फ़्रीडरिक मैक्स मूलर (मृत्यु- 28 अक्टूबर, 1900)

October 28, 2017

फ़्रीडरिक मैक्स मूलर ( जन्म- 6 दिसम्बर, 1823, जर्मनी; मृत्यु- 28 अक्टूबर, 1900, इंग्लैण्ड) प्रसिद्ध जर्मन संस्कृतवेत्ता, प्राच्य विद्या विशारद, लेखक तथा भाषाशास्त्री था। वह ब्रिटिश 'ईस्ट इण्डिया कम्पनी' में कर्मचारी था। जन्म से जर्मन होने के बावजूद भी मैक्स मूलर ने अपने जीवन का अधिकांश समय इंग्लैण्ड में व्यतीत किया था। उसका संबंध अनेक यूरोपीय तथा एशियाई संस्थाओं से था। मैक्स मूलर ने 'भारतीय दर्शन' पर कई रचनाएँ की थीं। अंतिम दिनों वह बौद्ध दर्शन में अधिक रुचि रखने लगा था तथा जापान में मिले अनेक बौद्ध दार्शनिक ग्रंथों की गवेषणा में दत्तचित्त था।


जन्म तथा शिक्षा
जर्मन संस्कृतवेत्ता एवं भाषाशास्त्री मैक्स मूलर का जन्म जर्मनी के 'देसो' नामक नगर में 6 दिसम्बर, 1823 ई. को हुआ था। उसके पिता प्रसिद्ध जर्मन कवि विल्हेम मूलर (1794-1827) थे, जिन्हें हजर्मन मुक्तक प्रगीतों की विशिष्ट शैली 'फिल-हेलेनिक' प्रगीतों के कारण काफ़ी ख्याति मिली थी। जब मैक्स मूलर मात्र चार वर्ष का ही था, तभी उसके पिता का देहान्त हो गया। उसने 1841 ई. में 'लाइपसिंग विश्वविद्यालय' से मैट्रिक पास किया था। मैक्स मूलर का संबंध अनेक यूरोपीय तथा एशियाई संस्थाओं से था। वह बोडलियन लाइब्रेरी का क्यूरेटर तथा यूनिवर्सिटी प्रेस का डेलीगेट था। 28 अक्टूबर, 1900 को मैक्स मूलर का निधन ऑक्सफ़ोर्ड, इंग्लैण्ड में हुआ। उसकी मृत्यु के बाद वर्ष 1903 में उसकी फुटकर रचनाओं का संग्रह प्रकाशित हुआ था।


सन 1846 में मैक्स मूलर इंग्लैण्ड पहुँचा, जहाँ बुन्सेन तथा प्रोफ़ेसर एच. एच. विल्सन ने उसे ऋग्वेद के संपादन कार्य में पर्याप्त सहायता पहुँचाई। सन 1848 में ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में ऋग्वेद का मुद्रण आरंभ होने के कारण मैक्स मूलर को ऑक्सफ़ोर्ड को ही अपना निवास स्थान बनाना पड़ा। बाद में मैक्स मूलर को 1850 में वहीं आधुनिक भाषाओं का टेलर प्राध्यापक नियुक्त किया गया और फिर 'क्राइस्ट चर्च कॉलेज' का मान्य सदस्य (फेलो) बनाया गया। वह 'आल सोल्स कॉलेज' का भी सदस्य रहा।


इस बीच मैक्स मूलर के कई लेख प्रकाशित हुए, जो बाद में 'चिप्स फ्रॉम ए जर्मन वर्कशाप' शीर्षक से संग्रह रूप में प्रकाशित हुए। सन 1859 में इसकी पुस्तक 'हिस्ट्री आव एंशेंट संस्कृत लिटरेचर' प्रकाशित हुई। मैक्स मूलर का प्रधान लक्ष्य ऑक्सफ़ोर्ड में संस्कृत विभाग का संस्कृत आचार्य बनना था, किंतु सन 1860 में उक्त स्थान के रिक्त होने पर मैक्स मूलर का चुनाव सिर्फ इसलिए नहीं हो पाया कि वह विदेशी था और उसका संबंध 'लिबरल' दल के लोगों से था। उस स्थान पर मैक्स मूलर को न लेकर सर मोनियर विलियम्स की नियुक्ति की गई। इस घटना से मैक्स मूलर को काफ़ी धक्का पहुँचा। लेकिन 1868 में इसकी पूर्ति हो गई और वह वहीं तुलनात्मक भाषाशास्त्र का आचार्य बनाया गया।


मैक्स मूलर ने सन 1861 तथा 1863 में 'रॉयल इंस्टीट्यूशन' के समक्ष भाषा विज्ञान संबंधी कई व्याख्यान दिए, जो 'लेक्चर्स ऑन सायंस ऑव लैंग्वेजज' के नाम से प्रकाशित हुए। यद्यपि इन व्याख्यानों के निष्कर्ष तथा तर्क पद्धति का ह्टिनी जैसे भाषाशास्त्रियों ने काफ़ी विरोध किया, तथापि मैक्स मूलर के इन व्याख्यानों का भाषा वैज्ञानिक प्रगति के इतिहास में अत्यधिक महत्व है। मैक्स मूलर ने भाषा विज्ञान को 'भौतिक विज्ञान' की कोटि में माना है, जबकि यह वस्तुत: ऐतिहासिक या सामाजिक विज्ञान की एक विधा है। मैक्स मूलर ने भाषाशास्त्री के लिये संस्कृत के अध्ययन की आवश्यकता को इतना महत्व दिया कि उनके शब्दों में संस्कृत-ज्ञान-शून्य तुलनात्मक भाषाशास्त्री उस ज्योतिषी के समान है, जो गणित नहीं जानता।


मैक्स मूलर ने यूरोपीय भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया। इस कार्य में प्रिचार्ड, विनिंग, बाप तथा एडोल्फ पिक्टेट की गवेषणाओं से उसे पर्याप्त सहायता मिली। मैक्स मूलर का एक अन्य प्रिय विषय धर्मविज्ञान पुराण-कथा-विज्ञान है। इस अध्ययन ने उसे तुलनात्मक धर्म की ओर भी प्रेरित किया। सन 1873 में उसने 'इंट्रोडक्शन टू द जिनियस ऑव रेलिजन्स' प्रकाशित की। इसी वर्ष इस विषय से संबंधित व्याख्यान देने के लिये वह वैस्ट मिनिंस्टर एबे में आमंत्रित किया गया। बाद में 1888 से 1892 तक इस विषय पर उसकी अन्य पुस्तक चार भागों में प्रकाशित हुई, जो गिफर्ड लेक्चर्स के रूप में दिए गए भाषण हैं।


मैक्स मूलर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य 51 जिल्दों में 'सैक्रेड बुक्स ऑफ़ दि ईस्ट' (पूर्व के धार्मिक-पवित्र-ग्रंथ) का संपादन है। यह कार्य 1875 में आरंभ किया गया था, तथा तीन जिल्दों के अतिरिक्त समग्र कार्य मैक्स मूलर के जीवनकाल में ही प्रकाशित हो चुका था। मैक्स मूलर ने 'भारतीय दर्शन' पर भी रचनाएँ की थीं। अंतिम दिनों वह बौद्ध दर्शन में अधिक रुचि रखने लगा था तथा जापान में मिले अनेक बौद्ध दार्शनिक ग्रंथों की गवेषणा में दत्तचित्त था।


Friedrich Max Müller (6 December 1823 – 28 October 1900), generally known as Max Müller, was a German-born philologist and Orientalist, who lived and studied in Britain for most of his life. He was one of the founders of the western academic field of Indian studies and the discipline of comparative religion.Müller wrote both scholarly and popular works on the subject of Indology. The Sacred Books of the East, a 50-volume set of English translations, was prepared under his direction. He also promoted the idea of a Turanian family of languages.



Friedrich Max Müller was born into a cultivated family on 6 December 1823 in Dessau, the son of Wilhelm Müller, a lyric poet whose verse Franz Schubert had set to music in his song-cycles Die schöne Müllerin and Winterreise. His mother, Adelheid Müller (née von Basedow), was the eldest daughter of a prime minister of Anhalt-Dessau. Carl Maria von Weber was a godfather.


Müller was named after his mother's elder brother, Friedrich, and after the central character, Max, in Weber's opera Der Freischütz. Later in life, he adopted Max as a part of his surname, believing that the prevalence of Müller as a name made it too common. His name was also recorded as "Maximilian" on several official documents (e.g. university register, marriage certificate),[citation needed] on some of his honours and in some other publications.


Müller entered the gymnasium (grammar school) at Dessau when he was six years old. In 1839, after the death of his grandfather, he was sent to the Nicolai School at Leipzig, where he continued to his studies of music and classics. It was during his time in Leipzig that he frequently met Felix Mendelssohn.


In need of a scholarship to attend Leipzig University, Müller successfully sat his abitur examination at Zerbst. While preparing, he found that the syllabus differed from what he had been taught, necessitating that he rapidly learn mathematics, modern languages and science. He entered Leipzig University in 1841 to study philology, leaving behind his early interest in music and poetry. Müller received his degree in 1843. His final dissertation was on Spinoza's Ethics.He also displayed an aptitude for classical languages, learning Greek, Latin, Arabic, Persian and Sanskrit.


In 1850 Müller was appointed deputy Taylorian professor of modern European languages at Oxford University. In the following year, at the suggestion of Thomas Gaisford, he was made an honorary M.A. and a member of the college of Christ Church, Oxford. On succeeding to the full professorship in 1854, he received the full degree of M.A. by Decree of Convocation. In 1858 he was elected to a life fellowship at All Souls' College.


He was defeated in the 1860 election for the Boden Professor of Sanskrit, which was a "keen disappointment" to him. Müller was far better qualified for the post than the other candidate (Monier Monier-Williams), but his broad theological views, his Lutheranism, his German birth and lack of practical first-hand knowledge of India told against him. After the election he wrote to his mother, "all the best people voted for me, the Professors almost unanimously, but the vulgus profanum made the majority".


Later in 1868, Müller became Oxford's first Professor of Comparative Philology, a position founded on his behalf. He held this chair until his death, although he retired from its active duties in 1875.


In 1869 Müller was elected to the French Académie des Inscriptions et Belles-Lettres as a foreign correspondent (associé étranger).


In June 1874 Müller was awarded the Pour le Mérite (civil class), much to his surprise. Soon after, when he was commanded to dine at Windsor, he wrote to Prince Leopold to ask if he might wear his Order, and the wire came back, "Not may, but must."


In 1875 Müller was awarded the Bavarian Maximilian Order for Science and Art. The award is given to acknowledge excellent and outstanding achievements in the field of science and art. In a letter to his mother dated 19 December, Müller wrote that the award was more showy than the Pour le Mérite, "but that is the best".


In 1896 Müller was appointed a member of the Privy Council.
Müller became a naturalized British citizen in 1855, at the age of 32.


He married Georgina Adelaide Grenfell on 3 August 1859. The couple had four children – Ada, Mary, Beatrice and Wilhelm Max – of whom two predeceased them.


Georgina (died 1919) had his papers and correspondence bound; they are at the Bodleian Library, Oxford.
Müller's health began deteriorating in 1898 and he died at his home in Oxford on 28 October 1900. He was interred at Holywell Cemetery on 1 November 1900.


After his death a memorial fund was opened at Oxford for "the promotion of learning and research in all matters relating to the history and archaeology, the languages, literatures, and religions of ancient India".


The Goethe Institutes in India are named Max Müller Bhavan in his honour, as is a street (Max Mueller Marg) in New Delhi.


Müller's biographies include those by Lourens van den Bosch (2002), Jon R. Stone (2002) and Nirad C. Chaudhuri (1974), the last of which was awarded the Sahitya Akademi Award for English by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Stephen G. Alter's (2005) work contains a chapter on Müller's rivalry with the American linguist William Dwight Whitney.