bendre was only 12 years old. Bendre later adopted the pen-name of Ambikatanayadatta. Bendre completed his primary and high school education in Dharwad with his uncle's help and completed his matriculation in 1913. He joined the Fergusson College, Pune, for his higher education. After obtaining his degree Bendre returned to Dharwad and started teaching at Victoria high school. He married Laxmibai from Ranebennur in 1919. He earned his Master of Arts degree in 1935.


Bendre formed the Geleyara Balaga ("Group of Friends") in 1922, a peer group inclined toward the study of culture and literature. This friends circle drew poets, writers and intellectuals from different parts of Karnataka including Ananda Kanda, Shamba Joshi, Siddavanahalli Krishna Sharma, Enke, G.B.Joshi, Krishnakumar Kallur, V. K. Gokak, R. S. Mugali and Pandhareenathachar Galagali.In 1926, Bendre started the cultural movement "Nada-habba'", a celebration of the land and its culture which is still prevalent in Karnataka. This festival is celebrated during the time of the Hindu festival Navaratri.


In 1932 Bendre was sentenced to home imprisonment in Mugad village for writing Nara Bali ("Human Sacrifice"), which was branded seditious by the British government.Bendre's two sons Panduranga and Vamana and daughter Mangala were the only surviving children among nine who were born to him. In 1943, he presided over the 27th Kannada Sahitya Sammelana held at Shimoga. He went on to become a fellow of the Kannada Sahitya Parishat. In 1972 the Government of Karnataka produced a documentary on his life.


Bendre started with simple and earthly romantic poetry, often using the "spoken" form of the language. His later works dug deeper into social and philosophical matters. According to G. S. Amur, a leading critic in Kannada, "Bendre believed in the value of an integrated personality but loved to project himself as a threefold being: Dattatreya Ramachandra Bendre - the biological self, the thinking self and the creative self. According to Amur, the three 'selves' were conceived as mutually supporting 'selves', as the imagery Bendre used to concrete this idea clearly suggests. He spoke of Ambikatanayadatta and Professor Bendre as two entities that were closely related just as the river and its bank or the belly and the back. One could not exist without the other.


Bendre is usually considered the father figure of modern Kannada poetry. His poems are linked to the Kannada poetic tradition through their use of folklore, the vachanas and the Kirtans. Apart from native prosodic forms, Bendre also employed native imagery, folk beliefs, references to Indian mythology and the language spoken by the common people. Nada Lila ("The Play of Sounds") is perhaps the most remarkable among his collection of poems. All the features of Navodaya poetry like patriotism, the reformatory zeal, critical attitude, Indian culture, consolidation of traditional strength, mystical faith and assertion of a poet's individuality can be found in this collection of poems.


Bendre used diverse techniques for spiritual lyrics, classical style for sonnets, and traditional as well as colloquial idioms for pastoral and folk lyrics. Symbolism is characteristic of his poetry. His poem Patargitti (Butterfly) which is sung as a nursery rhyme is about the colors of temptation. Mudalmaneya ("Dawn") is symbolic of all pervading peace or, the poet's yearning for it. In the Kuniyonu bara ('Let us Dance") all diverse currents of thought meet in on great confluence. Apparently, all of Bendre's poems could be set to music and abound in alliteration; but there was always a hidden layer of meaning which only a trained poetic mind could decipher.


Towards the end of his life Bendre was deeply absorbed in numbers. This was not just a new interest but one that became a central concern. When Dom Moraes visited him during his exploration of Karnataka in 1976, he found Bendre immersed in numbers. In his books Vishvadharanasutra and A Theory of Immortality Bendre made ambitious attempts to intuit all knowledge into numbers
In 1972, film director and playwright Girish Karnad made a Kannada documentary film, D. R. Bendre on his life and work.