जतीन्द्रनाथ दास (जन्म- 27 अक्टूबर, 1904)

October 27, 2017

जतीन्द्रनाथ दास ( जन्म- 27 अक्टूबर, 1904, कलकत्ता, ब्रिटिश भारत; मृत्यु- 13 सितम्बर, 1929, लाहौर, पाकिस्तान) भारत के प्रसिद्ध क्रान्तिकारियों में से एक थे, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए जेल में अपने प्राण त्याग दिए और शहादत पाई। इन्हें 'जतिन दास' के नाम से भी जाना जाता है, जबकि संगी साथी इन्हें प्यार से 'जतिन दा' कहा करते थे। जतीन्द्रनाथ दास 'कांग्रेस सेवादल' में सुभाषचन्द्र बोस के सहायक थे। भगत सिंह से भेंट होने के बाद ये बम बनाने के लिए आगरा आ गये थे। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम केन्द्रीय असेम्बली में फेंके थे, वे इन्हीं के द्वारा बनाये गए थे। जेल में क्रान्तिकारियों के साथ राजबन्दियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रान्तिकारियों ने 13 जुलाई, 1929 से अनशन आरम्भ कर दिया। जतीन्द्रनाथ भी इसमें सम्मिलित हुए। अनशन के 63वें दिन जेल में ही इनका देहान्त हो गया।


जन्म और शिक्षा
अमर शहीद जतीन्द्रनाथ दास का जन्म 27 अक्टूबर, 1904 ई. को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता), ब्रिटिश भारत में एक साधारण बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम बंकिम बिहारी दास और माता का नाम सुहासिनी देवी था। जतीन्द्र नौ वर्ष के थे, तभी उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। 16 वर्ष की उम्र में 1920 में जतीन्द्र ने मैट्रिक की परीक्षा पास की। अनशन के 63वें दिन 13 सितम्बर, 1929 को जतीन्द्रनाथ दास का देहान्त हो गया। जतीन्द्र के भाई किरण चंद्रदास ट्रेन से उनके शव को कोलकाता ले गए। सभी स्टेशनों पर लोगों ने इस शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित की। कोलकाता में शवदाह के समय लाखों की भीड़ एकत्र थी। उनकी इस शानदार अहिंसात्मक शहादत का उल्लेख पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में किया है।


जब जतीन्द्रनाथ अपनी आगे की शिक्षा पूर्ण कर रहे थे, तभी महात्मा गाँधी ने 'असहयोग आन्दोलन' प्रारम्भ किया। जतीन्द्र इस आन्दोलन में कूद पड़े। विदेशी कपड़ों की दुकान पर धरना देते हुए वे गिरफ़्तार कर लिये गए। उन्हें 6 महीने की सज़ा हुई। लेकिन जब चौरी-चौरा की घटना के बाद गाँधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो निराश जतीन्द्रनाथ फिर कॉलेज में भर्ती हो गए। कॉलेज का यह प्रवेश जतीन्द्र के जीवन में निर्णायक सिद्ध हुआ।


एक युवक के माध्यम से जतीन्द्रनाथ प्रसिद्ध क्रान्तिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आए और क्रान्तिकारी संस्था 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' के सदस्य बन गये। अपने सम्पर्कों और साहसपूर्ण कार्यों से उन्होंने दल में महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया और अनेक क्रान्तिकारी कार्यों में भाग लिया। इस बीच जतीन्द्र ने बम बनाना भी सीख लिया था।


1925 में जतीन्द्रनाथ को 'दक्षिणेश्वर बम कांड' और 'काकोरी कांड' के सिलसिले में गिरफ़्तार किया गया, किन्तु प्रमाणों के अभाव में मुकदमा न चल पाने पर वे नज़रबन्द कर लिये गए। जेल में दुर्व्यवहार के विरोध में उन्होंने 21 दिन तक जब भूख हड़ताल कर दी तो बिगड़ते स्वास्थ्य को देखकर सरकार को उन्हें रिहा करना पड़ा।


जेल से बाहर आने पर जतीन्द्रनाथ दास ने अपना अध्ययन और राजनीति दोनों काम जारी रखे। 1928 की 'कोलकाता कांग्रेस' में वे 'कांग्रेस सेवादल' में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सहायक थे। वहीं उनकी सरदार भगत सिंह से भेंट हुई और उनके अनुरोध पर बम बनाने के लिए आगरा आए। 8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम केन्द्रीय असेम्बली में फेंके, वे इन्हीं के द्वारा बनाये हुए थे। 14 जून, 1929 को जतीन्द्र गिरफ़्तार कर लिये गए और उन पर 'लाहौर षड़यंत्र केस' में मुकदमा चला।[1]


जेल में क्रान्तिकारियों के साथ राजबन्दियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रान्तिकारियों ने 13 जुलाई, 1929 से अनशन आरम्भ कर दिया। जतीन्द्र भी इसमें सम्मिलित हुए। उनका कहना था कि एक बार अनशन आरम्भ होने पर हम अपनी मांगों की पूर्ति के बिना उसे नहीं तोड़ेंगे। कुछ समय के बाद जेल अधिकारियों ने नाक में नली डालकर बलपूर्वक अनशन पर बैठे क्रांतिकारियों के के पेट में दूध डालना शुरू कर दिया। जतीन्द्र को 21 दिन के पहले अपने अनशन का अनुभव था। उनके साथ यह युक्ति काम नहीं आई। नाक से डाली नली को सांस से खींचकर वे दांतों से दबा लेते थे। अन्त में पागल खाने के एक डॉक्टर ने एक नाक की नली दांतों से दब जाने पर दूसरी नाक से नली डाल दी, जो जतीन्द्र के फेफड़ों में चली गई। उनकी घुटती सांस की परवाह किए बिना उस डॉक्टर ने एक सेर दूध उनके फेफड़ों में भर दिया। इससे उन्हें निमोनिया हो गया। कर्मचारियों ने उन्हें धोखे से बाहर ले जाना चाहा, लेकिन जतीन्द्र अपने साथियों से अलग होने के लिए तैयार नहीं हुए।


Jatindra Nath Das  (27 October 1904 – 13 September 1929), also known as Jatin Das, was an Indian independence activist and revolutionary. He died in Lahore jail after a 63-day hunger strike.
Jatindra Das was born in 1904 at Calcutta. He joined the Anushilan Samiti, a revolutionary group in Bengal, at a young age and also participated in Gandhi's Non-Cooperation movement in 1921.


In November 1925, while studying for a B.A. at Vidyasagar College in Calcutta, Das was arrested for his political activities and was imprisoned at the Mymensingh Central Jail. While interned there, he went on a hunger strike to protest the ill-treatment meted out to the political prisoners. After fasting for twenty days, the Jail Superintendent apologised and he gave up the fast. He was contacted by revolutionaries in other parts of India and agreed to participate in bomb-making for Bhagat Singh and comrades. Sachindra Nath Sanyal taught him how to make bombs.


On 14 June 1929 he was arrested for revolutionary activities and was imprisoned in Lahore jail to be tried under the supplementary Lahore Conspiracy Case.
In Lahore jail, Das began a hunger strike along with other revolutionary fighters, demanding equality for Indian political prisoners with those from Europe. The conditions of Indian inhabitants of the jails was deplorable. The uniforms that Indian prisoners were required to wear in jail with were not washed for several days, and rats and cockroaches roamed the kitchen area making the food unsafe to eat. Indian prisoners were not provided with any reading material such as newspapers, nor paper to write on. The condition of the British prisoners in the same jail was strikingly different.


Das's hunger strike started on 13 July 1929 and lasted 63 days. The jail authority took measures to forcibly feed him and the other independence activist. Eventually, the jail committee recommended his unconditional release, but the government rejected the suggestion and offered to release him on bail.


Jatin died on 13 September 1929. Durga Bhabhi led the funeral procession, which went from Lahore to Calcutta by train. Thousands of people rushed to the railway stations to pay homage to Das. A two-mile long procession in Calcutta carried the coffin to the cremation ground. It was Subhas Chandra Bose, who received the coffin of Das at Howrah Railway Station and led the funeral procession to the cremation ground. The hunger strike of Jatin Das in prison was one crucial moment in the resistance against illegal detentions.


After his death, the Viceroy informed London that "Mr Das of the Conspiracy Case, who was on hunger strike, died this afternoon at 1 p.m. Last night, five of the hunger strikers gave up their hunger strike. So there are only Bhagat Singh and Dutt who are on strike." 


Tributes were paid by almost every leader in the country. Mohammad Alam and Gopi Chand Bhargava resigned from the Punjab Legislative Council in protest. Motilal Nehru proposed the adjournment of the Central Assembly as a censure against the inhumanity of the Lahore prisoners. The censure motion was carried by 55 votes against 47. Jawaharlal Nehru said "Another name has been added to the long and splendid roll of Indian martyrs. Let us bow our heads and pray for strength to act to carry on the struggle, however long it may be and whatever consequences, till the victory is ours ". Subhas Chandra Bose described Das as the "young Dadhichee of India", referring to the well known mythological yogi Dadhichee who sacrificed his life for the sake of killing a demon.