राज कुमार ( मृत्यु- 3 जुलाई 1996 )

July 03, 2017

राज कुमार ( जन्म- 8 अक्तूबर 1926 बलूचिस्तान (अब पाकिस्तान में), मृत्यु- 3 जुलाई 1996 मुम्बई) हिन्दी फ़िल्मों में एक भारतीय अभिनेता थे। इनका नाम कुलभूषण पंडित था लेकिन फ़िल्मी दुनिया में ये अपने दूसरे नाम 'राज कुमार' के नाम से प्रसिद्ध हैं। पारम्परिक पारसी थियेटर की संवाद अदाइगी को इन्होंने अपनाया और यही उनकी विशेष पहचान बनी। इनके द्वारा अभिनीत प्रसिद्ध फ़िल्मों में पैग़ाम, वक़्त, नीलकमल, पाकीज़ा, मर्यादा, हीर रांझा, सौदाग़र आदि हैं।


जीवन परिचय
राज कुमार का जन्म बलूचिस्तान (अब पाकिस्तान में) प्रांत में 8 अक्तूबर 1926 को एक मध्यम वर्गीय कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद राज कुमार मुम्बई के माहिम पुलिस में बतौर दारोग़ा काम करने लगे। राज कुमार मुम्बई के जिस थाने मे कार्यरत थे वहाँ अक्सर फ़िल्म उद्योग से जुड़े लोगों का आना-जाना लगा रहता था।अपने संजीदा अभिनय से लगभग चार दशक तक दर्शकों के दिल पर राज करने वाले महान अभिनेता राज कुमार 3 जुलाई 1996 के दिन इस दुनिया को अलविदा कह गए। एक बार पुलिस स्टेशन में फ़िल्म निर्माता कुछ जरूरी काम के लिए आए हुए थे और वह राज कुमार के बातचीत करने के अंदाज से काफ़ी प्रभावित हुए। उन्होंने राज कुमार को यह सलाह दी कि अगर आप फ़िल्म अभिनेता बनने की ओर क़दम रखे तो उसमें काफ़ी सफल हो सकते है। राज कुमार को फ़िल्म निर्माता की बात काफ़ी अच्छी लगी। इसके कुछ समय बाद राज कुमार ने अपनी नौकरी छोड़ दी और फ़िल्मों में बतौर अभिनेता बनने की ओर अपना रुख़ कर लिया। वर्ष 1952 में प्रदर्शित फ़िल्म रंगीली मे सबसे पहले बतौर अभिनेता राज कुमार को काम करने का मौक़ा मिला। वर्ष 1952 से वर्ष 1957 तक राज कुमार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। फ़िल्म रंगीली के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वह उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने 'अनमोल सहारा- 1952, 'अवसर- 1953', 'घमंड- 1955', 'नीलमणि- 1957', 'कृष्ण सुदामा- 1957' जैसी कई फ़िल्मों र्मे अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर सफल नहीं हुई।


वर्ष 1957 में प्रदर्शित महबूब ख़ान की फ़िल्म मदर इंडिया में राज कुमार गांव के एक किसान की छोटी सी भूमिका में दिखाई दिए। हालांकि यह फ़िल्म पूरी तरह अभिनेत्री नरगिस पर केन्द्रित थी फिर भी राज कुमार अपनी छोटी सी भूमिका में अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फ़िल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति भी मिली और फ़िल्म की सफलता के बाद राज कुमार बतौर अभिनेता फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए।  दुनिया जानती है कि राजेश्वर सिंह जब दोस्ती निभाता है तो अफ़साने बन जाते हैं मगर दुश्मनी करता है तो इतिहास लिखे जाते है 
वर्ष 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पैग़ाम' में उनके सामने हिन्दी फ़िल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे लेकिन राज कुमार ने यहाँ भी अपनी सशक्त भूमिका के ज़रिये दर्शकों की वाहवाही लूटने में सफल रहे। इसके बाद राज कुमार 'दिल अपना और प्रीत पराई-1960', 'घराना- 1961', 'गोदान- 1963', 'दिल एक मंदिर- 1964', 'दूज का चांद- 1964' जैसी फ़िल्मों में मिली कामयाबी के ज़रिये राज कुमार दर्शको के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसी स्थिति में पहुँच गये जहाँ वह फ़िल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म काजल की जबर्दस्त कामयाबी के बाद राज कुमार बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली। वर्ष 1965 बी.आर.चोपड़ा की फ़िल्म वक़्त में अपने लाजवाब अभिनय से वह एक बार फिर से अपनी ओर दर्शक का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहे। फ़िल्म वक़्त में राज कुमार का बोला गया एक संवाद "चिनाय सेठ जिनके घर शीशे के बने होते है वो दूसरों पे पत्थर नहीं फेंका करते या फिर चिनाय सेठ ये छुरी बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं हाथ कट जाये तो ख़ून निकल आता है" दर्शकों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुआ। फ़िल्म वक़्त की कामयाबी से राज कुमार शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुँचे। ऐसी स्थिति जब किसी अभिनेता के सामने आती है तो वह मनमानी करने लगता है और ख्याति छा जाने की उसकी प्रवृति बढ़ती जाती है और जल्द ही वह किसी ख़ास इमेज में भी बंध जाता है। लेकिन राज कुमार कभी भी किसी ख़ास इमेज में नहीं बंधे इसलिये अपनी इन फ़िल्मो की कामयाबी के बाद भी उन्होंने 'हमराज़- 1967', 'नीलकमल- 1968', 'मेरे हूजूर- 1968', 'हीर रांझा- 1970' और 'पाकीज़ा- 1971' में रूमानी भूमिका भी स्वीकार की जो उनके फ़िल्मी चरित्र से मेल नहीं खाती थी इसके बावजूद भी राज कुमार यहाँ दर्शकों का दिल जीतने में सफल रहे।


कमाल अमरोही की फ़िल्म पाकीज़ा पूरी तरह से मीना कुमारी पर केन्द्रित फ़िल्म थी इसके बावजूद राज कुमार ने अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों की वाहवाही लूटने में सफल रहे। फ़िल्म पाकीज़ा में राज कुमार का बोला गया एक संवाद "आपके पांव देखे बहुत हसीन हैं इन्हें ज़मीन पर मत उतारियेगा मैले हो जायेगें" इस क़दर लोकप्रिय हुआ कि लोग राज कुमार की आवाज़ की नक़्ल करने लगे। वर्ष 1978 में प्रदर्शित फ़िल्म कर्मयोगी में राज कुमार के अभिनय और विविधता के नए आयाम दर्शकों को देखने को मिले। इस फ़िल्म में उन्होंने दो अलग-अलग भूमिकाओं में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। अभिनय में एकरुपता से बचने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित करने के लिए राज कुमार ने अपने को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इस क्रम में वर्ष 1980 में प्रदर्शित फ़िल्म बुलंदी में वह चरित्र भूमिका निभाने से भी नहीं हिचके और इस फ़िल्म के जरिए भी उन्होंने दर्शको का मन मोहे रखा। इसके बाद राज कुमार ने 'कुदरत- 1981', 'धर्मकांटा- 1982', 'शरारा- 1984', 'राजतिलक- 1984', 'एक नयी पहेली- 1984', 'मरते दम तक- 1987', 'सूर्या- 1989', 'जंगबाज- 1989', 'पुलिस पब्लिक- 1990' जैसी कई सुपरहिट फ़िल्मों के ज़रिये दर्शको के दिल पर राज किया।


वर्ष 1991 में प्रदर्शित फ़िल्म सौदाग़र में राज कुमार के अभिनय के नये आयाम देखने को मिले। सुभाष घई की निर्मित फ़िल्म सौदाग़र में दिलीप कुमार और राज कुमार वर्ष 1959 में प्रदर्शित पैग़ाम के बाद दूसरी बार आमने सामने थे। फ़िल्म में दिलीप कुमार और राज कुमार जैसे अभिनय की दुनिया के दोनो महारथी का टकराव देखने लायक़ था। फ़िल्म सौदाग़र में राज कुमार का बोला एक संवाद "दुनिया जानती है कि राजेश्वर सिंह जब दोस्ती निभाता है तो अफ़साने बन जाते हैं मगर दुश्मनी करता है तो इतिहास लिखे जाते है" आज भी सिने प्रेमियों के दिमाग में गूंजता रहता है। ‘बूलंदी’ में ‘ना तलवार की धार से ना गोलियों की बौछार से...'आज भी हमारे दिलों में गूंजता है।


राज कुमार ने 'दिल एक मंदिर' और 'वक़्त' के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार प्राप्त किया।


Raaj Kumar (8 October 1926 – 3 July 1996), born as Kulbhushan Pandit, was an Indian film actor. He worked as sub-inspector of Mumbai Police in the late 1940s before he turned to acting with the 1952 Hindi film Rangeeli.He appeared in the Oscar-nominated 1957 film Mother India and went on to star in over 70 Hindi films in a career that spanned over four decades.



Raaj Kumar was born in Panjgur, Balochistan, Pakistan in a Kashmiri Pandit family.In the late 1940s he moved to Mumbai, India where he became Sub-inspector of the Mumbai Police.[citation needed] He married Jennifer, an Anglo-Indian, whom he met on a flight where she was the air hostess. She later changed her name to Gayatri as per Hindu customs.[3] They had three children, sons Puru Raajkumar (a Bollywood actor), Panini Raajkumar and daughter Vastavikta Pandit, who made her screen debut in 2006 film Eight: The Power of Shani.



Raaj Kumar made his acting debut in the 1952 film Rangili and appeared in films like Aabshar, Ghamand and Lakhon Mein Ek, but it was as Prince Naushazad in Sohrab Modi’s Nausherwan-E-Adil (1957) that he became famous. In 1957, he achieved prominence with his brief role as the husband of Nargis in Mother India. He followed this with the unglamorous role of a mill worker in Paigham (1959) alongside Dilip Kumar. In Sridhar’s Dil Ek Mandir (1963), Raaj Kumar played the role of a cancer patient for which he won the Filmfare Award in the Best supporting actor category.[5]He was cast with Sunil Dutt, Shashi Kapoor and Balraj Sahni in Yash Chopra’s family drama Waqt in 1965. [6] He became known for his distinct style of dialogue delivery.


His other notable films included Hamraaz (1967), Heer Raanjha (1971), Maryada (1971), Lal Patthar (1971) and Pakeezah (1972). After a period of flops in the late 1970s and early 1980s, he had notable successes as a supporting actor in Kudrat (1981), Ek Nai Paheli (1984), Marte Dam Tak (1987), Muqaddar Ka Faisla (1987) and Jung Baaz (1989). In 1991, he reunited with fellow veteran actor Dilip Kumar after 32 years in Subhash Ghai's Saudagar. His last hit film was the 1992 film Tirangaa and his final film was 1995's God & Gun.


From his screen debut in Rangili in 1952 to his last film God & Gun in 1995, he played memorable characters in 60-odd films.
The greatest actor of all time died at the age of 69 due to throat cancer[8][9] According to Purru Raaj Kumar in his interview to Farhana Farook, his father suffered from Hodgkins for which he had chemotherapy. The last two years were bad with the nodes recurring in the lungs and ribs.


Filmography
Year Title Role Notes
1952 Rangeeli
1953 Aabshar
1955 Ghamand
1957 Mother India Shamu
1957 Krishna Sudama
1957 Nausherwan-E-Adil Naushazad / Joseph
1957 Neel Mani
1958 Dulhan
1958 Panchayat Mohan
1959 Durga Mata
1959 Paigham Ram Lal Nominated, Filmfare Best Supporting Actor Award
1959 Shararat Suraj
1959 Ardhangini prakash
1959 Swarg Se Sundar Desh Hamara
1959 Ujala Kalu
1960 Dil Apna Aur Preet Parai Dr. Sushil K. Verma
1961 Gharana Kailash
1963 Dil Ek Mandir Ram Filmfare Best Supporting Actor Award
1963 Godaan Hori
1963 Phool Bane Angarey Capt. Rajesh
1963 Pyar Ka Bandhan kalu
1964 Zindagi Gopal
1965 Waqt Raja Filmfare Best Supporting Actor Award
1965 Kaajal Moti Nominated, Filmfare Best Actor Award
Nominated, Filmfare Best Supporting Actor Award


1965 Oonche Log Inspector Shreekant
1965 Rishte Naate Sundar
1967 Hamraaz Captain Rajesh
1967 Nai Roshni Jyoti
1968 Mere Huzoor Nawab Salim
1968 Neel Kamal Chitrasen Nominated, Filmfare Best Supporting Actor Award
1968 Vaasna kailash
1970 Heer Raanjha Ranjha
1971 Lal Patthar Kumar Bahadur Gyan Shankar Rai
1971 Maryada Raja Babu / Raj Bahadur
1972 Pakeezah Salim Ahmed Khan
1972 Dil Ka Raja Raja Bichitra Singh / Raju
1973 Hindustan ki kasam Rajib
1974 36 Ghante Editor Ashok Rai
1976 Ek Se Badh Kar Ek shankar
1978 Karmayogi Shanker / Mohan
1980 Bulundi Professor Satish Khurana
1980 Chambal Ki Kasam Thakur Suraj Singh
1981 Kudrat Choudhury Janak Singh
1982 Dharam Kanta Thakur Bhavani Singh
1984 Ek Nai Paheli Upendranath
1984 Raaj Tilak Samadh Khan
1984 Sharara (film) Raj kumar
1987 Itihaas Joginder Singh
1987 Marte Dam Tak S.I. Rane / Rana
1987 Muqaddar Ka Faisla Pandit Krishnakant
1988 Mahaveera DSP Karamvir / Don
1988 Mohabbat Ke Dushman Rehemat Khan
1988 Saazish Kailash
1989 Desh Ke Dushman
1989 Jung Baaz Krishan Prasad
1989 Galiyon Ka Badshah Ram / Raja
1989 Suryaa: An Awakening Rajpal Chauhan
1990 Police Public Jagmohan Azad
1991 Saudagar Rajeshwar Singh
1993 Tirangaa Brigadier Suryadev Singh
1993 Insaniyat Ke Devta Jailer Rana Pratap Singh
1993 Police Aur Mujrim Police Commissioner Veer Bahadur Singh
1994 Ulfat Ki Nayee Manzilen
1994 Betaaj Badshah Prithvi Raj
1995 Jawab Ashwani Kumar Saxena
1995 God and Gun Saheb Bahadur Rathore