अमृता प्रीतम (मृत्यु: 31 अक्टूबर, 2005)

October 31, 2017

अमृता प्रीतम ( जन्म: 31 अगस्त, 1919 पंजाब (पाकिस्तान) – मृत्यु: 31 अक्टूबर, 2005 दिल्ली) प्रसिद्ध कवयित्री, उपन्यासकार और निबंधकार थीं जिन्हें 20वीं सदी की पंजाबी भाषा की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री माना जाता है। इनकी लोकप्रियता सीमा पार पाकिस्तान में भी बराबर है। इन्होंने पंजाबी जगत में छ: दशकों तक राज किया। अमृता प्रीतम ने कुल मिलाकर लगभग 100 पुस्तकें लिखी हैं जिनमें उनकी चर्चित आत्मकथा 'रसीदी टिकट' भी शामिल है। अमृता प्रीतम उन साहित्यकारों में थीं जिनकी कृतियों का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। अपने अंतिम दिनों में अमृता प्रीतम को भारत का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान पद्म विभूषण भी प्राप्त हुआ। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से पहले ही अलंकृत किया जा चुका था।


जीवन परिचय
अमृता प्रीतम का जन्म 1919 में गुजराँवाला (पंजाब- पाकिस्तान) में हुआ था। बचपन लाहौर में बीता और शिक्षा भी वहीं पर हुई। इन्होंने पंजाबी लेखन से शुरुआत की और किशोरावस्था से ही कविता, कहानी और निबंध लिखना शुरू किया। अमृता जी 11 साल की थी तभी इनकी माताजी का निधन हो गया, इसलिये घर की ज़िम्मेदारी भी इनके कंधों पर आ गयी। ये उन विरले साहित्यकारों में से है जिनका पहला संकलन 16 साल की आयु में प्रकाशित हुआ। फिर आया 1947 का विभाजन का दौर, इन्होंने विभाजन का दर्द सहा था, और इसे बहुत क़रीब से महसूस किया था, इनकी कई कहानियों में आप इस दर्द को स्वयं महसूस कर सकते हैं। विभाजन के समय इनका परिवार दिल्ली में आ बसा। अब इन्होंने पंजाबी के साथ-साथ हिन्दी में भी लिखना शुरू किया। इनका विवाह 16 साल की उम्र में ही एक संपादक से हुआ, ये रिश्ता बचपन में ही माँ-बाप ने तय कर दिया था। यह वैवाहिक जीवन भी 1960 में, तलाक के साथ टूट गया। अमृता प्रीतम ने लम्बी बीमारी के बाद 31 अक्टूबर, 2005 को अपने प्राण त्यागे। वे 86 साल की थीं और दक्षिणी दिल्ली के हौज़ ख़ास इलाक़े में रहती थीं। अब वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कविताएँ, कहानियाँ, नज़्में और संस्मरण सदैव ही हमारे बीच रहेंगे। अमृता प्रीतम जैसे साहित्यकार रोज़-रोज़ पैदा नहीं होते, उनके जाने से एक युग का अन्त हुआ है। अब वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका साहित्य हमेशा हम सबके बीच में ज़िन्दा रहेगा और हमारा मार्गदर्शन करता रहेगा।


1960 में अपने पति से तलाक के बाद, इनकी रचनाओं में महिला पात्रों की पीड़ा और वैवाहिक जीवन के कटु अनुभवों का अहसास को महसूस किया जा सकता है। विभाजन की पीड़ा को लेकर इनके उपन्यास पिंजर पर एक फ़िल्म भी बनी थी, जो अच्छी ख़ासी चर्चा में रही। इन्होंने लगभग 100 पुस्तकें लिखीं और इनकी काफ़ी रचनाएं विदेशी भाषाओं में भी अनूदित हुई हैं।


कहानी संग्रह
सत्रह कहानियाँ
सात सौ बीस क़दम
10 प्रतिनिधि कहानियाँ
चूहे और आदमी में फ़र्क़
दो खिड़कियाँ



ये कहानियाँ जो कहानियाँ नहीं हैं
उपन्यास
कैली कामिनी और अनीता
यह कलम यह काग़ज़ यह अक्षर
ना राधा ना रुक्मणी
जलते बुझते लोग
जलावतन
पिंजर
संस्मरण
कच्चा आँगन
एक थी सारा
कविता संग्रह
अमृत लहरें (1936)
जिन्दा जियां (1939)
ट्रेल धोते फूल (1942)
ओ गीता वालियां (1942)
बदलम दी लाली (1943)
लोक पिगर (1944)
पगथर गीत (1946)
पंजाबी दी आवाज़(1952)
सुनहरे (1955)
अशोका चेती (1957)
कस्तूरी (1957)
नागमणि (1964)
इक सी अनीता (1964)
चक नाबर छ्त्ती (1964)
उनीझा दिन (1979)


आत्मकथा
अक्षरों के साये
रसीदी टिकट
सम्मान और पुरस्कार


अमृता जी को कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया, जिनमें प्रमुख हैं 1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1958 में पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा पुरस्कार, 1988 में बल्गारिया वैरोव पुरस्कार; (अन्तर्राष्ट्रीय) और 1982 में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार। वे पहली महिला थीं जिन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और साथ ही साथ वे पहली पंजाबी महिला थीं जिन्हें 1969 में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया।


साहित्य अकादमी पुरस्कार (1956)
पद्मश्री (1969)
डॉक्टर ऑफ़ लिटरेचर (दिल्ली युनिवर्सिटी- 1973)
डॉक्टर ऑफ़ लिटरेचर (जबलपुर युनिवर्सिटी- 1973)
बल्गारिया वैरोव पुरस्कार (बुल्गारिया – 1988)
भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार (1982)
डॉक्टर ऑफ़ लिटरेचर (विश्व भारती शांतिनिकेतन- 1987)
फ़्रांस सरकार द्वारा सम्मान (1987)
पद्म विभूषण (2004)



Amrita Pritam About this sound listen (help·info) (31 August 1919 – 31 October 2005) was an Indian writer and poet, who wrote in Punjabi and Hindi. She is considered the first prominent woman Punjabi poet, novelist, and essayist, and the leading 20th-century poet of the Punjabi language, who is equally loved on both sides of the India-Pakistan border. With a career spanning over six decades, she produced over 100 books of poetry, fiction, biographies, essays, a collection of Punjabi folk songs and an autobiography that were translated into several Indian and foreign languages.


She is most remembered for her poignant poem, Ajj aakhaan Waris Shah nu (Today I invoke Waris Shah – "Ode to Waris Shah"), an elegy to the 18th-century Punjabi poet, an expression of her anguish over massacres during the partition of India. As a novelist, her most noted work was Pinjar (The Cage) (1950), in which she created her memorable character, Puro, an epitome of violence against women, loss of humanity and ultimate surrender to existential fate; the novel was made into an award-winning film, Pinjar in 2003.


When the former British India was partitioned into the independent states of India and Pakistan in 1947, she migrated from Lahore, to India, though she remained equally popular in Pakistan throughout her life, as compared to her contemporaries like Mohan Singh and Shiv Kumar Batalvi.


Known as the most important voice for the women in Punjabi literature, in 1956, she became the first woman to win the Sahitya Akademi Award for her magnum opus, a long poem, Sunehade (Messages),later she received the Bharatiya Jnanpith, one of India's highest literary awards, in 1982 for Kagaz Te Canvas (The Paper and the Canvas). The Padma Shri came her way in 1969 and finally, Padma Vibhushan, India's second highest civilian award, in 2004, and in the same year she was honoured with India's highest literary award, given by the Sahitya Akademi (India's Academy of Letters), the Sahitya Akademi Fellowship given to the "immortals of literature" for lifetime achievement.