मनोज कुमार पांडेय (मृत्यु: 3 जुलाई, 1999)

July 03, 2017

कैप्टन मनोज कुमार पांडेय ( जन्म: 25 जून, 1975 - मृत्यु: 3 जुलाई, 1999) परमवीर चक्र से सम्मानित भारतीय व्यक्ति है। इन्हें यह सम्मान सन 1999 में मरणोपरांत मिला। पाकिस्तान के साथ कारगिल का युद्ध बहुत से कारणों से विशेष कहा जाता है। एक तो यह युद्ध बेहद कठिन और ऊँची चोटियों पर लड़ा गया, जो बर्फ से ढकी और दुर्गम थीं, साथ ही यह युद्ध पाकिस्तान की लम्बी तैयारी का नतीजा था जिसकी योजना उसके मन में बरसों से पल रही थीं। इसी युद्ध के कठिन मोर्चों में एक मोर्चा खालूबार का था जिसको फ़तह करने के लिए कमर कस कर कैप्टन मनोज कुमार पांडे अपनी 1/11 गोरखा राइफल्स की अगुवाई करते हुए दुश्मन से जूझ गई और जीत कर ही माने। भले ही, इस कोशिश में उन्हें अपने प्राणों का बलिदान देना पड़ा।


जीवन परिचय
मनोज कुमार पांडे का जन्म 25 जून 1975 उत्तर प्रदेश राज्य के सीतापुर ज़िले के रुधा गाँव में हुआ था। उनके पिता गोपीचन्द्र पांडे तथा उनकी माँ के नाम मोहिनी था। मनोज की शिक्षा सैनिक स्कूल लखनऊ में हुई और वहीं से उनमें अनुशासन भाव तथा देश प्रेम की भावना संचारित हुई जो उन्हें सम्मान के उत्कर्ष तक ले गई। वह शुरू से ही एक मेधावी छात्र थे और खेल-कूद में भी बड़े उत्साह से भाग लेते थे। दरअसल उसकी इस प्रकृति के मूल में उनकी माँ की प्रेरणा थी। वह इन्हें बचपन से ही वीरता तथा सद्चरित्र की कहानियाँ सुनाया करती थीं और वह मनोज का हौसला बढ़ाती थीं कि वह हमेशा सम्मान तथा यश पाकर लौटें।


मनोज की माँ का आशीर्वाद और मनोज का सपना सच हुआ और वह बतौर एक कमीशंड ऑफिसर ग्यारहवां गोरखा राइफल्स की पहली बटालियन में पहुँच गए। उनकी तैनाती कश्मीर घाटी में हुई। ठीक अगले ही दिन उन्होंने अपने एक सीनियर सेकेंड लेफ्टिनेंट पी. एन. दत्ता के साथ एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भरा काम पूरा किया। यही पी.एन दत्ता एक आतंकवाडी गुट से मुठभेड़ में शहीद हो गए, और उन्हें अशोक चक्र प्राप्त हुआ जो भारत का युद्ध के अतिरिक्त बहादुरी भरे कारनामे के लिए दिया जाने वाला सबसे बड़ा इनाम है। एक बार मनोज को एक टुकड़ी लेकर गश्त के लिए भेजा गया। उनके लौटने में बहुत देर हो गई। इससे सबको बहुत चिंता हुई। जब वह अपने कार्यक्रम से दो दिन देर कर के वापस आए तो उनके कमांडिंग ऑफिसर ने उनसे इस देर का कारण पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया, 'हमें अपनी गश्त में उग्रवादी मिले ही नहीं तो हम आगे चलते ही चले गए, जब तक हमने उनका सामना नहीं कर लिया।' इसी तरह, जब इनकी बटालियन को सियाचिन में तैनात होना था, तब मनोज युवा अफसरों की एक ट्रेनिंग पर थे। वह इस बात से परेशान हो गये कि इस ट्रेनिंग की वजह से वह सियाचिन नहीं जा पाएँगे। जब इस टुकड़ी को कठिनाई भरे काम को अंजाम देने का मौका आया, तो मनोज ने अपने कमांडिंग अफसर को लिखा कि अगर उनकी टुकड़ी उत्तरी ग्लेशियर की ओर जा रही हो तो उन्हें 'बाना चौकी' दी जाए और अगर कूच सेंट्रल ग्लोशियर की ओर हो, तो उन्हें 'पहलवान चौकी' मिले। यह दोनों चौकियाँ दरअसल बहुत कठिन प्रकार की हिम्मत की माँग करतीं हैं और यही मनोज चाहते थे। आखिरकार मनोज कुमार पांडेय को लम्बे समय तक 19700 फीट ऊँची 'पहलवान चौकी' पर डटे रहने का मौका मिला, जहाँ इन्होंने पूरी हिम्मत और जोश के साथ काम किया।


मनोज कुमार पांडेय ने निर्णायक युद्ध के लिए 2-3 जुलाई 1999 को कूच किया जब उनकी 1/11 गोरखा राइफल्स की 'बी कम्पनी को खालूबार को फ़तह करने का जिम्मा सौंपा गया। मनोज पाँचवें नम्बर के प्लाटून कमाण्डर थे और उन्हें इस कम्पनी की अगुवाई करते हुए मोर्चे की ओर बढ़ना था। जैसे ही यह कम्पनी बढ़ी वैसे ही उनकी टुकड़ी को दोनों तरह की पहाड़ियों की जबरदस्त बौछार का सामना करना पड़ा। वहाँ दुश्मन के बंकर बाकायदा बने हुए थे। अब मनोज का पहला काम उन बंकरों को तबाह करना था। उन्होंने तुरंत हवलदार भीम बहादुर की टुकड़ी को आदेश दिया कि वह दाहिनी तरफ के दो बंकरो पर हमला करके उन्हें नाकाम कर दें और वह खुद बाएँ तरफ के चार बंकरों को नष्ट करने का जिम्मा लेकर चल पड़े। मनोज ने निडर होकर बोलना शुरू किया। और एक के बाद एक चार दुश्मन को मार गिराया। इस कार्यवाही में उनके कँधे और टाँगे तक घायल हो गई अब वह तीसरे बंकर पर धावा बोल रहे थे। अपने घावों की परवाह किए बिना वह चौथे बंकर की ओर बढ़े। उन्होंने जोर से गोरखा पल्टन का हल्ला लगाया और चौथे बंकर की ओर एक हैण्ड ग्रेनेड फेंक दिया। तभी दुश्मन की एक मीडियम मशीन गन से छूटी हुई होली उनके माथे पर लगी। उनके हाथ से फेंके हुए ग्रेनेड का निशाना अचूक रहा और ठीक चौथे बंकर पर लगा उसे तबाह कर गया लेकिन मनोज कुमार पांडे भी उसी समय धराशायी हो गए। मनोज कुमार पांडेय की अगुवाई में की गई इस कार्यवाही में दुश्मन के 11 जवान मारे गए और छह बंकर भारत की इस टुकड़ी के हाथ आ गए। उसके साथ ही हथियारों और गोलियों का बड़ा जखीरा भी मनोज की टुकड़ी के कब्जे में आ गया। उसमें एक एयर डिफैस गन भी थी। 6 बंकर कब्जे में आ जाने के बाद तो फ़तह सामने ही थी और खालूबार भारत की सेना के अधिकार में आ गया था। मनोज पांडे की शहादत ने उसके जवानों को इतना उत्तेजित कर दिया था कि वह पूरी दृढ़ता और बहादुरी से दुश्मन पर टूट पड़े थे और विजयश्री हथिया ली थी। मनोज कुमार पांडे 24 वर्ष की उम्र जी देश को अपनी वीरता और हिम्मत का उदाहरण दे गए। भले ही उनके साथी कहते रहे कि उन्होंने कभी बचपन के आनन्द से मुँह नहीं मोड़ा, लेकिन देश के प्रति वह इतना गम्भीर समर्पण जी गए, जिसको कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।


Captain Manoj Kumar Pandey, PVC (25 June 1975 – 3 July 1999), was an Indian Army officer of 1/11 Gorkha Rifles who was posthumously awarded India's highest military honour, the Param Vir Chakra, for his audacious courage and leadership during the Kargil War in 1999. He died during the attack on Jubar Top, Khalubar Hills in Batalik Sector, Kargil. His actions have led to him being referred to as the "Hero of Batalik".


Manoj Pandey was born on 25 June 1975 in Rudha village, Sitapur district, Uttar Pradesh, India. He was the son of Shri Gopi Chand Pandey, a small-time businessman living in Lucknow. He was eldest in his family. He was educated at Uttar Pradesh Sainik School, Lucknow and Rani Laxmi Bai Memorial Senior Secondary School. He had a keen interest in sports with boxing and body building in particular. He was adjudged the best cadet of junior division NCC of Uttar Pradesh directorate in 1990. He graduated from the National Defence Academy in 90th course and belonged to MIKE squadron. He commissioned into the 1st battalion, 11 Gorkha Rifles (1/11 GR).


Prior to his selection, during his Services Selection Board (SSB) interview, the interviewer asked him, "Why do you want to join the Army?" He immediately replied, "I want to win the Param Vir Chakra." True to his words, Captain Manoj Kumar Pandey did win the country's highest gallantry honour but posthumously.


He forced back the intruders on 11 June 1999 at Batalik Sector in the Kargil War. He led his men to capture the Jubar top which was considered as important due to its strategic location. Quickly sizing up the situation, the young officer led his platoon along a narrow, treacherous ridge that led to the enemy position. While still short of the objective, the enemy fired upon the Indian soldiers effectively stalling the Indian attack. Displaying great courage, he surged ahead of his troops and charged at the enemy with a full-throated battle cry through a hail of bullets.


Although wounded in the shoulder and leg, he pressed on his solitary charge with grim determination, until he closed in on the first bunker. Then in ferocious hand-to-hand combat, he killed two of the enemy and cleared the first bunker. It was the turning point. Inspired by their leader's spontaneous valour, the troops charged at the enemy and fell upon them. Unmindful of his grievous wounds, he rushed from bunker to bunker urging his men on. Critically injured, he collapsed at the final bunker and finally succumbed to his injuries. But by this time he had already captured the bunker with his men.
Captain Manoj Kumar Pandey took part in a series of boldly led attacks during Operation Vijay; forcing back the intruders with heavy losses in Batalik including the capture of Jubar Top.


On the night of 3 July 1999 during the advance to Khalubar as his platoon approached its final objective, it came under heavy and intense enemy fire from the surrounding heights.Captain Pandey was tasked to clear the interfering enemy positions to prevent his battalion from getting day lighted, being in a vulnerable position. He quickly moved his platoon to an advantageous position under intense enemy fire, sent one section to clear the enemy positions from the right and himself proceeded to clear the enemy positions from the left.


Fearlessly assaulting the first enemy position, he killed two enemy personnel and destroyed the second position by killing two more. He was injured on the shoulder and legs while clearing the third position. Undaunted and without caring for his grievous injuries, he continued to lead the assault on the fourth position urging his men and destroyed the same with a grenade, even as he got a fatal burst on his forehead.


His last words were "Na chhodnu" ("don't spare them" in Nepali). This singular daredevil act of Captain Pandey provided the critical firm base for the companies, which finally led to capture of Khalubar. The officer, however, succumbed to his injuries. Captain Manoj Kumar Pandey, thus, displayed most conspicuous bravery, indomitable courage, outstanding leadership and devotion to duty and made the supreme sacrifice in the highest traditions of the Indian Army.