नरेन्द्र देव (जन्म- 31 अक्टूबर, 1889)

October 31, 2017

नरेन्द्र देव (जन्म- 31 अक्टूबर, 1889, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 19 फ़रवरी, 1956, मद्रास) भारत के प्रसिद्ध विद्वान, समाजवादी, विचारक, शिक्षाशास्त्री और देशभक्त थे। अपने पिता के प्रभाव से ही इनका राजनीति की ओर झुकाव हुआ था। नरेन्द्र देव गरम विचारों के व्यक्ति थे। वे सन 1916 से 1948 तक 'ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी' के सदस्य रहे थे। देश की आज़ादी के लिए इन्होंने कई बार जेल यात्राएँ भी कीं और जवाहरलाल नेहरू के साथ अहमदनगर क़िले में भी बन्द रहे। नरेन्द्र जी का व्यक्तित्व बड़ा ही असाधारण था। वे हिन्दी, संस्कृत, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, पाली आदि भाषाओं पर समान अधिकार रखते थे। बौद्ध दर्शन के अध्ययन आदि में उनकी विशेष रुचि थी।


परिचय
नरेन्द्र देव का जन्म 31 अक्टूबर, 1889 ई. को सीतापुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनके पिता का नाम बलदेव प्रसाद था, जो एक प्रसिद्ध वकील थे। नरेन्द्र जी के बचपन का नाम अविनाशी लाल था। कुछ समय बाद उनके पिता अपने पैतृक नगर फैजाबाद वापस आ गए और यहीं पर अविनाशी लाल का बचपन बीता। इनके पिता के एक मित्र ने इनका नाम बदलकर नरेन्द्र देव रख दिया। घर का वातावरण धार्मिक और सामाजिक रूप में चेतना सजग था। इसके फलस्वरूप नरेन्द्र देव को अपने घर पर ही स्वामी रामतीर्थ, पंडित मदनमोहन मालवीय जैसे महानुभावों के दर्शन हुए। यहीं से उनके अंदर भारतीय संस्कृति के प्रति अनुराग उत्पन्न हुआ और पिता के प्रभाव से राजनीति की ओर भी झुकाव हो गया। आचार्य जी जीवन पर्यन्त दमे के मरीज रहे। इसी रोग के कारण 19 फ़रवरी, 1956 ई. को मद्रास (वर्तमान चेन्नई) के एडोर में उनका निधन हो गया। वे अपने मित्र और मद्रास के तत्कालीन राज्यपाल श्रीप्रकाश के निमंत्रण पर स्वास्थ्य लाभ के लिए वहाँ गए थे।


अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद नरेन्द्र देव ने अपने व्यावसायिक जीवन के तहत सन 1920 तक फैजाबाद में वकालत की, परन्तु राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का 'असहयोग आंदोलन' आंरभ होते ही इन्होंने वकालत त्याग दी। बाद में पंडित जवाहरलाल नेहरू के परामर्श पर वे 'काशी विद्यापीठ' में अध्यापक होकर चले गए। सन 1926 में नरेन्द्र देव इस संस्था के कुलपति भी बन गए। यहीं पर श्रीप्रकाश ने आपको 'आंयार्य' सम्बोधन से पुकारना शुरू किया, जो जीवन पर्यन्त इनके नाम का अंग बना रहा।


आचार्य नरेन्द्र देव विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति की गतिविधियों में भाग लेने थे। वे अपने गरम विचारों के व्यक्तित्व के लिए जाने जाते थे। सन 1916 से 1948 तक वे 'ऑल इंड़िया कांग्रेस कमेटी' के सदस्य रहे थे। नेहरू जी के साथ 'कांग्रेस वर्किंग कमेटी' के भी वे सक्रिय सदस्य रहे।


सन 1930, 1932 और 1942 के आंदोलनों में आचार्य नरेन्द्र देव ने जेल यात्राएँ कीं। वे 1942 से 1945 तक जवाहरलाल नेहरू जी आदि के साथ अहमदनगर क़िले में भी बंद रहे। यहीं पर उनके पांड़ित्य से प्रभावित होकर नेहरूजी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "डिस्कवरी ऑफ़ इंड़िया" की पांडुलिपि में उनसे संशोधन करवाया।


कांग्रेस को समाजवादी विचारों की ओर ले जाने के उद्देश्य से सन 1934 में आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में 'कांग्रेस समाजावादी पार्टी' का गठन हुआ था। जयप्रकाश नारायण इसके सचिव थे। गांधीजी आचार्य का बड़ा सम्मान करते थे। पहली भेंट में ही उन्होंने आचार्य को 'महान नररत्न' बताया था। कांग्रेस द्वारा यह निश्चय करने पर कि उसके अंदर कोई अन्य दल नहीं रहेगा, समाजवादी पार्टी के अपने साथियों के साथ आचार्य नरेन्द्र देव ने भी कांग्रेस पार्टी छोड़ दी। पार्टी छोड़ने के साथ ही पार्टी के टिकट पर जीती विधान सभा से त्याग-पत्र देकर इन्होंने राजनीतिक नैतिकता का एक नया आदर्श उपस्थित किया था।


राजनीतिक चेतना और विद्वता का नरेन्द्र देव में असाधारण सामंजस्य था। वे संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, फ़ारसी, पाली, बंगला, फ़्रेंच और प्राकृत भाषाएँ बहुत अच्छी तरह जानते थे। 'काशी विद्यापीठ' के बाद आचार्य नरेन्द्र देव ने 'लखनऊ विश्वविद्यालय' और 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' के कुलपति के रूप में शिक्षा जगत पर अपनी छाप छोड़ी।


बौद्ध दर्शन के अध्ययन में नरेन्द्र देव की विशेष रुचि थी। इस विषय के अनेक ग्रंथ 'बौद्ध धर्म दर्शन' और 'अभिधर्म कोश' बहुत प्रसिद्ध हैं। आचार्य जी उच्च कोटि के वक्ता भी थे। उनके महत्त्वपूर्ण भाषणों के संकलन निम्नलिखित हैं-


राष्ट्रीयता औऱ समाजवाद
समाजवाद : लक्ष्य तथा साधन
सोशालिस्ट पार्टी औऱ मार्क्सवाद
भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास
युद्ध और भारत
किसानों का सवाल



आचार्य नरेन्द्र देव ने 'संघर्ष' औऱ 'समाज' नामक साप्ताहिकों, 'जनवाणी' मासिक एवं 'विद्यापीठ' त्रैमासिक पत्रिका का संपादन भी किया।


Acharya Narendra Dev (About this sound pronunciation (help·info) was born on 30 October 1889 in Sitapur Uttar Pradesh.He was one of the leading theorists of the Congress Socialist Party in India. His democratic socialism renounced violent means as a matter of principle and embraced the satyagraha as a revolutionary tactic. Dev was first drawn to nationalism around 1915 under the influence of B G Tilak and Aurobindo Ghosh. As a teacher he became interested in Marxism and Buddhism. He was active in the Hindi language movement. He was a key leader of Congress Socialist Party from its founding in 1934 and was imprisoned several times during the freedom struggle. He was at times a member of the Uttar Pradesh legislative assembly. From 6 December 1951 to 31 May 1954 he served as Vice Chancellor of Faizabad University. He was one of the most respected vice chancellors of that University. Helped by Nirmal Chandra Chaturvedi, Executive Councillor and a prominent educationist of the state, he started a number of projects for the expansion of the University} Narendra Dev advocated the abolition of poverty and exploitation not just through the Marxist materialist dialectic but especially on moral and humanistic grounds. Furthermore, he insisted that "without political democracy social democracy was a sham". Dev was active in the peasant movement and served as president of the All-India Kisan Congress.


He remained associated with the Socialist Party and its successor, the Praja Socialist Party, until his death in 1956.
Prime Minister Rajiv Gandhi has said: "Acharya Narnedra Dev was one of the greatest sons of India and the nation owes a great debt to him."


The Narendra Dev University of Agriculture and Technology was named in his honour in 1975.


In an emotional obituary in Rajya Sabha, Jawaharlal Nehru said:


The death of Acharya Narendra Dev is something much bigger for many of us and, I think, for the country than just the passing away of an important person. He was a man of rare distinction--distinction in many fields--rare in spirit, rare in mind and intellect, rare in integrity of mind and otherwise. Only his body failed him. I do not know if there is any person present here in this House who was associated with him for a longer period than I was. Over 40 years ago we came together and we shared innumerable experiences together in the dust and heat of the struggle for independence and in the long silence of prison life where we spent--I forget now--four or five years together at various places, and inevitably got to know each other intimately; and so, for many of us, it is a grievous loss and a grievous blow, even as it is a grievous loss for our country. There is the public sense of loss and there is the private sense of loss and a feeling that somebody of rare distinction has gone and it will be very difficult to find his like again.
He had been professor at Kashi Vidyapeeth and Vice Chancellor of Faizabad University, Lucknow University and Banaras Hindu University.He died at the age of 67 in 19 February 1956 in Madrass